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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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cancerमोहम्मद आसिफ इकबाल
इंडियन कांउसिल फार मेडिकल रिसर्च के मुताबिक भारत में तंबाकू सेवन से होन वाला कैंसर और सवाईकल कैंसर महामारी की तरह फैल रहा है। हर साल तंबाकू से जुड़े कैंसर के लगभग 3 लाख नए मामले सामने आते हैं। देश में रोज दो हजार लोग इससे मौत के मुंह में समा जाते हैं। भारत में 10 किस्म के कैंसरों में चार मुंह के होते हैं। फेफडें के कैंसर से सबसे अधिक मौतें यहां होती हैं। देश के शहरी इलाकों में स्त्रियों में स्तन कैंसर होने की प्रमुख वजह उनकी जीवन शैली है। देश में जहां पहले प्रति लाख की आबादी पर स्तन कैंसर के 10-20 मामले मिलते थे वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 30-40 प्रति लाख हो गई है। कैंसर से निपटने में सबसे बड़ी बाधा देश में जांच सुविधाओं का अभाव है। जिससे इस बीमारी का देर से पता चलता है। हालांकि इस दिशा में भी कुछ प्रगति हुई है। चिकित्सा वैज्ञानिकों के प्रयासों के कारण ही 1990 के बाद से मरने वालों की संख्या में 15 फीसदी की कमी आई है।
एक चिंताजनक रिपोर्ट यह भी सामने आयी है कि भारत में कैंसर के मरीज बढ़ते जा रहे हैं जिसमें महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा है। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (एनसीआई) के मुताबिक, दुनिया में कैंसर का हर 13वां नया रोगी भारतीय है, जिसमें महिलाओं का प्रतिशत बहुत ज्यादा हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल कैंसर के 12.5 लाख नए रोगियों में से सात लाख महिलाएं होती है जो कि एक चिंताजनक स्थिति है। हर साल केवल भारत में कैंसर से करीब 3.5 लाख महिलाओं की मौत हो जाती है, जिनमें से नंबे प्रतिशत केस में महिलाओं को रोग बहुत बाद में पता चलता है। कैंसर का प्रमख कारण नींद की कमी, व्यायाम की कमी, खानपान की गलत आदतें, तनाव, सिगरेट और शराब है। महिलाएं भी आज घर-बाहर दोनों की ड्यूटी निभाती है इस कारण उनकी लाइफ स्टाइल प्राकृतिक नहीं रहती, जो कि कैंसर का मुख्य कारण है। महिलाओं में बढ़ रहे कैंसर का मुख्य कारण शहरी महिलाओं का देर से शादी करना और देर से औलाद का होना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 35 साल का आंकड़ा पार कर लेने के बाद हर महिला को अपना रेगुलर चेकअप कराना चाहिए। महिलाओं को जंक फूड और टेंशन से बचना चाहिए और व्यायाम करना चाहिए। भारत में सबसे ज्यादा महिलाएं स्तन कैंसर, गर्भाशय कैंसर और गॉल ब्लैडर के कैंसर की शिकार होती हैं।
अगर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों की मानें, तो वर्ष 2020 तक कैंसर के मामलों में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि की आशंका है। ऐसे में स्थिति और खराब हो जाएगी। देश में प्रति 10,000 लोगों पर 9 हॉस्पिटल बेड हैं और यहां भी पैरामेडिकल स्टाफ और लैब टेक्नीशियन आदि की भारी कमी है। भारत अपनी जीडीपी का एक फीसदी से भी कम हिस्सा स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है। नए अस्पतालों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है मानव संसाधन की भारी कमी, खास तौर पर जूनियर और सीनियर रेजिडेंट्स की। हमारे नीति निर्माताओं को भी इस कहावत से सीख लेनी चाहिए। शायद “मेक इन इंडिया” के साथ-साथ प्रधानमंत्री को “ट्रीट इन इंडिया” के बारे में भी सोचना चाहिए। स्वास्थ्य में निवेश का सीधा असर देश के विकास पर भी देखने को मिलेगा। सरकार भी तो विकास का नारा लेकर ही आगे बढ़ने की बात करती नजर आ रही है। डॉक्टर-पेशेंट रेशियो में भारी अंतर, मेडिकल कॉलेजों में कम सीट्स और खाने-पीने की चीजों में इतनी लापरवाही, खास तौर से अभी ब्रेड के ताल्लुक़ से रिपोर्ट सामने आई है वह बहुत चिंता जनक है, यह साड़ी लापरवाहियां और कमियां ना देश और ना ही देश वासियों के लिए अच्छी हैं। सही बात यह है कह हम देश के असली मुद्दों के समाधान के लिए हम या हमारी सरकारें कोशिश नहीं करतीं, साथ ही हम देश में बढ़ते कैंसर के मामलों का सामना करने के लिए भी पूरी तरह तैयार नहीं हैं।

