लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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25 नवम्बर पर विशेष:-

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मृत्युंजय दीक्षित

 

सिख समाज के महान  संत व गुरू नानक का जन्म 1469 ई में रावी नदी के किनारे स्थित रायभुएकी तलवंडी में हुआ था जो अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। अब यह पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है।इनके पिता मेहता कालू गांव के पटवारी थे  और माता का नाम तृप्तादेवी था। इनी एक बहन भी थी जिनका नाम नानकी था । बचपन से ही नानक में प्रखरबुद्धि के लक्षण दिखलायी देने पड़ गये थे। बचपन से ही ये सासांरिक चीजों के प्रति उदासीन रहते थे। पढ़ाई-   लिखाई में इनका मन कभी नहीं लगा। सातवर्ष की आयु में गांव के स्कूल में जब अध्यापक पंडित गोपालदास ने पाठ का आरंभ अक्षरमाला से किया  किया लेकिन अध्यापक तब  उस समय दंग रह गये जब उन्होंने गुरू से अक्षरमाला का अर्थ पूछा। अध्यापक की आलोचना करने पर गुरूनानक ने हर एक अक्षर का अर्थ लिख दिया। गुरूनानक के द्वारा दिया गया यह पहला दैविक संदेश था। लज्जित अध्यापक ने गुरूनानक के पैर पकड़ लिये।

कुछ समय बाद उन्होंने स्कूल जाना ही छोड़ दिया। अध्यापक स्वयं गुरूनानक को घर छोड़ने आये। बचपन से ही कई चमत्कारिक घटनाएं घटित होने लग गयी जिससे गांव के लोग इन्हें दिव्यशक्ति मानने लगे। बचपन से ही इनके प्रति श्रद्धा रखने वाले लोगों में इनकी बहन नानकी गांव के शासक प्रमुख थे। गुरूनानक का विवाह कहा जाता है कि 14 से 18 वर्ष के बीच गुरूदासपुर जिले के बटाला के निवासी भाईमुला की पुत्री सुलक्खनी के साथ हुआ। उनकी पत्नी ने  दो पुत्रों को जनम दिय।लेकिन गुरू पारिवारकि मामलों में पड़ने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनके पिता को भी जल्द ही समझ में आ गया कि विवाह के कारण भी गुरू अपने लक्ष्य से पथभ्रष्ट नहीं हुए थे। वे शीघ्र ही अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर अपने चार शिष्यों मरदाना,लहना, नाला और रामदास को लेकर यात्रा के लिए निकल पड़े़।

गुरूनानक देव ने संसार के दुखों को घृणा झूठ और छल – कपट से परे होकर देखा।  इसलिए वे इस धरती पर मानवता के नवीनीकरण के लिए निकल पड़े। वे सच्चाई की मशाल लिए, अलौकिक प्यार, मानवता की शांति और खुशी के लिए चल पड़े। वे उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम चारों तरफ गये और हिंदू ,मुसलमान, बौद्धों, जैनियों, सूफियों, योगियों और सिद्धों कें विभिन्न केद्रों का भ्रमण किया। उन्होंने अपने मुसलमान सहयोगी मर्दाना जो कि एक भाट था  के साथ पैदल यात्रा की। उनकी यात्राओं को पंजाबी में उदासियां कहा जाता है।  इन यात्राआं मे आठ वर्ष बीताने के बाद घर वापस लौटे।

गुरूनानक एक प्रकार से सर्वेश्वरवादी थे।  मूर्तिपूजा के घोर विरोधी थे। रूढ़ियों और कुप्रथा के तीखे व प्रबल विरोधी थे। कहा जाता है कि बचपन में ही उन्होनें जनेऊ का कड़ा विरोध किया था और उसे तोड़कर फेंक भी दिया था।उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होनें तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक स्थितियों पर भी नजर डाली है।  संत साहित्य में नानक ने नारी को उच्च स्थान दिया है। इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है ।  हिंदू, मुसलमान दोनों पर ही इनके उपदेशों का प्रभाव पड़ता था। कुछ लोगो ने ईष्र्यावश उनकी शिकायत तत्कालीन शासक इब्राहीम लोधी से कर दी जिसके कारण कई दिनों तक कैद में भी रहे। कुछ समय बाद जब पानीपत की लड़ाई में इब्राहीम लोधी बार के साथ लड़ाई में पाराजित हुआ तब कहीं जाकर गुरूनानक केैद से मुक्त हो पाये।    जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बढ़ती चली गयी तथा विचारों में भी परिवर्तन हुआ। उन्होनें करतारपुर नामक एक नगर भी बसाया था। अंितंम समय में  हिंदू और  मुसलमान शिष्य अपने धार्मिक रीति- रिवाजों के साथ संस्कार करना चाहते थे।इस विवाद का अंत भी गुरूनानक ने स्वयं ही करवाया। उनकी याद में सिखों ने एक गुरूद्वारा  और मुसलमानों ने मकबरा बनवाया लेनि रावी नी मं अचानक बाढ़ आयी और दोनों को बहा ले गयी। संभवतः ईश्वर को यहां पर भी भेदभाव पसंद नहीं था। एक प्रकार से गुरूनानक के धर्म ने सभी प्रकार की अर्थहीन रीतियों तथा संस्कारों को अस्वीकार किया। गुरूनानक के उपदेश आज के वर्तमान समय के लिए भी बेहद उपयोगी हैं।

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