लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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सितम्बर २००१ में मेरे द्वारा गाज़ियाबाद के व्यापर कर विभाग की विशेष अनुसन्धान शाखा के अधिकारीयों से पिलखुवा की कई फार्मों की जांच कराई थी! ये सभी फर्में पोटैशियम क्लोरट के व्यापर के लिए पंजीकृत थीं और एक्सप्लोसिव्स के व्यापर का लाइसेंस भी इन्होने जिलाधिकारी से प्राप्त कर रखा था! मुझे ज्ञात हुआ था की यह विस्फोटक केमिकल खेती में प्रयोग के नाम पर मंगाया जा रहा था लेकिन इसका कोई उपयोग खेती में नहीं पाया गया था! यहाँ तक की इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक ने इसे खेती में प्रयोग किया जाना मान लिया था!मुझे शिकायत मिली थी कि इस विस्फोटक केमिकल का प्रयोग अपराधियों द्वारा देसी बेम व पटाखे बनाने में किया जा रहा था! कुख्यात आतंकी करीम टुंडा इसी क्षेत्र का था! अतः मैंने एक अधिकारी को पांडिचेरी भेज कर इसके बारे में जांच कराई थी! तथा पॉन्डिचेरी के तत्कालीन बिक्रीकर आयुक्त से भी इस बारे में वार्ता की थी! मैंने जिला प्रशासन से भी अनुरोध किया था कि उक्त खतरनाक केमिकल के आयत के लाइसेंस देने के बाद उसके वास्तविक इस्तेमाल कि भी जांच समय समय पर करवानी चाहिए! लेकिन कुछ नहीं किया गे! उस समय के सभी समाचार पत्रों ने इस मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किया था!
मेरे द्वारा इस मामले में गहराई से सीबीआई से जांच करवाने के लिए तत्कालीन आयुक्त व्यापर कर श्री राकेश गर्ग जी को भी पत्र लिखा गया था! लेकिन न तो कोई जांच हुई और न ही जिला प्रशासन सतर्क हुआ! जिसका नतीजा अब गाज़ियाबाद में “पटाखों” कि फैक्ट्री में भीषण विस्फोट के रूप में सामने आया है!इससे पूर्व इसी प्रकार के धमाके बिजनौर और हापुड़ में भी हो चुके हैं!
समाचारों के अनुसार अब ख़ुफ़िया एजेंसियां सक्रीय हुई हैं! क्या वास्तव में?
समाचारों के अनुसार एजेंसियों को शक है कि कहीं आईएसआईएस के खुरासानी मॉड्यूल ने तो गाज़ियाबाद में दस्तक नहीं दे दी है? जांच अवश्य होनी चाहिए! लेकिन जब २००१ में मैंने जांच कराई थी तो उस समय न तो आईएसआईएस था और न ही कोई खुरासानी मॉड्यूल ही था! अब्दुल करीम टुंडा भी उससे बहुत पहले का था!
बेहतर होगा कि उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में एक्सप्लोसिव्स एक्ट के तहत जितने भी लाइसेंस दिए गए हैं उनकी गहराई से जांच कराई जाये कि किस वस्तु के प्रयोग हेतु लाइसेंस दिया गया है? क्या वास्तव में घोषित उद्देश्य में उसका इस्तेमाल भी किया जाता है? प्रशासन द्वारा आयातित विस्फोटक के एन्ड यूज़ पर कोई निगाह रखी जा रही है या नहीं? जिन लोगों के नाम पर लाइसेंस दिए गए हैं उनका वास्तविक व्यवसाय क्या है?अगर सही जगह से जांच प्रारम्भ नहीं की गयी तो आईएसआईएस और खुरासानी मॉड्यूल की जांच में उलझकर वास्तविक अपराधियों पर से ध्यान भटक जायेगा!

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