लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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देव को बचपन से हीं पुस्तकें पढने का बहुत शौक था.अब तो उसे यह भी याद नहीं है कि कौन कौन सी पुस्तकें पढी उसने उन दिनों.आज वह सोचता है कि न जाने कब और कैसे चाट पडी उन पुस्तकों की. पुस्तकों की चाट ने उसके जीवन में नाटकीयता का समावेश भी कर दिया.अनजाने में ही उन पुस्तकों में वर्णित पात्रों का जीवन जीने का प्रयत्न करने लगा था.

उन्हीं दिनों उसे शौक चर्राया था लेखक या कवि बनने का.स्कूल में उसने एक दो लेख भी लिखे थे,जिन्हें सराहा गया था.पर,चूँकि वह पढने में तेज था,उसे विज्ञान की ओर उन्मुख होना पडा.साहित्य और विज्ञान. एक तरह का विरोधाभास है दोनो में.किसी ने उसकी अभिरूची जानने का प्रयत्न तो किया नहीं.ऐसे शायद उस को भी अपनी अभिरूची का ज्ञान नहीं था.साहित्य और विज्ञान दोनो साथ साथ चलते रहे. वह पढता रहा पुस्तकें और पास करता रहा परीक्षाएं.पता नहीं वह क्या बनना चाहता था.पर विज्ञान में स्नातक होने के बाद उसे नौकरी पकडनी पडी और पड गया वह नोन,तेल.लकडी के चक़कर में.दिमाग में लेखक वाला कीडा काटता रहा और दिन बीतते रहे.फिर धुन सवार हुआ उसपर कहानी लेखक बनने का.पता नहीं उसके दिमाग में कैसे यह बात आयी कि कहानी लिखना बहुत कठिन कार्य नहीं है.बस लग गया वह इस ओर.पर उसने जब लिखना चाहा तो उसे लगा कि वह क्या लिखे.जीवनानुभव का जहाँ तक प्रश्न था,पढाई के बाद नौकरी पर जाने आने और दफ्तर में काम करने के अतिरिक्त उसको आता ही क्या था?दो चार मित्र भले ही उसने पाल रखे थे,पर उन लोगों के बारे में भी कोई विशेष जानकारी नहीं थी उसे. स्कूल और कालेज के जमाने के मित्रों के संबंध में भी कोई ऐसी कहानी नहीं थी जिसका कोई महत्व हो या जो लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर सके. उसे पता हीं नहीं चल रहा था कि वह क्या करे? उसने ने पढा था कि एक लेखक रेलवे में स्टेशन मास्टर थे.उनकी कहानियाँ रेलवे के विभिन्न अनुभवों पर आधारित थी.लोग बडे चाव से उन कहानियो को पढते थे.दूसरे एक लेखक यात्रा के बहुत शौकीन थे और यात्रा के दौरान हुए अपने विभिन्न अनुभवों को अपने लेखन का माध्यम बनाते थे.एक अन्य लेखक के कहानियों और उपन्यासों का प्लाट पर्वतों के इर्द गिर्द बुना गया था. पता लगा कि वे ज्यादातर वहीं रहा करते थे.देव ने इसपर बहुत सोचा और अपने आसपास के वातावरण से कुछ निकालने का प़यत्न किया,पर अपने आसपास के वातावरण को उसने इतना शुष्क और नीरस पाया कि उसे अपने आप पर ग्लानि होने लगी. क्यों वह ऐसी जिन्दगी जी रहा है जिसमे कोई रोमांस नहीं.क्यों वह रह रहा है ऐसी जगह जहाँ कोई रहस्य नहीं,कोई नवीनता नहीं. पता नहीं लोग कैसे लेखक बन जाते हैं और लिख डालते हैं इतनी अच्छी अच्छी कहानियाँ?. उसको लगा कि उनका कल़्पना जगत बहुत विस्तृत होता होगा और उसी के बल पर वे कहानी लिख जाते होंगे. पर उसने यह भी तो पढा था कि कोई कहानी या उपन्यास बिना आधार के नहीं लिखा जाता.किसी ठोस आधार पर कल्पना का कलेवर चढा कर ही रचना का निर्माण होता है.उसे लग रहा था कि वह ठोस आधार उसे मिल क्यों नहीं रहा है. क्या वह कभी भी कहानी लेखक नहीं बन सकेगा?एकबारगी उसे लगा कि वह हार रहा है,पर इतनी आसानी से हार मानना तो उसके स्वभाव में शामिल नहीं था.

तब उस ने लिया सहारा पुस्तकों का और कहानी की कला के बारे में जानने का प्रयत्न करने लगा.अनेकों पुस्तकों के पारायण के पश्चात उसे लगा कि अब उसका अनुभव क्षेत्र विस्तृत होगया है और वह कहानी लेखक बन सकता है.उसने पढा कि सबसे व्यापक क्षेत्र है सामाजिक कहानियों का.तो फिर क्यों न इसी को माध्यम बना कर एक कहानी का शुभारम्भ किया जाये.एक समस्या फिर सामने आकर खडी हो गयी.कौन सी सामाजिक समस्या ली जाये? किसको माध्यम बनाया जाये कहानी का?उसने सोचा,कयों न भिखारियों की जिन्दगी को कहानी का माध्यम, उसका आधार बनाया जाये.कितनी करूण होती होगी उनकी जिंदगी?लोग बरबस उसकी कहानियों की तरफ आकृष्ट हो जायेंगे. उसने फिर सोचने का प्रयत्न किया कि भिक्षुकों के जीवन पर आधारित कोई कहानी या उपन्यास उसने पढा या नहीं. शायद उसने पढा भी हो पर उसे याद तो नहीं आया.पता नहीं कविताओं कि ओर उसका ध्यान क्यों नहीं गया? शायद वह कविताएँ पढता ही नहीं था,नहीं तो निराला की सुप़सिद्ध कविता उसकी जेहन में अवश्य होती.खैर!

