• मुख पृष्ठ
  • राजनीति
    • चुनाव
      • लोकसभा चुनाव
      • विधानसभा चुनाव
      • घोषणा-पत्र
      • चुनाव विश्‍लेषण
      • आंकडे
  • आर्थिकी
  • विश्ववार्ता
  • मीडिया
  • मनोरंजन
    • खेल जगत
    • टेलिविज़न
    • रेडियो
    • सिनेमा
    • संगीत
    • चुटकुले
    • कार्टून
  • धर्म-अध्यात्म
  • कला-संस्कृति
  • साहित्‍य
    • लेख
    • कहानी
    • कविता
    • गजल
    • आलोचना
    • व्यंग्य
    • पुस्तक समीक्षा
  • समाज
  • साक्षात्‍कार
  • विविधा
  • अन्य
    • वीडियो
    • महिला-जगत
    • बच्चों का पन्ना
    • विधि-कानून
    • हिंद स्‍वराज
    • सार्थक पहल
    • खेत-खलिहान
    • जन-जागरण
    • विज्ञान
    • स्‍वास्‍थ्‍य-योग
    • सैर-सपाटा
    • खान-पान
  • संपर्क


इंसान और जानवर के बीच बढ़ता टकराव


डॉ. आशीष वशिष्ठ

वन्य प्राणियों के गांवों एवं शहरों में प्रवेश, खेती-पालतू पशुओं को नुकसान पहुंचाने और मनुष्यों पर घातक हमला करने की घटनाएं देश भर में भी बढ़ रही हैं। वन क्षेत्रों के निकट के गांवों एवं कस्बों में ऐसी घटनाएं आए दिन हो रही हैं। वनों में रहने वाले बंदर जब-तब गांव और शहर में झुंड बनाकर हमले करने लगे हैं। इसी तरह बाघ, रीछ, नीलगाय, सियार, लकड़बग्गे और हिरण आदि पशु भी गांव पर धावा बोलने लगे हैं। मांसाहारी पशु तो बहुत बुरी हालत में हैं। वनों में वन्य प्राणियों की कमी के कारण मांसाहारी पशु अब गांव में लोगों के पालतू पशुओं को खाने लगे हैं। इसके लिए वे रात के समय धावा बोलते हैं। अगर पिछले एक दशक में जंगली जानवरों के हमलों में घायल और मृत लोगों और मवेषियों का आंकड़ा हजारों में होगा, वहीं इंसान और जानवर के टकराव से फसल, प्राकृतिक संसाधनों और दूसरे नुकसान का हिसाब-किताब करोड़ों में होगा।

 

उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो, उसमें से बाहर निकले बाध चारों तरफ अपना आतंक फैलाए हैं और बेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। जंगली जानवरों और मानव के बीच संधर्ष क्यो बढ़ रहा है? और जंगली जानवर जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड की भांति छत्तीसगढ़, झारखण्ड, असम, राजस्थान और देश के दूसरे राज्यों में वनक्षेत्र के समीप बसे क्षेत्रों से जंगली जानवरों की घुसपैठ और हमले की खबरें आती रहती हैं। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो, उसमें से बाहर निकले बाध चारों तरफ अपना आतंक फैलाए हैं और बेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। इन दिनों सूबे की राजधानी लखनऊ की शहरी सीमा में एक बाघ के आमद ने वन विभाग और राजधानीवासियों की नींद हराम कर रखी है।

 

