लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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महाराष्ट्र सूबे के एक साधारण कार्यकर्ता से उठकर भारतीय जनता पार्टी के सिंहासन पर आरूढ होने वाले नितिन गडकरी का नाम जैसे ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चला, सभी चौंक गए थे। संघ के वरदहस्त के चलते उनकी ताजपोशी भी हो गई। जब लोगों ने गडकरी की उमर और पहनावा देखा तो लोगों को लगा कि आने वाले समय में भाजपा अपना चाल, चरित्र और चेहरा बदलने जा रही है। गडकरी अपेक्षाकृत युवा अध्यक्ष और कुर्ता पायजामा या धोती कुर्ता से इतर आज के परिवेश के हिसाब से पतलून कमीज पहनने के आदी हैं। शायद ही कोई हो जिसने गडकरी को नेतागिरी की परंपरागत पोषाक में देखा हो।

देखा जाए तो नितिन गडकरी स्वयं भी जनाधार वाले नेता नहीं कहे जा सकते हैं। कल तक विदर्भ की राजनीति करने वाले एक शख्स को अनायास ही उठाकर राष्ट्रीय परिदृश्य में बिठा दिया जाए वह भी मुखिया बनाकर तो उसे अपने आप को इसके अनुरूप ढालने में समय लगना लाजिमी है। चाहे जो भी हो पर एक बात तो उभरकर सामने आ ही गई है कि गडकरी को भले ही दिल्ली में धसके किले की कमान सौंपी गई हो पर वे नागपुर का अपना मोह नहीं छोड पा रहे हैं। अध्यक्ष बनने की अनाधिकारिक घोषणा के उपरांत उनका ज्यादा से ज्यादा समय नागपुर में ही बीता है। नागपुर में संघ का मुख्यालय भी है, मगर यह इतर बात है। देखा जाए तो गडकरी को अपना समय दिल्ली सहित अन्य सूबों में ही बिताना चाहिए था, वस्तुत: जो गडकरी ने किया नहीं।

इसके अलावा भले ही गडकरी मिशन 2014 लेकर चल रहे हों, पर उनके अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा की धार वैसी ही बोथरी नजर आ रही है, जैसी कि पहले थी। केंद्र सरकार नित नए मामले दे रही है, विपक्ष को जिनको मुद्दा बनाकर भाजपा चाहे तो सडकों पर उतर सकती है। मंहगाई ही एक एसा मुद्दा है, जिस पर कांग्रेस को घेरा जा सकता है। भाजपा के साथ विडम्बना यह है कि अब भाजपा में रीढ विहीन लोगों को कमान सौंपी गई है, जिससे आम जनता के साथ जुडने की बात उनके जेहन में आ ही नहीं रही है। भाजपा के पिछले चंद सालों के आचरण को देखकर यह कहा जा सकता है कि भाजपा द्वारा अब भी एसा ही माना जा रहा है कि वह सत्ता में है, और चारों ओर रामराज्य है।

बहरहाल टीम गडकरी को देखकर साफ लगने लगा है कि भाजपा अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तैयार किए गए रोडमेप पर सवारी गाठने को तैयार है। पार्टी के संसदीय बोर्ड में मुसलमानों की जिस कदर उपेक्षा और हिन्दुत्व के लिए आग उगलने वाले वरूण गांधी को जिस तरह का वजन दिया गया है, उससे साफ हो गया है कि भाजपा अब हिन्दुत्व के मुद्दे को जोरदारी से उठाने की तैयारी में है। लोग यह अवश्य ही कह रहे हों कि भाजपा अपने गांधी (वरूण) को कांग्रेस के गांधी (राहुल) की काट के लिए तैयार कर ही है, पर राहुल के सामने वरूण का कद और सोच काफी बौनी ही नजर आती है।