अब चूँकि भिक्षुकों की जिंदगी पर आधारित कहानी का निर्माण करना था,देव को भिक्षुकों के बारे में जानकारी की आवश्यक्ता का अनुभव हुआ. तब उसे याद आया कि उसने किसी भिक्षुक बारे में सोचने की जहमत ही नहीं उठाई थी.यहाँ तक कि वह किसी भिखारी को भीख तक नहीं देता था. उसे अफ़सोस तो अवश्य हुआ कि वह भिक्षुकों की ओर कभी उन्मुख क्यों नहीं हुआ.फिर सोचा,अभी क्या बिगडा है.इसमें कौन अडचन है? अभी जाकर किसी भिक्षुक से मिलता हूँ.उसके बारे में जानकारी हासिल करके उसमें थोडी सी अपनी कल्पना का कलेवर चढा कर एक कहानी लिख डालता हूँ.अब तो उसे लगने लगा कि कहानी लिखना सचमुच कोई कठिन कार्य नहीं. बस प्रारम्भ में देर है.पहली कहानी लिख जाये तो अन्य कहानियाँ अपने आप बनने लगेंगी.

जहाँ चाह वहाँ राह!देव की किस्मत से लंगडा भिखारी आज भी उसके घर से थोडी दूरी पर नुक्कड के कोने में बैठा हुआ था.यों तो भीड में लंगडे से आँख बचाकर वह हमेशा निकल जाता था,जिससे लंगडा उससे कोई याचना न कर बैठे. आज उसे महसूस हुआ कि वह कितना गलत था. इतनी करूण काया को नजर अन्दाज करके उसके कदम कैसे आगे बढ जाते थे?उसे तो भिखारी की सहायता करनी चाहिए थी.भिखारी को उचित सहायता के अतिरिक्त उसके सुख दुःख के बारे में भी पूछना चाहिेए था.सुख का ख्याल आते हीं उसे अपने आप पर हँसी आ गयी.भिखारी के जीवन में सुख कहाँ?यही सब सोचते हुए वह बडे उत्साह से भिखारी की ओर बढा.अपने उत्साह में उसे यह भी ध्यान में नहीं आया कि उसके बढते कदमों को देख कर भिखारी की भौहें चढ गयी.वह सोचने लगा कि यह मनहूस आज सबेरे सबेरे इस तरफ क्यों बढा चला आ रहा है?क्यों मेरी बोहनी बिगाड कर मेरे पेट पर लात मारना चाह रहा है?क्या इसे आज अन्य कोई काम नहीं? अन्य दिनों तो यह मेरी नजर बचाकर निकल जाता था,पर आज न जाने कौन सा काम आ पडा है कि मेरी ओर बढा चला आा रहा है. आओ बच्चू, तुम भी क्या याद करोगे? देखें क्या गर्ज पड गयी है?

लंगडा भिखारी सावधान की मुद्रा में बैठ गया और उसे इस तरह देखा कि वह एकबारगी सहम सा गया.ऐसे भी उसे पता नहीं चल रहा था कि वह क्या पूछे? क्या बोले? भिखारी भी एकदम चुप हो गया था. उसके मुँह से अनवरत निकलने वाली आवाज-‘भगवान के नाम पर,अल्ला के नाम पर इस लंगडे को कुछ देते जाओ बावा’ भी बंद थी.अब तो उसे लग रहा था कि वह बेकार ही इसके पास आया.भिखारी अवश्य उसे पहचान गया है और शायद हीं उससे बात करे.वह इतना नर्वस हो गया था कि उसके मुँह से बोल हीं नहीं फूट रही थी.लंगडा भी उसे एकटक देखे जा रहा था.देव को लगा कि उसे सबसे पहले एक या दो रुपया लंगडे के कटोरे में डालना चाहिए.पैसे निकालने के लिये उसने जेब में हाथ डाला हीं था कि लंगडा भिखारी बोल पडा,

“क्यों बाबू?क्या बात है? आज बडी दयालुता दिखा रहे हो?”

देव तो जैसे आसमान से गिर पडा.उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि कोई भिखारी भी उससे ऐसी बात कर सकता है.क्रोध तो उसे बहुत आया,पर वह खून का घूँट पी कर रह गया.

“नहीं,योहीं.कोई खास बात नहीं है.मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता था.”

“क्या पूछना चाहते हो?”

तुम्हारे बारे में, तुम्हारे जिन्दगी के बारे में?”

 

“साफ साफ क्यों नहीं कहते कि वह क्या बोलते हैं,तुम मेरा इन्टरभयू लेना चाहते हो?”

“नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है.”

अब उस लंगडे भिखारी की आवाज जरा ऊँची हो गयी,

“बाबू तुम मेरा टाइम खराब कर रहे हो.यह मेरे धंधे का समय है.दो चार पैसे कमाने का वक्त है और तुम फोकट में मेरा इन्टरभयू लेना चाहते हो? ऐसा नहीं हो सकता.अगर इन्टरभयू लेना हीं है तो उसकी फीस निकालो.”

