लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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बाबा मायाराम

किसानों के लिए नई फसल का आना किसी त्यौहार से कम नहीं होता है। यह उसकी सारी जमा पूंजी, अथक परिश्रम और आशाओं की एक नई किरण के रूप में अभिव्यक्त होता है। लेकिन मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के किसानों के घर गहरा दुख, नैराश्‍य और मातम छाया हुआ है। हाल ही महीनों में जिले में तीन किसानों के आत्महत्या की खबरें आ चुकी है। वे सोयाबीन की फसल नष्ट होने से परेषान थे। इस साल के शुरूआत में भी दो किसान भी इसी कारण आत्महत्या कर चुके हैं। कृषि के क्षेत्र में होशंगाबाद जिला बहुत समृद्व और खुशहाल माना जाता है। तवा परियोजना से सिंचित इस क्षेत्र को पंजाब-हरियाणा कहा जाता है। होशंगाबाद जिले में ही सबसे पहले सोयाबीन की खेती की शुरूआत हुई थी। इससे किसानों में समृद्वि भी दिखाई दी। लेकिन अब हालात बदल गए है, होशंगाबाद जिले के किसान भी हताशा में मौत को गले लगा रहे है। यह नर्मदांचल अब विदर्भ और आंध्रप्रदेश बनने की ओर बढ़ रहा है, जहां बड़े पैमाने पर किसानों द्वारा आत्महत्या की खबरें सुर्खियों में रही हैं।

होषंगाबाद जिले की डोलरिया तहसील के नानपा गांव के युवा किसान 32 वर्शीय कमल गौर ने सल्फास की गोली खाकर आत्महत्या कर ली। उसकी 17 एकड़ जमीन में मात्र 15 क्विंटल सोयाबीन की पैदावार हुई यानी प्रति एकड़ एक क्विंटल से भी कम। इस परिवार पर 3 लाख 10 हजार का सरकारी कर्ज था। इसमें 2 लाख 45 हजार रूपए का कर्ज भारतीय स्टेट बैंक की होशंगाबाद शाखा से किसान क्रेडिट कार्ड पर और 65 हजार रूपए का कर्ज नानपा ग्रामीण साख सहकारी संस्था से लिया था। इसी तहसील के रतवाड़ा गांव के 62 साल के बुजुर्ग किसान रामसिंह राजपूत फसल खराब होने के गम में अपने शरीर पर मिट्टी तेल डालकर आग लगा ली जिससे अगले दिन उनकी मौत हो गई। रामसिंह की 3 एकड़ जमीन में मात्र 1 क्विंटल सोयाबीन ही पैदा हुआ। हालांकि उस पर बैंक का सरकारी कर्ज नहीं था। लेकिन मित्रों व रिश्‍तेदारों की उधारी थी। प्रशासन ने इस बुजुर्ग किसान की दर्दनाक मौत को हल्का करने के लिए उसे मानसिक रोगी बताया। जिसे परिजनों व पड़ौसियों ने सिरे से खारिज कर दिया। जिले के ही सिवनी मालवा तहसील के चापड़ाग्रहण गांव के मिश्रीलाल बेड़ा (54 वर्ष) ने भी सल्फास की गोली खाकर अपने अपने प्राण त्याग दिए। उनकी 3 एकड़ जमीन में मात्र 2 क्विंटल सोयाबीन पैदा हुआ। उनके 4 भाईयों के संयुक्त परिवार पर सतपुड़ा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की शाखा शिवपुर से किसान के्रडिट कार्ड पर 2 लाख 45 हजार का कर्ज था। उनके हिस्से में करीब 50 हजार का कर्ज आता था। मिश्रीलाल के पास इतना भी पैसा भी नहीं था कि वह फसल कटाई की मजदूरी का भुगतान कर सके। इसके लिए उन्होंने गांव के लोगों से सहायता मांगी लेकिन वे भी कुछ ज्यादा मदद न कर सके। ग्रामीणों ने बताया कि कुछ दिनों मिश्रीलाल अत्याधिक चिड़चिड़े हो गए थे। अंतत: कम पैदावार होने से उन्होंने मौत को गले लगा लिया। इस अंचल के ये तीनों किसान छोटे और मझौले थे। तीनों तवा परियोजना के कमांड क्षेत्र से है और संपन्न मानी जाने वाली कृषक जातियों से हैं। तीनों ने सोयाबीन की फसल अपने खेतों में बोई थी। लेकिन मौसम के असंतुलन होने और अधिक बारिश के कारण पीला मोजेक और तंबाकू इल्ली नामक कीटाणुओं के प्रकोप से फसल को नुकसान हुआ जिससे वह नष्ट हुई। इसी नुकसान ने उन्हें ये अतिवादी कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।

