लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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लिमटी खरे

केंद्र और राज्यों की सरकारों के बीच समन्वय के अभाव का परिणाम आज साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। अस्सी के दशक से आंतरिक सुरक्षा में गड़बड़ियां प्रकाश में आने लगी थीं। जम्मू काश्मीर के साथ ही साथ पंजाब, असम बुरी तरह सुलगा। कंेद्र सरकार ने इसके शमन के लिए प्रयास किए। मामला शांत हुआ। इसके बाद देश मंे अलगाववाद, क्षेत्रवाद, माओवाद, भाषावाद, नक्सलवाद ने तेजी से पैर पसारे।

नक्सलवाद को खाद पानी कहां से मिलता है, इस बारे में सरकारें बहुत ही अच्छी तरह वाकिफ हैं। आर्थिक विषमता ही किसी भी लड़ाई का प्रमुख कारक हुआ करती है। अस्सी के दशक में संयुक्त मध्य प्रदेश में नक्सलवाद की जड़ें काफी हद तक गहरी हो चली थीं। अलगाववाद, क्षेत्रवाद, माओवाद, भाषावाद, नक्सलवाद आदि के पनपने के पीछे कारण क्या है? क्या शासक इस बात से अंजान हैं? जाहिर है इसका उत्तर होगा सरकारें सब कुछ जानती हैं।

नक्सलवाद प्रभावित बालाघाट और मण्डला जिलों के जंगलों, आदिवासियों आदि से चर्चा के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इस सबके पीछे सिर्फ और सिर्फ सरकारी तंत्र ही जवाबदार है। नक्सलवादियों के निशाने पर कौन हैं? जाहिर है पुलिस, वन, राजस्व महकमे के लोग। आखिर इन विभागों को नक्सलवादियों ने क्यों चुना है? हालात बताते हैं कि इन तीनों ही महकमों का आम जनता से रोजाना ही वास्ता पड़ता है। यह बात भी जगजाहिर है कि इन तीनों ही महकमों के लोगों को चढ़ोत्री चढ़ाए बिना कोई काम संभव नहीं है।

जब आम जनता को यह पता चलता है कि उनका शोषण करने वालों को ‘कोई‘ दण्ड दे रहा है तो उसका इस ‘कोई‘ का साथ देना वाजिब है। उन्हें लगने लगता है कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए कोई तो आगे आया है। वरना कोई अनजान आदमी आकर समूचे गांव को अपने बस में कैसे कर लेता है? गांव के गांव इनका साथ देने कैसे तैयार हो जाते हैं? कैसे इनकी फौज के लिए जुझारू सिपाही मिलते हैं जो मरने मारने को तैयार हो जाते हैं? हमारे नीति निर्धारकों को इस बारे में सोचना होगा?

आंतरिक सुरक्षा के संबंध में समाज, आम आदमी और सरकार की भूमिका क्या और कैसी होना चाहिए? इस बारे में अब तक चिंतन नहीं होना दुर्भाग्य का ही विषय माना जाएगा। सरकारों, गैर सरकारी संगठनों, राजनैतिक दलों आदि की संगोष्ठियों में भी इस गंभीर विषय पर चर्चा नहीं किए जाने से साफ जाहिर हो जाता है कि इन सभी को आम आदमी की कितनी परवाह है।

आंतरिक सुरक्षा के लिए सरकारी तंत्र को जवाबदार इसलिए ठहराया जा रहा है क्योंकि विसंगतियां सरकारी तंत्र के कारण ही उपज रही हैं। आजादी के पहले के परिदृश्य में अंग्रेजों की लालफीताशाही के कारण समाज एकजुट हुआ, इतिहास साक्षी है इसी दौरान गांव में धनाड्य वर्ग ने जब भी कहर बरपाया है, इससे डकैतों की उत्पत्ति हुई है। कुल मिलाकर सामाजिक व्यवस्था का ढांचा जब भी गड़बड़ाया है तब तब अनैतिक रास्तों को अपनाकर अपना शासन स्थापित करने के प्रयास हुए हैं।

वर्तमान में आंतरिक सुरक्षा एक अत्यंत गंभीर प्रश्न बनकर उभर चुकी है, जिसकी तरफ सरकार का ध्यान गया तो है, पर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अपने वोट बैंक की जुगत में सरकारों ने इस मुद्दे के शमन के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं किए हैं। यही कारण है कि देश में आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद आदि का जहर तेजी से फैल चुका है। आप अगर महाराष्ट्र का ही उदहारण लें तो वहां शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मराठी वाद के चलते लोगों का जीना मुहाल हुए बिना नहीं है। वोट बैंक के चलते सरकार मौन साधे हुए है।

हमारे विचार से इस मामले में काफी हद तक समाज भी दोषी है। समाज को भी इस तरह की व्यवस्था का प्रतिकार करना चाहिए। आम आदमी को भी इसके विरोध में स्वर बुलंद करने की आवश्यक्ता है। आखिर क्या कारण है कि आम आदमी अपना काम बिना रिश्वत के करवाने में अक्षम है। इसका उत्तर आईने की तरह साफ है। आज हमें भी जल्दी और नियम विरूद्ध काम करवाने की आदत सी हो गई है। हम कहीं भी जाते हैं तो चाहते हैं कि हमारा काम औरों से पहले, जल्दी और सुविधा के साथ हो जाए, इसके लिए हम हर कीमत देने को तैयार होते हैं। इसका भोगमान गरीब गुरबों को भुगतना होता है, जिनके पास संसाधनों का अभाव है।

