लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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दिनेश पंत

जो स्‍वयं एक इतिहास हो, जो किसी देश की परम्‍परा, पुराण, से जुड़ी हो, जिसे विशिष्ठ नदी होने का गौरव हासिल हो, जिससे देश की जनता ही नहीं विदेशी भी प्यार करते हों, जो देश की समृद्धि से जुड़ी हो, जो लोगों की आशा-निराशा, हार-जीत, यश गौरव से जुड़ी हो, जिसने किसी देश की विविधता भरी संस्कृति का पोषण किया हो, जो सभी नदियों का नेतृत्व करती हो, जिसे माँ का दर्जा मिला हो, जिसने चट्टानों और हिमघाटियों से निकल कर मैदानों को सजाया-संवारा हो, जिसने लोगों की प्यास बुझाई, खेतों में ही नहीं घरों में भी हरियाली लहराई हो, यहां उसी मुक्तिदायिनी, जीवनदायिनी गंगा की बात हो रही है। गंगा भारत वर्षे भातृरूपेण संस्थिता/नमस्तस्यै नमस्तस्यै नम: नम: जैसे गुणगान करते-करते नहीं थकते।

यह भगीरथ की वहीं गंगा है जिसमें डुबकियां लगाने भर से सारे पाप धुल जाते हैं, इसी जीवनदायिनी गंगा के लिए ‘अब राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते-धोते’ जैसे जुमले आम हो चले हैं। राजा भगीरथ के कठोर तप से प्रकटित गंगा की धारा ने जाने कितनों का उद्धार किया। उसी तप से निर्मित जीवनदायिनी गंगा को आज खुद उद्धारक की जरूरत आन पड़ी है। अपने उद्गम स्थल गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक इस पतित पावनी गंगा का हाल यह है कि इसमें कूड़ा-करकट, अपशिष्ट पदार्थों के साथ ही 6440 मिलियन लीटर गंदा पानी व 5044 मिलियन लीटर सीवेज भी प्रतिदिन समाहित हो रहा है। इसी गंगा में जिन मछलियों की 140, सरीसृपों की 42 प्रजातियां पोषित हो रही थी, प्रदूषण ने न सिर्फ इनके जीवन को संकट में डाला है बल्कि गंगा जल ग्रहण क्षेत्र जो विशाल जैव विविधता वाला क्षेत्र भी रहा है, अब संकट में है।

गंगा एक्शन प्लान लागू होने के बाद जो सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बने, वह उत्सर्जन भी नदियों में ही फेंका गया। आज से चार वर्ष पूर्व जब जापान की इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेन्सी ने गंगा-यमुना को लेकर जो अध्ययन किया। उस अघ्ययन रिपोर्ट के मुताबिक गौमुख से गंगा सागर तक गंगा के प्रदूषण का 80 प्रतिशत सीवरेज, 17 प्रतिशत फैक्ट्रियों के उत्सर्जन व 3 प्रतिशत अन्य स्रोतों से हो रहा है। नगर हों या फिर ऋषिकेश, हरिद्वार में गंगा के किनारे बसे सैकड़ों आश्रमों की गंदगी में यहीं समाहित हो रही है। ऐसा नहीं है कि गंगा को बचाने के मानवीय प्रयास नहीं हुए। गंगा तो मैली होनी अंग्रेजों के समय से ही शुरू हो गई थी। गंगा की दुर्दशा से द्रवित होकर 1916 में पं. मदन मोहन मालवीय ने गंगा की शुद्धता के लिए आंदोलन चलाया था, लेकिन आजादी के बाद आधुनिक विकास के नाम पर कल-कारखाने खुलने शुरू हुए। कस्बों व नगरों में रहने वालों की संख्या बढ़ी और उसी के अनुपात में कूड़ा-करकट व रसायनिक अपशिष्टों में भी बढ़ोत्तारी हुई और यह सब गंदगी गंगा में समाहित होती चली गई। उसके बाद गंगा मैली दर मैली होती चली गई और उसे साफ करने के प्रयास नहीं के बराबर हुए।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जिन्होंने खुद गंगा की महिमा पर लिखा था, ‘हिमालय और गंगा का नाम आते ही आम भारतीय के मन में उसकी पवित्र और मनोहारी छवि उतर आती है।’ उन्हीं के प्रधानमंत्रीत्तव काल में भी गंगा कम मैली व प्रदूषित नहीं हुई थी, लेकिन उसे बचाने के लिए शायद ही कोई ठोस कदम उठाया हो। आजाद भारत में सरकारें बदलती रही, विकास होता रहा, कल-कारखाने खुलते रहे, कस्बों व नगरों का विकास होता रहा। गंगा किनारे लोग बसते रहे। गंगा इनकी हर तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति करती रही। पीने के लिए पानी दिया, सिंचाई के लिए पानी दिया। खेतों को उपजाऊ बनाया, खूब धन्य-धान्य उगा और लोग समृध्दि की ओर बढ़ते चले गए लेकिन अपने इस पालनहार गंगा को ही भूल गए।