वन विशेषज्ञों के अनुसार मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं। जब कभी बाहुल्य क्षेत्रफल में जंगल थे तब मानव और वन्यजीव दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में सुरक्षित रहे, समय बदला और आबादी बढ़ी फिर किया जाने लगा वनों का अंधाधुन्ध विनाश। जिसका परिणाम यह निकला कि जंगलों का दायरा सिमटने लगा, वन्यजीव बाहर भागे और उसके बाद शुरू हुआ न खत्म होने वाला मानव और वन्यपशुओं के बीच का संघर्ष। बाघ अथवा वन्यजीव जंगल से क्यों निकलते हैं इसके लिए प्राकृतिक एवं मानवजनित कई कारण हैं। इनमें छोटे-मोटे स्वार्थो के कारण न केवल जंगल काटे गए बल्कि जंगली जानवरों का भरपूर शिकार किया गया। आज भी नेशनल पार्क का आरक्षित वनक्षेत्र हो या संरक्षित जंगल हो उनमें लगातार अवैध शिकार जारी है। यही कारण है कि वन्यजीवों की तमाम प्रजातियां संकटापन्न होकर विलुप्त होने की कगार पर हैं। इस बात का अभी अंदेशा भर जताया जा सकता है कि इस इलाके में बाघों की संख्या बढ़ने पर उनके लिए भोजन का संकट आया हो। असामान्य व्यवहार आसपास के लोगों के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। मगर इससे भी बड़ा खतरा इस बात का है कि कहीं मनुष्यों और जंगली जानवर के बीच अपने को जिन्दा रखने के लिए खाने की जद्दोजेहाद नए सिरे से किसी परिस्थितिकीय असंतुलन को न पैदा कर दे।

 

गौरतलब है कि जब तक भरपूर मात्रा में जंगल रहे तब तक वन्यजीव गांव या शहर की ओर रूख नहीं करते थे। लेकिन मनुष्य ने जब उनके ठिकानों पर हमला बोल दिया तो वे मजबूर होकर इधर-उधर भटकने को मजबूर हो गए हैं। इधर प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारियों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए। परिणाम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आते हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे-पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में गन्ने के खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है।

 

जंगली जानवरों के हमले में मारे गए एंव घायल होने वालों का आंकड़ा समस्या की गंभीरता को प्रदर्षित करता है। झारखंड के वनबहुल इलाकों से लगी बस्तियों में रहने वाले लोग खासतौर पर हाथियों, भेड़ियों, लकड़बघ्घों जैसे वन्यजीवों से ज्यादा परेशान रहते हैं। सिर्फ हाथियों ने ही पिछले दस वर्षों के अंदर 745 लोगों को मौत की नींद सुला दिया। यदि खबरों पर विश्वास किया जाए तो पिछले दो दशकों के दौरान हाथियों ने केवल छत्तीसगढ़ में 120 से ज्यादा मनुष्यों की जान ली है। वर्ष 2001 से 2010 तक उत्तराखण्ड में जंगली जानवरों के हमलों में 303 लोगों की मौत और 718 लोग घायल हुए। संयुक्त बिहार के जमाने से मार्च 2010 तक हाथियों के हमले से मारे गए लोगों, घायलों, बर्बाद हुई फसलों, मवेशियों, घरों और अनाजों की क्षति पर सरकार ने मुआवजा के तौर पर 1546.86 लाख रुपये की अदायगी की थी। पिछले तीन सालों में यूपी के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से निकले बाघों के द्वारा खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद तक दो दर्जन के आसपास मानव मारे जा चुके हैं। अगर उत्तर प्रदेश में जंगली जानवरों में हमले में मारे गये लोगों का आंकड़ा जोड़ा जाए तो वो तकरीबन दो सौ होगा।

 

