लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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• महामहिम जैसे शब्दों और औपनिवेशिक व्यवहार को समाप्त करने का आव्हान से एक नया वातावरण बनेगा !

• राजनीतिज्ञों को लेना होगी सीख और होना होगा जनतंत्र के अनुरूप

• अभी हाल ही में घटे घटनाक्रम में हमारें राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी जी नें एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उनकें सम्मिलित होने के अवसर पर छपे आमंत्रण पत्र पर से अपनें नाम के आगे लगे महामहिम शब्द को हटाने का आग्रह किया. सम्माननीय राष्ट्रपति जी के कार्यालय की ओर से जारी विज्ञप्ति का स्पष्ट आशय यह भी है कि स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारतीय गणराज्य में औपनिवेशिक प्रकार के व्यवहार, आचरण, भाषा और शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया जाना चाहिए. कहना न होगा कि आज के घोर आडम्बरी, प्रपंची और जबरदस्त दिखावटी व शानोशौकत वाली राजनीति और राजनेताओं के इस युग में सम्मानीय राष्ट्रपति जी का यह आग्रह या आदेश मरुभूमि के बीच ठंडी हवा के एक पुरसुकून और ताजा हवा के एक झोंकें की तरह आया है.हाल ही में निर्वाचित सम्मानीय राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी -जिन्हें हम आदरपूर्वक प्रणब दा के नाम से पुकारते हैं- के सम्बन्ध में राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद ऐसा लगने लगा था कि इन्हें संभवतः अब “प्रणब दा” के नाम से पुकारना और संबोधित करना बंद करना होगा किंतु उनके इस अनूठे, अभिनव किंतु अपनेपन से भरे आदेश के बाद पूरे भारतीय राजनैतिक जगत और आम नागरिकों को लगने लगा है कि ये तो हमारे “प्रणब दा’ ही है. प्रणब दा के इस स्नेहिल आदेश के बाद निश्चित ही “दा” शब्द का वजन बढ़ गया है और अब हम उन्हें और भी अधिक प्रेम, स्नेह और अपनेपन से “प्रणब दा” बोल पायेंगे.

सम्मानीय प्रणब दा ने तो अपनी ओर से स्थिति स्पष्ट कर दी कि भारतीय राजनीति, सामाजिक और प्रशासनिक परिवेश से अब औपनिवेशिक शब्दों का व वातावरण का लोप विलोप हो जाना चाहिए किंतु लाख टके का सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी औपनेवेशिक, अंग्रेजी या राजसी भाषा, ब्रिटिश व्यवहार, मुगलियाना हाव भाव, राजतान्त्रिक चाल चलन और धरती से चार अंगुल ऊपर उठकर चलनें के अपने चाल चलन और व्यवहार को बदले के लिए तैयार हैं? मुझे लगता है कि भारतीय राजनीतिज्ञ और नौकरशाह अपने राजसी व्यवहार को बदलनें की तो छोड़िये उस पर चिंतन मनन और चर्चा करनें को भी तैयार नहीं दिखतें हैं. आजकल देश के सार्वजनिक जीवन में काम करनें वाले लोग अपनी शान और बान केवल इस बात में समझते हैं कि सार्वजनिक स्थानों और संस्थानों में उन्हें अतिरिक्त सुविधाएँ, सम्मान और सुविधा प्रदान की जाएँ. ऐसे दमघोंटू और अवसादग्रस्त कर देनें वाले वातावरण में निश्चित ही प्रणब दा की यह पहल प्रसन्नचित्त और प्रफ्फुल्लित कर देनें वाली तो हैं किंतु इस नई पहल का अनुसरण कितने और कौन कौन करता है यह उत्तर बहुप्रतीक्षित और बहु अपेक्षित रहेगा!! यह आशा और अपेक्षा भी सदा ही रहेगी कि भारतीय राजनीति के इस अधोन्मुखी कालखंड को उत्तरोत्तर प्रज्ञा और संज्ञा से भर देनें के लिए प्रणब दा क्या क्या करते हैं??

