लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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राकेश उपाध्याय 

भारत की चिरंजीवी-अखंड जीवन शक्ति का रहस्य क्या है, गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की 80 साल की जीवन यात्रा के कुछ पन्ने खंगालकर इसे जाना जा सकता है। गुरुदेव उस दौर में पैदा हुए, जब देश न सिर्फ राजनीतिक तौर पर गुलाम था बल्किउसकी प्रतिभा, बौद्धिक क्षमता, उसका संपूर्ण पौरुष और पराक्रम सदियों की गुलामी सेकुंठित और मटियामेट था, जिसे बाद में अंग्रजों और उनके देसी चारणवर्ग ने देश कोआत्मग्लानि से डूब मरने की झिड़की का औज़ार बना लिया। गुरुदेव जब पैदा हुए तो 1857 की क्रांति को बस कुछ ही साल बीते थे, देश नई बौद्धिक और राजनीतिक क्रांति के मुहाने पर खड़ा था।

बंगाल से उठी नवजागरण की आंधी

उस घनघोर निराशा-काल में बंगाल से रोशनी निकली, देखते-देखते पंजाब,महाराष्ट्र, तमिलनाडु होते हुए समूचे देश में पुनर्जागरण का रूप ले लिया। कई सौसालों की गुलामी की मार से त्रस्त देश का बौद्धिक वर्ग जागा तो उसने गजब क्रांतिकर डाली। इस बौद्धिक क्रांति ने ऐसा डंका बजाया समूचा देश नींद से जाग उठा। सबसेबड़ा सवाल देश खुद से पूछने लगा कि कि जब तुम्हारी रोशनी से कई जहां रोशन हो चुके हैं तो फिर तुम अंधेरे में क्यों जी रहे हो?

गुरुदेव को वही रोशनी विरासत में मिली। उनके पिता देवेंद्रनाथ टैगोरमहर्षि थे, राजा राम मोहन राय के अहम मित्रों में शुमार, ब्रह्म समाज केसंस्थापकों में अग्रणी। ब्रिटिश भारत की राजधानी कोलकाता में उनका निवास 18वीं सदीमें आध्यात्मिक विभूतियों, अंग्रेज अफ़सरों, बौद्धिक चिंतकों और बड़े व्यापारियोंके लिए बहुत जाना-पहचाना था। दरअसल गुरुदेव के दादा द्वारिका नाथ ठाकुर खुद भीबड़ी शख्सियत थे, विरासत से ज़मींदार थे लेकिन मन से संत सरीखे।

18 वीं सदी में नवजागरण का जो सूर्य बंगाल में उगा था, उससे देश को जोमहान ऊर्जा मिली, उसने आजतक राह रोशन कर रखी है। 2012 रविंद्रनाथ टैगोर के जन्म का150वां साल है तो अगले साल स्वामी विवेकानंद का 150वां जन्मवर्ष । लेकिन इनजन्मसदियों के शोर में क्या हम सदियों पहले बंगाल से निकले क्रांति-संदेश कोसुन-समझ रहे हैं? सवाल है कि आगे का रास्ता कैसे रोशन होगा, कौन करेगा?

गुरुदेव, तुम्हें पाकर युग निहाल हो गया

गुरुदेव ने उस वक्त में कविता-संगीत-रंगमंच-शिक्षा समेत साहित्य औरसंस्कृति को इतना कुछ दिया कि युग निहाल हो गया, वो भी तब जबकि देश-दुनिया में यूरोपकी चकाचौंध थी। लंदन में विलियम आर्चर जैसे साहित्य समीक्षक भारत के पूरेज्ञान-विज्ञान, दर्शन, धर्म, काव्य, चित्रकला, मूर्तिकला, वेद-उपनिषद, रामायण,महाभारत की विरासत को ‘अवर्णनीय बर्बरता के घृणास्पद स्तूप’ कहकर भारतीयों को अंग्रेजी धर्म और सभ्यता का लबादा ओढ़ने कीसलाह दे रहे थे। एक तरह से भारत की पूरी ज्ञान विरासत ‘मिथक’ के तौर पर प्रचारितकर मनोरंजन और उपहास का विषय बना दी गई थी।

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने तब दुनिया को बताया कि भारत का साहित्यकारक्या है, भारत का मन क्या है, वो कैसे सोचता है, वो प्रकृति को कैसे देखता है, संसारके कण-कण के लिए उसके मन में कितना प्यार समाया है। 1893में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को भारत की समृद्धआध्यात्मिक विरासत का परिचय दे दिया था। दो दशक बाद 1912 में जब लंदन में गुरुदेवके काव्य गीतांजलि का प्रकाशन हुआ तो विलियम आर्चर जैसे समीक्षक को भी जवाब मिल गया। उस दौर के बड़े यूरोपीयसाहित्यकार डब्ल्यू बी यीट्स ने उसी वक्त लिखा कि ‘बेजोड़है गीतांजलि। यूरोप में ऐसी कविताएं लिखने वाला रचनाकार कम से कम मुझे तो नहींमिला।’ स्वीडिश एकेडमी ने गुरुदेव को नोबेल पुरुस्कारसे सम्मानित करने का फैसला 1913 में लिया तो तय हो गया कि यीट्स गलत नहीं थे। स्वामीविवेकानंद और गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगौर, दोनों ने दुनिया में भारत की नंगे-भूखे औरपिछड़े देश की प्रचारित छवि बदलकर रख दी।

गुरुदेव गैरराजनीतिक शख्सियत थे, जीवन भर उन्होंने साहित्य-कला कीसाधना की। 2200 से ज्यादा कविताएं लिखीं, दर्जन से ज्यादा उपन्यास लिखे, भारत और बंगलादेश को राष्ट्रगान लिखा, श्रीलंका के राष्ट्रगान को प्रेरणा दी। 70 साल की उम्र में उन्होंने चित्रकारी शुरु की, उनका पथ दैव निर्धारितथा। लिहाज़ा जिस काम के लिए वो दुनिया में आए थे, भारतीय नवजागरण का वो काम करकेवो चुपचाप चले गए। उन्होंने सही अर्थ में बताया कि विश्वमानव क्या होता है? उन्हें अपनी मातृभूमि-जन्मभूमि से असीम प्यार थालेकिन उतनी ही मोहब्बत वो पूरी क़ायनात से करते थे। उनके जीवन और कविताओं परउपनिषदों के इस महान संदेश पूरा असर था कि समूचा संसार उस अनंत-असीम कीलीला है जिसे वेदों ने नेति-नेति कहकरपुकारा । उसी असीम की प्रकाशमय झलक एक दिन उन्हें सुबह-सुबह गंगा किनारेउगते सूर्य के जरिए मिली, तो उन्हें मुक्ति का वो रास्ता दिख गया, जिसे जानने केलिए जन्म-जन्मांतर अनवरत यात्रा पर चलना पड़ता है। ये वो वक्त था जब 19वीं सदी कासूर्योदय हो रहा था, भारत में सदियों की गुलामी का अंधेरा छंटता दिखने लगा था।

जीवन पथ के कांटे गीत बन गए

गुरुदेव ने पढ़ाई के लिए स्कूली शिक्षा का सहारा नहीं लिया, वो कुदरतकी सुषमा, पेड़-पौधों, बाग-बगीचों, खेत-खलिहानों के सौंदर्य के बीच ही खेलते-पढ़ते,गाते-गुनगुनाते बड़े हुए। 8 साल की उम्र में पहली कविता लिखी, पिता महर्षिदेवेंद्रनाथ के साथ छोटी उम्र में महीनों तक हिमालय और तीर्थों का भ्रमण किया,पिता ने छोटी उम्र में उन्हें उपनिषदों का ज्ञान कराया। बड़े हुए तो ऊंची पढ़ाई केलिए लंदन गए लेकिन बगैर डिग्री हासिल किए भारत लौट आए। 1881 में उनका विवाह मृणालिनीदेवी से हुआ जिनके साथ शुरुआती आनंदमय जीवन उन्होंने अपने दादा की इस्टेट सियालदह मेंबिताया। खेती, बाग-बागवानी के पैतृक काम को संभाला लेकिन ज्यादा वक्त तक ये नहींचला। पत्नी असमय ही साथ छोड़कर चली गईं, बेटी रेणुका और बेटा क्षेमेंद्र की अकालमौत ने उन्हें नीरव एकांत में ये सोचने को मजबूर किया कि जीवन का वास्तविक सत्य क्या है? असल आनंद कहां है? वो उजाला क्या है जिसे पाकर फिर कुछ पाना शेष नहीं रहता? पत्नी औरदो बच्चों की विदाई के दुख से गुरुदेव उबर पाते की पिता देवेंद्र नाथ भी 1905 मेंउनका साथ छोड़ दिया।

गुरुदेव के जीवन को डूबोने आंसुओं का सैलाब सामने था। लेकिन वाह रेमहामानव, नियति से गुरुदेव की मुलाक़ात ऐसी हुई कि आज संसार गवाह है कि महान विचारों और विशाल-सुंदर मन का एक मनुष्य उनके बीच 80 साल रहकर चला गया। डूबने कीबजाए दुःखों में से सारे संसार को पार लगाने का महान जीवन संदेश उन्होंने खोजनिकाला। गुरुदेव के अन्तर्मन से कविता का निर्झर सरित-प्रवाह और तेजी से बहने लगा।कुदरत की हर छटा, जीवन के हर आयाम को गहराई से गुरुदेव ने देखा, समझा और ईश्वर कीलीला को प्रणाम किया, संसार का कण-कण में उन्हें बस उसी अन्तर्यामी के ही दर्शन हुए। सारे भेद मिट गए…संसार का कण-कण उनके कवित्त-कर्म का हिस्सा बन चुका था। वेदकाल से जो विरासत हिंदुस्तान को मिली, उसे कलम-कूची से संवार कर गुरुदेव ने आधुनिक साहित्य का अंग बना दिया।

विश्वमानवता के कल्याण के लिए आजादी

गुरुदेव अंतरात्मा से विश्वमानव थे लेकिन सवाल भारत की आजादी का खड़ाहुआ तो उन्होंने सब कुछ दांव पर लगा दिया क्योंकि उनके लिए मातृभूमि की आजादीमानवता की मुक्ति का सवाल था। 1919 में जबजलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ तो गुरुदेव ने ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्माननाइटहुड की उपाधि वापस कर दी। वॉयसराय को कड़ा पत्र लिखकर यूरोपीय सभ्यता केअमानवीय चेहरे को बेपर्दा कर दिया। उन्होंने भारतीय आजादी के समूचे आंदोलन कोरास्ता दिखाया। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी को सत्याग्रह के वक्त अपने विदेशीमित्रों से मदद पहुंचवाई। 1915 में गांधीजी देश लौटे तो उनसे मिलने शांति निकेतनगए। वहीं पर पहली बार उन्हें गुरुदेव ने ‘महात्मा’ कहकर संबोधित किया तो गांधीजी ने भी उन्हें ‘गुरुदेव’ कहकर शीश नवाया।नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन को भी गुरुदेव ने राह दिखाई। प्रेसीडेंसी कॉलेजमें पढ़ते वक्त भारत विरोधी प्राध्यापक की नेताजी ने पिटाई की तो उन्हें कॉलेज सेनिकाल दिया गया। गुरुदेव सुभाष बोस के साथ खड़े हुए। उनका निष्कासन वापस करने केलिए न सिर्फ गवर्नर को चिट्ठी लिखी बल्कि प्रोफेसर के आचरण की निंदा करते हुएसुभाष बोस को सही ठहराया। गांधीजी और सुभाष बोस को मिलाने का काम गुरुदेव ने कियाऔर जब दोनों के बीच मतभेद बढ़े तो हरक़दम सुलझाने की कोशिश की। नेताजी ने कांग्रेससे अलग होकर फॉरवर्ड ब्लॉक बनाया तो गुरुदेव ने आशीर्वाद भी दिया, हालांकि वोनेताजी को कांग्रेस में ही देखना चाहते थे, उनकी ये इच्छा पूरी होती, उसके पहले हीनेताजी देश छोड़कर विदेश चले गए।

गुरुदेव ने नोबेल पुरुस्कार में मिला सारा धन और अपनी पैतृक संपत्तिका बड़ा हिस्सा शांति निकेतन स्कूल खड़ा करने में लगाया जहां कोमल मनों को तमामबंधनों से मुक्त रहकर असल मनुष्य के रूप में गढ़ने का अनूठा काम शुरु हुआ। 1940 में जब गांधी जी उनकी बीमारी का हालजानने शांति निकेतन पहुंचे तो गुरुदेव ने उनसे कहा था कि बापू, मेरे जाने के बादशांति निकेतन को अपना समझकर वैसे ही संभालिएगा जैसे मैं संभालता आया। उनके जाने केबाद पंडित नेहरु ने अपनी जेलडायरी में जो लिखा वो अब इतिहास की धरोहर है-‘मेरे जीवन का सौभाग्य की मुझे गांधी और गुरुदेवके साथ रहने का मौका मिला, दुनिया में इन दोनों से बढ़कर महामानव मैंने नहीं देखा।’

7 अगस्त 1941 को गुरुदेव ने शरीर छोड़ दिया। 7 मई 1861 को जो जीवनज्योति जली, वो तो बुझ गई लेकिन जो विरासत वो छोड़ गए, उसके आलोक में मानवता आज भीअपना भविष्य तलाश रही है। वो नवविहान कभी तो हर जीवन में आएगा जिसके साक्षी गुरुदेव बने।

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