दरअसल विकास के नाम पर जंगलों के कटने और अपने ठिकानों पर कब्जा होते देखकर जानवर शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसी आपाधापी में वे हिंसक भी होते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के कोरबा क्षेत्र में कोयला उत्खनन और बिजली परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्र उजाड़ हो चुके हैं। इन्हीं क्षेत्रों में हाथियों का निवास है। इसके अलावा उड़ीसा और झारखंड में भी वन उजड़ रहे हैं। वहां भी हाथियों के प्राकृतिक निवास संकट में हैं। इसलिए साल में कई बार इन प्रांतों से सुरक्षित निवास और भरपेट भोजन की तलाश में बड़ी संख्या में निकले हाथी छत्तीसगढ़ पर धावा बोल देते हैं। जिस रास्ते से हाथी गुजरते हैं, वहां हजारों एकड़ जमीन में खड़ी फसल चट कर जाते हैं और किसानों को तबाह कर देते हैं। जानकारी के अनुसार, 1990 से 2009 के दौरान एकीकृत सरगुजा जिले में हाथियों के हमलों में 116 लोग मारे गए और 46 घायल हुए। सरकार ने मृतकों के परिवारजनों को 90 लाख और घायलों को 94,000 रुपया बतौर मुआवजा वितरित किया। हाथियों द्वारा फसल और मकान उजाड़ने के 31600 मामलों में सरकार को 43 करोड़ रुपये का मुआवजा देना पड़ा। राजमार्गो के सटे जंगलों में भी जानवरों के स्वभाव में असामान्य बदलाव देखे गए हैं। विशेष तौर पर उत्तराखण्ड में ऋषिकेश-देहरादून रोड पर हाथी कई लोगों को शिकार बना चुके हैं। यहां या तो जानवरों ने मनुष्य को नुकसान पहुंचाया है या हाथी, गुलदार, बाघ, भालू जैसे जानवर लोगों का निशाना बने हैं। इस टकराहट ने वन विभाग समेत वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता भी बढ़ाई है।

 

समस्या लगातार गंभीर रूप धारण कर रही है और राज्य सरकारें केवल मुआवजा वितरित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती हैं, जबकि समस्या का हल केवल पर्यावरण एवं वन संरक्षण के जरिए ही संभव है। इसको रोकने के लिए अब जरूरी हो गया है कि वन्यजीवों के अवैध शिकार पर सख्ती से रोक लगाई जाये तथा चारागाहों को पुराना स्वरूप दिया जाए ताकि वन्यजीव चारे के लिए जंगल के बाहर न आयें। इसके अतिरिक्त वन्य प्राणियों को प्राकृतिक वासस्थलों में मानव की बढ़ती घुसपैठ को रोका जाये साथ ही ऐसे भी कारगर प्रयास किये जायें जिससे मानव एवं वन्यजीव एक दूसरे को प्रभावित किये बिना रह सकें। वन विभाग के पास साधनों एवं संसाधनों की कमी का भारी टोटा है,। लाल फीताशाही और कर्मचारियों की उदासनीता ने भी समस्या में इजाफा किया है। लबोलुबाब यह है कि हमने जानवरों का घर उजाड़ा है। उसकी सजा मानव बस्तियों पर जानवरों के हमले के रूप में मिल रही है। मानव को अब भी सावधान होकर जंगल में हस्तक्षेप से बाज आना चाहिए।’

January 31st, 2012 | 46 views | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post
Category: समाज | Tags: increasing conflict between human and animal, increasing struggle between human and animals, इंसान, इंसान और जानवर के बीच बढ़ता टकराव, जानवर के बीच बढ़ता टकराव
Share on MySpace Share in Google Buzz Y!:Yahoo Buzz

सबसे ज्यादा चर्चित लेख

  • परिचर्चा : अयोध्‍या मामले पर इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की लखनऊ पीठ का निर्णय
  • परिचर्चा : राष्ट्रमंडल खेल और सेक्स
  • आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता एवं अल्पसंख्यकों का विरोध असंवैधानिक!
  • पुरुष से ऊंचा स्‍थान है नारी का हिंदू परंपरा में
  • क्या यही हकीकत है ‘सच्चे मुसलमानों’ की?
  • ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ के दो वर्ष पूरे होने पर विशेष

प्रवक्ता.कॉम के लेखों को अपने मेल पर प्राप्त करने के लिए
अपना ईमेल पता यहाँ भरें:

परिचर्चा में भाग लेने या विशेष सूचना हेतु : यहाँ सब्सक्राइव करें


  • Most recent
    Most liked
    Show all Comments (2)
  • sunil patel

    डॉ. वशिष्ट जी ने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है – सभी को जीने का हक़ -.

