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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-बरुण कुमार सिंह

कभी-कभी लगता है कि ऊपर वाले का इनसान में यकीन नहीं है। जन्म की दुर्घटना कभी किसी झुग्गी में होती है, कभी कोठी में। एक के पास खाने को नहीं है, दूसरे के पास चुनने की दिक्कत है। क्या खाए, क्या नहीं। ऊपर वाले की नाइंसापफी कोई झेल भी ले, आदमी भी अपनी हरकतों से कब बाज आता है? एक भूखे को आरक्षण का झुनझुना थमा देता है, दूसरे को ऊंची जाति का होने की सजा। सबको रोटी का मौका मुश्किल है, इतिहास के अन्याय को मिटाना आसान। सत्ता प्रजातंत्र की हो या एकतंत्र की इस नगरी में सिपर्फ राक्षस बसते हैं। वह नई-नई जुगत भिड़ाते हैं, जनता के वोट हथियाने का।

हम कैसी आजादी और किस आजादी की बात करते हैं। आम-आदमी को तो आजादी का मतलब भी नहीं पता। तथाकथित खास आदमी (रोटी के लिए मजबूर) को इसकी कीमत नहीं पता। एक तरपफ कॉमनवेल्थ गेम की चकाचौंधा, इंडिया शाइनिंग, विकास के आंकड़े, विकास का दर आदि वातानुकूलित कमरे में योजना बनाते बिगाड़ते देश के कर्णधार, नीतिकार हैं, वहीं दूसरी ओर अपने पेट पालने के लिए और दाल-रोटी के जुगाड़ में सुबह होते ही मजदूर किसी भिखारी की तरह काम तलाश करते नजर आते हैं। आज जहां हमारे देश में भुखमरी और गरीबी के कारण लोग अपने जिगड़ के टुकड़े बच्चे को बेच देते हैं, क्योंकि वह उस बच्चे की क्षुधाा को शांत करने में सक्षम नहीं है। कहां गई हमारी मानवता, हृदय की व्यथा और राज्य सरकार/केन्द्र सरकार, गैर सरकारी संगठन, धान्ना सेठ, समाज के पुरोधाा और सामाजिक उत्थान करने वाले, दम्भ भरने वाले शुभचिंतक? हमारे दोनों भारत यानी भारत और इंडिया में गैप बढ़ता ही जा रहा है? जो देश के लिए कुछ करने योग्य हैं, वे सिपर्फ अपने लिए करने में लगे हैं। आज जहां सरकारी बाबू करोड़पति हो गये है, वहीं आईएएस ऑपिफसर अरबपति हो गये हैं ये आंकड़े सरकार द्वारा ही अभी बिहार और उत्तारप्रदेश के राज्य के बारे में जारी की गई है। ऐसे माहौल में हम किस आजादी की बात करते हैं?

महात्मा गांधाी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम कानून ;मनरेगाध्द के अन्तर्गत हर परिवार को साल में 100 दिन का रोजगार देने का कानून बनाया है। लेकिन साल में दो 365 दिन होते हैं, 265 दिन क्या वे भूखे मरेंगे? एक साल में उसे 27 प्रतिशत दिनों की रोजगार गारंटी दी जाती है और बाकी बचे 73 प्रतिशत दिनों की रोजगार गारंटी की जिम्मेदारी कौन लेगा। जबकि प्रतिमाह के हिसाब से आंकड़े निकाला जाय तो 100 दिन की रोजगार गारंटी योजना महीने में सिपर्फ 8.33 प्रतिशत दिन अर्थात् 8 दिन ही ठहरती है तो बाकी के 22 दिनों की जिम्मेदारी कौन लेगा? जबकि ठीक इसके विपरीत संगठित क्षेत्र अर्थात सरकारी सेवा में कार्यरत लोगों की शनिवार और रविवार की छुट्टी रहती है सिपर्फ ये ही दिन जोड़ दिया जाय तो महीने में 8 और साल में 104 दिन की छुट्टी होती है। इसके अलावा राष्ट्रीय पर्व त्योहार एवं अन्य छुट्टियां अलग से मिलती हैं। क्योंकि यह संगठित क्षेत्र है तो सरकार भी इनके लिए संगठित होकर कार्य करती है। बाकी असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए लापीपॉप का झुनझुना थमा देती है। आधाी-अधाूरी योजनाएं लागू करके वाहवाही लूटी जाती है और गरीबों का मजाक उड़ाया जाता है। एक तरपफ सरकार संगठित क्षेत्रों के लिए सप्ताह में दो दिनों की छुट्टी देती है तो दूसरी तरपफ मनरेगा रोजगार गारंटी के नाम पर दो ही दिन रोजगार की गारंटी देती है। इसलिए इंडिया और भारत में गैप बढ़ता ही जा रहा है। जब तक ऐसी योजनाएं लागू रहेगी इंडिया और भारत के गैप को मिटाया नहीं जा सकता, बराबरी पर भी लाया नहीं जा सकता।