अब तो वह बडे असमंजस में पड गया. साक्षात्कार के लिए फीस और वह भी एक भिखारी को.उसे तो स्वप्न में भी यह ख्याल नहीं आ सकता था.उसने पढा अवश्य था कि विदेशों में लोग साक्षात्कार के लिए फीस लेते हैं,पर वे प्रसिद्ध व्यक्ति होते हैं.उनका समय बहुत मूल्यवान होता है. उनके विचार भी बहुत महत्व पूर्ण होते हैं. जिन पत्र पत्रिकाओं में उनके साक्षात्कार छपते हैं,उन पत्र पत्रिकाओं का भी महत्व बढ जाता है.सक्षात्कर्ता भी प्रसिद्धि पा जाता है.अपने देश में तो ऐसा कुछ नहीं है.यहाँ बडे बडे लोगों के साक्षात्कार लिये जाते हैं,पर उसमें पैसे के लेन देन की बात तो उसने कभी सुनी भी नहीं थी.अब यह अदना सा भिखारी! इसका साहस तो देखो.मैनें इससे बात क्या कर ली,इसका दिमाग तो सातवें आसमान पर चढ गया.

उधर उसकी चुप्पी ने भिखारी का साहस और बढा दिया.वह फिर बोल पडा-

“क्यों बाबू? तुमको साँप क्यों सूंघ गया?जेब से पैसे निकालने में नानी की याद क्यों आा गयी? क्या फोकट में हीं मेरा इंटरभयू लेने चले थे? यहाँ आधे से एक घंटे के इन्टर भयू के पूरे पच्चास रूपये लगते हैं.अगर कोई विदेशी साहब इंटरभयू लेता है, तो कम से कम सौ रूपये देता है.फोटू वगैरह खींचता है तो उसके पैसे अलग से देता है.एक फोटू के मैं कम से कम पच्चीस रूपये लेता हूँ.अगर कोई जान पहचान वाला हो तो कुछ रियायत भी कर देताहूँ,पर ,बाबू,तुमसे तो मैं पूरे पैसे पहले रखवा लूंगा तब इंटरभयू शुरु होगा”‘

देव को लग रहा था,वह कहाँ फँस गया.जेब में इतने पैसे भी नहीं थे.होते भी तो क्या?इतने पैसे तो इस लंगडे पर खर्च करने की वह सोच भी नहीं सकता था.दो चार लोग भी खडे हो गये थे, उन दोनो की बातचीत का रस लेने. उस ने वहाँ से टलने में हीं अपनी कुशल समझी.चलते चलते भी पीछे से उसे भिखारी की आवाज सुनाई पडी-

बडा आया था फोकट में मेरा इऩटरभयू लेने.मुझे हीं बेवकूफ समझा था.सोच रहा होगा कि पैसे कमाने का एक जरिया हाथ लगा.इसको पता नहीं,इसके जैसे सैकडों इधर आते रहते हैं.”

भिखारी की बातें पिघले सीसे की तरह उस के कानों में जा रही थीं.वह कोस रहाथा,उस मनहूस घडी को जब उसे इस भिखारी की जिन्दगी के बारे में लिखने की सूझी थी.टूट गया उसका स्वप्न.भांड में जाये सामाजिक समस्या. उसके साथ ही उसे अजीब तरह की बेचैनी होने लगी और बेहद हीनता का भाव छा गया,उसके दिलोदिमाग पर.उसको लगा की वह अब कभी भी कहानी लेखक नहीं बन सकेगा.

2.

इस घटना के बाद कुछ दिन बीत गये.वह लंगडा भिखारी तो अभी भी नुक्कड के उसी कोने में बैठता था,पर उसने अपना मार्ग बदल दिया था.अब वह दफ्तर के लिये या किसी अन्य कार्य के लिये घर से बाहर निकलता तो ध्यान रखता कि वह उस मार्ग ने न गुजरे.उस लंगडे का सामना करने का साहस उस में नहीं था, पर उसके दिमाग में कहानी लेखक बनने का कीडा फिर से काटने लगा था.उसने यह भी पढा कि कहानियाँ दिमाग नहीं दिल से उपजती हैं.अब वह सोचने लगा कि यह दिल से उपजना क्या वस्तु है?क्या उसके अबतक के विचार केवल दिमाग के उपज थे? जब उसे इसका कोई उत्तर न मिला तो उसने इस विचार को दिमाग से निकाल देने में हीं अपनी भलाई समझी और उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगा.

उस की किस्मत! उसको ऐसा अवसर मिल भी गया.इस बार वह भूल नहीं करना चाहता था,अतः प्रथम तो उसने फूंक फूंक कर कदम रखने की सोची.फिर उसे लगा कि कोई अन्य न बाजी मार ले जाये और वह चल पडा अपने दूसरे अभियान पर.

