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 सुजाता राघवन 

वीरेंद्र की इस यात्रा का लक्ष्य बारिश के पानी को बर्बादी से बचाना था। 1997 में इसकी शुरूआत करते समय उनके मन में पारंपरिक जल स्त्रोतों, कुओं, तालाबों और छोटे-छोटे झरनों में कम होती जलधारा अधिक हावी थी। छत्तीसगढ़ में धान की खेती सबसे ज्यादा होती है। इसीलिए इसे ‘चावल का कटोरा’ भी कहा जाता है। धान की फसल मुख्यतः जल संसाधन पर निर्भर होती है। 

छत्तीसगढ़ के बस्तर का नाम आते ही एक ऐसे क्षेत्र की छवि उभरकर सामने आती है जो पिछले कई वर्षों से हिंसा, संघर्ष और रक्तपात से जूझता आ रहा है। विकास की वास्तविक परिभाषा और राजनीतिक परिपेक्ष्य की सीमा में बंधा मीडिया भी इन सवालों के घेरे में उलझ कर रह गया है। इस गहन वैचारिक संघर्ष और उससे जुड़ी बहस में जो बात कहीं खो गई है, वह है बस्तर की अपनी पहचान। यह क्षेत्र कैसा है, यहां के लोग कैसे रहते हैं और वह कौन सी बात है जो विश्व मानचित्र पर इसे परिभाषित करती है?

खूबसूरत जंगलों और आदिवासी संस्कृति में रंगे बस्तर को राज्य की सास्कृतिक राजधानी के तौर पर भी जाना जाता है। उड़ीसा से शुरू होकर दंतेवाड़ा की भद्राकली नदी में समाहित होने वाली करीब 240 किलोमीटर लंबी इंद्रावती नदी बस्तर के लोगों की आस्था और भक्ति का प्रतीक है। दुर्गम और दुरूह रास्ते इसके नैसर्गिंक संसाधन हैं। यहां की जो चीज लोगों को सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वह है यहां के घने जंगल जो मीलों तक खत्म नहीं होते और फिर इसकी सांस्कृतिक और सामाजिक रचनाएं। सदियों से इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों की अपनी ही जीवन पद्धति है। जिनकी संस्कृति में प्रकृति की पूजा ही सर्वोपरि है एवं उसकी रक्षा वर्तमान पीढ़ी से होते हुए भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित कर दी जाती है।

सदियों से क्षेत्र में चले आ रहे जीवन दर्शन ने ही संभवतः वीरेंद्र सिंह को पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी लेने को प्रेरित किया। दुर्ग जिले के कृषक परिवार में जन्मे वीरेंद्र बचपन से प्रकृति की गोद में खेला करते थे। पौधों में नयी कोपलों को निहारने, कटने के लिए खड़ी फसलों को ताकने और झरनों से तेजी से झरते पानी को देखने में उन्हें बहुत आनंद आता था। जब वह बड़े हुए तो उन्होंने महसूस किया कि मानव सभ्यता का आधार प्रकृति प्रदत्ता इन्हीं अनमोल उपहारों पर निर्भर है। यदि इसकी देखभाल नहीं की गई तो मानव सभ्यता के अस्तित्व को बचाना भारी पड़ सकता है। प्रकृति के प्रति खतरों को लेकर चिंतित वीरेंद्र के समक्ष विद्यालय शिक्षक के रूप में उसके रहस्यों को जानने और समझने की असीम संभावनाएं फलीभूत होने लगीं। इसी के साथ शुरू हुई उनकी अनवरत हरित यात्रा।

वीरेंद्र की इस यात्रा का लक्ष्य बारिश के पानी को बर्बादी से बचाना था। 1997 में इसकी शुरूआत करते समय उनके मन में पारंपरिक जल स्त्रोतों, कुओं, तालाबों और छोटे-छोटे झरनों में कम होती जलधारा अधिक हावी थी। छत्तीसगढ़ में धान की खेती सबसे ज्यादा होती है। इसीलिए इसे ‘चावल का कटोरा’ भी कहा जाता है। धान की फसल मुख्यतः जल संसाधन पर निर्भर होती है। जिसके लिए यहां के अधिकांश किसान इन्हीं पारंपरिक जल स्त्रोतों पर निर्भर हैं और यह सब वर्षा पर निर्भर हैं। लेकिन वर्षा के समय अधिकांश जल बेकार बह जाता है। जिसका संचयन किया जाए तो कैसा रहेगा? इसी विचार को वास्तविक स्वरूप देने के साथ शुरू हुआ उनका अभियान, जो पिछले 14 सालों से जारी है। इस अद्भुत प्रकृति यात्रा के कारण वह अब इस क्षेत्र में ‘ग्रीन कमांडो’ के नाम से विख्यात हो चुके हैं।