अगर हम सरकारी आंकड़ों पर ही जाएं तो हम पाते हैं आजादी के 63 सालों के बाद भी, अभी तक गरीबों को कुछ खास नहीं मिला है।

हमारे सामने अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट है जिसमें कहा गया है कि देश की आबादी का 74 पफीसदी हिस्सा जनता 20 रुपये रोजाना आमदनी पर जी रही है। हमारे यहां असंगठित क्षेत्रों में लगभग 80-85 प्रतिशत लोग जुड़े हुए हैं उन्हें अपेक्षित सुविधााएं भी नहीं मिल पा रही है जबकि 10-15 संगठित क्षेत्र के लोगों के लिए सरकार और निजी कंपनियां भी अनदेखी करने का साहस नहीं जुटा पाती। क्योंकि वे संगठित क्षेत्र के हैं।

कभी वे हड़ताल करते हैं, तो कभी सड़क जाम करते हैं, कभी स्कूलों में हड़ताल चलता है, तो कभी विश्वविद्यालय में, कभी वकील हड़ताल करते हैं तो कभी अस्पताल में ही हड़ताल हो जाता है। कभी ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों की हड़ताल होती है तो कभी वायुयान के पायलट हड़ताल पर चले जाते हैं। बैंक कर्मचारी और अधिाकारी मोटी तनख्वाह को लेकर एकजुट होकर हड़ताल करते हैं और ये वित्ताीय व्यवस्था का भट्ठा बैठा देते हैं। सरकार भी देर-सबेर इन सबकी बात मान ही लेती है, समझौते देर-सबेर हो ही जाते हैं, इनकी पगार भी बढ़ जाती है, पेंशन भी बढ़ जाती है, नया वेतन स्केल भी मिल जाता है क्योंकि ये संगठित क्षेत्र के हैं जबकि असंगठित क्षेत्र के साथ हर बार अन्याय होता है और वे छले जाते हैं। अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की भी वे पूर्ति नहीं कर पाते हैं।

वोट बैंक के चक्कर में राजनीतिक दल, धार्म और जाति की शतरंजी बाजियां खेलते हैं। अयोधया में राम मंदिर से लेकर बाबरी मस्जिद तक साम्प्रदायिकता, जातिवाद का खामियाजा आम आदमी को ही उठाना पड़ा है।

एक समय था जब हिन्दुस्तान को सोने की चिड़िया कहा जाता था। दुनिया को विज्ञान से लेकर चिकित्सा तक का ज्ञान हमने कराया, लेकिन तस्वीर के दूसरे पहलू की कई बातें ऐसी हैं, जो भारत की सुनहरी तस्वीर को बदरंग करती है। आज भी हम एक तरह से निरक्षरता, साम्प्रदायिकता, लैंगिक भेदभाव, अंधाविश्वास और टालू रवैया के गुलाम है।

विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार भारत जैसे अल्पविकसित देशों में निर्धानता रेखा एक अमरीकी डॉलर प्रतिदिन या 365 अमरीकी डॉलर प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति है। इस परिभाषा से संभवत: 75 प्रतिशत से भी अधिाक भारतीय निर्धानता रेखा के नीचे हैं।