अगर गंगा को इस भूल भूल्लैया से निकालने का प्रयास किसी ने किया तो उनमें एक प्रमुख नाम था एम.सी.मेहता। इस मैग्सेसे अवार्ड विजेता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और यहां एक अर्जी दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता को देखते हुए सरकार पर दबाव डाला और गंगा को प्रदूषण से न बचाने पर लताड़ लगाई। सुप्रीम कोर्ट के इसी सख्त रूख के बाद सर्वप्रथम केंद्र स्तर पर गंगा एक्शन प्लान बना। लेकिन सरकारी मशीनरी की रफ्तार व इच्छाशक्ति के अभाव में यह एक्शन प्लान सफेद हाथी ही साबित हुआ। 1500 करोड़ रूपए तब से अब तक गंगा को शुद्व करने के नाम पर खर्च कर दिए गए लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। मेग्सेसे अवार्ड विजेता मेहता के इस कदम का असर यह रहा कि गंगा को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी, कई संगठन गंगा को बचाने के लिए आगे आने लगे। इसने भी सरकार पर दवाव बढ़ाने का काम किया।

गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए योग गुरू बाबा रामदेव के नेतृत्व में गंगा रक्षा मंच द्वारा चलाया गया अभियान हो, विश्व विरादरी द्वारा भारत जागृति मिशन के तहत गंगा रक्षा पंचायतों का आयोजन हो या फिर पर्यावरणविद् जेडी अग्रवाल, सुंदरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट या उत्ताराखंड के विभिन्न संगठनों द्वारा चलाए जा रहे नदी बचाओ अभियान हों। इनके द्वारा जो प्रयास किए गए उसी का यह परिणाम रहा कि केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय नदी घोषित किया। अब गंगा को शीतल बनाने के लिए नए सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाने की बात हो रही है। पिछले अनुभवों से मिली शिक्षा के आधार पर केंद्र सरकार ने गंगा की सफाई और इसके संरक्षण के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है। इसी के तहत वर्श 2009 में नेशनल गंगा रिवर बेसिन ऑथारिटी की स्थापना की गई। जिसे यह सुनिश्चित करने के लिए एक बहु क्षेत्रीय प्रोग्राम तैयार करने का कार्य सौंपा गया है कि वर्श 2020 के बाद अपशिष्‍ट जल को गंगा में बहने से कैसे रोका जाए। इसके साथ ही भारत सरकार गंगा की सफाई के लिए विश्व बैंक व जापान सरकार के सहयोग से 1अरब 500 करोड़ की व्यवस्था कर रही है। लेकिन फिर भी यहां देखना यह होगा कि इसका हाल भी केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की भांति न हो। हालांकि अगर सरकार इच्छा शक्ति रखे तो गंगा की पवित्रता फिर से वापस तो लाई ही जा सकती है। जब लंदन की प्रदूषित टेम्स नदी साफ-सुथरी हो सकती है। वहां की शान बन सकती है। तो फिर लोगों के दिलो-दिमाग में बस चुकी गंगा क्यों नहीं अपनी पवित्रता को वापस पा सकती है? गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर सक्रियता दिखाने और फिर खामोशी ओढ़ लेने से जिम्मेदारी से तो नहीं बचा जा सकता। अपनी उद्गम स्थल गंगोत्री से जो गंगा दो धाराओं मंदाकिनी व अलकनंदा में बंटती है वहां से यह देवप्रयाग गढ़वाल में भले ही एक होती हो। फिर हिमालय से निकलकर ऋषिकेश के मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हो फिर यहां से यह दक्षिण पूर्व दिशा में टेढ़ी-मेढ़ी बहती हुई छोटी नदियों को अपने में मिलाती हुई 2510 किमी. की लंबी यात्रा कर खाड़ी में गंगा गंगासागर के समुद्र में जा मिलती है। इस दौरान यह अपनी सहायक नदियों के साथ मिलकर दस लाख वर्ग किलोमीटर अति विशाल उपजाउ भूमि का निर्माण करती है। परंतु गौमुख से गंगासागर तक हर जगह गंगा प्रदूषित है, इस सच से तो इंकार नहीं किया जा सकता।

पुराणों की कथाओं में जाएं तो कपिल मुनि के शाप से भस्मीभूत राजा सागर के पुत्रों के शीपोद्वार के लिए भगीरथ ने कठोर श्रम किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ और तब से न जाने इस गंगा में डुबकी लगाकर कितने लोगों ने अपने पाप धोये। डुबकी तो भगीरथ की इस गंगा में आज भी जारी है। गंगा नदी के तट पर स्थित हरिद्वार में हो रहे महाकुंभ में तो हर रोज लाखों लोग डुबकी लगा रहे हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि लोगों की जीवन रेखा रही गंगा की जीवन रेखा तो कम होती जा रही है। भगीरथ ने अपने प्रयासों से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित तो कर दिया लेकिन इसकी पवित्रता को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकारों की ही नहीं वरन हमसब की होती है। अगर गंगा का अस्तित्व नहीं रहा तो उनका क्या होगा जो गंगा की बदौलत ही जी रहे हैं। जिनकी सुख-समृद्वि और अनवरत चलने वाली जीवन की धारा इसी पर टिकी है। (चरखा फीचर्स)

(लेखक उतराखंड में स्वंतत्र पत्रकार के रूप में कार्य करते हैं)

 

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