महिलाओं के मामले में टीम गडकरी ने बाजी मार ली है। 13 महिलाओं को आसनी प्रदान कर गडकरी ने महिलाओं में एक अच्छा संदेश देने का प्रयास किया है, किन्तु दूसरी ओर राजस्थान की पूर्व निजाम वसुंधरा राजे को महासचिव जैसी महती जवाबदारी देकर नितिन गडकरी खुद की बखिया उधडवाने से नहीं बच पाएंगे। वसुंधरा राजे वे ही हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के न केवल संगीन आरोप लगे थे, वरन उन्होंने पार्टी के संसदीय बोर्ड के आदेशों को धता बताते हुए विधायक दल के नेता का पद नहीं छोडा था। ये वे ही वसुंधरा हैं, जिन्होंने भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह को नाकों चने चबवा दिए थे। इसी तरह विनय कटियार जो कल तक भाजपा के खिलाफ जहर उगल रहे थे, उन्हें महत्वपूर्ण आसन दिया गया है। वहीं भाजपा के थिंक टैंक रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल की भी गडकरी ने उपेक्षा की है। माना जा रहा था कि प्रहलाद पटेल की सकारात्मक सोच का लाभ पार्टी को मिल सके इसलिए उन्हें संसदीय बोर्ड में स्थान दिया जाना चाहिए था।

वैसे टीम गडकरी पहले की तुलना में काफी जवान दिख रही है। इसमें अनेक क्षत्रों को पूरी तरह उपेक्षित रखा जाना समझ से परे ही है। बिहार जहां इस साल चुनाव होने हैं, वहां से पर्याप्त नेतृत्व नहीं दिख रहा है। दक्षिण और पूर्वोत्तर भी कमजोर ही प्रतीत हो रहा है। दक्षिण से अनंत कुमार के अलावा किसी और को नहीं लिए जाने के प्रतिकूल परिणाम पार्टी को भुगतना पड सकता है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मध्य प्रदेश से अलबत्ता दो महसचिव बना दिए गए हैं, माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को काबू में करने इस तरह का काम किया गया हो। वैसे भी शिवराज सिंह चौहान का कद एकाएक राष्ट्रीय परिदृश्य में बढता प्रतीत हो रहा है। उधर मुक्त कंठ से नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने के बाद भी उन्हें संसदीय बोर्ड में स्थान न देने का कारण समझ से ही परे है।

देखा जाए तो टीम गडकरी में वरूण गांधी, नवजोत सिंह सिध्दू, सरोज पांडे, वाणी त्रिपाठी, मुरली धर राव, धर्मेंद्र प्रधान जैसे युवा तो विजय गोयल, अनंत कुमार, थांवर चंद गहलोत, अर्जुन मुण्डा, नरेंद्र तोमर, जगत प्रसाद जैसे अनुभवी लोगों का शुमार है। पर एक बात अभी भी अनुत्तरित है कि आखिर नितिन गडकरी को ग्लेमर की मदद लेने की क्या जरूरत पड गई। भीड जुटाने वाली ड्रीम गर्ल हेमा मलिनी को उपाध्यक्ष तो छोटे पर्दे की अदाकारा स्मृति ईरानी को सचिव बनाया गया है। इसके अलावा किरण खेर और शायना एनसी को कार्यकारिणी सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। रूपहले पर्दे के इन अदाकारों के साथ भीड तो जुटाई जा सकती है, किन्तु भीड को वोट में तब्दील करने की जादुगरी के लिए गडकरी को मंझे हुए चाणक्य ही चाहिए होंगे, जिनकी कमी साफ तौर पर परिलक्षित हो रही है।

गडकरी ने किसके कहने पर इस तरह की टीम का गठन किया है, इस बात को वे ही बेहतर जानते होंगे किन्तु टीम गडकरी की घोषणा के साथ ही अब इसके खिलाफ असंतोष का लावा खदबदाने लगा है। लोग दबी जुबान से यह भी कह रहे हैं कि जिन लोगों को टीम गडकरी में उपकृत किया गया है, वे जनाधारविहीन लोग ही हैं, और इनके सहारे 10 फीसदी वोट बैंक बढाने की बात सोचना भी बेमानी ही होगा। महासचिव और उपाध्यक्ष की फेहरिस्त में ही आधा दर्जन राज्य सभा सदस्य हैं। थांवर चंद गहलोत और विजय गोयल लोकसभा तो धर्मेंद प्रधान विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। योग्य और सक्षम लोगों के बजाए जिन लोगों को टीम गडकरी में स्थान मिला है, उससे असंतोष पनपना स्वाभाविक ही है, अब देखना यह है कि इस सबसे संघ के मानस पुत्र नितिन गडकरी कैसे निपट पाते हैं।

-लिमटी खरे

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