ब्रैड में कैंसर, जिसका हम अभी उल्लेख किया, यह रिपोर्ट सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट(सीएसई) की जांच सामने आई है कि ब्रेड में कैंसर पैदा करने वाले तत्‍व पाए गए हैं। सीएसई की जांच के अनुसार ब्रेड, बन, रेडी टू ईट बर्गर और पिज्‍जा के 38 लोकप्रिय ब्रांड में से 80 प्रतिशत में पोटेशियम ब्रोमेट और आयोडेट पाया गया। पोटेशियम ब्रोमेटतत्‍व कैंसरकारक है जबकि आयोडेट से थायराइड की बीमारियां होती हैं। जांच के अनुसार ब्रेड के भारतीय उत्‍पादक आटे में पोटेशियम ब्रोमेट और आयोडेट का इस्‍तेमाल करते हैं। सीएसई की ओर से जारी बयान के अनुसार, ”कई देशों में इन तत्‍वों का ब्रेड बनाने में इस्‍तेमाल प्रतिबंधित हैं। ये तत्‍व स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक हैं। लेकिन भारत में इनके प्रयोग पर प्रतिबंध नहीं है। हमने 84 प्रतिशत सैंपल्‍स में पोटेशियम ब्रोमेट या आयोडेट पाया। हमने इन सैंपल्‍स के लेबल की जांच की और इन मामलों के जानकारों और निर्माताओं से बात की।” यह जांच सीएसई की पॉल्‍यूशन मॉनिटरिंग लेबोरेटरी ने की।
सीएसई ने पोटेशियम ब्रोमेट और आयोडेट के इस्‍तेमाल पर तुरंत रोक की मांग की है। पोटेशियम ब्रोमेट यूरोपियन संघ, कनाडा, ऑस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड, चीन, श्रीलंका, ब्राजील, नाइजीरिया, पेरु और कोलंबिया में प्रतिबंधित है। जांच के अनुसार ब्रेड निर्माता लेबल पर इन तत्‍वों के बारे में लिखते भी नहीं हैं। रिपोट के सामने आने के बाद जहाँ स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री जेपी नड्डा ने जांच का आश्‍वासन दिया है। वहीं यह भी देखना होगा की कहीं मैग्गी नूडल्स की तरह ब्रेड में भी किसी और बाबा की कंपनी तो सामने आने वाली नहीं है? अगर ऐसा होता है तो जहाँ एक तरफ इन रिपोर्ट्स पर विश्वास काम हो जाता है वहीँ अपने बिज़नेस को बढ़ाने का यह तरीका भी सही नहीं है। व्यापार की बात तो हम आंशिक रूप से कह दी है, नहीं तो सही बात तो यही है कि ब्रेड खाने से कैंसर के बढ़ने का मामला वाकई चिंताजनक है, और अगर इस पर त्वरित कार्यवाही नहीं की गई तो समस्याओं में वृद्धि होगी, जो देश और देशवासियों, दोनों ही के लिए विनाश का कारण बनेगा। इन परिस्थितियों से निपटने के दो ही तरीके हो सकते हैं। एक: राज्य सरकारें और केंद्र सरकार स्वास्थ्य विभाग पर विशेष ध्यान दे, बाजार में बिकने वाली खाने-पीने की चीजों की सही जांच और उस पर कार्यवाही हो साथ ही स्वास्थ्य परियोजनाओं के लिए बजट में वृद्धि हो। तो दूसरा तरीका यह है कि नशे वाली सभी चीजों पर प्रतिबंध लगाया जाए। विशेष रूप से शराब, सिगरेट, बीड़ी, गुटका व अन्य इसी तरह चीज़ें। लेकिन जहां तक जनता का मामला है और वह खुद इस समस्या से लड़ना चाहती है तो उसे भी कुछ न कुछ वह काम ज़रूर करने पड़ेंगे जो अब तक नहीं किए हैं। उदाहरण के लिए एक ऐसा वातावरण प्रदान करें जहाँ परिवार में पति अपनी जिम्मेदारी निभाए तो पत्नी अपनी। साथ ही बच्चों की बेहतर परवरिश के लिए और खुद को समस्या से बचाने के लिए उन सभी अनैतिक कामों से बचें जिनसे न केवल एक व्यक्ति बल्कि घर, परिवार और समाज सब पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यानी नशा मुक्त घर भी हो और समाज और देश भी। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य के संबंध में खुद भी चौकनना रहें और बाजार में बिकने वाली चीजों पर नजर भी रखें साथ ही सरकार को अवश्य इस ओर आकर्षित करें कि वह जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करने पाए। न किसी व्यक्ति विशेष को रियायत देकर और न ही किसी नीति के रूप में।

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