    वाकई स्तिथि बहुत खतरनाक हो गई है. सोचने बाली बात है की हमने लाखो बाघ मार दिए. एक बाघ करोडो आदमी में से एक इंसान मारता है तो हल्ला मच जाता है. आखिर इंसान ने जानवरों के आवास पर अतिक्रमण कर लिया है.

    क्या समस्या ख़त्म नहीं हो सकती है. हमे भी रोटी मिले और जानवरों को भी भोजन मिले. हमारी सिक्षा, सरकार में संवेदनशीलता ही कमी हो गई है. अंग्रेजी पाठ्यक्रम ने इंसानों को जंगलो और जानवरों से दूर कर दिया है.

    अरबो खरबों रूपए खर्च करके जंगलो को प्रतिबिबंधित करने की बजाय जंगलो को आम आदमी से जोड़ना होगा. जंगल का भ्रमण निशुक्ल (शर्तो के साथ) होना चाहिए. लोग जंगल और जानवर को समझेगे, प्यार करेंगे – शाकहार अपनाएंगे = जानवर कम मरेंगे.

    हम अभी भी नहीं संभले तो प्रकृति स्वयं को संतुलित कर लेगी, किन्तु परिणाम मनाव सभ्यता के लिए भयंकर होंगे. अभी भी समय है सरकार इमानदार से काम करे.
    जिए और जीने दे.

    February 05 2012
    CommentsLikeUnlike
    • इक़बाल हिंदुस्तानी
      iqbal hindustani

      आदमी जानवरों की सी हरकतें तो लगातार कर ही रहा है अब एक ही रास्ता है की वह जंगल में जाकर और बस जाये.

      February 04 2012
      CommentsLikeUnlike

      • अपनी प्रतिक्रिया व विचार यहाँ लिखें :



       (Press Ctrl + G) or Click on letter (अ) to toggle between English and हिंदी, for other Indian Languages scroll down (अ)
      • हिंदी में टाइप करें

        यहाँ क्लिक करें

      • हिंदी फॉण्ट कन्वर्टर

        हिंदी फॉण्ट से यूनिकोड

      • सबस्क्राइब

        प्रवक्‍ता डॉट कॉम के लेखों को अपने ईमेल पर प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए बॉक्‍स में अपना ईमेल पता भरें:

      • प्रवक्ता पर लेख भेजे

        प्रवक्ता पर लेख भेजने के लिए यहां क्लिक करें या फिर सीधे prawakta@gmail.com पर हमें लिख भेजें।
      • आपका मत

        उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक सीटें किस पार्टी को मिलेंगी?

        View Results

        Loading ... Loading ...
        • Polls Archive
      • परिचर्चा

        स्वस्थ बहस ही लोकतंत्र का प्राण होती है। यहां आप समसामयिक प्रश्‍नों पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं।
      • विषय सूची

