लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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सजीवन मयंक

नये पत्ते डाल पर आने लगे ।

फिर परिंदे लौटकर गाने लगे ।।

जो अंधेरे की तरह डसते रहे ।

अब उजाले की कसम खाने लगे ।।

चंद मुर्दे बैठकर श्मशान में ।

जिंदगी का अर्थ समझाने लगे ।।

उनकी ऐनक टूटकर नीचे गिरी ।

दूर तक के लोग पहिचाने लगे ।।

जब सियासत का नया नक्शा बना ।

थे जो अंधे लोग चिल्लाने लगे ।।

आईनों की साफ गोई देखकर ।

सामने जानें से कतराने लगे ।।

जब सच्चाई निर्वसन होने लगी ।

लोग उसको वस्त्र पहनाने लगे ।।

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एक भी खिड़की नहीं चारों तरफ दीवार है ।

घुट रहा है दम यहॉं , वातावरण बीमार है ।।

एक लंगड़ा आदमी जैसे घिसटकर चल रहा ।

ठीक वैसी ही हमारे , वक्त की रफ्तार है ।।

अपना चेहरा आईनें में देखकर कहनें लगे ।

हम तो ऐसे हैं नहीं यह आईना बेकार है ।।

जिंदगी के बाद रिश्ते शुरू होते हैं यहां ।

शव को कंधा लगा देना एक शिष्टाचार है ।।

उस सड़क पर भीड़ ज्यादा बढ़ गई है आजकल ।

चल रहा है जिस जगह पर मौत का व्यापार है ।।

हमने जो भी कुएं खुदवाये सभी सूखे रहे ।

लोग कहते हैं कोई चट्टान पानी दार है ।।

 

 

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