घटना केवल इतनी थी कि पिछले साल उसके पडोस में एक शादी हुई थी. अन्य शादियों की तरह यह भी एक सीधी सादी शादी थी.लडकी वालों से उस का कोई गहरा संबंध था नहीं,अतः वह शादी में निमंत्रित नहीं था.अब वह लडकी मैके लौट आयी थी और देव को उडती उडती खबर मिली थी कि लडकी के ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल दिया है.इस खबर को उसने अपने लिये इश्वरीय वरदान समझा.इससे बडी सामाजिक समस्या क्या होसकती थी?सामाजिक कुरीतियाँ अभी भी इस कदर हावी हैं कि लडकियों का जीना दूभर हो गया है.अच्छी खासी पढी लिखी लडकी है यह.सुन्दर भी कम नहीं. गौर वर्ण,अच्छे नाक नख्स, लम्बा छरहरा शरीर.वह सोच रहा था,क्या कारण हुआ कि ससुराल वालों ने उसे निकाल दिया.उसके मष्तिष्क में प्रश्नों की श्रृंखला बनती जा रही थी.इस बार उसे लगा कि उसका दिल भी उसका साथ दे रहा है. उसने लडकी के घर जाने की ठानी. फिर सोचने लगा,क्या बहाना लेकर जाऊँ.एक बार उसके मष्तिष्क में यह बात आयी कि पत्नी को साथ लेकर जाया जाये तो अच्छा रहेगा,पर इस विचार को उसने अपने दिमाग से बाहर किया.उसे लगा कि पत्नी का साथ उसका सब काम विगाड देगा.वह खुलकर बात नहीं कर सकेगा.ज्यादा कुरेदने पर पत्नी को शक भी हो सकता था कि इस लडकी के साथ अवश्य उसका कोई संबंध रहा होगा,नहीं तो वह क्यों इस लडकी में इतनी दिलचस्पी लेता? पडोस का मामला होने के कारण एक सुविधा तो उसको थी.वह ऐसे समय वहाँ जा सकता था जब अन्य कोई वहाँ न हो.इसके लिये भी उसे बहुत इंतजार करना पडा.उसके पास इतना समय तो था नहीं कि वह चौबीस घंटे उधर निगाह लगाये रखे.फिर ज्यादा ताक झाँक करने पर लोगों की ,खास कर अपनी पत्नी की निगाहों में चढने का भी डर था.गर एक बार उसकी पत्नी को शक पड जाता तो देव का सारा किया कराया धरा रह जाता. फिर कभी न लिख पाता वह कहानी. उसके स्वप्न अधूरे ही रह जाते.खैर, अवसर आ भी गया.

वह उस शाम दूध लेकर लौट रहा था. उसकी निगाहें पडोस के घर की ओर लगी हुई थी.उसको लगा कि उस समय उस घर में लडकी के माता पिता और उस लडकी के सिवा अन्य कोई नहीं है.लडकी का भाई उसे मार्ग में हीं दूसरी ओर जाता हुआ मिल गया था. अतः उसके जल्दी लौटने की संभावना कम हीं थी.उसने दूध का वर्तन घर में रखा और धीरे से खिसक लिया.सौभाग्य वस पत्नी ने भी उसे नहीं टोका. शाम के धुंधलके में जब देव उस घर के पास पहुँचा तो उसके दिलोदिमाग में उथल पुथल मची हुई थी.लगता था कि वह चोरी करने जा रहा है और उसे शक है कि कही वह रंगे हाथों पकडा न जाये.एक बार तो देव को लगा कि वह लौट जाये,पर इधर उधर देखने पर उसे जब इतमिनान हो गया कि कोई देख नहीं रहा है तो साहस करकर उसने अपना हाथ घंटी पर रख ही दिया. जब कुछ देर तक भीतर कोई हलचल नहीं हुई तो उसे लगा कि घंटी बजी ही नहीं.पर ऐसा कैसे हो सकता था? उसने स्वयं घंटी की आवाज सुनी थी.कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद वह दुबारा घंटी पर हाथ रखने को ही था कि धीरे से दरवाजा खुलने की आवाज आयी.लडकी की माँ की सवालिया निगाहें देव की ओर उठी ही थी कि उसने लडकी की माँ को नमस्कार किया और उनके पीछे पीछे घर में दाखिल हो गया.लडकी के पिता ड्राइंग रूम में बैठे थे.बिजली की रोशनी में उनका चेहरा सूना सूना लग रहा था.देव ने कमरे में अपनी निगाहें दौडाई तो उसे सब चुछ अन्य दिनों की तरह ही लगा. हो सकता है कि कुछ परिवर्तन हुआ हो पर उसकी निगाहें उस परिवर्तन को पकड नहीं पा रही थी. लडकी शायद दूसरे कमरे में थी.पहले तो ऐसा होता था कि दरवाजा या तो लडकी खोलती थी या उसका भाई खोलता था,पर आज तो उसे यह भी उम्मीद नहीं थी कि लडकी उसकी उपस्थिति में कमरे में आयेगी भी.