• प्राचीन एतिहासिक महाभारत कालीन नगरी हस्तिनापुर के अवशेषों, खंडहरों तथा कौरवों पांडवों के और घातों, प्रतिघातों, षड्यंत्रों, संधियों, दुरभिसंधियों के विशाल किंतु अविस्मरणीय इतिहास को अपने उदर में छिपाए बैठी इस रायसीना पहाड़ी पर बना हमारा राष्ट्रपति भवन एक स्वयंसिद्ध व जागृत स्थापत्य रहा है. ब्रिटिश व भारतीय स्थापत्य शैली का यह बेजोड़ प्रासाद ब्रिटिश काल में वायसरीगल हाउस कहलाता था और औपनिवेशिक शासन का संचालन गढ़ होता था. आज उसी ब्रिटिश शासकों द्वारा बनाएँ गए राजप्रासाद के गलियारों से गुजरकर हमारें राष्ट्रपति जी का अपनेपन से भरा सन्देश भारतीय जनता और जनतंत्र को मिलना एक सुखद, सुन्दर, स्वस्थ, समृद्ध सन्देश तो है ही किंतु साथ साथ आश्चर्यजनक भी है !!! स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात जब डा. राजेन्द्रप्रसाद और उनकें बारह वर्षीय कार्यकाल के बाद डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राष्ट्रपति बनें तब तो सब कुछ बहुत ही ठीक, व्यवस्थित और उदाहरण परक था किंतु इन दो राष्ट्रपतियों के सत्रह वर्षीय कार्यकाल के बाद स्थितियां और उदाहरण उतने सहज और स्वस्थ नहीं रहे. पल प्रतिपल, दिनप्रतिदिन, साल दर साल और दशक दर दशक इस राष्ट्रपति भवन ने जो राजनीति और आदर्शों के अधोगमन का खेल देखा उसके विषय में -यदि एक डा. अब्दुल कलाम आजाद के कार्यकाल को छोड़ दें तो बाकी की- चर्चा न करना ही अधिक उचित और गरिमामयी रहेगा. डा. राधाकृष्णन जी के कार्यकाल के पश्चात से लेकर वर्ष १९८० से पूर्व जब तक राज्य सरकारों के विषय में राष्ट्रपति भवन को प्रदत्त अधिकारों के विषय में नया क़ानून नहीं बन गया तब तक तो राष्ट्रपति भवन का उपयोग राज्य सरकारों के सत्ताहरण का एक सहज सुलभ साधन बन गया था. इतिहास साक्षी है कि अस्सी के दशक के पूर्व तक के काले स्याह उदाहरणों के कारण ही स्वतंत्र भारत में राष्ट्रपति की छवि रबर स्टंप की बन गयी थी. अंतरात्मा की आवाज वाले अध्याय ने तो सदा सदा के लिए राष्ट्रपति भवन पर अमिट छाप ही छोड़ दी थी. यहाँ उल्लेखनीय यह भी है कि प्रतिभा ताई के राष्ट्रपति भवन से विदा होने की बेला में प्रणब दा भी एक ऐसी भूल कर बैठे थे जो उनकें राजनैतिक आकार से बहुत ही छोटी और गंभीर थी. वह भूल थी उनकें राष्ट्रपति की उम्मीदवारी को तय करनें के लिए काँग्रेस अध्यक्ष के प्रति आभार प्रकट करने की!! उन जैसे विशाल व्यक्तित्व और अनुभवी राजनेता से यह आशा नहीं थी कि –खासतौर से राष्ट्रपति की उम्मीदवारी तय होने के बाद- वे अपनी उम्मीदवारी के लिए राष्ट्रीय राजनीति या जनता के स्थान पर काँग्रेस अध्यक्ष के प्रति आभार या धन्यवाद प्रकट करें. वह क्षण प्रणब दा की गरिमा और प्रतिष्ठा के विपरीत खड़ा क्षण था और उनकें प्रति राष्ट्र के विश्वास को डिगाने वाला क्षण भी.. किंतु आज इस महामहिम शब्द को हटाने और भारतीय राजनीति से औपनिवेशिक शब्दों और व्यवहार आचरण को समाप्त करनें वाला व्यक्तव्य देते समय उन्होंने न केवल उनके प्रति हमारें विश्वास को डिगाने वाले क्षण का समूल नाश कर दिया है बल्कि देश की आशाओं और विश्वास के अनुरूप ही अपनी पारी को भी प्रारंभ कर दिया हैं.

• भारत में गठबंधन और जोड़तोड़ की राजनीति के इस विकट कालखंड में राष्ट्रपति भवन की भूमिका किसी भी क्षण अति महत्वपूर्ण और निर्णायक हो सकती है. विभिन्न मतों, विचारों और धुर विरोधियों को भी साथ लेकर सरकार बना लेने के इस महाविकट और राजनैतिक रूप से संक्रमणकाल में यह अवश्यम्भावी ही लगता है कि आने वाला इतिहास हमारें राष्ट्रपति भवन की परीक्षा लेनें ही वाला है. किंतु आशापूर्ण सुविधा, प्रसन्नता और तसल्ली इस बात की भी है कि इस संक्रमण काल के लिए एक राजनैतिक पंडित और संवेदनशील व्यक्ति इस परीक्षा को कुशलता से उत्तीर्ण करनें और भारतीय राजनीति और जनता दोनों को प्रसन्न कर देनें के लिए निर्मल ह्रदय लिए उद्दृत और तैयार बैठा है.

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