लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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आलोक कुमार 

विकास दर के आँकड़ों में वृद्धि दर्शाने के बावजूद बिहार में ग्रामीण जनता की जरुरत के हिसाब से मुठ्ठी भर भी नए रोजगार का सृजन नहीं हो पाया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदहाली , ग्रामीण इलाकों के कुटीर और शिल्प उद्योगों का ठप्प पड़ना, घटती खेतिहर आमदनी और मानव-विकास के सूचकांकों से मिलती खस्ताहाली की सूचना , इन सारी बातों के एक साथ मिलने के पश्चात तो तस्वीर ऊभर कर आती है वो किसी भी दृष्टिकोण से विकास का सूचक व द्योतक नहीं है l

 वर्तमान बिहार में केवल 57 फीसदी किसान स्वरोजगार में लगे हैं और 36 फीसदी से ज्यादा मजदूरी करते हैं। इस 36 फीसदी की तादाद का 98 फीसदी ” रोजहा ( दिहाड़ी ) मजदूरी “ के भरोसे है यानी आज काम मिला तो ठीक वरना कल का कल देखा जाएगा । अगर नरेगा के अन्तर्गत हासिल रोजगार को छोड़ दें तो बिहार में 15 साल से ज्यादा उम्र के केवल 5 फीसदी लोगों को ही सरकारी ऐजेन्सियों द्वारा कराये जा रहे कामों में रोजगार हासिल है l

कैसा विकास हो रहा है बिहार में ? जिसमें गैरबराबरी की खाई दिनों-दिन चौड़ी होती जा रही है। एक खास तरह की सामाजिक और आर्थिक असमानता बिहार में बढ़ती हुई देखी जा सकती है। इसके  दो महत्वपूर्ण कारण हैं रोजगार रहित वृद्धि और भूमि से विस्थापन नए रोजगार कम पैदा हो रहे हैं और पुराने रोजगार तथा आजीविका के पारंपरिक स्त्रोत ज्यादा नष्ट हो रहे हैं। कृषि उपज के दाम आम तौर पर लागत-वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़े हैं , प्रदेश की सरकार के द्वारा भी इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई है । बड़े पैमाने पर नदियों, बांधों, नहरों व तालाबों का पानी तथा जमीन के नीचे का पानी शहरी प्रयोजन के लिए लिया जा रहा है, जिससे खेती के लिए पानी का संकट पैदा हो रहा है। बिहार की अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर है। यहाँ की 80 फीसदी से ज्यादा आबादी की रोजी-रोटी खेती व पशुपालन से चलती है। सिंचाई व्यवस्था के कमजोर होने के कारण यहाँ कृषि पैदावार मानसून आधारित है। अधिकांश जिलों के सरकारी  नलकूप  ठप्प  हैं। नहरें केवल नाम के लिए हैं । प्रदूषण , बालू के अवैध खनन , ईंट –भट्ठों के द्वारा मनमानी कटाई के कारण कई नदियां बरसाती नालों में तब्दील हो गयी हैं। अधिकांश कुएं उड़ाही नहीं होने के कारण सूख  गए हैं। ऐसे में किसानों के पास पटवन के लिए मानसून के अलावा निजी बोरिंग ही विकल्प है, जो खर्चीला है। डीजल व कृषि यंत्रों की बढ़ती कीमतें किसानों की कमर तोड़ रहे हैं। ज़्यादातर लघु व सीमांत किसानों के पास अपना पंपिंग सेट नहीं होता है। वे प्रति घंटे के हिसाब से पटवन का पैसा चुकाते हैं। उन्हें कर्ज लेकर खेती करनी होती है। ऐसे में मौसम की मार उन्हें और कर्ज़दार बना देती है। डीजल सब्सिडी के नाम पर भी घोटालों का धंधा अपने चरम पर  है । 

 

सिचाँई की समस्या कोई नई समस्या नहीं है l पाँच-छः सालों की ही अगर बात की जाए तो प्रदेश में 2008, 2009 व 2010 में भी सूखे के हालात पैदा हुए थे। वर्ष  2011, 2012 व 2013 में भी कम बारिश के कारण खेती पर असर पड़ा था। ऐसा नहीं है कि प्रदेश के पास पानी की भी कमी है। बाढ़ व बेमौसम बारिश के पानी की उपलब्धता को ही अगर प्रदेश का प्रशासनिक महकमा सहेजना सीख ले तो ऐसे संकट का सामना किया जा सकता है। जल प्रबंधन की दीर्घकालिक योजना पर प्रदेश – सरकार के सार्थक पहल की जरूरत है l

 

बिहार के ग्रामीण इलाकों में लोगों की आमदनी साल-दर-साल कम हो रही है। बिहार में खेती आज घाटे का सौदा है। बिहार में सीमांत किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी बड़े किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी से बीस गुना कम है।  ग्रामीण इलाके का कोई सीमांत कृषक परिवार खेती में जितने घंटे की मेहनत करता है अगर हम उन घंटों का हिसाब रखकर उससे होने वाली आमदनी की तुलना करेंगे तो निष्कर्ष निकल कर आएगा कि कृषक परिवार को किसी भी लिहाज से न्यूनतम मजदूरी भी हासिल नहीं हो रही है। जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है , वे अपने परिवार की बुनियादी जरुरतों को भी पूरा कर पाने में असमर्थ हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है , जबकि खेती सहित अन्य सारे स्रोतों से उसे औसतन मासिक 2115 रुपये हासिल होते हैं, जिसमें दिहाड़ी मजदूरी भी शामिल है यानी किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से लगभग 25 फीसदी ज्यादा है।

बिहार में खाद्यान्न, रोजगार , कृषि जैसे जीविका से जुड़े क्षेत्र बदहाल हैं l ऐसे में भी यदि प्रदेश आकड़ों में विकास के पथ पर दौड़ रहा है तो ये मुख्यमंत्री और उनके महकमों की आंकडेबाजी और जनता से दूर होती सरकार के सरोकारों का आईना ही है l विकास के प्रारूप व परियोजनाओं एवं जमीनी हकीकत (यथार्थ ) के बीच सार्थक सामंजस्य के बिना विकास का कोई भी प्रारूप सही मायनों में फ़लीभूत नहीं होगा l जब तक सबसे निचले पायदान पर जीवन-संघर्ष कर रहे है प्रदेश के वासी को ध्यान में रखकर विकास की प्राथमिकताएं तय नहीं की जाएंगी तब तक विकास दिशाविहीन और दशाविहीन ही होगा l

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