माहौल थोडा भारी सा लग रहा था.देव के सोचे हुए प्रश्न भी उसका साथ नहीं दे रहे थे.वह समझ नहीं पा रहा था कि प्रश्नों का आरम्भ किस तरह किया जाए.लडकी के माँ बाप भी चुप थे.उन्हें तो उसके आने का कारण ही नहीं समझ में आ रहा था.उनके तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि इस आदमी को उनसे इस अवसर पर क्या काम पड सकता है.गर्मी का मौसम तो था नहीं,पर उसको लगा कि उसके माथे पर पसीना छल छला रहा है.गला भी उसका सूख रहा था.उसे लगा कि अगर पानी का एक गलास मिल जाता तो राहत मिलती. पता नही ये लोग उसे जल क्यों नहीं पेश कर रहे हैं? क्या ये लोग साधारण शिष्टाचार भी भूल गये? पर नहीं,वह देखता क्या है कि वही लडकी हाथों में एक गलास जल और कुछ नमकीन लिए कमरे में पधार रही है.उस लडकी की निगाह में पता नहीं क्या था कि पानी पीते पीते वह नर्वस नजर आने लगा. लडकी की माँ ने उसे नमकीन लेने का भी इशारा किया, पर उसने इनकार कर दिया.उसे तो पता भी नहीं चल रहा था कि वह अब क्या करे.चुप बैठना भी उसे भारी लग रहा था.उसने साहस करके एक दो बातें की भी तो उसे वे बातें खुद बेतुकी लगीं. हाँ हूँ के अलावा उन बातों का उसे कोई उत्तर भी नहीं मिला.असली मुद्दे पर आने का वह साहस नहीं जुटा पा रहा था.अब उसे लगने लगा कि वह अब इन लोगों से कोई भी प्रश्न नहीं पूछ सकेगा.उसे अपनी पत्नी अवश्य याद आा रही थी.उसे लग रहा था कि उसकी पत्नी इस समस्या का कोई समाधान अवश्य निकाल लेती.पर अब तो कुछ नही हो सकता था. उसे लगा कि अब तो जल्द से जल्द यहाँ से भागने में हीं भलाई है. हाँलाकि ज्यादा समय नहीं बीता था,पर उसे लगा कि बहुत देर हो गयी है.वह यकायक उठ खडा हुआ और नमस्कार करके चलने को तैयार हो गया.लडकी ने भी ,जो अब तक बैठ चुकी थी, उस की ओर नजर उठाई,पर उसने लडकी की ओर देखा भी नहीं.’बेटा, और थोडी देर बैठो तो सही’ यह लडकी के पिता की आवाज थी,पर वह फिर कभी आने को कहकर बाहर निकल आया.बाहर आने पर उसने एक लंबी रहत की साँस ली.उसे लगा कि उस कमरे में और थोडी देर बैठा रहता तो उसका दम घुट जाता. बाहर निकलकर उसने इधर उधर देखा कि किसी की नजर तो उस पर नहीं पडी.उसे तो उस समय यह ख्याल भी नहीं आया कि उसके पडोसी,जिनके घर वह गया था,उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे.पर उसे यह एहसास तो हो ही गया कि वह एकबार फिर असफल हो गया था.उसकी कहानी लेखक बनने की तमन्ना फिर मिट्टी में मिल गयी थी.

3

कुछ दिन और बीत गए.अब उसे लगने लगा कि सामाजिक समस्याओं पर लिखना उसके बूते के बाहर की बात है. तो क्या वह हार मान ले?क्या वह कहानी लेखक बनने का स्वप्न देखना छोड दे?उसने फिर कहानी लेखन की कला वाली पुस्तकों का सहारा लिया.देखा कि अभी तो अनेक विषय शेष हैं.प्रेम की कहानियाँ लिखी जा सकती है.राजनीति और उसके छल प्रपंच पर भी कलम चलाया जा सकता है.राजनीतिज्ञों के काल्पनिक तस्वीरों को भी पेश किया जा सकता है.उसने सोचा कि चलो प्रेम कहानियों पर अपनी कलम आजमाईश करते हैं.आदर्श प्रेम की बहुत सी गाथाएँ उसने पढी थी.लैला मजनू,सोहनी महीवाल और हीर राँझा के साथ ही साथ रोमियो जुलियट की तस्वीर भी उसके जेहन में समाई हुई थी.उपन्यासों और कहानियों में सैकडों प्रेम गाथाएँ भरी पडी थी.चलचित्र तो वह कम ही देखता था,पर उसने देखा था कि एक तरह का प्रेम उन चलचित्रों में भी दिखाया जाता था.उसको लगा कि अगर वह इसीतरह की कोई कहानी लिख गया तो लोग कभी भी उसकी कहानियों को नहीं सराहेंगे.अपना अनुभव तो कुछ था नहीं जिसको आधार बना कर वह कहानी लिखता.उसे अपने आप पर इस बार बहुत क्रोध आया.क्या जिंदगी जी है उसने?इन छतीस वर्षों में वह किसी भी लडकी से प्रेम नहीं कर सका. न जाने वे कैसे लोग होते हैं जिनको बचपन से ही एक अदद लडकी मिल जाती है प्रेम करने के लिए? उसने तो बस एक शादी कर ली ,वह भी माता पिता के पसंद की लडकी से और जुट गया गृहस्थी की चक्की में.अब तो वह एक बच्चे का बाप भी बन चुका था.क्या आवश्यकता थी इतनी जल्दी शादी करने की और बच्चा पैदा करने की?उसे तो आज कालेज का वह साथी बुरी तरह याद आ रहा था,जो अभी भी कुँआरा था और लडकियाँ उसके पीछे पागल थीं उसका वह साथी न पढने में उससे ज्यादा तेज था और न बहुत स्मार्ट ही था,पर कुछ तो अवश्य था उसमें और जो शायद लडकियों को ही ज्यादा दिखता था.उसको अपने उस साथी का छिछोरापन कभी नहीं भाया था और इसी कारण उससे हल्लो हल्लो के आगे पहचान भी नहीं बढाया था देव ने उससे. उसको तो देव ने कभी अपने घर भी नहीं बुलाया था.पता नही उसके मन में अपनी पत्नी के भी उस सहपाठी की तरफ आकर्षित होने का भय था शायद. उसने एकबार अपने बच्चे की तरफ बडे प्यार से देखा और सोचा कि इसके साथ खेलने वाली किसी लडकी की ओर इसके देखने या किसी हरकत को आधार बनाकर वह किसी कहानी का आरम्भ करे,पर यह विचार उसे इतनी मूर्खतापूर्ण लगी कि वह रोने रोने को हो गया.एकबार तो उसने पति-पत्नी के जीवन में भी प्रेम कहानी का आधार ढूंढने का प्रयत्न किया,पर इसमें भी उसे सफलता नहीं मिली. इसी तरह सोचते सोचते न जाने कब वह दर्पण के सामने खडा हो गया था.उसकी नजर जब अपने आप पर पडी तो उसे लगा कि वह तो अभी भी जवान है.छतीस वर्ष की उम्र ही क्या होती है?फिर वह स्वयं ही प्रेमानुभव क्यों न करे?यथार्थ का कल्पना के साथ सम्मिश्रण उसकी कहानी को चार चाँद लगा देगा.एकबार उसे अपनी पत्नी और बच्चे का भी ख्याल आया,पर उसने अपने मन में सोचा कि वह उनके प्रति कर्तव्य पालन से कहाँ विमुख हो रहा है?उन लोगों को छोड थोडे ही रहा है वह?यह तो प्रेम का एक नाटक होगा,जो आधार बनेगा उसके द्वारा लिखे जाने वाले प्रेम कहानी का.इसबार भी न जाने क्यों उसे अपनी पत्नी याद आयी,पर पत्नी को इसमे शामिल होने के लिए बात करना तो बर्रे के छत्त़े को छेडने जैसा था.बाद की जिंदगी नर्क बन जाने का खतरा अलग.पहले का कोई अनुभव न होने के कारण उसे इस ओर कदम बढाने का साहस तो नहीं हो रहा था.डर भी लग रहा था उसे.पर कहानी लेखक बनने के लिए कुछ कुछ उत्सर्ग करना आवश्यक था. एकबार वह कहानी लेखक बन गया तो पाई पाई वसूल हो जायेगा इसका उसे विश्वास था.

