लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

Posted On by &filed under जन-जागरण, विविधा.


सभी पशुओं में गाय ऐसा प्राणी है जिसका भारत ही नहीं संसार के सभी लोग दुग्धपान हैं। भारत की धर्म व संस्कृति उतनी ही पुरानी है जितनी की यह सृष्टि। सृष्टि बनने के बाद परमात्मा ने प्रथम भारत में ही आदि सृष्टि  की थी। उस समय भारत या आर्यावर्त्त पूरे भूगोल में संसार का पहला देश था जो अस्तित्व में आया था। मनुष्यों की अमैथुनी उत्पत्ति कर ईश्वर ने आदि चार ऋषियों को एक-एक वेद का ज्ञान दिया जो एक प्रकार से ईश्वर, जीव व प्रकृति अथवा ज्ञान, कर्म, उपासना व विज्ञान के मुख्य ग्रन्थ हैं। इस ज्ञान के साथ संस्कृत भाषा का ज्ञान भी ईश्वर ने इन चार ऋषियों को दिया था। यदि ईश्वर ज्ञान न देता तो मनुष्यों में यह सामर्थ्य नहीं था कि वह कभी भी कोई भाषा बना पाते। भाषा न होती तो मनुष्यों का एक दिन भी निर्वाह नहीं हो सकता था। आप एक मनुष्य के बच्चे की कल्पना कीजिए। यदि बच्चे के माता-पिता और सगे-सम्बन्धी-इष्ट-मित्र आदि न हों तो क्या वह बच्चा जीवित रहेगा। अब यह तो बच्चे की बात है, ईश्वर भी जानता था कि यदि वह मनुष्य को बच्चों को रूप में जन्म देगा तो उनका पालन करने के लिए माता पिता चाहियें। परन्तु आरम्भ में माता पिता कहां से आते, अतः इसका निदान परमात्मा ने मनुष्यों को युवावस्था में उत्पन्न कर किया। अब पालन करने की समस्या तो हल हो गई परन्तु वह आपस में मुंह से बोलकर व्यवहार कैसे करें, इसके लिए भाषा की आवश्यकता थी। भाषा वह सभी आदि मनुष्य बना नहीं सकते थे और भाषा के बिना व्यवहार चल नहीं सकता था, अतः ईश्वर ने ही, जो कि सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वान्तर्यामी है, अपने अन्तर्यामी स्वरूप से जीवात्माओं के हृदय के भीतर भाषा का ज्ञान दिया और वह आपस में बोलने व व्यवहार करने लगे। इनमें से ही चार ऋषियों को परमात्मा ने चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अर्थववेद का ज्ञान दिया था।

 

