लेखक परिचय

विकास कुमार

विकास कुमार

मेरा नाम विकास कुमार है. गाँव-घर में लोग विक्की भी कहते है. मूलत: बिहार से हूँ. बारहवीं तक की पढ़ाई बिहार से करने के बाद दिल्ली में छलाँग लगाया. आरंभ में कुछ दिन पढ़ाया और फिर खूब मन लगाकर पढ़ाई किया. पत्रकार बन गया. आगे की भी पढ़ाई जारी है, बिना किसी ब्रेक के. भावुक हूँ और मेहनती भी. जो मन करता है लिख देता हूँ और जिसमे मन नहीं लगता उसे भी पढ़ना पड़ता है. रिपोर्ट लिखता हूँ. मगर अभी टीवी पर नहीं दिखता हूँ. बहुत उत्सुक हूँ टेलीविज़न पर दिखने को. विश्वास है जल्दी दिखूंगा. अपने बारे में व्यक्ति खुद से बहुत कुछ लिख सकता है, मगर शायद इतना काफ़ी है, मुझे जानने .के लिए! धन्यवाद!

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नानाजी ने 21, जून 2005 के पत्र में युवाओं को संबोधित करते हुए लिखा है। युवाओं ! जहां चारों ओर अराजकता, ॔ष्टाचार, जातिवाद, प्रांतवाद और आर्थिक विषमता का वातावरण है उसमें ी हमारे वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीकों तथा उपलब्ध संसाधनों के बल पर राष्ट्रीय स्वामिन को बनाए रखा है। 1962 के युद्ध में चीनी सेना से हमने लोहा लिया तथा बांग्लादेश के स्वाधीनता संघर्ष में शत्रुओं के 93, 000 सैनिकों को बंदी बनाया।
 
॔॔कौन बनेगा करोड़पति’’ के माध्यम से युवा पी़ी को उपोक्तावादी संस्कृति के तरफ मोड़ा जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप वैज्ञानिक तथा सैनिक क्षेत्रों में पद रिक्त हैं। आजादी के 50 वषोर्ं में राजनीतिज्ञों को यह अनुव हुआ कि अप्रशिक्षित नेता प्रशिक्षित प्रशासनिक अधिकारियों को मार्ग दर्शन नहीं कर सकते।
 
उजड़े तथा बिखरे गांवों के तरफ से आबादी का शहरों की तरफ पलायन इस बात का द्योतक है कि हम विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था को अपने प्रशासनिक व संवैधानिक जीवन में स्थान नहीं दे पाए। फलतः आज दो ारत दिखाई दे रहा है। ारत की अधिकांश जनता के जीवन स्तर को सुधारने के लिए वैकल्पिक आर्थिक रचना की परम आवश्यकता है। विकास के पाश्चात्य मॉडल के स्थान पर गांधीवादी तथा एकात्म मानववादी दर्शन के द्वारा जनता के जीवन में पूर्णरूपेण परिवर्तन किया जा सकता है। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर मैं दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से युगानुकूल नवरचना के प्रकल्प को ग॔ामीण समाज के समक्ष एक उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत कर रहा हूं। यह प्रयोग सफल होता दिखाई दे रहा है।
 
नानाजी प्रकृति के सुकुमार कवि पंत की ाषा में ॔ारतमाता ग॔ामवासिनी’ के तरफ इंगित करते हुए कहते हैं कि शहरी जीवन की तुलना में ग॔ामीण जनता आज ी मानवीय गुणों से ओतप्रोत हैं। वस्तुओं का उत्पादन, वितरण और उपोग हेतु कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के बिना कुछ ी संव नहीं है। अतः ग॔ामीण वस्तुओं का नियोजन ी जरूरी है।
 
ारतीय चिंतन में ग॔ाहक देवता है। वह मात्र वस्तुओं का क॔यविक॔य नहीं करता बल्कि वह सेवा के द्वारा समाज में रचनात्मक सहयोग करता है। लेकिन पाश्चात्य अर्थ चिंतन में सर्वहारा का अधिनायकवाद दिखायी पड़ता है। उसके लिए संपूर्ण विश्व एक बाजार है तथा उसमें रहनेवाले लोग क॔ेता व विक॔ेता। 1917 में जो रूसी क॔ांति हुई उसमें मानव जाति का सहआस्तित्व था ही नहीं।
 
ारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था के बाद उदारवादी अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया है। पर 20 वषोर्ं के अध्ययन से यह साबित होता है कि उदारवादी अर्थव्यवस्था ने सामाजिक समता के स्थान पर विषमता को ही ब़ाया है।
 
युवाओं को संबोधित करते हुए नानाजी पत्र में लिखते हैं कि अविकसित और विकासशील समाज के लिए एक मॉडल की जरूरत है। जिसके माध्यम से युगानुकूल नवरचना का मार्ग प्रशस्त हो। अतः देश का युवा ॔॔ मैं नहीं तु’’ का आदर्श प्रस्तुत करके ारत को समृद्ध और शक्तिशाली बनाएगा।
 
नाना प्रकार के नानाजी ने विविधता में एकता की स्थापना के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से आजीवन सेवा का व॔त लिया था। पर जब राजनीति में मूल्यों का स्थान न के बराबर हो तो एक सदाचारी मातृूमि तथा पुण्यूमि का क्त कब तक इस काली कोठरी में रहेगा। वो तो सांप के क ेंचुल की तरह त्याग कर लोकपथ का अनुगामी बनेगा। राजनीतिज्ञों को यह सोचना चाहिए कि लोकपथ से ही सारे पथ जाते हैं।
 
नानाजी ने 28 जुलाई, 2005 के पत्र में युवाओं को संबोधित करते हुए लिखा है कि प्रिय युवा बंधुओं और बहनों! गुलामी के पूर्व हमारी न्याय व्यवस्था ॔पंचमुखी परमेश्वर’ अर्थात ॔पंच परमेश्वर’ थी । गांव के समस्त विवाद लोग मिलबैठकर सुलझा लेते थे। पर अंग॔जों ने 1828 में इसे वकीलों के माध्यम से शुरू किया। ॔ग॔ामीण गुटबंदी’ तथा ॔ग॔ामीण मुकदमेंबाजी’ पर प्र॔यात समाजशास्त्री बिरेन्द्र सिंह की एक पुस्तक हैं जिसमें उन्होंने ग॔ामीण समाज में व्याप्त गुट तथा संघर्ष को समझाने का प्रयास किया है। नानजी ी गांवों में गुटबंदी तथा मुकदमें बाजी से व्यथित हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य ग॔ामीण समाज में ॔रामराज्य’ के स्वप्न को साकार करना है। यह ती संव है जब जनता, वकील तथा सरकार एक सार्थक तथा प्रावी कदम उठायें।
 
की महात्मा गांधी को उनके राजनीतिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले ने ारतीय समाज का अध्ययन करने हेतु ेजा था। ग॔ामीण पुनर्रचना के लिए नाना जी ने ारतीय गांवों के अध्ययन पर बल दिया है। नानाजी लिखते हैं कि मैं एक किसान द्वारा हतोत्साहित करने पर ी हतोत्साहित नहीं हुआ तथा ट्यूबवेलों के माध्यम से गांवों का कायाकल्प कराया।
 
जनता पार्टी की सरकार द्वारा दिए गए सुविधाओं ने जनता में खुशियाली रूपी फसल को हरारा कर दिया। किंतु बिंध्याचल की पहाड़ियों से युक्त चित्रकू ट में यह प्रकल्प दुःसाध्य था। धीरेधीरे यह 500 गांवों में प्रयोग सफल हो गया है। किसी ी प्रकल्प के सफलता हेतु उस स्थान का वातावरण मु॔य रूप से जिम्मेदार होता है। लेकिन नानाजी ने अपने दिव्य ज्ञान चक्षु से ॔समाज शिल्पी दंपत्तियों’ का जो प्रयोग किया। उसके कारण उन गांवों से शून्य मुकदमेंबाजी, शून्य बेरोजगारी तथा हरेरे गांव दिखाई पड़ते हैं। यह सब राष्ट्र दधीचि नानाजी के प्रताप एवं प्राव के कारण संव हुआ है।
 
