लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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cowपिछले कुछ दिनों से मीडिया में बौद्धिक जुगाली करते अनेक स्वयंभू किस्म के प्रगतिशील तत्व नज़र आ रहे हैं. इनका काम और कुछ नहीं,  केवल सनसनी फैलाकर सस्ती लोकप्रियता अर्जित करना  है. ये लोग  अनेक कारणों से लोकप्रिय होते भी रहे हैं.उनको यह पता है कि  हमारे किस बयांन पर या ‘ट्वीट’ पर हंगामा हो सकता है,  इसलिए बीच-बीच में वे कुछ शिगूफे छोड़ देते है और मज़े  लेते है. सबसे ताज़ा शिगूफा है कि  ”हम तो गौ मांस  खाते  है….. यह हमारा अधिकार है.  हम क्या खाए-पीएं, यह हमारा निजी मामला है.” दूसरा बयान देह दिखा कर चर्चित होने वाली एक हीरोइन का है, वो कहती है, ”मेरा अपना शरीर है, मैं इसका जैसा चाहे इस्तेमाल करूँ ?” बेशक क्या खाएँ-पीएँ और देह-प्रदर्शन  का मामला निजी मामला हो सकता है लेकिन इस बात को भूल नहीं जाना चाहिए  कि हम समाज में रहते हैं, जंगल में नहीं। और वो भी भारत में रहते है, जिसकी अपनी एक सभ्यता-संस्कृति रही है. भारत भारत है, पश्चिम नही.

जब हमारे पड़ोस में कोई दुःख घटित हो जाता है, तो हम अपने घर की खुशियों के लिए बगल में ही ज़ोर-ज़ोर से बाजा नहीं बजाते,  अपनी खुशीबाजे-गाजे के भी मना लेते है ताकि पड़ोसी को लगे।  कुछ ऐसे भी निर्मम होते होंगे जो कहते होंगे ”कोई मरे, तो मरे, हम उसके लिए अपनी खुशियों का दमन क्यों करे?”  अपनी-अपनी मानसिकता और संस्कारो  के कारण  व्यक्ति वैसा व्यवहार करता है.इस वक्त  गाय का सवाल भी कुछ इसी तरह का एक बड़ा मुद्दा है. जिस देश में करोडो लोग गाय को पूजते हो, उसे  माँ  कह कर उसका सम्मान करते हो, जिसके बारे में वेद-पुराणों  में न जाने कितनी सुन्दर-सुन्दर कथाएँ वर्णित हो, जिस गाय के अनेक प्रामाणिक लाभ बताए जाते रहे हैं और हैं भी,  उस गाय की हत्याओ के बढ़ते सिंलसिले से दुखी लोग जब आवाज़ बुलंद करते हैं कि ”गौ हत्या बंद हो” तो कुछ लोग  अपंनी आज़ादी का हवाला दे कर फ़ौरन से पेपेश्तर  चीख पड़ते है कि  ”नहीं, ये नहीं हो सकता। ये हमारी भक्षण-आज़ादी पर हमला है.” ऐसे लोगो से पूछा जाना चाहिए की अगर तुम करोडो लोगो की भावनाओं का  सम्मान करते हुए  गौ मांस खाना छोड़ दोगे तो क्या जीवन में कोई बड़ी हानि हो जाएगी?

मैंने एक उपन्यास लिखा है ”एक गाय की आत्मकथा”.जिसमे एक गाय इस देश में हो रही अपनी दुर्दशा का व्यंग्यात्मक वर्णन करती है. उपन्यास में अनेक पाखंडी हिन्दू गाय के साथ दुराचार करते हैं मगर एक मुस्लिम पात्र मुज़फ्फर अली गायों को बचने का काम करता है.  उस उपन्यास से प्रेरित हो कर फ़ैज़ खान नामक मुस्लिम युवक इस वक्त  देश भर में घूम-घूम कर गौ कथा कर रहा है और गाय को बचाने की बात कह कर सबको चकित कर रहा है.देश में कुछ  मुस्लिम भाई ऐसे भी है जो गौ सेवा में लगे हैं, मेरे अपने शहर में मुज़फ्फर भाई और उनके साथ अनेक मुस्लिम। राजस्थान में कुछ मुस्लिम भाई गौशालाएँ भी चलाते हैं. वे गाय के महत्व को समझ रहे है, मगर हिन्दू समाज के ही अनेक लोग गौ हत्या और उसके मांस को खाने  की ज़िद में अड़े हुए हैं। वैसे शर्मनाक  विसंगति यह भी है कि  अनेक कसाईखाने हिन्दू ही चला रहे है और वे इस कार्य को अपने धंधे का हिस्सा बताने से नहीं चूकते। गौर तालाब बात यह है कि गौ मांस भक्षण के प्रति जितने बयान किसी मुस्लिम के नहीं आते, उससे ज़्यादा बयान हिन्दुओं के आ रहे है. बॉलीवुड के एक पिटे हुए हीरो ने पिछले दिनों गौ मांस खाने की वकालत की, उसके बाद एक सेवानिवृत्त जज महोदय कूद पड़े कि  गौ मांस खाने में कोई बुराई नही. कुछ लोग गौ हत्या  मज़ाक उड़ाते हुए यह भी कहते पाए जाते है कि  क्या दूसरे जानवरो को कटने दिया जाए? ऐसा कहने वाले यह भूल जाते है कि  गौ हत्या के विरोध में  हर तरह  के जीवो की हत्या के खिलाफ होते है. गाय का नाम इसलिए लेते हैं गाय के प्रति उनका अतिरिक्त आदरभाव होता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं की वे भैस, बकरी या अन्य जीवो के प्रति बेफिक्र है.