देश की संवैधानिक व्यवस्था भी इसके लिए काफी हद तक दोषी करार दी जानी चाहिए। देश में आरक्षण को आजादी के उपरांत दस साल के लिए लागू किया गया था, जिसे आज 62 सालों बाद भी बदस्तूर जारी रखा गया है। 62 वर्षों में एक आदमी वृद्धावस्था को पा लेता है। सरकारी नौकर को भी 62 साल में सेवानिवृत किया जाता है। हमें यह कारण खोजना होगा कि आखिर क्या वजह है कि छः दशकों बाद भी हम आरक्षण पाने वालों को समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा में नहीं ला पाए हैं? हमें इस मसले को गंभीरता के साथ लेकर सोचना होगा, मनन करना होगा और फिर प्रयास करने हांेगे कि हम इस विसंगति को दूर करें।

आखिर क्या वजह है कि आज देश में जाति के बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा रहा है? आखिर क्या वजह है कि सरकारी नौकरों को सेवानिवृत्ति के उपरांत पेंशन देने से परहेज किया जा रहा है और जनप्रतिनिधियों को आज भी भारी भरकम पेंशन दी जा रही है। सवाल यह है कि आखिर यह पैसा आता कहां से है? जनता के गाढ़े पसीने की कमाई ही है यह जिस पर जनता के नुमाईंदे एश किया करते हैं।

बहरहाल लंबे समय के उपरांत केंद्र सरकार ने आंतरिक सुरक्षा की सुध ली है। मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह ने जिन बातों को रेखांकित किया वे संभवतः गैरजरूरी ही थीं। वस्तुतः आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ सुरक्षा बल, खुफिया एजेंसियों का सूचना तंत्र है, जो तहस नहस ही पड़ा हुआ है। जनता और पुलिस के बीच संवादहीनता के चलते जरायमपेशा लोगों के लिए बेहतर उपजाउ माहौल तैयार हो रहा है। छोटे मोटे अपराध से ग्रसित आम जनता थाने की चारदीवारी लांघने से डरती है। अपराधियों में पुलिस का खौफ न के बराबर है, पर जनता के मानस पटल पर पुलिस का कहर आतंक बरपा रहा है। जब तक जनता और पुलिस के बीच दूरी कम नहीं होगी, आंतरिक सुरक्षा के लिए लाख कोशिशें कर ली जाएं बेकार ही होंगी।

वैसे प्रधानमंत्री का यह कहना शत प्रतिशत सही है कि आज समाज की सुरक्षा पुराने पड़ गए कानूनों के माध्यम से ही की जा रही है। पुलिस सुधार के लिए न जाने कितनी कमेटियां, न जाने कितने आयोग बैठ चुके हैं, इन सबकी सिफारिशें धूल खा रही हैं। मनमोहन सिंह किस बात से डर रहे हैं। उनके पास पुलिस सुधार की सिफारिशें हैं तो उन्हें लागू किया जाना चाहिए। वजीरे आजम इसके लिए किस महूर्त का इंतजार कर रहे हैं, यह बात समझ से ही परे है।

भारत गणराज्य के महाराष्ट्र सूबे में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गुर्गे सरेराह आतंक बरपाते घूम रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के निवासियों को वहां से भाग कर आना पड़ रहा है, उधर कांग्रेस को इसके पीछे भी सियासत की ही पड़ी है। बाला साहेब ठाकरे और राज ठाकरे ने दिखा दिया है कि आजाद भारत में तंत्र का नहीं उनका राज कायम है। किसी में इतनी दम नहीं कि राज या बाला साहेब की लगाम कस सकें।

आंतरिक सुरक्षा के मामले में देश में सभी राज्यों को एक ही लाठी से हांका जाता है, जो अनुचित है। पूर्वोत्तर क्षेत्रों की जमीनी हकीकत और भोगोलिक परिस्थियां अलग है, तो दक्षिण, पश्चिम की अलग। आज विदेशी ताकतें सूचना और प्रोद्योगिकी का इस्तेमाल कर अपने रास्ते आसान करती जा रहीं हैं, और हमारे सुरक्षा बल या पुलिस वही बाबा आदम के जमाने में ही जी रहे हैं। हमें इसे बदलना ही होगा।

पुलिस या सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली को इक्कीसवीं सदी के हिसाब से ढाले बिना आंतरिक सुरक्षा की चर्चा बेमानी है। अगर हम एसा नहीं कर पाए तो इस तरह मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन को आहूत कर करोड़ों रूपयों को बहाने के अलावा हम कुछ और नहीं करने वाले। इसका नतीजा निश्चित तौर पर सिफर ही होगा।

कुल मिलाकर अगर किसी भी राज्य में आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया जाना है तो उसके लिए राज्य को बाकायदा अपनी एक ठोस नीति बनाना सुनिश्चित करना होगा। महज नीति बनाने से कुछ होने वाला नहीं, इसके लिए उस नीति का ईमानदारी से पालन कैसे हो? इस बारे में कठोर कदम उठाने की जरूरत होगी। इस सबके लिए जरूरी है सरकार में बैठे नुमाईंदो, राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि और समाज के पायोनियर (अगुआ) की ईमानदार पहल की, जिसकी गुंजाईश बहुत ज्यादा दिखाई नहीं पड़ती।

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