लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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diwali-fireworks-जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. .
हर चेहरा मुस्कान भरा हो, हर आँगन नाचे खुशहाली,

जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. .

जिनके घर में अँधियारा है, उनको भी उजियारा बाँटें.
कदम-कदम पर दुःख के पर्वत, आओ उनको मिल कर काटें.
जीवन का है लक्ष्य यही हम, हर होठों पर लायें लाली..
हर चेहरा मुस्कान भरा हो, हर आँगन नाचे खुशहाली,
जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. .

केवल अपनी ही चिंता में, मानव तो शैतान हो गया,
दूजों के दुःख भी हरने हैं, इन सबसे अनजान हो गया.
अपनी जैसी भरी-भरी हो, दूजे मानव की भी थाली.
हर चेहरा मुस्कान भरा हो, हर आँगन नाचे खुशहाली,
जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. .

दीवाली क्या रोजाना हम, निर्धन जन से प्यार रखें,
उनके लिए बचाएँ थोडा, उनके हित उपहार रखें,
ज्ञान यही कहता है सबको, बाँटें हम खुशियों की प्याली. .
हर चेहरा मुस्कान भरा हो, हर आँगन नाचे खुशहाली,
जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. .

निर्धन, वंचित, निशक्तों के साथ मनाएं हम दीवाली,
अगर प्रभु ने दिया है वैभव, बन जाएँ फिर वैभवशाली.
साथ नहीं जायेगा कुछ भी, अंत हाथ रहना है खाली..
हर चेहरा मुस्कान भरा हो, हर आँगन नाचे खुशहाली,
जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. .

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