पिछले कुछ वर्षो से सोयाबीन की फसल में बार-बार नुकसान हो रहा है और इस जिले में प्रति एकड़ पैदावार कम होती जा रही है। सोयाबीन की जो 9305 किस्म इस बार फेल हुई है, उसकी अपेक्षा एक अन्य किस्म 9560 का उत्पादन ज्यादा है। लेकिन वह भी औसत से बहुत ही कम है। इस बार औसत पैदावार 29 किलोग्राम से लेकर 2 क्विंटल प्रति एकड़ रही है। वर्ष 1994 में प्रदेश में सोयाबीन की उपज 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर थी जो वर्ष 2008-09 में घटकर 10.91 प्रति हैक्टेयर हो गई। राष्ट्रीय स्तर पर सोयाबीन की उपज 12.35 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। किसानों के मुताबिक एक किस्म तीन-चार साल से ज्यादा नहीं चलती। उसकी अंकुरण क्षमता खो जाती है।

हमारे देश में करीब 30 साल पहले सोयाबीन की खेती शुरू हुई। होशंगाबाद जिले में ही सबसे पहले इसकी शुरूआत हुई। इसकी खेती मुख्य रूप से अमरीका-यूरोप में पशु आहार के लिए हुई थी। यह कहा गया कि भारतीय भोजन में प्रोटीन की कमी है, जिसकी पूर्ति सोयाबीन से हो सकती है। लेकिन इसकी खली का निर्यात किया गया, जो प्रोटीन वाला हिस्सा था और तेल की खपत यहां हुई। इससे हुआ यह कि यहां की परंपरागत दलहन-तिलहन की खेती खत्म हो गई। यहां मक्का, ज्वार, तुअर, देशी धान, मूंग, उड़द, मूंगफली की खेती या तो कम हो गई या खत्म हो गई। यह संकट तब और बढ़ा जब 1995 में विष्व व्यापार संगठन के तहत हमने खुले बाजार की नीति अपनाई। इसके तहत कृषि वस्तुओं के आयात को खुली छूट दे दी गई। आयात षुल्क को कम कर दिया गया। सोयाबीन की खेती बड़ी लागत की मांग करती है। इसका असर यह हुआ कि खाद्य तेल के आयात को बढ़ावा मिला। इस मामले में हम पहले स्वावलंबी हो गए थे, परावलंबी हो गए। हमारे किसानों को काफी घाटा उठाना पड़ा। सोयाबीन की खेती काफी महंगी लागत वाली है। महंगा बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाएं, नींदानाशक का बेजा इस्तेमाल किया जाता है। पूरी खेती मशीनीकृत हो गई है। टे्रक्टर और हार्वेस्टर से होती है। इन सबसे बहुत लागत बढ़ गई है। इस धंधे में कई देशी-विदेशी कंपनियां मालामाल हो रही हैं और किसान कंगाल होते जा रहे हैं।

अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे किसानों को सरकार से मदद की दरकार है। लेकिन उन्हें अब तक कोई मदद नहीं मिली है। देश के शीर्ष पांच राज्यों में जहां सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं उनमें मध्यप्रदेश का नाम भी है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्र्ड ब्यूरो के आंकडों के मुताबिक प्रदेश में वर्ष 2004 से 2009 तक 8298 किसानों ने आत्महत्या की है। आंकड़ों के हिसाब से रोज प्रदेश में 4 किसान जान दे रहे हैं। इसके बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। अब किसानों को उम्मीद फसल बीमा से है। पहले राष्ट्रीय फसल बीमा योजना लागू थी जिसका लाभ एकाध वर्ष को छोड़कर किसानों को नहीं मिल रहा था। लेकिन इस बार उसके स्थान पर मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू की गई। जिसके तहत तहसील में वर्षा बहुत कम या अधिक होती है तो इस योजना का लाभ मिलेगा। इस बार करीब-करीब औसत वर्षा हुई है। इसलिए इसका लाभ भी किसानों को कोई खास नहीं मिल पाएगा। जिन दो कंपनियों इफको टोकियो और आई सी आई सी आई-लोम्बार्ड के माध्यम से किसानों का प्रीमियम काटा गया, उनसे भी किसानों को लाभ नहीं मिल पा रहा है।

अब सवाल है कि इस खेती का विकल्प क्या है? खेती की लागत बढ़ रही है और उपज घट रही है। मौसम बदल रहा है कभी ज्यादा, कभी कम या अनियमित वर्षा से फसलें प्रभावित हो रही हैं। दूसरी ओर कीट प्रकोप के प्रभाव से भी फसलें नष्ट हो जाती है। मध्यप्रदेश सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जैविक नीति बनाई है। वैकल्पिक खेती की जरूरत षिद्दत से महसूस की जा रही है। होशंगाबाद जिले में इसके कुछ छुटपुट प्रयोग भी हो रहे हैं। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ तब देसी गोबर खाद, देसी बीज और हल-बैल के माध्यम से किसान खेती कर रहे थे। अब इसमें भी नए अनुभव और मेडागास्कर जैसे नई तकनीक आई है जिससे उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। सोयाबीन की जगह ज्वार जैसी फसलों को आजमाया जा सकता है। देषी बीज और गोबर खाद की खेती यहां के मिट्टी-पानी और मौसम के अनुकूल है, जिसकी सिफारिश इन दिनों कई कृषि वैज्ञानिक भी कर रहे हैं। (चरखा फीचर्स) 

(लेखक छतीसगढ़ में स्वंतत्र पत्रकार के रूप में कार्य करते हैं) 

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