लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘शादाब

रूस के शहर तोमस्क मैं कुछ कट्टरपंथी ईसाईयो द्वारा भारत मैं हिंदू भाईयो द्वारा अकीदत से देखे और पढे जाने वाले पवित्र ग्रंथ भगवद्गीता पर पाबंदी लगाने की मांग इस पवित्र ग्रंथ को घर मैं कलह फैलाने वाला बता कर जहां इक नया विवाद छेड़ दिया है। आखिर क्यो इन विदेशियो द्वारा हमारी धार्मिक आस्थाओ पर बार बार चोट की जाती है। कभी आस्ट्रेलिया द्वारा हमारे बच्चे पर नस्लभेद के नाम पर हमले होते है, कभी अमेरिका मैं सिख भाईयो पर हमले होते तो कभी इन लोगो की आस्था के साथ इन की पंगडिया उतार उतार कर खिलवाड किया जाता है। दरअसल ये सब हमारी कमजोरी का फायदा उठाते है। यूरोप के लगभग आधा दर्जन मुल्क मुस्लिम महिलाओ द्वारा पहने जाने वाले बुर्के व हिजाब पर आतंकवाद की आड लेकर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाने की तैयारी की, इस का विरोध नही हुआ। केवल मुस्लिम संगठनो ने ही इस का विरोध किया। बेल्जियम की संसद के निचले सदन ने बुर्के पर पाबंदी से सम्बंधित कानून को पारित कर दिया। प्रस्ताव यह कहकर पारित किया गया की कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर ऐसे कपडे नही पहन सकता जिस से उस का चेहरा छुपा हो। इस के साथ ही बेल्जियम बुर्के पर संसद में मतदान कराने वाला यूरोप का पहला देश बन गया। बेल्जियम में लगभग 6,30,000 मुसलमानो की आबादी है और सभी सरकार के इस फैसले से नाराज है पर सरकार पर इस का कोई असर नही।

दरअसल पिछले दिनो बेल्जियम में ग्रीन रूढीवादी क्रिशिचयन डेमोक्रेट और धुर दक्षिणपंथी सोशलिस्ट संगठन के कुछ सिर फिरे लोगो ने एक सम्मेलन कर यह आवाज उठाई थी की डच ,फ्रेच और जर्मन बहुल बेल्जियम में मुस्लिम औरते हेड स्काफ और हिजाब कार्यालय ,स्कूल ,मैट्रो रेल ,मॉल ,स्टेडियम आदि जैसी सार्वजनिक जगहो पर नही लगायेगी। ऐसा करने पर उन पर सरकार को 20 से 34 यूरो और हफते भर तक की जेल का जुर्माना लगाना चाहिये। इस सगठन का इस के पीछे यह तर्क था की बुर्का मुस्लिम औरतो की मर्यादा के खिलाफ है यह एक चलते फिरते कैद खाने की तरह है। सब से पहला सवाल यह उठता है की क्या किसी मुस्लिम महिला या मुस्लिम सगठन ने कभी बुर्के पर ऐतराज उठाया क्या इन क्रिशियन लोगो को मदर मेरी के सर पर रखी हुई हिजाब रूपी चादर और गाऊन में छुपा उन का पूरा जिस्म कभी नजर नही आया। वास्तव में औरत को खुदा ने कुछ ऐसे नाजुक अंग दिये है जिसे छुपाना उस के लिये जरूरी है बुर्का कोई कैद खाना नही बल्कि वो खूबसूरत लिबास है जो औरत की सुन्दरता की रक्षा ढाल की तरह करता है। आज के इस कलयुग में एक ओर जहा लोग औरत को भूख और वासना की चीज समझने लगे है। दो दो तीन तीन साल की अवोध मासूम बच्चिया बलात्कार का शिकार हो रही हो। ऐसे समाज में क्या औरत के सर से चादर या बुर्का उतारना ठीक होगा।

एक बार टीपू सुल्तान जंग जीत कर लौट रहे थे उन की सवारी जब शहर से निकली तो हिंदू महिलाओ ने जंग से जीत कर घर लौटने पर रास्ते मैं जगह जगह उन पर फूल बरसा कर उन का जोरदार स्वागत किया। हाथी पर बैठे हुए टीपू सुल्तान की नजर स्वागत कर रही कुछ हिन्दू महिलाओ पर जब पडी तो उन्होने अपनी ऑखो को बन्द कर लिया और अपनी चादर बदन से उतार कर उन महिलाओ की ओर फेक दी। चूकि उस वक्त उन हिन्दू महिलाओ ने ब्लाऊज और पेटीकोट पहन रखे थे उन का पेट और सीना खुला था। एक शासक को अपनी प्रजा को यू देखना अच्छा नही लगा। पर उस वक्त का इतिहास गवाह है की टीपू ने उन के पहनावे या उन लोगो के धर्म में दखल नही दिया। क्या हम भारतवासी अपनी बहू या बेटी को स्कर्ट फ्रॅाक या बिकनी में देख सकते है। जर्मनी फ्रॉस में ये वहा के चलन में है वहा का ये आम पहनावा है लेकिन मेरा ये मानना है की इस्लाम को मानने वाली कोई महिला यू बेपर्दा बेशर्मी के साथ कभी नही रह सकती। युरोपीय देशो में इस्लामी लिबास पहनने की तथा इस्लामी मजहब को मानने की पूरी आजादी मिली हुई है। फिर यहा के ईसाई बहुल समाज को मुस्लिमो से इतनी चिढ क्यो है। क्या आतंकबाद के मुद्दे पर ? जो इस्लाम को लेकर गलत फहमी बनी है। या फिर ये लोग मुस्लिमो को डरा धमका कर धर्म परिवर्तन कराने के लिये ये सब कुछ अमेरिका के इशारे पर कर रहे है।

फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी भी बुर्के पर पाबंदी के प्रबल समर्थक रहे है सरकोजी के निर्देश पर ही फ़्रांस की संसद में भी जुलाई 2011 में बुर्के और प्रदा प्रथा से संबंधित विधेयक पेश किया गया। जिस में बुर्का और प्रदा प्रथा को बढावा देने वालो के लिये कडी सजा का प्रावधान किया गया था। जिस के अर्न्तगत यदि कोई महिला सार्वजनिक स्थान पर बुर्को या नकाब पहनती है तो उस पर डेढ सौ यूरो (करीब 9000 रूपये) का जुर्माना लगाया जायेगा। लेकिन अगर कोई फ़्रांस में महिला को चेहरा ढकने के लिये मजबूर करेगा या उकसायेगा तो नये पास होने वाले कानून के तहत उसे एक साल की कैद के अलावा 20 हजार डालर (करीब नौ लाख रूपये) अदा करने होगे। मार्च 2010 के शुरू में एक प्रतिष्ठत अग्रेजी न्यूज पेपर ने पश्चिम यूरोप में एक सर्वे छापा था जिस में फ्रांस की 70 प्रति शत आबादी स्पेन की 65 प्रतिशत ,इटली की 63 प्रतिशत, ब्रिटेन की 53 प्रतिशत, जर्मनी की 50 प्रतिशत आबादी नही चाहती की मुस्लिम महिलाये बुर्का या नकाब लगायें।

आज समाज में नारी की प्रधानता सिद्व होती जा रही है। मुस्लिम महिलाये राजनीति के साथ साथ बिजनेस व खेल के मैदान में आगे बढी है। जिस बात का सब से बडा प्रमाण हमारे देश की संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का पास होना है। राजनीति ,विज्ञान ,समाज सेवा, नारी आज हर क्षेत्र में पुरूषो को चुनौती दे रही है। आज की नारी भावुक तो उतनी ही है जितना पहले थी किन्तु आज उस के पास शिक्षा ,विवेक ,हिम्मत के साथ ही वो अपने व समाज के हित-अहित की पहचान करने में सक्षम हुई है। ऐसे में इस्लामी शरई कानून के खिलाफ यूरोप में बनने वाले ये नये नये कानून हमे अंततः संस्कृतियो के टकराव की ओर ही ले जायेगे। जो की एक खतरनाक संकेत है।

क्या किसी भी मुल्क या उस की सरकार को किसी व्यक्ति विशेष के धार्मिक प्रतीक वाले लिबास को तय करने का अधिकार है ? ये एक खतरनाक संकेत है की यूरोप में इस्लाम के खिलाफ एक नये किस्म का बेसिर पैर का नया मुद्दा खडा किया जा रहा है। पिछले दिनो जर्मनी के शहर गेल्शेनकिरशेन में एक सम्मेलन मस्जिदो से मीनार हटाओ के नाम से भी बुलाया गया था। दरअसल बुर्के और मीनारो के विरोध में जर्मन और फ्रेंच लॉबी सक्रिय है। गौर करने वाली बात यह है कि बेल्जियम के दक्षिणी शहर तुर्नाई के कैथलिक चर्च के बिशप गे हारपिंगनी का मानना है कि किसी भी धर्म के परिधान को तय करने का अधिकार किसी भी देश की सरकार को नही दिया जा सकता। क्यो कि धर्म और उस से जुडी आस्थाए बहुत नाजुक होती है अतः उन का मानना है की सरकार को सोच समझकर फैसला करना चाहिये। दारूल उलूम देबन्द ने भी इस मसले पर सऊदी अरब सहित दुनिया के तमाम मुस्लिम मुल्को और मुसलमसनो से बोलने का आहवान किया है। भारत के पवित्र ग्रंथ भगवद्गीता पर रूस मैं हो रहे प्रतिबंध के विरोध मैं सोमवार को भारतीय संसद मैं चर्च हुई साईबेरिया से चली बिरोध की इस आंधी के विरोध मैं लालू यादव, मुलायम सिॅह और भाजपा खूब बोली पर कडाई के साथ यदि हमारे राजनेताओ ने इस मुद्दे को राजनेती और अपने अपने वोट बैंक से न जोडा तो इस का कुछ न कुछ हल जरूर निकलेगां

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2 Comments on "गीता और बुर्के पर वबाल क्यों"

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आर. सिंह
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शादाब जफर ‘शादाब साहब ,केवल एक प्रश्न ,
आप बुर्के के पक्ष में क्यों हैं?

Rajesh Bheel
Guest

शायद ईसाई धर्म अपने आप को सर्वाधिक असुरक्षित मानता है. ऐसी हरकते उसके असुरक्षा भाव का नमूना है. यही कारण है कि मानवता को सही दिशा देनेवाले ग्रन्थ श्रीमद भागवत गीत से भी उसे आपत्ति है.

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