विचार करने पर व वैदिक साहित्य के प्रमाणों से यह ज्ञात होता है कि यह सृष्टि तथा गो आदि प्राणी परमात्मा ने हम मनुष्यों के जीवन को स्वस्थ, सुखी, समृद्ध तथा स्वादिष्ट आहार प्रदान करने आदि के लिये बनाये हैं। गाय जैसा हितकारी प्राणी शायद ही संसार में दूसरा कोई हो। अन्य सब प्राणियों व पदार्थों के अपने-अपने उपयोग व लाभ हो सकते हैं, किसी का कुछ कम व किसी का कुछ अधिक। गाय से हमें गोदुग्ध मिलता है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हितकर है। रोगों की रोकथाम व अनेक रोगों पर इसका रोगनिवारक प्रभाव होता है। यहां तक की बहुत से नेत्रान्ध व दृष्टिदोष से पीडि़त लोगों को बहुत लाभ हुआ है। हमने यह भी अनुभव किया है कि जो बच्चे गाय का दूध पीते हैं वह सामान्य रोगों से कम प्रभावित होते हैं जबकि भैंस आदि का दूध पीने वाले अधिक। इसका हमने अपने जीवन में स्वयं व मित्रों को प्रयोग कराकर देखा है। मनुष्य जब शिशु होता है, उस समय किन्हीं माताओं को पर्याप्त दूध न बनने की स्थिति में देशी गाय का दूध ही दिया जाता है और इससे बच्चा पूरा पोषण पाता है। गाय के बाद दूसरा स्थान बकरी का है। बकरी का दूध भी अनेक गुणों से भरपूर है। बकरी जो ओषधियां व उसके पत्ते खाती है, उसके प्रभाव से भी उसका दूध अनेक गुणों से युक्त होकर दुग्धपान करने वालों को नानाविध लाभ पहुंचाता है। शैशवकाल में उन बच्चों के जीवन की रक्षा गाय व गोदुग्ध से होती है जिनकी माताओं को पर्याप्त दूध प्राकृतिक कारणों से नहीं बनता है या किन्हीं परिस्थितियों वश माता का वियोग हो जाये। वृद्धावस्था में भी ऐसी स्थिति आती है जब कि मनुष्य के मुंह में दान्त नहीं होते तब अन्नादि पदार्थों को चबाने व उन्हें पचाने में कठिनाई होती है। ऐसी स्थिति में भी मनुष्य गाय के दूध को पीकर लम्बे समय तक सुखद जीवन व्यतीत कर सकता है। इससे गाय हम सब मनुष्यों की माता सिद्ध होती है। हमने यह भी पढ़ा है कि प्रसिद्ध समाजसेवी बिनोवा जी को कोई उदर रोग था जिससे उनका अन्न खाना वर्जित था। वह केवल दूध को ही आहार के रूप में लेते थे और वर्षों तक जीवित रहे और स्वस्थ रहते हुए देश व समाज के हित के प्रशंसनीय कार्य किये।

 

गाय से हमें जो दूघ मिलता है यह वस्तुतः अमृत है। जैसे स्वास्थ्यवर्धक गुण गाय के दूध में हैं, वह अन्य पदार्थों की तुलना में श्रेष्ठ हैं। गोदूग्ध से दही, मट्ठा, क्रीम, मक्खन, घृत, मावा आदि न जाने कितने खाद्य पदार्थ बनते हैं। यह सब पदार्थ स्वाद व पोषण की दृष्टि से भी अद्वितीय हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह पदार्थ सात्विक गुणों से युक्त हैं जिससे हमारे जीवन व व्यक्तित्व का समग्र विकास वा उन्नति होती है। भगवान कृष्ण व महर्षि दयानन्द जी का उदाहरण हमारे सामने हैं। यह दोनों युगमहापुरूष पूर्ण शाकाहारी व दुग्धाहारी थे। इनकी बौद्धिक उन्नति में जहां इनकी अनेक गुरूओं की संगति व विद्योपसना रही है वहीं दुग्धपान भी एक महत्वपूर्ण कारक था। दूसरी ओर जो मनुष्य दुग्ध का सेवन कम व सामिष भोजन जिसमें पशुओं का मांस, अधिक मिर्च, मसाले, तले हुए पदार्थ, फास्टफूड जैसे अन्न व भोजन का सेवन करते हैं उनमें रोगों की सम्भावना अधिक होती है। रोग एवं अल्पायु से बचने का सरलतम एवं कारगर एक ही उपाय है कि हम सामिष भोजन जो कि पूरी तरह से अमानवीय एवं ईश्वर व मानवता के प्रति कृतघ्नता का व्यवहार है, आज ही त्याग कर संकल्पपूर्व पूर्ण शाकाहारी एवं दुग्धाहारी बनें। यदि किसी परिवार में गोपालन की व्यवस्था की जा सकती है तो देशी नस्ल की अच्छी गायों को रखकर पूरे परिवार को उसका सेवन करना चाहिये। गोपाल व गोसेवा से अदृश्य धर्म लाभ भी होता है जिससे हमारा इस जन्म की मृत्यु के बाद का जीवन अर्थात् पुनर्जन्म अधिक श्रेष्ठ व सुखी मिलता है।

