लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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gandhiगाँधी जी ने इग्लैंड की पार्लियामेंट को ‘बाँझ और वेश्या’ कहा था। बाद सें उन्होंने वेश्या शब्द को विलोपित कर दिया था। लेकिन उनका आरोप सही था। आज भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी ये दोनों शब्द अप्रासंगिक नही हैं। हमारी संसद जनहित में अनेक निर्णय तो करती है लेकिन वे कार्यरूप में परिणत नही हो पाते। पार्लियामेंट में अब जैसे लोग चुन कर जा रहे हैं, उसे देख कर हैरत होती है। अब आम आदमी संसद नही पहुँच सक ता। या तो वंश परंपरा से आने वाले लोग पहुँचते हैं या फिर करोड़पति-अरबपति। ब्रिटिश पार्लियामेंट के बारे में गाँधी जी ने लिखा था कि ”जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए। ब्रिटिश पार्लियामेंट महज प्रजा का खिलौना है।” आज भी कमोबेश वही हालत है। पार्लियामेंट की व्यवस्था में करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन देश की जनता की बेहतरी कितनी हो पाती है? उल्टे संसद की कार्रवाइयों के जो दृश्य सामने आते हैं, वे कई बार नाट्य मंचों या टीवी चैनलों में प्रस्तुत होने वाले नाटकीय दृश्यों जैसे ही फूहड़ लगते हैं।

हमारा संविधान लोकमंगल की भावना से भरा पड़ा है लेकिन व्यावहारिक धरातल पर अमल न हो पाने के कारण लोकतंत्र मजाक-सा लगने लगता है। बातें तो बड़ी अच्छी है, मगर वे सार्थक न हो सकें तो उसका औचित्य ही क्या? हमारी नई यांत्रिक सभ्यता का यही चरित्र है कि वह बातें बड़ी-बड़ी करती है, लेकिन काम फूटी कौड़ी का नहीं। यंत्रों में अगर संवेदनाएँ होती तो शायद वे कुछ करती भी। इसी तरह जो मनुष्य यंत्रवत हो चुके हैं, उनसे हम कल्याण की उम्मीद नहीं कर सकते। इसीलिए मेरा यही मानना है, कि इस नई यांत्रिक सभ्यता ने हमें हृदयहीन बना कर रख दिया है। अभी तो ये अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है। यह शुरुआत है। जो मंजर अभी दीख रहे हैं, उससे भविष्य की विसंगतियों का अनुमान लगाया जा सकता है। अगर भारतीय समाज को बचाना है तो उसे गाँधी के रास्ते पर ही चलना होगा। भले ही वह गाँधीवाद को पचा न पाए, गाँधीगीरी जैसे हाजमोलाई शब्द ही काम चलाए लेकिन हमें गाँधी के निकट तो आना ही पड़ेगा क्यों कि गाँधी लाख दुखों की एक दवा है। इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। इससे घबराने की जरूरत नहीं। हम आधुनिक बनें, यंत्रों की दुनिया के बीच जीएँ (मोबाइल और इंटरनेट से हमारा कितना गहरा रिश्ता बन चुका है) मगर गाँधी के उन वचनों को न भूल जाएँ जो उन्होंने मनुष्यता को बचाने के लिए हिंद स्वराज्य में कहे हैं।

प्रस्तुत है गिरीश पंकज जी द्वारा लिखा  ’हिंद स्वराज्य’ विषय पर  लेख की दुसरी किस्त ,  पुरा  लेख तीन किश्तों में है, जैसा कि ज्ञात रहे प्रवक्ता ने हिन्द स्वराज विषय पर व्यापक चर्चा शुरु किया है। संपादक को अपेक्षा है कि पाठक इस चर्चा में शामिल होकर इस नया आयाम देंगे…

आज भारतीय समाज पश्चिम की ओर मुँह करके चल रहा है इसीलिए ठोकरें का रहा है। कदम-कदम पर गिर रहा है। संस्कृति की चुनरी उड़ कर कहाँ चली गई पता ही नहीं चला। नैतिकता का जूता कब का फट चुका है। सभ्यता के वस्त्र तार-तार हो चुके हैं। सब कुछ दिखने लगा है। जो चीजें ढँकी रहती थीं, अब उन्हें ही दिखाया जा रहा है। बर्बादी को जैसे पारिवारिक-सामाजिक स्वीकृति मिल गई है। हिंद स्वराजज्य में जो दिशा दिखाई गई है, जो जीवन-सूत्र दिए गए हैं, उसके सहारे हम क्यों नहीं चल सकते? अगर ऐसा कर सकते तो एक नैतिक समाज की स्थापना में आसानी होती। लेकिन अब ऐसा संभव नहीं दिखता। लगता है, कि हम लोग बहुत आगे निकल आए हैं। आज की नई सभ्यता में अराजकता है, असंकारिता है। निर्लज्जता है। गाँधी ने हिंद की सभ्यता को सबसे अच्छी सभ्यता निरूपित किया था। यूरोप की सभ्यता को उन्होंने चार दिन की चाँदनी कहा था। सौ साल पहले गाँधी ने भारतीय समाज की यूरोपीय संस्कृति के प्रति अंधी आसक्ति देख कर कहा था, कि अँगरेजों की सभ्यता को बढ़ावा दे कर हमने जो पाप किया उसे धो डालने के लिए हमें मरने तक भी अंदमान में रहना पड़े तो वह कुछ ज्यादा नहीं होगा। सौ साल पहले गाँधी जी ने जिस पाप की ओर इशारा किया था, उस पाप का घड़ा तो कब का लबालब भर चुका है लेकिन फूटने का नाम नहीं ले रहा। उल्टे इस घड़े को बचाने की मुहिम-सी चल रही है। नए भारतीय मानल को देख कर हैरत होती है। सोचना पड़ता है, कि कया इसी देश में कभी महावीर, गौतम, नानक, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, गाँधी, बिनोबा आदि महापुरुष जन्में थे? आने वाली पीढियों को यकीन ही नहीं होगा। वे समझेंगी कि ये सब मिथक है। काल्पनिक पात्र है। भविष्य में जैसा क्रूर समाज विकसित होगा, उसमें यह संभव है।

