लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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garibi-hatao-neetiराकेश कुमार आर्य

नारों के सहारे सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने का नाटक भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से कांग्रेसी व गैर कांग्रेसी सभी सरकारों की नीति का एक मुख्य अंग रहा है। इंदिरा जी एक बार से अधिक ‘गरीबी हटाओ’ के मुद्दे को भुनाकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंची थीं। इसी प्रकार इस घिसे-पिटे मुद्दे को चले चलाए कारतूस की भांति गैर कांग्रेसी सरकारों ने भी अपनाने और भुनाने का प्रयास किया, बहुत से लोग राष्ट्र के साथ किये जा रहे इस घिनौने अपराध को समझ चुके हैं। किंतु कुछ भोले लोग अब भी राजनीतिज्ञों के जाल में फंस ही जाते हैं। वास्तव में हमारे देश में गरीबी नही मिटायी गयी, अपितु गरीब को मिटाया गया है। चौंकिये मत! तथ्य कुछ ऐसे ही बोलते हैं। क्योंकि वास्तविकता तो ये है कि इस समय देश में चालीस प्रतिशत आबादी ऐसी है जो दोनों समय भोजन भी नही कर पाती। इसका कारण है कि उनके हाथों का काम बड़े कारखानों और बड़ी-बड़ी मशीनों ने छीन लिया है। बड़े कारखानों के स्वामियों से चुनावों के समय राजनैतिक पार्टियों द्वारा मोटा पैसा लिया जाता है। इसलिए नेतागण उद्योगपतियों को भारी रियायतें देने का प्रयास करते हैं।

एक आकलन के अनुसार सारी दुनिया के कुल कारखानों का साठ प्रतिशत हिस्सा सौंदर्य प्रसाधन और शस्त्रों के उत्पादन में लगा हुआ है। सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में जीवधारियों का रक्त, हड्डी, आंख का कोमल अंग प्रयोग किया जा रहा है। जिससे आज उन जीवधारियों की कितनी ही प्रजातियां या तो लुप्त हो गयी हैं या विनाश के कगार पर हैं।

भारत का ग्रामीण व्यक्ति जो, दंत मंजन, साबुन, तेल जैसी वस्तुओं का निर्माण करने में सक्षम है, उसे प्रोत्साहित करने की आवश्यकता थी, परंतु ऐसा नही किया गया। इन जैसी वस्तुओं का निर्माण भी कारखानों ने छीन लिया। गरीब की गरीबी तो हटाई नही बल्कि उन्हें बेरोजगार कर दिया गया। सूती कपड़ा, बढ़ई का सामान, लुहार का काम, चर्मकार का काम आदि सब मशीनों ने ही छीन लिया। जिन्हें आजीविका का कोई काम मिला हुआ था उनके काम को छीनकर उनके अवसरों का दोहन और शोषण किया गया।

फलस्वरूप आज विश्व की चालीस प्रतिशत श्रम शक्ति अनुपयोगी हो चुकी है। भारत भी इसका अपवाद नही है। आज यद्यपि भारत अन्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर है, परंतु अन्न के बिना फिर भी लोग भूखे मर रहे हैं। कारण बिना काम के अन्न दिया नही जा सकता और काम लिया जा रहा है मशीनों से। तो गरीबी कैसे मिट रही है? गरीबी तो और ज्यादा बढ़ रही है।
उद्योगपति और नेता दोनों मिलकर राष्ट्र की उस संपत्ति का उपयोग कर रहे हैं जो तीस चालीस करोड़ लोगों की आजीविका को अवसर प्रदान करने में सक्षम है। एक आंकलन के अनुसार मात्र 300 परिवारों की जागीर भारत बन चुका है। पाठक याद करें आजादी से पूर्व 563 देशी रियासतें थीं और अब तीन सौ परिवार। अर्थात उस समय अब से लगभग दुगुने परिवारों का वर्चस्व था। अब उस समय के आधे ‘राजाओं का’ आधिपत्य और वर्चस्व भारत पर है।
इन सब राजनीतिक परिवारों के संबंध औद्योगिक घरानों से हैं। प्रत्येक महत्वाकांक्षी योजना और परियोजना की इन तीन सौ परिवारों को सूचना होती है। जो इन्हीं तक पहुंचती है। जिसका लाभ ये औद्योगिक घराने उठाते हैं। बदले में ये लोग चुनाव खर्च और दूसरे सुखोपभोग के साधन उपलब्ध कराकर नेताओं को उपकृत करते हैं।