 

महर्षि दयानन्द ने गोरक्षा व गोपालन के महत्व को दर्शाने वाली एक लघु पुस्तिका गोकरूणानिधि लिखी है जो गो के महत्व पर विश्व के इतिहास में प्राचीनता, ऐतिहासिकता, प्रमाण एवं विवेचन की दृष्टि से अन्यतम है। बार-बार इसका पाठ करना चाहिये। इसमें महर्षि दयानन्द ने अपने हृदय को खोल कर प्रस्तुत किया है। गायों के प्रति उनके हृदय में कितना सम्मान, आदर व पूजा का भाव है, यह इस पुस्तक को पढ़ने से पाठकों को ज्ञात होगा। महर्षि दयानन्द में ज्ञान की जो पराकाष्ठा थी, उसके कारण वह गाय माता के अभूतपूर्व भक्त बने। इस पुस्तक में महर्षि दयानन्द ने आर्थिक आधार पर भी गाय से होने वाले लाभों की चर्चा व गणितीय गणना करते हुए बताया है कि एक गाय की एक पीढ़ी से 4,10,440 व्यक्ति एक बार के भर पेट भोजन से तृप्त होते हैं। इस पर भी यदि गाय की पीढ़ी-पर-पीढ़ी से होने वाले दुग्ध व बैलों से होने वाले कृषि के अन्न की गणना करें तो असंख्य प्राणियों को भोजन का लाभ एक गाय की अनेक पीढि़यों से होता है। इतना ही नहीं स्वामी दयानन्द जी लिखते हैं कि जितने आरोग्यकारक और बुद्धिवर्धक आदि गुण गाय के दुग्ध से होते हैं, उतने भैंस के दूध और भैंसे आदि से नहीं हो सकते। इसलिए आर्यों ने गाय को सर्वोत्तम पशु माना है। हम यह समझते हैं कि महर्षि दयानन्द ने जो गणना की है वह गणित के नियमों से पुष्ट होने के कारण भ्रान्तिरहित एवं सर्वमान्य तथ्य है। इस पर भी यदि भारत या इसके किसी राज्य किंवा विश्व के किसी देश में मांसाहार के लिए गोहत्या होती है तो वह मानवीय गुणों अंहिसा, दया, करूणा, प्रेम, स्नेह, उदारता, कृतज्ञता आदि के विरूद्ध होने से घोर अन्यायपूर्ण कार्य है। महर्षि दयानन्द ने यह भी लिखा है कि एक गाय की अनेक पीढि़यों से असंख्य लोगों का पालन होता है वहीं एक गाय को काट कर खाने से अधिक से अधिक 80 लोग एक बार में तृप्त हो सकते हैं। ‘‘देखों ! तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मार असंख्य मनुष्यों की हानि करना महापाप क्यों नहीं?’’ हम महर्षि के इस विचार से पूर्णतया सहमत हैं। महापाप का अर्थ महादुःख होना है। इस महापाप को करने वालों को यह महादुःख भावी जन्म जन्मान्तरों में अवश्य हि भोगना है, यह शास्त्रीय तर्कसंगत विचार व मान्यता है।

 