शुरूआत में वीरेंद्र लोगों को बारिश के पानी के संचयन के प्रति जागरूक करने लगे। जिसके काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आए। इस अभियान के फलस्वरूप इलाके में दैनिक जीवन और कृषि के लिए होने वाले पानी की किल्लत को काफी हद तक कम कर दिया है। उनके अभियान का लक्ष्य जल संचयन से आगे बढ़कर अब उसे प्रदूषण से मुक्ति दिलाना भी हो गया है। इस अभियान में उन्हें स्कूली बच्चों का भी खूब साथ मिल रहा है। इस संबंध में वीरेंद्र का कहना है कि दुर्ग जिले में स्थित भिलाई इस्पात संयंत्र से निकलने वाले प्रदूषक पदार्थों से तंदुला बांध के आसपास का क्षेत्र प्रभावित हो रहा था। पानी की अपनी जरूरतों के लिए अनेक लोग इसी बांध पर निर्भर थे। आसपास के क्षेत्रों में विचरण तथा निवास करने वाले पशु-पक्षी भी इसी बांध के पानी पर आश्रित थे। इस संबंध में उन्होंने जिला, विकासखंड और शहरी निकाय के अधिकारियों के समक्ष इस मुद्दे को उठाया, लेकिन सभी की प्रतिक्रिया ठंडी ही रही। इसी से विचार आया कि इस मिशन में विद्यालय के बच्चों को भी शामिल किया जाए तो बेहतर रहेगा। आज वीरेंद्र के मार्गदर्शन में समूचे कांकेर जिले के स्थानीय स्कूलों के बच्चे शामिल हो चुके हैं, जिससे उनकी रणनीति को बल प्राप्त हुआ है। विद्यालयों के प्राचार्य इस तरह के प्रासंगिक सामाजिक कार्यों के लिए सहर्ष अपने छात्र-छात्राओं को भेजने को तैयार रहते हैं। पर्यावरण के प्रति ग्रीन कमांडो का यह अभियान महाविद्यालयों तक पहुंच चुका है और कॉलेजों के विद्यार्थी स्वतः ही उनकी इस मुहिम में शामिल होते जा रहे हैं। अलग-अलग टुकड़ों में बंटकर ग्रीन कमांडो की टोली घर-घर जाकर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के बारे में समझाती है और पेड़ों एवं पानी के संचयन के प्रति जागरूक करती है। यह पूछे जाने पर कि वह पर्यावरण जगत में होने वाले परिवर्तनों से किस प्रकार जीवंत संपर्क बनाए रखते हैं और यह भी कि कार्यरूप में परिणत करने के लिए उन्हें नये-नये विचार कैसे आते हैं, वह मुस्कुरा कर जवाब देते हैं, ‘‘मुझे पर्यावरण के बारे में फस्तकें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। मुझे स्वतः ही पता चल जाता है कि क्या गलत हो रहा है और किस पर धयान देने की आवश्यकता है और किस प्रकार बच्चों तथा युवाओं के मन में इसके प्रति उत्सुकता पैदा की जाए।’’

अपने अभियान को सफल बनाने के लिए ग्रीन कमांडो नुक्कड़ नाटक, पोस्टर बनाने, प्रदर्शनी लगाने, विषय आधारित यात्राएं निकालने, क्षेत्र का दौरा करने, वृक्षारोपण अभियान और घर-घर जाकर संदेश पहुंचाने जैसे अन्य कार्यक्रम करते रहते हैं। इस दल ने अब तक जो अभियान चलाए हैं, उनमें सबसे उल्लेखनीय हैं गेहूं की खड़ी फसल को गाजर घास (वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम) से बचाना। गाजर घास के विस्तार के कारण गेहूं की फसल में समय से पूर्व ही फूल निकल आते थे। उनके इस अभियान में लड़के और लड़कियां दोनों ही शामिल हैं, परंतु लड़कियां ज्यादा आगे आकर काम करती हैं। अभियान के धयेय और संदेशों के साथ-साथ वे इनसे जुड़ी गतिविधियों में भी पर्याप्त दिलचस्पी लेती हैं। दल में शामिल सदस्य मुख्य रूप से पैदल चलकर आसपास के वातावरण को बारीकी से देखते हैं। जबकि पोस्टर बनाने के लिए रंग और ब्रुश जैसी सामग्रियों के लिए वीरेंद्र अपने वेतन से व्यय करते हैं। खाने के लिए दल के सदस्य भोजन अपने घर से लाते हैं। परंतु कई बार स्थानीय लोग भी उनके लिए भोजन आदि की व्यवस्था करते हैं। इस प्रकार एक तरह से यह एक सामुदायिक कार्यक्रम बन गया है। वीरेंद्र इस बात से प्रसन्न हैं कि उन्हें एक निजी कंपनी गोदावरी रिवर इस्पात लि. में संचार अधिकारी का काम मिल गया है, जहां उन्हें काफी बढ़िया वेतन मिलता है। इसी वेतन के बल पर वह अपने अभियान को सफल बनाने की कोशिश करते रहते हैं। जब वह विद्यालय शिक्षक थे तो उन्हें कुल पांच सौ रुपए मिलते थे। परंतु इस दौरान भी वह अपनी प्रिय परियोजनाओं के लिए कुछ-न-कुछ रचनात्मक कार्य कर ही लेते थे। उनके दो कलाकार मित्र अंकुश और देवांगन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए खाका तैयार करने में अहम योगदान देते हैं।

वीरेंद्र अपने मौलिक धयेय जल संरक्षण से बड़ी गंभीरता से जुड़े हुए हैं। उनका मानना है कि पानी पृथ्वी पर सबसे बहुमूल्य संसाधन है और वही सबके केंद्र में है। उनके द्वारा चलाया जा रहा अभियान एक ऐसा विषय है जिसका सरोकार न केवल बस्तर अथवा छत्तीसगढ़ से बल्कि पूरे देश से है। जल बचाने के इस अभियान में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए देश के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक भास्कर ने इस वर्ष उन्हें ‘दैनिक जल स्टार‘ फरस्कार के लिए चुना है। परंतु फरस्कारों को लेकर वीरेंद्र के मन में कोई लालसा नहीं है। वह तो बस अपने ध्येय को लेकर समर्पित हैं। हरा-भरा बस्तर, छत्तीसगढ़ में स्वच्छ पर्यावरण और इन सबसे ऊपर युवाओं का एक जुझारू समूह जो उनके संदेश को दूर-दूर तक ले जाने के लिए कटिबद्ध है, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं। परिवर्तन की यह धरोहर ग्रीन कमांडो आगे भी लोगों को रास्ता दिखाएगी, यही विश्वास है। (चरखा फीचर्स)

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