पत्र लेखन जनकल्याण का एक सशक्त माध्यम रहा है। प्रायः महात्मा गांधी, जय प्रकाश नारायण आचार्य विनोबा ावे तथा देश के गणमान्य लोगों ने इन पत्रों के द्वारा ारतीय समाज को एक नयी दिशा देने का प्रयास किया था। नानाजी तो एक राष्ट्रदृष्टा थे उनके मन में एक स्वर्णीम ारत का चित्र अंकित था। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण गोंडा, चित्रकू ट, नागपुर और बीड़ में देखा जा सकता है।
 
24 अगस्त, 2005 के पत्र में नानाजी क्या लिखतें हैं? जिस प्रकार ॔समाज शिल्पी दंपत्तियों’ ने स्थानीय ग॔ामवासियों के सहयोग से चित्रकू ट के गांवों का कायाकल्प किया। उस प्रकार आजादी के पश्चात यदि हमारे युवाओं को ग॔ाम केंद्रित विकास पर जोर दिया गया होता तो ारत के 6.50 लाख लोगों का जीवन स्तर कुछ और ही होता। देश के नौजवान बेरोजगारी, अपराधीकरण अन्य कुत्सित प्रवृतियों से ग॔सित नहीं होते। नानाजी की एक पीड़ा यह ी है कि जातीय, क्षेत्रीय तथा मजहबी ावनाओं को ड़काकर राजनीतिक दलों ने ारतीय समाज को खंडोंखंडों में विजित कर दिया है। यदि इस समाज को सुधारना है तो उसमें सर्वप्रथम युवा पी़ी को आगे आना होगा। मूल्यविहीन शिक्षा पर प्रहार करते हुए नानाजी का कहना है कि वर्तमान शिक्षापद्धति के माध्यम से ॔॔संपूर्ण क॔ांति’’, ॔॔सप्त क॔ांति’’ तथा ॔॔रामराज्य’’ के स्वप्न को साकार नहीं किया जा सकता है।
 
हर राष्ट्र की अपनी पहचान होती है। जिसे उस राष्ट्र की अस्मिता के रूप में हम व्या॔यायित करते हैं। लगग हजारों वषोर्ं के गुलामी के पश्चात ी हमारी सभ्यतासंस्कृति नष्ट क्यों नहीं हुई? वो कहीं न कहीं बची रही। जिसके बल पर ारत आज ी खड़ा है। ारतीय राष्ट्रीयता संकीर्ण और स्वार्थी न होकर मानवीय गुणों से ओतप्रोत है। हम धन के स्थान पर धर्म की महत्ता का प्रतिपादन करते आ रहे हैं।
 
समाजिक जीवन में प्रत्येक क्षेत्रों में व्याप्त ॔ष्टाचार, घूसखोरी तथा ाईतीजावाद से दुःखी होकर नानाजी का कहना है कि जबजब तरूणाई ने करवट बदली है। तबतब समाज में परिवर्तन हुआ है। राज्य सत्ता के माध्यम से समाजिक परिवर्तन के लक्ष्य को साकार नहीं किया जा सकता है।
 
युवाशक्ति के हाथों में परिवर्तन रूपी मशाल के द्वारा ारतीय समाज को प्रकाशित किया जा सकता है। अतः ऐ युवाओं! उठो और युगानुकूल नवरचना के कार्यक॔म में शामिल हो जाओ

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1 Comment on "नानाजी देश्मुख् (part 2)"

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डॉ. मधुसूदन
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सही कहा!
“राज्य सत्ता के माध्यम से समाजिक परिवर्तन के लक्ष्य को साकार नहीं किया जा सकता है।” कुछ सहायता की जा सकती है|
वैसे…
भ्रष्टाचार पनपने के लिए मिडिया, आम नागरिक, लेनेवाले और देनेवाले, देखनेवाले, सभी न्यूनाधिक मात्रामे जिम्मेदार है| जब तक साधारण जन सुधरेंगे नहीं बहुत अंतर नहीं आ सकता| या तो फिर एक कल्याणकारी शासक भी बहुत कुछ कर सकता है| उसकी क्षतियाँ भी तो है ही|

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