लोग कहते हैं कि नैनो आम जनता की कार है जिसकी कीमत लाखों रुपये से ऊपर है। लेकिन एक साइकिल की बात कहें तो वो भी 2000/-2500/- रुपये से कम की नहीं आ रही है तो हमारे आईआईटी के इंजीनियर क्यों शोधा नहीं करते कि किसान, गरीब जैसे लोग जिनके ऊपर छत का सहाना नहीं है। वह भी 1000/- रुपये तक में साइकिल खरीद सके। जब एक कार को कम मूल्य पर बनाकर बेचने के लिए शोधा हो सकते हैं तो साइकिल के लिए क्यों नहीं? इसमें पेट्रोल का खर्चा भी नहीं है, वातावरण प्रदूषित होने का भी खतरा नहीं है। जो आज जिम में बैठकर पैडल मारते रहते हैं इससे बेहतर है कि वो उतने ही समय साइकिल चला लें तो उनका अच्छा एक्सरसाइज हो जाएगा।

चिंता का दूसरा कारण शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक परिवर्तन की कमी है। हमारी जनसंख्या इतनी ज्यादा है लेकिन देश में शिक्षा की गुणवत्ता के नाम पर कुछ भी विकसित नहीं हो पाया है। इस क्षेत्र में मूलभूत संरचना की कापफी कमी है। एक आधा विश्वविद्यालय को छोड़ दिया जाय तो कोई ऐसा विश्वविद्यालय नहीं है जहां शोधा के नाम पर कुछ सार्थक हो पा रहा है। बेहतर शिक्षक की लगातार कमी हर जगह दिखाई पड़ रही है।

पूरी दुनिया में भारत की शिक्षा के क्षेत्र में अगर कोई पहचान है तो यह मात्र आईआईटी है लेकिन यह जानकर किसी को आश्चर्य हो सकता है कि देश के 14 आईआईटी में 50 पफीसदी से ज्यादा शिक्षकों की कमी है। फिर दूसरी संस्थाओं के बारे में बात करने की जरूरत कहां रह जाती है? और ये आईआईटी दुनिया के 100 स्थानों की सूची में भी स्थान नहीं पाते हैं?

अभी वर्तमान में तेलंगाना राज्य की मुद्दा को देख रहे हैं। राजनेता अपने उद्देश्यों को पफलीभूत न होते देख इस तरह के हथकंडे अपनाते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि तेलंगाना राज्य बना देने के बाद भी उसी तेलंगाना को पिफर विभाजित करने की बात न उठे। झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्ताराखण्ड नये राज्य बने। झारखण्ड में तो पांच-छह साल में मुख्यमंत्री बदलने का रिवाज ही चल पड़ा। कोई नेता लाखों में है तो कोई करोड़ों में है। आज देश के निर्वाचित सांसद/विधाायक में 40-45 प्रतिशत करोड़पति हैं जो कि उनके द्वारा घोषणा पत्र से मालूम होता है जबकि अघोषित संपत्ति कहीं इससे अधिक है। हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जब राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत हुए तो न तो उन्हें अपना मकान दिल्ली में था और न ही पटना में। इसी कारण वे पटना में सदाकत आश्रम में रहे।

बेशक देश में लोकतंत्र है और लोकतांत्रिाक संस्थाएं मजबूत भी हुई है, लेकिन सत्ता वर्ग ने बड़ी चतुराई से लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है। लोकतंत्र की प्रहरी संस्थाएं न्यायपालिका और मीडिया भी उन लोगों के साथ खड़ी दिखाई देती है जो सत्ता वर्ग के हैं या रसूखवाले हैं। गरीबी, विषमता, विस्थापन, बीमारी, बेरोजगारी आदि के प्रश्नों को राष्ट्रीय संवाद में जगह नहीं मिलती। इन समस्याओं की कहीं सुनवाई नहीं होती। इससे हो यह रहा है कि बाहर से मजबूत देश अंदर से कमजोर हो रहा है।