इस प्रकार लोकतंत्र की दुल्हन का डोला राजपथ से उतरकर नेताओं और औद्योगिक घरानों के बैडरूम में चला जाता है। वहां बड़े आराम से लोकतंत्र की दुल्हन की गरिमा लूटी जा रही है, और हमें छोटे पर्दों पर मुस्कान बिखेरते हमारे नेता आकर बता जाते हैं कि हमारा लोकतंत्र निरंतर सुदृढ़ होता जा रहा है, उसकी जड़ें गहरी हो रही हैं, क्योंकि गरीब को गरीबी मिटाने की अफीम खिलाकर सुला दिया गया है। लोकतंत्र का स्वामी ही जब सो गया या सुला दिया गया तो उसकी दुल्हन के साथ कुछ भी हो, उस सबके लिए तो ये लोग स्वतंत्र हैं। गरीब को नही पता कि तेरी गरीबी नही अपितु तेरा अस्तित्व मिटाने का गहरा षडय़ंत्र रच दिया गया है। कैसे?

– सडक़ों व पुलों के निर्माण में मशीनों का प्रयोग हो रहा है।
– नहरों के निर्माण में मशीनों का प्रयोग हो रहा है।
– बड़े कारखानों को मशीनें चला रही हैं।

हाथों से चलने वाली हर वस्तु से हाथ दूर किया जा रहा है। फिर भी छोटे पर्दे पर और संवाददाता सम्मेलनों में हमारे नेतागण मुस्कान बिखरते हुए कहते हैं कि हम रोजगार के नये अवसर पैदा कर रहे हैं? पुरानों को छीन रहे हैं, नये अवसरों को मशीनों को दे रहे हैं। फिर भी कह रहे हैं कि गरीबी के शत्रु से लड़ेंगे और परास्त करके ही दम लेंगे। सीधे क्यों नही कहते कि गरीब को मिटाकर ही दम लेंगे? ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी। वास्तव में हमारी सरकारों की नीति यही है। खोखली नारेबाजी से समस्याओं का समाधान नही हो सकता।

मुझे एक सज्जन ने, जोकि एक उद्योगपति हैं, बताया कि उनके एमरजेंसी काल में बड़े कांग्रेसी नेताओं से संबंध थे, जिन्होंने उनसे पार्टी के लिए चंदा लिया था। बदले में उन्हें नोएडा नामक स्थान जिसकी जब घोषणा होने वाली थी उसमें जमीन खरीदने के लिए कह दिया था कि आप यहां सस्ते में जमीन खरीदें, फिर कई गुणा मुआवजा लें। यही हुआ, उस व्यक्ति ने कौड़ी के मोल जमीन लेकर भोले-भाले किसानों को वहां से चलता कर दिया।

कांग्रेस का ऊपरी तौर पर नारा था गरीबी मिटाओ का। पर अवसर आने पर गरीब बेचारा ही मिटा दिया गया। राजनीति और उद्योगधंधे की दूरी मिटकर समाप्त हो गयी। आज राजनीति और उद्योग एक ही बात हो गयी है, देखिये उद्योग में राजनीति है और राजनीति में स्वयं उद्योग है। सब कुछ पलट गया है और सब कुछ बदल भी गया है। देश की सत्ता और अर्थव्यवस्था पर जिस प्रकार कुछ भूमाफियाओं का शिकंजा कसता जा रहा है, उससे गरीबी मिटी नही है अपितु बढ़ी है। इसका एक उदाहरण ये भी है कि हमारे जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए जो राशि मिलती है, इस राशि से जो विकास कार्य क्षेत्र में किये और कराये जाते हैं, वे सब इन जनप्रतिनिधियों के विशेष चहेतों के द्वारा ही कराये जाते हैं। जिसमें से एक निश्चित ‘कमीशन’ इन जनप्रतिनिधियों के पास चला जाता है। जहां जनप्रतिनिधि विकास कार्यों में कमीशन खा रहे हों, वहां गरीबी मिटाने का सपना देखना मूर्खता नही तो और क्या है? यह सपना तो राजनीति के भ्रष्टाचार की दलदल में फंसता ही जा रहा है, इसे पकडऩे की लालसा में गरीब भी साथ ही धंसता जा रहा है। नेता और उद्योगपति दूर बैठे इस दृश्य को देखकर ठहाका लगाकर हंस रहे हैं। अत: ये लेखनी अब ये लिखने को विवश है-

किस पर करें भरोसा, और किस पे रखें ठौर।
जिससे मिलीं ये नजरें, मिला और से और।।

इनके शिकंजे से बचने के लिए अब उपाय खोजने का समय आ गया है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?’ से)

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