लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का दूसरा कार्यकाल अनेक मामलों में विवादों में र्घिरा हुआ है। भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री को आज तक इतना बेबस नहीं देखा जितना कि इस कार्यकाल में देखने को मिल रहा है। सहयोगी दल जब चाहे तब कांग्रेस की कालर पकडकर हडका रहे हैं और कांग्रेस चुपचाप निरीहावस्था में कराह रही है। पता नहीं कांग्रेस को सत्ता की मलाई में क्या मिल रहा है जो वह अपनी अस्मिता और देश की इज्जत, आंतरिक सुरक्षा, लोगों की सुखसुविधाओं आदि तक को बलाए ताक रखने से नहीं चूक रही है।

इस कार्यकाल में रेल मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील महकमे की जवाबदारी त्रणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो सुश्री ममता बनर्जी को सौंपी गई है। ममता बनर्जी ने जब से भारत गणराज्य के रेल मंत्री का पदभार संभाला है, उसके बाद से ही उनकी प्राथमिकता में भारतीय रेल तंत्र के स्थान पर बंगाल के रायटर्स बिल्डिंग में कब्जा करना पहली पायदान पर आ चुका है। ममता के कदम देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वे हर हाल में पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करना चाह रही हैं।

जैसे ही वे मंत्री बनीं उन्होंने त्रणमूल कांग्रेस के अपने नहले दहलों को तुगलकी फरमान जारी किया जिसमें त्रणमूल कोटे के मंत्रियों को पश्चिम बंगाल में दरबार लगाने की हिदायत दी गई थी। सवा सौ साल पुरानी और देश में आजादी के छ: दशकों में पांच दशकों से अधिक राज करने वाली कांग्रेस की राजमाता चुपचाप सब कुछ देख सुन रहीं हैं। ममता ने अपना पदभार भी दिल्ली से हटकर बंगाल में जाकर ग्रहण किया।

ममता मनमानी पर उतारू रहीं और कांग्रेस के ‘कुशल रणनीतिकार प्रबंधक’ चुपचाप उनकी ज्यादतियों को सहने के लिए कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का मानस तैयार करते रहे। ममता बनर्जी ने कांग्रेस की गर्दन पकडकर हडकाया और कांग्रेस भारत गणराज्य के आम दीन हीन निरीह आदमी की तरह चुपचाप सब कुछ सहती रही। भारतीय रेल पिछले एक साल में नौकरशाहों के भरोसे ही चल रही है। रेल सुविधाओं की दिशा में देखा जाए तो यात्री रेल सुविधाओं में निरंतर कमी आई है। रेल दुर्घटनाओं के बढते ग्राफ ने भी कांग्रेस के आला नेताओं की तंद्रा नहीं तोडी।

यह सब जारी रहेगा, लेकिन कब तक? जाहिर है पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों तक देश की जनता को रेल दुर्घटना में या तो प्राण गंवाने होंगे या घायल होना होगा! इसका कारण यह है कि भारत गणराज्य जैसे शक्तिशाली प्रजातांत्रिक देश के रेल मंत्री का ध्यान बजाए अपने विभाग के अपने गृह सूबे पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों पर ज्यादा है। हालात देखकर कहा जा सकता है कि भारतीय रेल में अफसरशाही के बेलगाम घोडे पूरी रफ्तार से दौड रहे हैं।

बीते वर्षों में रेल सुरक्षा जीवन रक्षा का नारा बुलंद किया गया था, जिसमें यात्रियों की सुविधा का विशेष ख्याल रखने के लिए रेल यात्रा को दुर्घटना मुक्त बनाने के लिए रेल्वे ने कई कदम उठाने की सिफारिश की थी। विडम्बना यही है कि भारत गणराज्य में प्लानिंग तो भारी भरकम हो जाती है, पर जब उसे अमली जामा पहनाने की बारी आती है तब मानो सभी को सांप सूंघ जाता है। इससे बडी विडम्बना तो यह है कि भारी भरकम रेल सुरक्षा कोष आज भी ब्याज की राशि से फल फूल रहा है, किसी को इस कोष को व्यय करने की सुध नहीं है।

भारतीय रेल की सुरक्षा के मामले में पूर्व रेल मंत्री और बिहार के वर्तमान निजाम नितीश कुमार का दावा है कि अगर रेल्वे ने टक्क्र रोधी उपकरण लगा लिए होते तो यह दुर्घटना नहीं घटती। नितीश का दावा सही है, कि कोकण रेल्वे द्वारा इजाद किए गए टक्कर रोधी उपकरणों को उनके कार्यकाल में इसके गहन परीक्षण के उपरांत सभी रेल में लगाने का निर्णय लिया गया था। नितीश कुमार के कार्यकाल में यह योजना परवान नहीं चढ सकी।

इसके बाद सवा सौ साल पुरानी और देश पर आधी सदी से अधिक राज करने वाली कांग्रेस ने छ: साल देश पर शासन कर लिया है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार यात्रियों से किराए में तो पूरी राशि वसूल रही है, पर जब बारी आती है यात्रियों की जान की सलामती की तो कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा यात्रियों की जान कीडे मकोडों से कम नहीं समझी जाती है। बडबोले नितीश ने भी अपना मुंह सालों बाद खोला है, नितीश को अपने गिरेबान में झांकने की आवश्यक्ता है, इतने साल चुप रहने का जवाब भी अगर वे दे देते तो भारत की जनता उनका एहसान ही मानती।

