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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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मृत्युञ्जय दीक्षित

यह वर्ष महान रसायनविद डॉ. प्रफुल्ल चंद राय के जन्म का 150वां वर्ष है। डॉ. राय का जन्म पश्चिम बंगाल के रड़ौली गांव में हुआ था। अब यह स्थान बांग्लादेश में है। डॉ. राय के पिता समाजसेवी थे और उन्होंने कभी भी अंग्रेजों के समक्ष समर्पण नहीं किया। वे आधुनिक विचारधारा के अवश्य थे।

डॉ. राय की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई तथा वहां पर शिक्षा समाप्त करने के बाद 1870 में उन्होंने कलकत्ता के हेयर स्कूल में प्रवेश लिया। 1879 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जहां प्रारंभ में उन्हें शहरी छात्रों का विरोध और मजाक झेलना पड़ा। पिता के पुस्तकों के खजाने से प्रफुल्ल को एक पुस्तक प्राप्त हुई जिसमें कुछ महान वैज्ञानिकों के जीवन चरित्र थे। जिन्हें पढ़कर राय को प्रेरणा प्राप्त हुई। प्रफुल्ल सबसे अधिक महान वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिन के जीवन से प्रभावित हुए। उनके जीवन चरित्र को पढ़कर ही राय ने वैज्ञानिक बनने का निश्चय किया। प्रफुल्ल अंग्रेज कवि और नाटककार शेक्सपियर के साहित्य को बहुत ही शौक से पढ़ते थे। उनके पिता अपने पुत्र की जिज्ञासाओं को शांत किया करते थे।

1874 में प्रफुल्ल को पेचिश की बीमारी हो गई। जिससे वह बेहद कमजोर हो गये। लेकिन उन्होंने अपना अध्ययन कार्य जारी रखा और एडिमसन, सर वाल्कट स्कॉट, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, लार्ड बायरन, कार्लाइल आदि के जीवन चरित्रों को पढ़कर राय ने अपने जीवन को सुधारने के लिए नियमों का पालन करना प्रारंभ किया। अपनी बीमारी के सात महीने में प्रफुल्ल ने अपना एक एक दिन ज्ञान की वृद्धि कराने में लगाया। उन्होंने भारतीय इतिहास, साहित्य और संस्कृति का भी ज्ञान प्राप्त किया। प्रफुल्ल की कक्षाओं में पढ़ाये जाने वाले विषयों से संतोष नहीं प्राप्त होता था। उन्होंने अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए भौतिक शास्त्र व रसायन शास्त्र के अलग से व्याख्यान सुनने भी प्रारंभ कर दिये। इस बीच उन्हें रसायन विज्ञान की जो भी पुस्तक प्राप्त होती थी वे पूरी की पूरी पढ़ डालते थे। वैज्ञानिक अध्ययन के साथ ही वे संस्कृत भाषा का भी ज्ञान बढ़ा रहे थे।

सन 1882 में वे इंग्लैंड पहुंचे और एडिनबरा विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त किया। यहां उनका जाने माने रसायनविदों के साथ सम्पर्क हुआ और जिसके कारण उनका रसायन प्रेम और मजबूत हुआ। यहां उन्होंने जर्मन भाषा सीखी और जर्मन पुस्तकें पढ़कर अपने ज्ञान में वृद्धि की। सन् 1884 में उन्होंने एडिनबरा विश्वविद्यालय की स्नातक की एक निबंध प्रतियोगिता में भाग लिया, जिसका विषय था- ‘गदर के पहले और बाद का भारत’। इस निबंध में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार पर तीव्र व्यंग्य कसे गये थे जिसके कारण उनका निबंध पुरस्कृत नहीं हुआ लेकिन उनके निबंध की प्राचार्य सर विलियम मूर ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

उन्होंने अपने लेख को पार्लियामेंट विशेषज्ञ जान ब्राइट को विशेष टिप्पणी के लिए भेजा जिसकी उन्होंने प्रशंसा की। यही नहीं उन्होंने लेख को अत्यंत मार्मिक बताते हुए उपयोग करने के लिए अधिकृत किया। इसके बाद प्रफुल्ल ने अपने लेख को लंदन टाइम्स सहित सभी बड़े समाचारपत्रों में भेजा। जिसे पढ़ने के बाद इंग्लैंड वासियों को पता चला कि अंग्रेजों ने भारत को किस प्रकार से लूटा है।