प्रेम के आरंभ के लिए कम से कम एक अदद लडका और एक अदद लडकी होना आवश्यक है. लडके की भूमिका तो वह स्वयं निभा रहा था.अब आवश्यकता थी एक अदद लडकी की.लडकी भी कुँआरी होनी चाहिए. तलाकशुदा या विवाहित लडकियों से प्रेम करने की तो वह कल्पना भी नही कर सकता था.इस काम के लिए उसे सबसे पहले ख्याल आया अपने दफ्तर का.सौभाग्यवस वहाँ अनेक लडकियाँ कार्यरत थीं.उनकी ओर जब देव का ध्यान गया तो उसे याद आया कि कुछ लडकियों ने आरम्भ में उसमें दिलचस्पी भी दिखाई थी,पर एक तो उसका स्वभावऔर दूसरे उसके विवाहित होने की खबर?लडकियों को हतोत्साहित करने के लिए यह काफी था.उसके साथ ही अब खबर जुड गयी थी उसके बाप बनने की. उसे मालूम था कि वे लडकियाँ घास भी नहीं डालेगी उसको.ऐसे एक नयी लडकी दफ्तर में आयी थी,पर उस लडकी की ओर भी कदम बढाने का साहस भी देव में नहीं था क्योंकि उसे मालूम था, ज्यों ही अन्य लडकियाँ उसे नयी आयी हुई लडकी के साथ घुलते मिलते देखेंगी,उसका भंडाफोड किये बिना नहीं रहेंगी. उसने सोचा कि यह काम करना ही है तो किसी अन्य स्थल पर लडकी की तलाश करनी पडेगी.अब तो रह रह कर उसे अपने आप पर फक्र भी हो रहा था.क्या विचार आया था उसे?आम का आम और गुठलियों के दाम. अब तो दोनो हाथों में लड्डू थे उसके.लडकी से प्रेम और कहानी लेखन.इतना मधुर लगा उसको यह विचार कि वह अफसोस करने लगा कि क्यों न यह विचार पहले आया.क्यों मैं भटकता रहा सामाजिक समस़याओं में? भिखारी का ध्यान आते हीं उसका मुँह कडवा हो गया.दिमाग झनझन करने लगा.पर बीते दिनों का ख्याल दिलोदिमाग से निकाल कर वह जा पहुँचा अपने घर से थोडी दूर स्थित पार्क में.क्या अच्छा नाम था पार्क का–नंदन कानन.नंदन कानन यानि स्वर्ग का उपवन.वह रमणीय उद्यान जहाँ अप्सरायें भ्रमण करती हैं.पार्क का नामकरण करने वाले के सौन्दर्यवोध को उसने मन ही मन दाद दिया और चला गया पार्क के अंदर.

कल्पनातीत! नंदन कानन तो आज सचमुच नंदन कानन लग रहा था.पहले भी वह एक दो बार यहाँ आया था.पर उस समय पत्नी और बच्चे उसके साथ थे.गुलाब की क्यारियों और तरतीब से लगाये पेडों पर उसकी नजर भी पडी थी,पर उनमे छिपे सौन्दर्य पर उसका ध्यान नहीं गया था.वह पत्नी और बच्चे फरमाईशों के बीच हीं उलझ कर रह गया था.ज्यादा समय उन्होनें फव्वारों के बीच गुजारे थे.जल्दी ही वापस भी लौट गये थे वे यहाँ से.