भारतीय रेल के इतिहास में सबसे निचले छिछले दर्जे की कोई दुर्घटना को स्थान दिया जा सकता है तो वह है पटरी पर खडी एक रेल गाडी से आकर दूसरी रेल गाडी का टकरा जाना, वह भी तब जब न तो कोहरा हो और न ही विजिबिलटी अर्थात दृश्यता कम न हो। ममता बनर्जी जिस सूबे पर अपनी हुकूमत करने के सपने संजो रही हों, उसी पश्चिम बंगाल के सैंथिया रेल्वे स्टेशन पर यह घटना घटी।

मजे की बात तो यह है कि पश्चिम बंगाल का सैंथ्यिा रेल्वे स्टेशन कम यातायात दबाव के रेल्वे स्टेशन की फेहरिस्त में स्थान पाता है। इस तरह के स्टेशन पर अगर स्टेशन के प्लेटफार्म पर खडी रेल गाडी से पीछे से आती कोई दु्रत गति की रेल गाडी टकरा जाए वह भी रात दो बजे तो इस चूक को क्षम्य की श्रेणी में रखा जाएगा। भारतीय रेल के अधिकारियों के दावे पर हंसी ही आती है कि सौ किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से लगभग डेढ गुना गति से दौडने वाली उत्तर बंगा एक्सप्रेस जो पलक झपकते ही रेल्वे स्टेशन पार कर जाती को रोकने के लिए लाउडस्पीकर से चिल्ला चिल्ला कर रोकने का प्रयास किया गया था। इस तरह के बयान देने वाले रेल अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर देना चाहिए।

सबसे अधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब ममत बनर्जी के ही सूबे से सियासी राह पकडने वाले भारत गणराज्य के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी त्रणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और रेल मंत्री ममता बनर्जी के बचाव में उनके प्रवक्ता की हैसियत में दिखे। प्रणव दा का कहना था कि कोई भी इस बात की भविष्यवाणी नहीं कर सकता है कि दुर्घटना घटेगी या नहीं। सब कुछ जानते बूझते प्रणव मुखर्जी इस बात को सिरे से नकार रहे हैं कि रेल मंत्री ममता बनर्जी की रेल भवन से गैरमौजूदगी इन हादसों की वजह है। भारत गणराज्य को वर्तमान में एक पूर्ण कालिक रेल मंत्री की दरकार के मामले में भी प्रणव मुखर्जी का जवाब गोलमोल ही रहा। कुल मिलाकर कांग्रेस के लिए ममता बनर्जी एक मजबूरी बन गईं हैं, जिन्हें ”हर हाल” में ढोना कांग्रेस के लिए आवश्यक हो गया है।

मीडिया में तो भारतीय रेल चिल्ला चिल्ला कर यह बात कहती रही है कि आधुनिकता के इस दौर में उसने अत्याधुनिक उपकरणों से अपने आप को लैस कर लिया है, वस्तुत: जमीनी हकीकत कुछ और कह रही है, जिसे सुनना और जानान भारत की रेल मंत्री ममता बनर्जी को गवारा नहीं हैं। ममता को तो मानो मछली की आंख की तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की कुर्सी ही दिख रही है।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि पिछले दिनों हुई दो बडी रेल दुर्घटनाएं ममता बनर्जी के उसी गृह राज्य में हुई हैं जिसमें वे राज करने के सपने देख रहीं हैं। कांग्रेस भी ममता बनर्जी की बेसाखी बनकर उन्हें इस तरह की मनमानी में सहारा दे रही है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सत्ताधारी कांग्रेस सहित किसी भी सियासी दल में इतना माद्दा नहीं है कि वह ममता बनर्जी से सार्वजनिक तौर पर यह पूछ सके कि ममता जी आप भारत गणराज्य की रेल मंत्री हैं या फिर पश्चिम बंगाल की।

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2 Comments on "पश्चिम बंगाल से बाहर निकलिए ममता जी"

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sunil patel
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श्री खरे जी ने कांग्रेस और ममता जी के सम्बन्ध को बहुत अच्छे से परिभाषित किया है.
रेलवे अरबो रुपए कमा रही है और अरबो रुपए खर्च भी कर रही है. काश लाल फितासाही से उपर उठकर नई तकनीक का उपयोग किया जय तो दुर्घटनाओ की समस्या बहुत कम हो जाएगी. आजकल उच्च तकनीक बहुत सस्ती है जिसे भारतीय रेलवे बहुत आसानी से उपयोग कर सकती है.
यह सब हो सकता है अगर मलाई – रेवाड़ी बटना और बाटना बंद हो जय.

पंकज झा
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कोई दुश्मनी है आपको देश से लिमटी जी, कि आप ममता बनर्जी को बंगाल से बाहर निकाल रहे हैं. ममता, लालू, रामविलास, मायावती, जयललिता, करूणानिधि जैसे लोग अपने-अपने दरबे में रह कर एक तरह से देश का भला ही कर रहे हैं. चुकि राज्य ने उनो जन्म दिया है तो उसको तो झेलना ही पडेगा लेकिन कम से कम ‘देश’ इनके प्रकोप से वंचित रहे ऐसी दुआ कीजिये. रेल समेत अपने-अपने विभाग या प्रदेश का सारा संसाधन लेकर भी अगर ये लोग प्रदेश में ही अपनी चलते रहे तो शुक्र मनाइए…..वैसे अच्छा आलेख.

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