गोकरूणानिधि पुस्तक में महर्षि दयानन्द ने गाय से इतर बकरी का उल्लेख कर एक बकरी की एक पीढ़ी से 25,920 लोगों का एक समय का पर्याप्त भोजन होता है तथा इसकी पीढ़ी-पर-पीढ़ी के हिसाब से असंख्य लोगों का पालन होता है।  हम यहां महर्षि दयानन्द के कुछ बहुत ही उपयोगी विचारों को प्रस्तुत कर रहें हैं जिससे उनकी भावना का ज्ञान पाठकों हो सके। वह लिखते हैं कि ‘जैसे ऊंट- ऊंटनी से लाभ होते हैं, वैसे ही घोड़े-घोड़ी और हाथी आदि से अधिक कार्य सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार सुअर, कुत्ता, मुर्गा, मुर्गी और मोर आदि पक्षियों से भी अनेक उपकार होते हैं। जो मनुष्य हिरन और सिंह आदि पशु और मोर आदि पक्षियों से भी उपकार लेना चाहें तो ले सकते हैं, परन्तु सबकी रक्षा उत्तरोत्तर समयानुकूल होवेगी। वर्तमान में परमोपकारक गो की रक्षा में मुख्य तात्पर्य है। दो ही प्रकार से मनुष्य आदि का प्राणरक्षण, जीवन, सुख, विद्या, बल और पुरूषार्थ आदि की वृद्धि होती है–एक अन्नपान, दूसरा आच्छादन। इनमें से प्रथम के बिना तो सर्वथा प्रलय और दूसरे के बिना अनेक प्रकार की पीड़ा प्राप्त होती है।

 

देखिए, जो पशु निःसार घासतृण, पत्ते, फलफूल आदि खावें और दूध आदि अमृतरूपी रत्न देवें, हलगाड़ी आदि में चलके अनेक विध अन्न आदि उत्पन्न कर, सबके बुद्धि, बल, पराक्रम को बढ़ाके नीरोगता करें, पुत्रपुत्री और मित्र आदि के समान मनुष्यों के साथ विश्वास और प्रेम करें, जहां बांधे वहां बंधे रहें, जिधर चलावें उधर चलें, जहां से हटावें वहां से हट जावें, देखने और बुलाने पर समीप चले आवें, जब कभी व्याघ्रादि पशु वा माननेवाले को देखें, अपनी रक्षा के लिए पालन करनेवाले के समीप दौड़कर आवें कि यह हमारी रक्षा करेगा। जिसके मरे पर चमड़ा भी कांटों आदि से रक्षा करे, जगंल में चरके अपने बच्चे और स्वामी के लिए दूध देने के नियत स्थान पर नियत समय पर चलें आवें, अपने स्वामी की रक्षा के लिए तनमन लगावें, जिनका सर्वस्व राजा और प्रजा आदि मनुष्य के सुख के लिए है, इत्यादि शुभगुणयुक्त, सुखकारक पशुओं के गले छुरों से काटकर जो मनुष्य अपना पेट भर, सब संसार की हानि करते हैं, क्या संसार में उनसे भी अधिक कोई विश्वासघाती, अनुपकारक, दुःख देनेवाले और पापी मनुष्य होंगे?’

 

महर्षि आगे लिखते हैं कि इसीलिए यजुर्वेद के प्रथम ही मन्त्र में परमात्मा की आज्ञा है कि –अघ्न्या, ‘यजमानस्य पशून् पाहि हे मनुष्य ! तू पशुओं को कभी मत मार, और यजमान, अर्थात् सबको सुख देनेवाले मनुष्यों के सम्बन्धी पशुओं की रक्षा कर, जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होवे, इसीलिए ब्रह्मा से लेके आजपर्यन्त आर्य लोग पशुओं की हिंसा में पाप और अधर्म समझते थे और इनकी रक्षा से अन्न भी महंगा नहीं होता, क्योंकि दूध आदि के अधिक होने से दरिद्र को भी खान-पान में मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के न्यून खाने से मल भी कम होता है। मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है, दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टि जल की अशुद्धि भी न्यून होती है, उससे रोगों की न्यूनता होने से सबका सुख बढ़ता है।

 