यह नई यांत्रिक सभ्यता हमे और पतित करेगी। रिश्तों के मामले में हम धीरे-धीरे कृपण होते जा रहे हैं। पशुवत आचरण की खबरें आए दिन छपती ही रहती हैं। सम्पत्ति-विवाद के कारण भाई ने भाई को मार डाला। बेटे ने पिता की हत्या कर दी। आधुनिक सभ्यता ने हमें शिक्षित तो किया है, सुशिक्षित नहीं। हिंद स्वराज्य में गाँधी ने इस बाबत अँगरेज विद्वान हक्सले के कथन का हवाला दिया हैं, जिसमें हक्सले कहते हैं कि उसी आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है जिसकी बुद्धि शुद्ध, शांत और न्यायदर्शी है। उसने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके मन की भावनाएँ बिल्कुल शुद्ध हैं। जिसे नीच कामों से नफरत है और जो दूसरे को अपने जैसा मानता है। हक्सले के इन कथनों के बरअक्स आज की शिक्षा और इसके फलितार्थों को देख लें। पढ़े-लिखे लोगों के न तो मन शुद्ध हैं, न शांत है और न प्रेम से भरे हुए हैं। वे लोग अपने ही लोगों से नफरत करते हैं। अपराध और अपराधी तक हाइटेक हो चुके हैं।

ऐसा पढ़ा-लिखा समाज किस काम का जो हिंसा करता है और बेचैन नहीं होता?

नफरत करता है और ग्लानि से नहीं भरता?

किसी को नीचा दिखाने का उपक्रम करता है और दुखी नहीं होता?

समकालीन शिक्षा हमें केवल सूचित करती है, सुशिक्षित नहीं करती। हमारा विवेक जागृत नहीं करती। यही इसकी सबसे बड़ी कमी है। विवेक जागरण के लिए विद्यालयीन शिक्षा की जरूरत नहीं। इसके लिए नैतिक शिक्षा अनिवार्य बने। समता-ममता के पाठ पढ़ाएँ जाएँ। अब जो नई शिक्षा व्यवस्था लादी जा रही है, उसमें मनुष्य को केवल यंत्र बनाने की व्यवस्था है। वेतन के पैकजों की ही भाषा है। पढ़ा-लिखा युवा रोबोट की तरह काम कर लेता है। तगड़ी कमाई कर लेता है। ईष्र्या के लिए बाध्य करने वाला भौतिक वैभव प्राप्त कर लेता है लेकिन वह अपने माता-पिता से को वृद्धाश्रम में भेज देता है, अपने भाई-बंधुओं से तन और मन दोनों से ही दूर हो जाता है। रिश्तों की हत्या करके भी हम सभ्य कहला रहे हैं तो यह बिल्कुल नई सभ्यता है, जिसकी आहट गाँधी ने सुन ली थी, और जिसकी गहन चिंता उन्होंने हिंद स्वराज्य में की है। गाँधी ऐसी शिक्षा के कायल नहीं थे। वे चाहते थे, कि पढ़-लिख कर लोग मनुष्य भी बनें। लोग अपने नैतिक कर्तव्यों को भी समझें। लेकिन अब नया दौर है। अब गिव्ह एंड टेक का जमाना है। यूज एंड थ्रो की अप-संस्कृति जोरों पर ही। यह नया समाज हैरत में डाल देने वाला है। आदिम युग से उठ कर मानव यहाँ तक पहँच गया है, लेकिन उसकी प्रवृत्तियाँ आदिम ही बनी हुई है। उसकी हरकतों में वे मूल्य दृष्टव्य नहीं होते जो यह साबित करें कि वह सभ्यता के नये आलोक में जी रहा है। विकास और विनाश में अंतर करना कठिन हो रहा है। इसका असली कारण यही है कि तमाम चिंताओं एवं प्रयासों के बावजूद पिछली शताब्दी में हम नैतिक मूल्यों की दृष्टि से निरंतर अवनति को ही प्राप्त हुए हैं। हिंद स्वराज्य को पढ़ कर उस दौर के भारत को भी समझा जा सकता है। जैसे पहले ही अध्याय में गाँधी जी एक जगह कहते हैं,कि स्वराज्य भुगतने वाली प्रजा अपने बुजुर्गां का तिरस्कार नहीं कर सकती। अगर दूसरों की इज्ज्त करने की आदत खो बैठेंगे तो हम निकम्मे हो जाएँगे। जो प्रौढ़ और तजुर्बेकार हैं, वे ही स्वराज्य को भुगत सकते हैं न कि बे-लगाम लोग। क्या यही है हमारी नयी सभ्यता? इस पर विचार की ज़रुरत है. (क्रमश..)

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