प्रफुल्ल ने बीएससी की परीक्षा में शानदार सफलता प्राप्त की। 1888 में डीएससी की उपाधि प्राप्त की। उन्हें कई छात्रवृत्तियां प्राप्त होने लग गईं। वे 1888 में ही भारत लौट आये। 1889 में कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कालेज में प्रोफेसर नियुक्त हुए। अध्ययन कार्य के साथ ही वे मौलिक शोध कार्य भी करने लग गये। सन 1916 में वे राजकीय सेवा से निवृत्त हो गये। प्रेसीडेन्सी कालेज और विश्वविद्यालय प्रयोगशाला से प्रकाशित एवं विविध रसायनिक समस्याओं से संबंधित उनके मौलिक पत्रों की संख्या दो सौ से अधिक पहुंच गई।

सन् 1896 में उन्होंने मरक्यूरस नाइट्रेट तैयार कर पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। वह औषधि व कल कारखानों की स्थापना एवं विकास की गतिविधियों के लिए लगातार प्रयत्नशील रहे। उन्होंने ऐसी चीजें तैयार करने का निर्णय लिया जिनकी मांग बाजार में बहुत होती थी और वे सरलता से तैयार भी हो सकती थीं। उन्होंने मात्र आठ सौ की पूंजी लगाकर, अपना कार्य प्रारंभ कर दिया। उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में दिमागी ताकत बढ़ाने वाले रासायनिक तत्व ‘फास्फेट ऑफ कैल्सियम’ का निर्माण किया। उन्होंने घर पर जो कारखाना लगाया वही आगे चलकर 1900 के लगभग एक विशाल कारखाना बन गया जो कि बंगाल कैमिकल्स एंड फार्मेस्युटिकल वर्क्स के नाम से आज भी प्रसिद्ध है।

डॉ. राय स्वदेशी उद्योग धंधों के भी संस्थापक थे। सौदेपुर में गंधक के तेजाब का कारखाना, 1901 में स्थापित चीनी मिट्टी के बरतन बनाने का कारखाना, 1921 में बंगाल एपेमल वर्क्स नामक तामचीनी की चीजें बनाने का कारखाना, 1905 में स्थापित बंगीय स्टीम नैविएशन कंपनी नामक जहाजरानी कम्पनी आदि की स्थापना और संचालन में उनकी भूमिका चिरस्मरणीय रहेगी। उन्होंने अमोनिया नाइट्रेट यौगिकों तथा उनके व्युत्पादों पर मौलिक अनुसंधान किये। नाइट्राजन अम्ल और लवण के विषय में उनके अनुसंधान की प्रशंसा हुई।

उन्होंने प्रसिद्ध रसायनवेत्ता नागार्जुन के प्रसिद्ध ग्रंथ रसेंद्र-सार संग्रह के विषय में एक लेख लिखा जो कि बहुत चर्चित हुआ। अनेक वर्षों के बाद उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंदू रसायन शास्त्र का इतिहास’ प्रकाशित हुई जिसकी प्रशंसा विश्व के सभी वैज्ञानिकों द्वारा की गई। पुस्तक का दूसरा खंड 1908 में प्रकाशित हुआ। यह ग्रंथ हिंदुओं की उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है।

डॉ. राय एक महान वैज्ञानिक ही नहीं अपितु एक महान समाज सेवी भी थे। वे बाढ़ पीड़ितों की भी मदद करते थे और अकाल पीड़ितों की भी। वे गांव-गांव गये और देश की दुर्दशा को देख दुःखी भी हुए। उन्होंने एकतामूलक संस्कृति के दर्शन किये।

सन 1911 में उन्हें नाइट की उपाधि से विभूषित किया गया। 1934 में उन्हें लंदन रसायन सोसाइटी का अध्यक्ष चुना गया। कई विदेशी विश्वविद्यालयों ने उन्हें उपाधियों से सम्मनित किया। कलकत्ता, ढाका और बनारस विश्वविद्यालयों ने भी उनका सम्मान किया। 1920 में वे भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। सन 1921 से 1931 तक उन्होंने देश के कोने कोने का दौरा किया और राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना करके खद्दर को अपनाने और छुआछूत को मिटाने पर भाषण देकर नवयुवकों में नयी चेतना का संचार किया। सन 1932 में उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘एक बंगाली रसायनवेत्ता का जीवन और अनुभव’ पूरी की।

सन 1929 में वे असहयोग के आर्थिक रचनात्मक कार्यक्रम में जुट गये। जीवन में वे सादगी की प्रतिमूर्ति थे। उन्हें इतिहास और साहित्य से प्रेम था। वे महान वैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री थे। वे आधुनिक भारत के शिल्पकारों में मूर्धन्य थे। उन्हें सामंतवादी पृथकतावाद से घृणा थी। महान वैज्ञानिक डॉ. राय का निधन संक्षिप्त बीमारी के बाद 14 जून 1944 को हो गया। उनके निधन से विज्ञान जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

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