आज तो अपनी धुन में मग्न गुनगुनाता हुआ वह इधर से उधर टहलने लगा.अभी शाम का धुंधलका भी पूरी तरह नहीं फैला था.उसे तो शाम का यह माहौल बहुत ही मादक लग रहा था, पर जिस तलाश में वह यहाँ आया था,उसकी सफलता पर उसे संदेह होने लगा था. जोडे तो बहुत थे.युवक और युवतियाँ तो थे हीं, वृद्ध और वृद्धाएँ भी संग संग जारहे थे..वह सोचने लगा यहाँ कहाँ अकेली लडकी के दर्शन होंगे?यही सब सोचते हुए वह लोगों की भीड से आगे निकल गया.इधर पेंड वगैरह तो थे,हरियाली भी कम नहीं थी,पर लोग तो फव्वारों और गुलाब की क्यारियों में उलझे हुये थे,इधर कौन आता?पर नहीं सामने के बेंच पर तो एक लडकी बैठी हुई थी. एकदम अकेली,अपने विचारों में मग्न. पहले तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ. उसने ध्यान से इधर उधर देखा.लडकी ने शायद उसे देखा नहीं था. उसे आश्चर्य हुआ कि वह बीस वर्षीया युवती इस एकांत में क्या कर रही है. अच्छे नाक नक्श वाली सुंदर युवती थी वह.कुछ कुछ आधुनिकता का भी समावेश था उसमें,खासकर उसके लिबास में.शायद वह किसी की प्रतीक्षा कर रही थी.देव के दिमाग में कीडा रेंगने लगा.उसने सोचना शुरु किया कि क्यों न इसके आसपास रह कर देखा जाए कि वह किसकी प्रतीक्षा कर रही है.वह आधे घंटे तक उस लडकी के इर्द गिर्द मडराता रहा,पर कोई आया नहीं.लडकी का भी शायद उसकी ओर ध्यान नहीं गया.इसके बाद थोडा और अंधेरा बढने पर वह उठकर चल दी.पहले तो देव ने उसका पीछा करने की सोची,लेकिन बाद में उसने अपना विचार बदल दिया.उसका मन अब पार्क में नहीं लग रहा था,अत; वह घर की ओर चल पडा.उस लडकी का चेहरा जरूर रह रह कर उसकी आँखों के सामने आ जा रहा था.

दूसरे दिन छुट्टी तो थी नहीं.सबेरे सबेरे तैयार होकर वह दफ्तर के लिए निकल गया.दफ्तर में भी उसका मन नहीं लगा. पार्क वाली लडकी अभी भी उसके दिलोदिमाग पर छायी हुई थी.घर आते हीं वह पत्नी से बोला-“दफ्तर में आज मैं बहुत परेशान रहा हूं.चाय पीकर मैं थोडी देर के लिए पार्क की ओर जाऊँगा.लौटने में थोडी देर हो सकती है,चिंता मत करना.”

पत्नी ने क्या उत्तर दिया उसने सुना भी नहीं और जल्दी जल्दी चाय पीकर पार्क की ओर निकल गया.पत्नी को आश्चर्य तो अवश्य हुआ.उसका बेटा भी मायूश हो गया,क्योंकि पापा ने आफिस से आकर उसे प्यार नहीं किया था.

देव पार्क में पहुँचा तो आज उसका ध्यान किसी ओर नहीं था.वह जल्द से जल्द उस स्थान पर पहुँचना चाहता था,जहाँ कल वह लडकी मिली थी. न जाने क्यों उसे लग रहा था कि आज भी वह लडकी वहीं मिलेगी.वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना भी कर रहा था.यह उसकी प्रार्थना का फल था या उसका सौभाग्य,लडकी आज भी अपने विचारों में मग्न उसी जगह बैठी हुई थी.वह तो जैसे निहाल हो गया.उसे लगा कि आज भगवान उस पर बहुत प्रसन्न हैं.आज तो शायद वह जो कुछ मांगता उसे मिल जाता.इस संयोग ने देव का साहस भी बढा दियाऔर वह लडकी के नजदीक आगया.लडकी ने उसकी ओर देखा और धीरे से बोली-हाय!देव के खुशी की तो पराकाष्ठा हो गयी.लडकी ने हाय क्या कहा,देव को लगा कि उसने सबकुछ पा लिया.जवाब में उसने भी हाय कहा,पर आवाज इतनी धीमी थी कि लडकी ने शायद ही सुना हो.

“इधर तो कोई आता जाता नहीं,फिर आप कैसे आ गये?” यह लडकी की आवाज थी.

“आप भी तो इधर हीं बैठी हुई हैं.कल भी मैनें देखा था कि आप इधर हीं बैठी हुई थीं.”देव को खुद पर आश्चर्य हुआ कि वह इतना कैसे बोल गया.

लडकी मुस्कुरायी,”तो कल वह आप ही थे जो बहुत देर से चहलकदमी कर रहे थे.बाद में मेरे जाने के बाद भी शायद आप यहीं थे?”

अब तो देव की हिम्मत बढ गयी.बोला,”नहीं आपके जाने के बाद मैं भी चला गया था”.