      • लेखक के अनुसार पढ़ें

      • अब तक

      • आपने कहा…

        • mahendra gupta on वजूद खोती राजनीति
        • Rajya Vardhan on सचिन से महान हैं सहवाग
        • LAIQ CHODRY on पुस्तक समीक्षा ; ‘ये तय हुआ था’
        • ravi on तसलीमा नसरीन का कसूर
        • ravi on किसका वोट-बैंक / शंकर शरण
        • ravi on किसका वोट-बैंक / शंकर शरण
        • OM on किसका वोट-बैंक / शंकर शरण
        • OM on किसका वोट-बैंक / शंकर शरण
        • singh on किसका वोट-बैंक / शंकर शरण
        • dr. madhusudan on देश संविधान की धज्जियां उड़ाते यह स्वयंभू सांस्कृतिक राष्ट्रवादी
        • leena on एम के गॉंधी के-निष्ठुर, हृदयहीन तथा धोखेभरे निर्णयों को सहना ही होगा!
        • डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ on भ्रष्टाचार क्यूँ नहीं बन रहा मुख्य चुनावी मुद्दा ?
        • iqbal hindustani on भ्रष्टाचार क्यूँ नहीं बन रहा मुख्य चुनावी मुद्दा ?
        • iqbal hindustani on भ्रष्टाचार के मामले में यू.पी.ए. का रिकार्ड नं.1 है
        • R.Singh on कबीर को समझने को दिमाग नहीं दिल चाहिएः भारती बंधु
        • dr. madhusudan on जारवा नहीं, हम हैं असभ्य
        • dr. madhusudan on व्हॅलंटाइन डे विकृति
        • R.Singh on जारवा नहीं, हम हैं असभ्य
        • Anil Gupta,Meerut,India on चुनावी मौसम में निखरता कांग्रेसी त्रियाचरित्तर
        • sangeet shrivastava on कविता: बिल्ली का संदेश – प्रभुदयाल श्रीवास्तव
        • Mohan Gupta on व्हॅलंटाइन डे विकृति
      • FOLLOW US ON

        
      • लेखक परिचय

        डॉ0 आशीष वशिष्ठ
        डॉ0 आशीष वशिष्ठ

        लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।
      • संपादक की कलम से…

      • विधानसभा चुनाव पर विशेष

        • अब तो विधानसभा चुनाव के बाद ही तस्वीर होगी साफ़
        • कांग्रेस, सपा और बसपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे : राजनाथ सिंह
        • युवराज अभी कागज फाड़ रहे हैं कुछ समय बाद कपड़े फाड़ेंगे : गडकरी
        • दलितों के विकास का धन हाथी के निर्माण में खर्च किया : कटियार
        • चुनाव परिणामों पर टिकी दिग्गजों की निगाह
        • भाजपा के पक्ष में चल रही है लहर : सुषमा स्‍वराज
        • बसपा शासन में सर्वजन दुखाय, सर्वजन सताय का बोलबाला रहा : उमा भारती
        • उत्तर प्रदेश की बदहाली के लिए बसपा, सपा और कांग्रेस की तिकड़ी जिम्मेदार : राजनाथ
        • अछूत बने ब्राह्मणों की चुप्पी
        • चुनावी नतीजों से पहले उत्तराखंड की राजनीति में चल रही है बर्फीली हवाएं
        • एम के गॉंधी के-निष्ठुर, हृदयहीन तथा धोखेभरे निर्णयों को सहना ही होगा!
        • राहुल गांधी ने अवसर गंवा दिया
        • जनता बसपा, सपा, कांग्रेस की सरकारों से बहुत प्रताड़ित हो चुकी है- कलराज मिश्र
        • उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव २०१२ की चकल्लस और मतदाता
        • भाजपा ने 2.जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया
        • सूबे का विकास करना सपा-बसपा और कांग्रेस के बूते की बात नहीं : कलराज मिश्र
        • कांग्रेस का भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन की बात जनता के लिए धोखा : कलराज मिश्र
        • पिछड़ों के कोटे से आरक्षण को कतर्इ नहीं बर्दाश्त करेगी भाजपा- नितिन गडकरी
        • केन्द्र और प्रदेश सरकार ने जनता का शोषण किया है : राजनाथ सिंह
        • ‘मुलायम सिंह यादव का बलात्कार पीड़ित महिलाओं को नौकरी देना समूची नारी जाति का अपमान’
      • पाठकों से निवेदन

        सुधी लेखकों से निवदेन है अपनी रचनाएं यूनिकोड (मंगल) फोंट में भेजें और साथ ही संबंधित तस्‍वीर भी हमें भेजेंगे तो उसे प्रकाशित करने में सुविधा होगी।

