लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’

ग़ज़ले

ये आजमा के देख लिया इस जहान में

रूसवाइ्रयो का डर है फक्त झूठी शान में

 

में गुनहागार हूँ मेरी बख्शिश को ऐ खुदा

हाफिज कुरान भेज मेरे खानदान में

 

खुशबू लबो की उस के ना बरसो बरस गई

जिसने करी है गुफतुगू ऊर्द्व जबान मे

 

छोटे तुम्हे सलाम करे आला मानकर

क्यो जी रहे हो आज मियॉ इस गुमान में

 

आदाब ए जिन्दगी को खरीदे कहा से वो

जिस को दबा खजाना मिला हो मकान में

 

बोला अमीरे ए शहर यू कल मेरे कान में

तुम भी कसीदा कह दो मियॉ मेरी शान मे

 

दुश्मन ने देखकर ही जिसे हार मान ली

ये कैसा तीर आ गया मेरी कमान में

 

बेटी के हाथ पीले करे किस तरह गरीब

भूखे है लोग माल के अब इस जहान मे

 

तुम छोड कर गये थे जहॉ जिस को जिस जगह

यू ही सजी है चीज वो मेरे मकान में

 

में सोचने लगा था के शायद ही हम मिले

देखा तुम्हे तो जान मेरी आई जान में

 

कहर ए खुदा से डर के सताओ यतीम को

ताकत बडी है सोच लो इस बे जुबान में

 

‘‘शादाब’’ मिसरा दे के समझते है आज वो

परवाज हम भी रखते है ऊडॅान में

 

2

जिन्दगी खूब बहुत खूब गुजारी मैने

अपने अजदाद की पगडी भी सभाली मैने

 

 

ऐशो इशरत यू हर एक गाम मिली है मुझ को

अपने मॉ बाप की कोई बात ना टाली मैने

 

दौरे हाजिर मै भटक जाये ना बच्चे मेरे

इन को कुरआन की तालीम दिला दी मैने

 

कोई खामी ना नजर आई मुझे औरो मै

जब नजर अपने गिरेबान पे डाली मैने

 

मुझ को हर सॉस हर एक लम्हा सताया फिर भी

जिन्दगी तुझ से कभी हार ना मानी मैने

 

उसने जब मॉ को हिकारत की नजर से देखा

मॉ को ले आया जमी भाई को दे दी मैने

 

आज रोने का सबब पूछ ना मुझ से बाबा

यू ही झिडका था बहुत पहले सवाली मैने

 

ये नजर खाना ए काबा को छुएगी इक दिन

हर बुरी शाह से नजर अपनी बचा ली मैने

 

3

मिट जॅाऊ वतन पर ये मेरे दिल मै लगन है

नजरो मै मेरी कब से तिरंगे का कफन है

 

हर गाम पडोसी को मेरे यू भी जलन है

सोने कि है धरती यहॅा चॉदी का गगन है

 

मशहूर बनारस की है सुब्ह शाम ए अवध यू

गालिब की गजल है कही मीरा का भजन है

 

जन्नत का लक्ब जिस को जमाने ने दिया है

वो मेरा वतन मेरा वतन मेरा वतन है

 

पंजाब की रूत है कही कश्मीर की रंगत

गंगा का मिलन है कही जमना का मिलन है

 

गॉधी तूझे भूले है ना चरखा तेरा भूले

खादी को बनाने का यहॉ अब भी चलन है

 

‘‘शादाब’’ जिसने तुझ को बनाया मेरे वतन

वो आज तेरी नीव मै गुमनाम दफन है

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