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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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मुकेश कुमार

हाल ही में बिहार सरकार ने उन लोगों को नोटिस भेजने का फैसला किया है जो इंदिरा आवास योजना का लाभ लेने के बावजूद मकान नहीं बना रहे हैं। दरअसल राज्य सरकार को पिछले कई महीनों से इस बात की शिकायत मिल रही थी कि इंदिरा आवास योजना का लाभ उठाने के बावजूद लोग मकान नहीं बना रहे हैं। जाहिर है यह वह लोग होंगे जिन्हें इसकी आवश्‍यकता नहीं रही होगी लेकिन भ्रष्‍टाचार की गंगा में डुबकी लगाते हुए इन्होंने यह राशि हासिल कर ली है। जो राशि किसी जरूरतमंद को मिलनी चाहिए थी। यह पहला अवसर नहीं है जब इंदिरा आवास योजना में भ्रश्टाचार की शिकायत मिली है। देश के कई हिस्सों में इंदिरा आवास योजना और मनरेगा में धांधली की शिकायतें तकरीबन हर रोज समाचारपत्रों की सुर्खियों में रहती हैं। इसका एक पूरा चेन सिस्टम बना हुआ है। दरअसल इसमें धांधली करने वाले इस बात से बखूबी वाकिफ होते हैं कि यदि मामले का खुलासा भी हुआ तो जांच होते होते सबकुछ शांत हो जाएगा। ऐसे में बिहार सरकार का लाभ लेने वालों को ही नोटिस थमाना भ्रष्‍टाचार पर सीधा प्रहार है।

राज्य सरकार का यह कदम स्वागतयोग्य है क्योंकि इससे जहां एक तरफ बिचौलियों नुकसान होगा वहीं दूसरी ओर इसका अनुचित लाभ लेने वालों को भी कड़ा संदेश जाएगा।

भ्रष्‍टाचार की इस कड़ी में नुकसान हमेशा उनका होता है जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत होती है। पिछले महीने राज्य सरकार ने राज्य के सभी प्रखंडो में इंदिरा आवास शिविर लगाकर करीब नौ लाख गरीबों को योजना का लाभ पहुंचाया है। इस तरह के शिविर लगाकर योजना का लाभ पहुंचाने का कार्य पिछले वर्ष शुरू किया गया था। इसके साथ ही सरकार ने यह भी फैसला लिया था कि इस योजना में गड़बड़ी की शिकायत मिलने पर उसकी विडियोग्राफी कराकर उसे यूट्यूब पर अपलोड किया जाएगा। ऐसा करने से कर्मचारियों और बिचैलियों में भय पैदा होगा और गड़बड़ी करने वालों की संख्या में कमी आएगी। सरकार के इस साहसिक प्रयास के बावजूद इसके घपले में कमी उम्मीद से कम हुई है। आज भी राज्य में ऐसे कई लोग हैं जो इस लाभकारी योजना से वंचित हैं।

राज्य के मधुबनी जिला स्थित बिस्फी ब्लॉक किसी नाम का मोहताज नही है। हिंदी तथा संस्कृत के महान कवि विद्यापति के नाम पर बसा यह ब्लॉक उनकी जन्मस्थली है। परंतु इसके बावजूद आज भी यह उपेक्षा का शिकार है। बिस्फी प्रखंड से मात्र एक किमी उत्तर दिशा में स्थित इस गांव में सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं का लाभ शायद ही पहुंच पाता है।

इसी ब्लॉक के रमुनिया गांव के रहने वाले मो. सलीम की उम्र 85 साल की हो चुकी है। लेकिन इसके बावजूद उसे अबतक इंदिरा आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका है। पूछने पर अपनी डबडबाई आँखें और कांपती हुई आवाज में बोले ‘‘बऊआ हो हमरा कोई न ह, हमर जिनगी इहे गाँव वाला के हाथ में ह कभी इ खिला द ह त कभी ऊ’’। इंदिरा आवास की योजना के लाभ से अभी तक यह बुजुर्ग वंचित है। इनका आरोप है कि मुखिया के बिचैलिये पांच हजार रूपए की मांग करते हैं। जबकि इनके पास दो वक्त की रोटी के लिए भी पैसा नही होता है। घर की हालत कुछ यूं है कि न जाने कब इसमे दब कर उनकी आवाज बंद हो जाए। सोने को एक पुरानी टूटी खटिया है जिसकी बयां उसकी पीठ करती है। एपीएल और बीपीएल कार्ड का नाम तो इन्होंने सुना है लेकिन अभी तक केवल इसलिए नसीब नही हुआ क्योंकि चढ़ावा देने के लिए इनके पास पैसे नहीं हैं। यह सिर्फ एक सलीम मियां की दास्तान नहीं है। राज्य के ऐसे कई गांव हैं जहां लोग सरकारी सुविधाओं से सिर्फ इसलिए वंचित हैं क्योंकि उनके पास बाबू साहब और उन तक मिलवाने वालों की जेबें गर्म करने के लिए पैसे नहीं है। जबतक उन्हें खुश नहीं करेंगे तबतक ऐसे लोगों को इंतजार करना होगा।

इसकी प्रमुख वजह भ्रष्‍टाचार है। यही कारण है कि उम्रदराज होने के बावजूद रमुनिया को किसी प्रकार की सुविधा अब तक प्राप्त नहीं हो सकी है। बाढ़ ग्रसित क्षेत्र होने के कारण बरसात के दिनों में इनकी दशा क्या होती होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। नदियों के उफान पर होने के कारण इन्हें अपना घर छोड़कर बांध पर शरण लेने को मजबूर होना पड़ता है। मो. सलीम बताते हैं कि पिछली बार मदद के नाम पर बाढ राहत समाग्री से एक क्विंटल गेहूँ मिला। जो कुछ दिनों के लिए पेट की आग को शांत करने के लिए कारगर साबित हुआ। लेकिन राशन खत्म होने के बाद फिर से समस्या यथावत रही। इस दौरान मदद के लिए कितने बार कितने ही बाबू-भईया से गिरगिरायें है परंतु दिलासा के सिवा कुछ नसीब नही हुआ। दो जिन्दगियों को इन्होंने जन्म दिया है जो फिल्हाल अपनी पत्नी के साथ दिल्ली में रह रहे है। जिन्हें सहारा देकर चलना सिखाया था उन्ही का इन्तजार करते-करते इनकी आखें जवाब देने लगी हैं। कान का सहारा बाकी है लेकिन हर वक्त यही डर सताता रहता है कि खुदा न जाने कब यह सहारा भी छिन जाए। सरकार की ओर से गरीबों और बेसहारों के लिए नई नई घोषणायें होती हैं, योजनाएं बनाई जाती हैं जो सुनने में तो अच्छा लगता है कि हर जगह खुशहाली है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। मो. सलीम की जिन्दगी एक प्रश्न बनकर हमारे सामने खड़ा है। जिसका जवाब सिर्फ सरकार और प्रशासन को ही नहीं बल्कि समाज को भी देना है। ये तो सिर्फ एक जिन्दगी है न जाने कितने ऐसे है जिन्हें इस बात का इंतजार है कि कभी तो कोई उनकी आवाज को सुनेगा। (चरखा फीचर्स)

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