इससे यह ठीक है कि गो आदि पशुओं का नाश होने से राजा और प्रजा का भी नाश हो जाता है, क्योंकि जब पशु न्यून होते हैं, तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कर्मों की भी घटती होती है। देखो, इसी से जितने मूल्य से जितना दूध और घी आदि पदार्थ तथा बैल आदि पशु सात सौ वर्ष पूर्व मिलते थे, उतना दूध, घी और बैल आदि पशु इस समय दश गुणे मूल्य से भी नहीं मिल सकते (यह बात अर्थशास्त्र के मूल्य निर्धारण सिद्धान्त मांग एवं पूर्ति (Supply and Demand से सिद्ध है), क्योंकि सात सौ वर्ष के पीछे इस देश में गवादि पशुओं को मारनेवाले मांसाहारी विदेशी मनुष्य आ बसे हैं। वे उन सर्वोपकारी पशुओं के हाड़-मांस तक भी नहीं छोड़ते, तो नष्टे मूल नैव फलं पुष्पम् जब कारण का नाश कर दे तो कार्य नष्ट क्यों न हो जावे? हे मांसाहारियों तुम लोगों को कुछ काल के पश्चात् जब पशु मिलेंगे, तब मनुष्यों का मांस भी छोड़ोगे वा नहीं? हे परमेश्वर ! तू क्यों इन पशुओं पर, जो कि विना अपराध मारे जाते हैं, दया नहीं करता? क्या उन पर तेरी प्रीति नहीं है, क्या उनके लिए तेरी न्यायसभा बन्द हो गई है? क्यों उनकी पीड़ा छुड़ाने पर ध्यान नहीं देता, और उनकी पुकार नहीं सुनता? क्यों इन मांसाहारियों की आत्माओं में दया का प्रकाश कर निष्ठुरता, कठोरता, स्वार्थपन और मूर्खता आदि दोषों को दूर नहीं करता, जिससे ये इन बुरे कामों से बचें।

 

भारत का गुजरात राज्य गोरक्षा, गोसंरक्षण एवं गोदुग्ध के उत्पदान में सम्भवतः देश का सबसे बड़ा आदर्श राज्य है। देश के सभी राज्यों को इसका अनुकरण करना चाहिये। जिन राज्यों में गोहत्या निषिद्ध है वह बधाई व साधुवाद के पात्र हैं। वहां अभियान इस बात का चलना चाहिये कि कहीं कोई चोरी छिपे गोहत्या कर गोमांस का सेवन न करता हो। ऐसा होने पर भारत न केवल स्वावलम्बी ही बनेगा अपितु इससे प्रजाजनों में रोगों में कमी आयेगी और लोग स्वस्थ, बलशाली एवं दीर्घजीवी बनेंगे। यही किसी राजनेता का स्वप्न होना चाहिये। आर्यराजाओं का सम्भवतः यही स्वप्न था। इसी कारण राजा श्री राम व योगेश्वर श्री कृष्ण स्वयं व इनके पूर्वज आदर्श गोरक्षक व गोपालक होते थे।

 

महर्षि दयानन्द ने अपने समय के अंग्रेज उच्च राज्याधिकारियों से सम्पर्क कर गोहत्या बन्द करने की मांग की थी व उनको मौखिक दृष्टि से सहमत भी किया था। उन्होंने एक हस्ताक्षर अभियान भी देशभर में चलाया था जिसे वह इंग्लैण्ड की राजरानी विक्टोरिया को भेजना चाहते थे परन्तु कुछ विधर्मी, स्वार्थी, अज्ञानी, मिथ्याचारी, विलासी, षडयंत्रकारी लोगों ने विष देकर इससे पूर्व ही उन्हें मार डाला जिससे देशोपकार के उनके द्वारा किये जा रहे अनेक कार्य रूक गये। गोरक्षा ही वस्तुतः देश की रक्षा है और गोहत्या राष्ट्रहत्या है। हम आशा करते हैं कि देश के सभी बन्धु सहृदयता से गोरक्षा पर मानवीय, धार्मिक एवं आर्थिक आधार पर विचार कर गोहत्या एवं गोमांसाहार के घृणित कार्य को छोड़कर देश की उन्नति में सहायक होंगे।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz