लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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मकां बनते गांव
झोपङी, शहर हो गई,
जिंदगी, दोपहर हो गई,
मकां बङे हो गये,
फिर दिल क्यांे छोटे हुए ?
हवेली अरमां हुई,
फिर सूनसान हुई,home-sweet-home
अंत में जाकर
झगङे का सामान हो गई।
जेबें कुछ हैं बढी
मेहमां की खातिर
फिर भी टोटे हो गये,
यूं हम कुछ
छोटे हो गये।
हा! ये कैसे हुआ ?
सोचो, क्यूं हो गया ??
अलाव साझे थे जो
मन के बाजे थे जो
बाहर जलते रहे
प्रेमरस फलते रहे
क्यूं अब भीतर जले ?
मन क्यूं न्यारे हुए ?
चारदीवारी में कैद क्यूं
अब दुआरे हुए ?
आबरु, अब सुरक्षित घर में नहीं
अस्मत, बेचारी
गल्ली गल है बिकी,
हा! ये कैसे हुआ ?
सोचो, क्यूं हो गया ??

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