        लेखों के त्‍वरित प्रकाशन के लिए हमें आप SMS के जरिए तत्‍काल सूचना दे सकते हैं : 09868964804 (sanjeev.sinha78@gmail.com)

      • लोकतांत्रिक विमर्शों का मंच

        प्रवक्‍ता डॉट कॉम भारतीय परंपरा की जान 'शास्त्रार्थ' का आधुनिक स्‍वरूप है, जहां विभिन्‍न विचारधाराओं के लोग एक ही मंच पर बेहतर लोकतांत्रिक समाज के लिए विचार-विमर्श करते हैं।

      • जरूर पढ़ें

        • तसलीमा नसरीन का कसूर
        • हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन
        • ॥अमृत भाषा संस्कृत॥- डॉ. मधुसूदन उवाच
        • किसका वोट-बैंक / शंकर शरण
        • आरक्षण समानता और सुरक्षा के मन्त्र नहीं.
        • क्यों और कैसे लिखा मैंने – कहो कौन्तेय
        • वे जो हर सांस में भारत को ही जीते हैं
        • सभी धर्मों में एक ही बात नहीं
        • हिंदी लेखन, विचारधारा और इतिहास बोध
        • बाबा माधवदास की वेदना : शंकर शरण
        • द्वितीय प्रवक्‍ता लेख प्रतियोगिता के परिणाम घोषित
        • प्रवक्‍ता डॉट कॉम द्वारा आयोजित द्वितीय लेख प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा 5 दिसम्‍बर को
        • प्रवक्ता डॉट कॉम द्वारा लेख प्रतियोगिता का आयोजन
        • तीन साल का हो गया ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’
        • ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ बना वैकल्पिक वेबसाइटों का सिरमौर
      • Alexa Rank

      

      • मुख पृष्ठ
      • हमारे बारे में
      • संपर्क
      • प्रवक्‍ता मण्डली
      • लेख भेजें
      • संपादक
      • ई-मेल
      • चर्चा में प्रवक्‍ता
      • प्रवक्ता पर विज्ञापन
      • Log In
      • पोल Archive
      • Pravakta Ads
        • Chhatisgarh-Ads
        • प्रवक्‍ता के सम्‍मानित पाठक
      • User Online
      • Hindi Font Converter
      • आर्थिकी
      • कला-संस्कृति
      • चुनाव
        • घोषणा-पत्र
        • जन-जागरण
        • लोकसभा चुनाव
          • आंकडे
          • चुनाव विश्‍लेषण
        • विधानसभा चुनाव
      • जरूर पढ़ें
      • ज्योतिष
        • राशिफल
        • वर्त-त्यौहार
      • टॉप स्टोरी
      • धर्म-अध्यात्म
      • पत्रिका पर नजर
      • परिचर्चा
      • पर्व – त्यौहार
      • प्रवक्ता न्यूज़
      • मनोरंजन
        • कार्टून
        • खेल जगत
        • चुटकुले
        • टेलिविज़न
        • रेडियो
        • संगीत
        • सिनेमा
      • महत्वपूर्ण लेख
      • मीडिया
      • राजनीति
      • विधि-कानून
      • विविधा
        • उत्‍पाद समीक्षा
        • खान-पान
        • खेत-खलिहान
        • टेक्नोलॉजी
        • पर्यावरण
        • बच्चों का पन्ना
        • महिला-जगत
        • विज्ञान
        • शख्सियत
        • साक्षात्‍कार
        • सार्थक पहल
        • सैर-सपाटा
        • हिंद स्‍वराज
      • विश्ववार्ता
      • वीडियो
      • समाज
      • साहित्‍य
        • आलोचना
        • कविता
        • कहानी
        • गजल
        • पुस्तक समीक्षा
        • लेख
        • व्यंग्य
      • स्‍वास्‍थ्‍य-योग

      Copyright © 2010 PRAVAKTA.COM
      Designed & Developed by Manu Info Solutions (MiS) New Server