गांधी जी ने अपने समय में गौ हत्या के विरुद्ध निरंतर लिखा। उनका यह कथन मशहूर है कि ” हम अपनी माँ का दूध तो तीन साल तक पीते हैं मगर गाय का दूध जीवन भर पीते रहते है.” गांधी जी ने यह भी कहा था कि  ”जैसे ही देश आज़ाद होगा, गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लग जाएगा।” लेकिन अनेक स्वप्नों की तरह गांधी का यह सपना भी अधूरा रहा, और अब तो कोई सम्भावना ही नहीं नज़र आती ।  भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बावजूद गौ हत्या के मामले में  उसकी उदासीनता देख कर  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी दंग है. संघ वाले कहते है कि  ”पूरे देश में गो वध पर रोक ले और गौ मांस का  रोक जाए”, लेकिन आश्चर्य  है कि  भाजपा के शासन काल में ही गौ मांस का निर्यात बढ़ गया.जब हिंदुत्व की दुहाई वाली सरकार ही इतनी उदासीन है, तो किसी से कोई उम्मीद नहीं की जा सक्ती. इसलिए अगर लोग गौ मांस खाने के अधिकार के लिए चिल्ला रहे है, तो गलत नहीं कर रहे.

यह  समय गाय के प्रश्न को विवादों में घसीटने  का नहीं है. वरन ठन्डे दिमाग से गाय के अर्थशास्त्र को समझने का है. दुनिया के अनेक  देश भारतीय गायों  का महत्व समझ चुके है. ब्राजील जैसे देशो ने गौ पालन करके ही कितनी तरक्की कर ली. गाय का  खास कर देसी गाय का दूध, और मूत्र भी अनेक बीमारियो में काम आता है. यह सिद्ध भी हो चुका  है. गाय बचेगी तो इस देश को सस्ती दवाइयाँ मिल सकेंगी जो ‘पंचगव्य’ से तैयार होती है. गाय को जिस तेजी से काटा जा रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि  आने वाले समय में इसके संरक्षण के लिए भी अभियान चलाना पड़ेगा। इसकी नौबत ही क्यों आए? गौ मांस खाने वाले अगर गाय के आर्थिक, सामाजिक, और मेडिकल महत्त्व को समझेंगे तो वे खुद गाय को बबचाने आगे आएँगे।  एक बार वे इस बात को ठन्डे दिमाग से तो सोचने की कोशिश करे. गौ मांस खाने की आज़ादी की बात करने की बजाय वे कुछ समय गाय के महत्व को बताने वाली बातो को ध्यान से पढ़े. लगभग हर धर्म में गाय की महत्ता बताई गयी है, कुरआन पाक के दुसरे अध्याय ‘सूर-ए -बक़र’ का हिन्दी अर्थ होता है ”गाय  का अध्याय’. इसमें साफ-साफ कहा गया है. ”गाय का जूठा पानी भी पवित्र होता है…..अल्लाह के पास गोश्त और खून हरगिज नहीं पहुंचते। हां, तुम्हारी परहेज़गारी ज़रूर पहुँचती है.” ये तथाकथित प्रगतिशील एक बार देखे तो गाय का महत्व क्या है. लेकिन वे देखना नहीं चाहते क्योंकि जो मज़ा सनसनी फ़ैलाने में है, वो मज़ा गाय के पक्ष में खड़े होने में कहाँ? ऐसा करने से लोग ”प्रगतिशील” नहीं , पुरातनपंथी जो कहलाएंगे , जबकि गाय के पक्ष में खड़ा होना पुरातनपंथी होना नहीं, एक तरह से अपनी जड़ो से जुड़ कर वैज्ञानिकता से भी जुड़ना है.

गिरीश पंकज

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