लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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विनोद बंसल

 उन महापुरुषों में से एक थे जिनका जन्म ऊंचे कुल में होने के बावजूद प्रारंभिक जीवन की बुरी लतों के कारण बहुत ही निक्रस्ट किस्म का था। मुंशी राम से स्वामी श्रद्धानन्द तक का सफ़र पूरे विश्व के लिए प्रेरणा दायी है। स्वामी दयानंद सरस्वती से हुई एक भेंट तथा पत्नि के पातिव्रत धर्म तथा निश्छल निष्कपट प्रेम व सेवा भाव ने उनके जीवन को क्या से क्या बना दिया।

काशी विश्व नाथ मंदिर के कपाट सिर्फ़ रीवाँ की रानी हेतु खोल कर, साधारण जनता के लिए बन्द किए जाने तथा एक कैथोलिक पादरी के व्यभिचार का द्र्श्य देख मुंशी राम का धर्म से विश्वास उठ गया और वे बुरी संगत में पड़ गए। स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ बरेली में हुए सत्संग ने उन्हें जीवन का अनमोल आनंद दिया जिसे उन्होंने सारे संसार को वितरित किया।

समाज सुधारक के रूप में उनके जीवन का अवलोकन करें तो पाते हैं कि उन्होंने प्रबल विरोध के बावजूद स्त्री शिक्षा के लिए अग्रणी भूमिका निभाई। स्वयं की बेटी अम्रत कला को जब उन्होंने “ईसा-ईसा बोल, तेरा क्या लगेगा मोल” गाते सुना तो उनके कान खडे हो गए। इस ओर पहल करते हुए घर घर जा कर चंदा इकट्ठा कर गुरुकुल कांगडी विश्व विद्यालय की स्थापना हरिद्वार में कर अपने बेटे हरीश्चंद्र और इंद्र को सबसे पहले भर्ती करवाया।

स्वामी जी का विचार था कि जिस समाज और देश में शिक्षक स्वयं चरित्रवान नहीं होते उसकी दशा अच्छी हो ही नहीं सकती। उनका कहना था कि हमारे यहां टीचर हैं, प्रोफ़ेसर हैं, प्रिन्सीपल हैं, उस्ताद हैं, मौलवी हैं पर आचार्य नहीं हैं। आचार्य अर्थात् आचारवान व्यक्ति की महती आवश्यकता है। चरित्रवान व्यक्तियों के अभाव में महान से महान व धनवान से धनवान राष्ट्र भी समाप्त हो जाते हैं।

जाति-पांति व ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर समग्र हिंदू समाज के कल्याण के लिए उन्होंने अनेक कार्य किए। प्रबल सामाजिक विरोधों के बावजूद अपनी बेटी अम्रित कला, बेटे हरिश्चद्र व इंद्र का विवाह जाति-पांति के समस्त बंधनों को तोड कर कराया। उनका विचार था कि छूआ-छूत को लेकर इस देश में अनेक जटिलताओं ने जन्म लिया है तथा वैदिक वर्ण व्यवस्था के द्वारा ही इसका अंत कर अछूतोद्धार संभव है।

वे हिन्दी को राष्ट्र भाषा और देवनागरी को राष्ट्र लिपि के रुप में अपनाने के पक्षधर थे। सतधर्म प्रचारक नामक पत्र उन दिनों उर्दू में छपता था। एक दिन अचानक ग्राहकों के पास जब यह पत्र हिंदी में पहुंचा तो सभी दंग रह गए क्योंकि उन दिनों उर्दू का ही चलन था।

त्याग व अटूट संकल्प के धनी स्वामी श्रद्धानन्द ने 1868 में यह घोषणा की कि जब तक गुरुकुल के लिए तीस हजार रुपए इकट्ठे नहीं हो जाते तब तक वे घर में पैर नहीं रखेंगे। इसके बाद उन्होंने भिक्षा की झोली डाल कर न सिर्फ़ घर-घर घूम चालीस हजार रुपये इकट्ठे किए बल्कि वहीं डेरा डाल कर अपना पूरा पुस्तकालय, प्रिंटिंग प्रेस तथा जालंधर स्थित कोठी भी गुरुकुल पर न्यौछावर कर दी।

उनका अटूट प्रेम व सेवा भाव अविस्मर्णीय है। गुरुकुल में एक ब्रह्मचारी के रुग्ण होने पर जब उसने उल्टी की इच्छा जताई तब स्वामी जी द्वारा स्वयं की हथेली में उल्टियों को लेते देख सभी हत्प्रभ रह गए। ऐसी सेवा और सहानुभूति और कहां मिलेगी?

स्वामी श्रद्धानन्द का विचार था कि अज्ञान, स्वार्थ व प्रलोभन के कारण धर्मांतरण कर बिछुड़े स्वजनों की शुद्धि करना देश को मजबूत करने के लिये परम आवश्यक है। इसीलिए, स्वामी जी ने भारतीय हिंदू शुद्धि सभा की स्थापना कर दो लाख से अधिक मलकानों को शुद्ध किया। एक बार शुद्धि सभा के प्रधान को उन्होंने पत्र लिख कर कहा कि ‘अब तो यही इच्छा है कि दूसरा शरीर धारण कर शुद्धि के अधूरे काम को पूरा करूं’।

महर्षि दयानन्द ने राष्ट्र सेवा का मूलमंत्र लेकर आर्य समाज की स्थापना की। कहा कि ‘हमें और आपको उचित है कि जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, आगे होगा, उसकी उन्नति तन मन धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें’। स्वामी श्रद्धानन्द ने इसी को अपने जीवन मूलाधार बनाया।

वे निराले वीर थे। लोह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा था ’स्वामी श्रद्धानन्द की याद आते ही 1919 का द्र्श्य आंखों के आगे आ जाता है। सिपाही फ़ायर करने की तैयारी में हैं। स्वामी जी छाती खोल कर आगे आते हैं और कहते हैं-‘लो, चलाओ गोलियां’। इस वीरता पर कौन मुग्ध नहीं होगा?’’ महात्मा गांधी के अनुसार ‘वे वीर सैनिक थे। वीर सैनिक रोग शैया पर नहीं, परंतु रणांगण में मरना पसंद करते हैं। वे वीर के समान जीये तथा वीर के समान मरे’। महात्मा गांधी ने ही उनको महात्मा मुंशीराम का नाम मिला।

राष्ट्र धर्म को बढ़ाने के लिए वे चाहते थे कि प्रत्येक नगर में एक ‘हिंदू-राष्ट्र मंदिर’ होना चाहिए जिसमें पच्चीस हजार व्यक्ति एक साथ बैठ सकें और वहां वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत आदि की कथा हुआ करे। मंदिर में अखाड़े भी हों जहां व्यायाम के द्वारा शारीरिक शक्ति भी बढ़ाई जाए। प्रत्येक हिन्दू राष्ट्र मंदिर पर गायत्री मंत्र भी अंकित हो।

देश की अनेक समस्याओं तथा हिंदोद्धार हेतु उनकी एक पुस्तक ‘हिंदू सोलिडेरिटी-सेवियर ओफ़ डाइंग रेस’ अर्थात् ‘हिंदू संगठन – मरणोन्मुख जाति का रक्षक’ आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही है। राजनीतिज्ञों के बारे में स्वामी जी का मत था कि भारत को सेवकों की आवश्यकता है लीडरों की नहीं। श्री राम का कार्य इसीलिए सफ़ल हुआ क्योंकि उन्हें हनुमान जैसा सेवक मिला। स्वामी दयानन्द का कार्य अधूरा पडा है जो तभी पूरा होगा जब दयानन्द रूपी राम को भी हनुमान जैसे सेवक मिलेंगे। वे सच्चे अर्थों में स्वामी दयानन्द के हनुमान थे जो राष्ट्र की सेवा के लिए तिल-तिल कर जले।

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1 Comment on "हनुमान बने श्रद्धानन्द"

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नन्दकिशोर आर्य
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आपने सही समय पर सही लेख लिख कर मार्ग प्रदर्शित किया है . धन्यवाद तीन सुधारों की अपेक्षा है १,उनकी पुत्री का नाम वेद्कुमारी था न कि अमृतकला २. १८६८ में गुरुकुल के लिए चंदा मांगने नहीं गए अपितु १८९८ में गए थे ३. स्वामी श्रद्धानन्द जी ने मिस्टर मोहनदास कर्मचंद को महात्मा के शब्द से प्रथम संबोधित किया न कि गाँधी ने उनको

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