लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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विजय कुमार-

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पिछले रविवार को शर्मा जी ने अपने घर यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के बाद कुछ खानपान का भी प्रबन्ध था। इसलिए हम सभी मित्र समय से पहुंच गये। यज्ञ में तो मैं सैकड़ों बार गया हूं; पर यह यज्ञ कुछ अलग प्रकार का था। इसमें हवन सामग्री के साथ ही ढेर सारी लाल मिर्चों की भी आहुति दी गयी। आग में पड़ने से एक ओर मिर्चें चटक रही थीं, तो दूसरी ओर पंडित जी भी ‘फट स्वाहा, हट स्वाहा’ जैसे मंत्र बोल रहे थे। सबकी आंख में आंसू आ रहे थे; पर मित्रता का तकाजा था, सो बैठे रहे। प्रसाद में प्रायः पेड़े, लड्डू या हलुवा जैसा कुछ मिष्ठान होता है; पर यहां सबको तेज मिर्च वाले पकौड़े मिले। यद्यपि बाद में खानपान काफी उत्तम था। अतः मामला संतुलित हो गया; पर इस विशेष प्रकार के यज्ञ का चक्कर समझ नहीं आया।

 

उस समय तो मैं चुप रहा; पर एक दिन मैंने उनसे इसका रहस्य पूछ ही लिया। शर्मा जी ने बताया कि जन्म के समय से ही उन पर कई बाधाओं और अनिष्ट ग्रहों की छाया मंडरा रही है। अतः उनका कोई भी काम आसानी से नहीं होता। कई बार तो वह बनते-बनते ही बिगड़ जाता है। आज 65 साल बाद फिर से उन्हीं ग्रह और नक्षत्रों का योग बना है, जो जन्म के समय थे। उनके निवारण के लिए यह ‘दुष्काल यज्ञ’ किया था। इसमें मिर्चें होम इसलिए की गयी थीं, जिससे उनकी तीव्रता से वे अनिष्ट ग्रह और बाधाएं भाग जाएं।

शर्मा जी मेरे बचपन के मित्र हैं। उनके जीवन की प्रायः हर घटना और दुर्घटना का मैं साक्षी हूं। एक बार उन्होंने बताया था कि उनके जन्म वाले दिन भारी आंधी और चक्रवात से सैकड़ों लोग मारे गये थे। करोड़ों रु. की सम्पत्ति भी नष्ट हुई थी। उनके घर की टीन की छत भी उड़कर नदी पार जा गिरी थी। इस कारण उनकी दादी उन्हें ‘आंधीलाल’ कहती थीं।

कक्षा पांच तक की पढ़ाई गांव में पूरी कर वे शहर में पढ़ने गये। उनके पिताजी उन्हें कक्षा छह में बैठाकर आये थे; पर अगले कई दिन वे गलती से कक्षा पांच वाले कमरे में ही जा बैठे। अतः उनका नाम वहीं लिख लिया गया। साल पूरा होने पर जब उन्हें कक्षा पांच उत्तीर्ण का प्रमाण पत्र मिला, तो घर वालों ने माथा पीट लिया; पर अब कुछ नहीं हो सकता था। इस तरह उनका एक साल खराब हो गया। हाई स्कूल में वे विज्ञान के विषय लेना चाहते थे; पर उसकी सब सीट भर चुकी थी। अतः उन्हें मजबूरी में कलाओं से सिर मारना पड़ा। परीक्षा में वे तेजी से हाथ चलाकर कई कॉपी भर देते थे; पर अंक सदा ‘रॉयल श्रेणी’ के ही आये। उस समय परीक्षा में उत्तीर्ण होने को ही बहुत बड़ी बात माना जाता था। इसलिए परीक्षा परिणाम आने पर उनका तिलक लगाकर और मिठाई खिलाकर स्वागत किया जाता था। कक्षा बारह में द्वितीय श्रेणी लाने पर उनके पिताजी ने घर में पुताई करायी और पूजा के बाद पूरे गांव को भोज दिया था।

