लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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निर्भया कांड के अपराधी, संसद की बहस और आम आदमी पार्टी को दिल्ली मंत्रिमंडल के लिए एक भी योग्य महिला न मिल पाने के रवैये में नारी के प्रति हम पुरुषों की मानसिकता के कई रूप झलकते हैं।

इन्हे झेलते हुए भी अपनी मर्यादा और संस्कारों को सहेजने की कोशिश में जुटी भारतीय नारी के तीन चित्र मैने सहज ही रच डाले हैं। प्रथम चित्र-भारतीय नारी का दर्द, दूसरा-असीम धैर्य और तीसरा-जीवन साथी के प्रति भारतीय नारी के समर्पण को चित्रित करने का प्रयास है।

………………………..
1.
हा! ये क्यूं हुआ ?
——————————

पहली, जन्म लेने से
पहले ही मारी गई।
क्या वो बनती अजीजन, दुर्गा या लक्ष्मी
वो तो पूत की आशा पे वारी गई।
दूजी थी अनखिली,
खिलखिलाई नहीं।
वह नाबालिग बही,
सहमति के संबंध
वे ठहराते सही।

तीजी की देह
व्यापार बनकर बिकी,
वह खेत हो गई,
फिर रेत हो गई।
हा! ये क्यूं हुआ ??

चैथी, जो पढी
कुछ आगे बढी,
प्रतिद्वंदी समझ वो
खङा हो गया
फिर नीचे गिरा
औ गिरता गया।

पांचवीं, तो सुहागन
बीच आगन मरी,
सातवीं के हिस्से में
सौत आ गई।
आठवीं ने जनी जो
संतान नहीं
निंदकों के दिलों को
वो भा गई।
नौवीं, मां बनकर भी
निपूती रही।
पूत साथ रहते हुए भी
अनाथ हो गई।
घर से बाहर परी
मौत आयेगी कब
ये मनाती हुई।
हा! ये क्यूं हुआ ??

इक दिन अंधेरा हुआ
शर्म.. बेशर्म सोई
बागवां खूब जगा,
फिर क्यूं बाग लुटा,
मेङ ही खेत को
क्या खुद खा गया ?
हा!, ये क्यूं हुआ ??

सोचो, क्यूं हुआ ?
कुछ कर न सको गर
जुबां तो ये खोलो
ऐ, मेरे देश बोलो – 2
कब तक सहोगे
ये दर्द-ए-मंजर
कब तक रहोगे
दिल मेरे मौन तुम ??
अब न कुछ तुम सहो,
दिल को खोलो.. कहो,
सोचो, ये क्यूं हुआ ?
हा! ये क्यूं हुआ ??
———————————–
2.
…क्योंकि मैं रोई नहीं
———————————–

स्कूल नया
पोशाक बडी दीदी की
सिलकर साइज मे ंकसी हुई।
बापू की छुट्टी के इंतजार में
चप्पल रगेदते रहे पैर कई दिन
बस्ता, बक्सा, रिबन, जूता
यहां तक सुपना भी पुराना ही
बेटी पढेगी, आगे बढेगी
पर खुशियां हरदम रहीं नई,
क्योंकि मैं रोई नहीं…

गर्मी में सलवार से
हम सीखते थे सलीका
बारिश में घुटने तक
भीग गईं शर्म
एक अदद दुपट्टे को
तरस गये हम
किसी की नही ंझुकी आंखें
सर्दियां होंठ सीकर
सो गई चुपचाप
उलट गया पन्ना
बीत गया साल
पर खुशियां हरदम रहीं नई
क्योंकि मैं रोई नहीं…..

वे खाती रही ंब्रैड बटर
लिए रात की रोटी
मैं सकुचाती रही
लौटते घर नाले किनारे
पा गई एक
दुर्गंध वाला सेब
खा बन गई मैं हंस
फिर भुगता पीलिया का दंश
आंखें पड गई पुरानी
पर खुशियां हरदम रहीं नई
क्योंकि मै रोई नहीं…..

हाथ में छाले
मुंह पे काई
बापू ढूंढते रहे रिश्ता
रिजेक्ट होती रही फाइल
नुमाइश होती रही
लेकिन
न गल सकी हमारी दाल
किस्सा हो गया पुराना
पर खुशियां हरदम रही नईं
क्योंकि मैं रोई नहीं….
.
भाभी देती रही ताने
उछालती रही रिश्ते
लांछन किसी और का फन था
कुलच्छिनी मैं कहलाई
शर्मसार हुई शर्म
दिन दहाडे किसी ने
शर्म को ही मार दी गोली
दिल्ली हो नई चाहे
यह दिल्लगी तो पुरानी है
लो दिवस महिला ने भी
कर दी तसदीक
पर खुशियां हरदम रहीं नई,
क्योंकि मैं रोई नहीं….
————————————–
3.
…कि जाने कैसी प्रीत लगाई।
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जर गई बाती,
पथरा गईं अखिंयां,
खुशियां हई पराई।
अबहु न लौटे सजन बावरे
ंजग में होत हंसाई
कि जाने कैसी प्रीत लगाई।।

शबनम का लुट गया खजाना,
आती नहीं रुलाई,
गाल गुलाबी पीत हो गये,
बैरन हो गई निंदिया
रही गजल पडी अलसाई
कि जाने कैसी प्रीत..

बिछुआ के मन पाप समायो,
खिसक चडा सरकाई
अंखियां मारैं तारे-चंदा
अब मो सो करैं हंसाई
मितवा मैं तो गई सकुचाई
कि जाने कैसी प्रीत….

पोर-पोर में बसी सुरतिया
बावरी फिरी पगलाई
बैरी हो गये सभी सहारे
नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे
मैं तो करूं दोहाई
कि जाने कैसी प्रीत..

अंग- अंग से जोबन उकसे
और सहा न जाये
मिश्री घुल कर खार हो गई
न है कोई खेवनहार
न लट फिर से लहराई
कि जाने कैसी प्रीत.

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1 Comment on "हा! ये क्यूं हुआ ?"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar

वाह पीड़ा की क्या अनुभूति जैसी कविता ,यह कविता नहीं एक हक़ीक़त है,देखते सब हैं दुखी कम होते है. पीड़ा दिखती है ,अनुभवित नहीं होती वह आपने कविता के माध्यम से करा दी. यह समाज गूंगा बहरा ,अँधा ,संवेदना विहीन हो चूका है. इसे सामान्य आदमी ही ठीक करेगा,सरकारें,नेता ,आलिशान मठों के मठाधीश। कुछ नहीं कर पाएंगे. सामाजिक क्रांति होना ही है.

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