आजादी के पहले आम लोगों को लगता था कि जब आजादी मिलेगी तो वे देश के बराबर के नागरिक होंगे और उनके पास वे सारे अधिकार होंगे जो अमीरों के पास है। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। आम लोगों को वोट डालने का अधिकार तो मिल गया लेकिन आर्थिक लाभ बिल्कुल नहीं मिला। जबकि वोट डालने में यही गरीब वर्ग पीछे नहीं रहता है।

हमारे लोकतंत्र की परेशानी यह रही कि शासक वर्गों ने समाज के बढ़ी हुई खाई को पाटने के लिए बहुत कुछ नहीं किया हैं परिणामस्वरूप् शहर और गांव की खाई बढ़ती ही गई है। देश में सुविधा के नाम पर जो कुछ भी किया गया है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा शहरों में चला गया है। गांव के लोग अभी भी वंचित और पीड़ित हैं।

देश के शासक वर्गों ने दलितों और आदिवासी के साथ बहुत ही बुरा व्यवहार किया है। वे अभी तक विकास और राजनीति की मुख्यधारा में नहीं आ पाया है। दलित, आदिवासी और पिछड़ों को बराबरी का अधिकार देने के लिए सरकार ने आरक्षण लागू करने की बात की, लेकिन इससे निजी क्षेत्रों का पूरी तरह बाहर कर दिया गया है, जबकि रोजगार निजी क्षेत्र में ही बचा है। पिछले बीस वर्षों में सरकार की निजी वजह से देश में एक ऐसे मधयम वर्ग का उदय हुआ है जिसके मन में गरीबों और वंचितों के लिए किसी प्रकार की सहिष्णुता और सहानुभूति नहीं रह गई है और सरकार के आरक्षण नीति के चलते देश का पूरा मधयम वर्ग इन तबकों को अपना जानी-दुश्मन समझ रहा है।

आज भी देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं के लिए लोग परेशन हैं। हर काम को करने के लिए आंदोलन करने पर रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम पर है। लोगों के कल्याण के लिए बनी योजनाएं समय से पूरी नहीं हो पा रही है। उनको सही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में लोगों में कुंठा की भावना उत्पन्न होती है। सही मायनों में देश में व्यापत नक्सलवाद और आंतकवाद को भी इन्हीं समस्याओं के कारण बढ़ावा मिला है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर हर वर्ग की जरूरत को धयान में रखकर उनके कल्याण के लिए नीति बनाने की जरूरत है।

समाज में बढ़ती गैर बराबरी से कभी कोई अनहोनी जन्म ले सकती है और लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। इसलिए नीति-निर्माता को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें सबको समान अवसर मिले।

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3 Comments on "भारत और इंडिया के बीच बढ़ती खाई"

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श्रीराम तिवारी
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जो जो इमानदार है ,मेहनत करता है ,फिर भी वैश्विक मानदंड से नीचे का जीवन बमुश्किल जीता है ,अवसरों से वंचित है ,विकास से बंचित है -आज़ादी के वरदान से ६३ साल बाद भी रोटी -कपडा -मकान-शिक्षा -स्वाश्थ-सामाजिक सुरक्षा से वंचित है .श्रम बेचता है किन्तु उसके मूल्य निर्धारण का अधिकार उसके पास नहीं -ऐसे समग्र मानवीय समूह को भारत कहते हैं , जो -जो सूरा सुन्दरी में डूबे हैं .कम्पनियों के मालिक हैं प्लाटों .भवनों खेतों और भारत की अथाह सार्वजनिक संपदा पर कब्जाए हुए हैं ऐसे सभ्रांत लोक को -जिसमें भृष्टाचार की वैतरणी बिज्बिजा रही है -उसे इंडिया… Read more »
gaurav
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मैं और आप तो तब भी हिंदी लिख और बोल रहे है परन्तु जो हाल मैं आजकल की पीढ़ी का देखता हूँ उसे देखकर नहीं लगता की यह लोग हिंदी पढ़ या लिख सकेंगे.

आपके उत्तर से में सहमत हूँ और यह शायद दुर्भाग्यपूर्ण ही है की भारत और पीछे होता जा रह है.

gaurav
Guest

आपका भारत और इंडिया से क्या अभिप्राय है?

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