बी.ए. करते ही उनके विवाह की चर्चा चल पड़ी। पड़ोस के गांव में रिश्ता तय हो गया। लड़की और लड़के ने एक दूसरे को देख भी लिया। शादी वाले दिन शर्मा जी ने दाढ़ी बनायी तो मूंछ दायीं ओर कुछ ज्यादा कट गयी। उसे संतुलित करने के लिए बायीं और रेजर चलाया, तो हाथ थोड़ा आगे तक चला गया। एक बार फिर दायीं ओर कोशिश की; पर इस चक्कर में मूंछे जोकर जैसी हो गयीं। गुस्से में आकर उन्होंने मैदान बिल्कुल साफ ही कर दिया। इससे उनकी मां नाराज हो गयी। क्योंकि वहां पिता के मरने पर ही मूंछें साफ करने की प्रथा थी। बड़ा हाय-हल्ला हुआ। खैर, पंडित जी ने किसी तरह बात संभाली और बारात लड़की वालों के घर जा पहुंची।

पर वरमाला के समय फिर समस्या आ गयी। लड़की भी शहर में इंटर में पढ़ रही थी और बड़े प्रगतिशील विचारों की थी। उसने कहा कि मुझे जो लड़का दिखाया गया था, वह तो मूंछवाला था; पर यह तो कोई और है। मैं इसे वरमाला नहीं डालूंगी। मामला बड़ा पेचीदा हो गया। लड़की अपनी जिद से टलने को तैयार नहीं थी। जैसे-तैसे लड़की के मामा ने उसे समझाया, तब वह राजी हुई और शर्मा जी दोपाये से चौपाये बन सके।

शर्मा जी नौकरी के समय भी ऐसा ही हुआ। एक बार वे बस खराब होने से लिखित परीक्षा में देर से पहुंचे, तो दूसरी बार साक्षात्कार लेने वालों की कार पंचर हो गयी। तीसरी जगह दो लोगों का चयन होना था, तो उनका नंबर तीसरा था। कई जगह धक्के खाने के बाद बड़ी मुश्किल से उन्हें काम मिला। नौकरी तो सरकारी थी; पर अधिकारियों से न पटने के कारण बार-बार स्थानांतरण होता रहा। आखिर उन्होंने सरकारी दफ्तर के रीति-रिवाज सीख लिये। उन्हें दो साल बाद समझ में आया कि मेज के ऊपर की ही तरह बहुत से काम मेज के नीचे से भी होते हैं। चौथे साल में उन्होंने ‘‘नौकरी के नौ काम, दसवां काम हां जी’’ वाला सूत्र आत्मसात कर लिया। तब जाकर उनकी मेज से फाइलों की भीड़ कम हुई और उन्हें कुछ चैन मिला।

ऐसे कई ज्ञात-अज्ञात झंझट शर्मा जी के साथ लगे रहे। अवकाश प्राप्ति के बाद मैंने कहा कि वे अपने सब खट्टे-मीठे संस्मरण छपवा लें, तो यह ‘खट्राग दरबारी’ भारतीय साहित्य की एक अमूल्य धरोहर बन जाएगी। उन्होंने मेरी बात मानकर साल भर तक कलम घिसी; पर जिस प्रकाशक को पांडुलिपि दी, अगले ही दिन वह भगवान को प्यारा हो गया। छपना तो दूर रहा, पांडुलिपि भी हाथ से गयी।

शर्मा जी का मानना था कि ये सब समस्याएं उनकी जन्म की तिथि के कारण हैं। उन्होंने पंडित जी से पूछा, तो उन्होंने कपाट खुलते ही केदारनाथ भगवान के दर्शन करने को कहा। शर्मा जी हिम्मत कर केदारनाथ पहुंच तो गये; पर उस दिन वहां का सारा अमला एक बड़ी पार्टी के बड़े नेता जी को दर्शन करा रहा था, सो शर्मा जी का नंबर अगले दिन ही आ सका।

अब मुझे उस दिन ‘दुष्काल यज्ञ’ में झोंकी गयी मिर्चों का रहस्य समझ में आया। मैंने पूछा, ‘‘लेकिन शर्मा जी, आपके जन्म की वह विशेष तिथि थी कौन सी… ?’’ शर्मा जी उस मनहूस तिथि को शायद याद करना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होेंने मुंह टेढ़ाकर उत्तर दिया – गड़बड़ चौथ। मुझे लगा, मानो किसी ने मेरे मुंह में फिर से मिर्चें झोंक दी हैं।

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