वैसे इसका एहसास होते ही कि लडकी ने भी उसे देखा था,देव को थोडी घबराहट अवश्य हुई कि पता नहीं किसी और ने भी न देखा हो.फिर सोचा प्रेम पथ पर जब कदम बढाया है तो कुछ खतरा तो मोल लेना हीं पडेगा.

लडकी बहुत सुलझे विचारों की लग रही थी और इस तरह से बातें कर रही थी, जैसे वे बहुत दिनों के परिचित हों.वह कह रही थी,”मैं तो इधर एकांत की तलाश में आती हूँ.माँ बाप की एकलौती संतान हूँ.मम्मी पापा को तो अपनी पार्टियों से फुर्सत नहीं.हर समय शोर गुल! यहाँ आकर मैं बहुत शांति महसूस करती हूँ.घर भी पास ही है,अतः मैं अक्सर इधर आ जाती हूँ.”

इसबार देव झूठ बोला,”मैं भी अकेला ही हूँ.मन बहलाव के आम साधन मुझे आकर्षित नहीं करते.पार्क भी एक अनुभव क्षेत्र है.इसका सौंदर्य भी अनुपम है.अक्सर यह मुझे अपने आकर्षण में बांध लेता है.”वह काफी गंभीर लग रहा था और देख रहा था कि लडकी पर उसका प्रभाव पड रहा है.इसी बीच वह लडकी की बगल में बैठ चुका था.

लडकी खिलखिला कर हँस पडी,”अरे आप तो लेखक या कवि लग रहे हैं.इस तरह की भाषा तो वे ही लोग बोलते हैं.क्या मेरा अनुमान सही है?”

देव तो झूठ बोल ही रहा था.सोचा एक झूठ और सही.उसपर भी यह तो आधा ही झूठ होगा.लेखक तो वह बनना ही चाहता था.आवाज को बेहद नम्र बनाकर बोला,”वंदा एक छोटा मोटा कहानी लेखक है”. यह कहते हुए उसकी आवाज जरा भी नहीं लडखडाई.उसे यह भी ध्यान नहीं आया कि लडकी जब उसकी छपी कहानी संग्रह या पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों के बारे में पूछेगीतो वह क्या उत्तर देगा?

देव का सौभाग्य या दुर्भाग्य! यह नौबत ही नहीं आयी.देखता क्या है कि उसकी पत्नी बेटे का हाथ पकडे हुए इधर ही आ रही है.अब तो उसको काटो तो खून नहीं.उसका चेहरा फक पड गया.लडकी ने तुरत यह परिवर्तन लक्ष्य किया और बोली,”कहिए बैचेलर साहब,यहसब क्या है?अब तो मुझे शक हो रहा है कि आप कहानी लेखक भी हैं?”

उसके मुँह से आवाज निकलती,उसके पहले ही उसकी पत्नी ने तीखी आवाज में कहा,” ये अपने आप को कुँआरा बता कर आप पर डोरे डाल रहे थे?इस उम्र में यह छिछोरापन!इनको शर्म भी नहीं आयी.और आप कौन से लेखक हैं? क्या लिखा है आपने?पहले घर चलिए,फिर बताती हूँ.वही तो मैं सोच रही थी कि इधर पार्क में हवाखोरी का चस्का क्यों लग गया?वह तो बेटे ने जिद की तो मैं इसको लेकर इधर आ गयी,नहीं तो पता नहीं क्या क्या गुल खिलता?”बोलते बोलते उसकी आखों से आँसू निकल आये.वह लडकी को भी भला बुरा कहना चाहती थी ,पर न जाने क्या सोच कर चुप रह गयी और लडके का हाथ पकडे हुए घर की ओर चल दी. लडका भी लगता है यह दृश्य देख कर सहम गया था और चुपचाप माँ के संग चल पडा था.देव भी हारे जुआरी की तरह पत्नी के पीछे पीछे घर की ओर चल पडा.लडकी की खिलखिलाहट उसकी पीठ में तीर की तरह चुभ रही थी,पर पीछे मुडकर देखने का साहस उसमें नहीं था.

उस रात देव पर क्या गुजरी यह वर्णन करने में वह असमर्थ है.इतना ही कह सकता है कि पत्नी के पैर पकड कर माफी मांगने पर ही वह पिघली.

अब तो कहानी लेखन के बारे में सोचने में भी उसकी जान निकलती है.कहानी लेखन कला की पुस्तकों के अनुसार तो अभी अनेक विषय शेष थे,पर वह बुरी तरह पस्त हो चुका था.उसमे अब इतना साहस नहीं थाकि वह कोई अन्य तजुर्बा करता.वह अपनी पत्नी से प्रतिज्ञा भी कर चुका था कि वह ऐसी कोई हरकत अब नहीं करेगा.

 

अपनी यह आपबीती लिख कर उसने निम्न पत्र के साथ एक हिन्दी पत्रिका के संपादक को भेज दिया;

 

पूज्य संपादक जी,

स्नेह अभिनंदन.

एक असफल कहानी लेखक की आपबीती आपकी सेवा में समर्पित है.पता नहीं यह प्रकाशन योग्य है या नहीं,पर अगर आप इसे प्रकाशित कर दें तो मेरे जैसे नैसर्गिक प्रतिभा रहित महत्वाकांक्षी युवकों को कुछ तो शिक्षा मिलेगी.

आपका,

एक असफल कहानी लेखक.

 

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