लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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medicalडा. राधेश्याम द्विवेदी
स्वास्थ्य का तात्पर्य रोगों से मुक्ति मात्र नहीं, निरोगी काया की रचना करना है। ऐलोपैथी हालांकि तुरंत परिणाम का दावा करती है, पर वह रोगों की जड़ समाप्ति की बात नहीं करती। भारत जैसे विशाल देश में, जहां लगभग सत्तर प्रतिशत जनसंख्या आज भी गांवों में रहती है, वैकल्पिक चिकित्सा का ज्ञान, स्वस्थ भारत की पृष्ठभूमि निर्मित कर सकता है।संविधान का अनुच्छेद इक्कीस जीने का अधिकार ही नहीं देता, बल्कि सम्मान से पूर्ण स्वस्थता के साथ जीने का अधिकार देता है। विश्व जनसंख्या में साढ़े सोलह प्रतिशत की भागीदारी निभाने वाले भारत की विश्व की बीमारियों में हिस्सेदारी बीस प्रतिशत है। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य-व्यवस्था और स्वास्थ्य शिक्षा की आवश्यकता और प्रचलन की पहचान प्राचीन है। भारत में औपचारिक तौर पर स्वास्थ्य शिक्षा की शुरुआत को 1929 में देखा जा सकता है, जब मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) में जनसाधारण को बेहतर स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में जानकारी देने के लिए राज्य के स्वास्थ्य सेवा निदेशालय में प्रचार इकाई स्थापित की गई थी।
1940 तक देश के लगभग सभी राज्यों में प्रचार इकाइयों को स्वास्थ्य सेवा निदेशालय के अंग के रूप में स्थापित किया जा चुका था। 1944 में सर जोसेफ मोरे की अध्यक्षता में स्वास्थ्य सर्वेक्षण समिति ने केंद्र और राज्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा को एकीकृत करने की सिफारिश की। सर मोरे की एक महत्त्वपूर्ण अनुशंसा यह भी थी कि ‘जनस्वास्थ्य शासन की जिम्मेदारी है।’ प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान योजना आयोग ने देश में गहन स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी गतिविधियों की आवश्यकता को बार-बार दोहराया। आयोग ने केंद्र और राज्य स्तरों पर कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या और उपकरणों से सुसज्जित स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो स्थापित करने की सिफारिश की। प्रारंभिक तौर पर केंद्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो ने अपनी गतिविधियों और कार्यों के बारे में राज्य स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो को दिशा-निर्देश दिए और साथ ही सभी राज्यों में स्वास्थ्य शिक्षा सेवाओं को सशक्त करने के लिए पूंजी भी प्रदान की और बाद में एसएचईबी स्वास्थ्य सेवा निदेशालय का अंग बन गया।सन 1958 में विद्यालय स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग की स्थापना युवा पीढ़ी के लिए स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों को सशक्त करने की दृष्टि से की गई। विद्यालय के पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य शिक्षा के घटक को सशक्त करने के लिए, विद्यालय स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कक्षा नौंवी व दसवीं के लिए शारीरिक शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा पाठ्यविवरण विकसित किया। ‘चिकित्सा एक विज्ञान है और चिकित्सा-शिक्षा की मजबूत नींव पर ही सफल चिकित्सा की जा सकती है’ इस तथ्य को स्वीकारते हुए 1983 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र के संबंध में निर्धारक तत्त्वों में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ।1983 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में वर्णित कुछ नीतिगत पहलुओं के संतोषजनक परिणाम निकले। इस नीति के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण पहल के विषय थे वृहत प्राथमिक स्वास्थ्य देखरेख सेवा के केंद्र दूर-दूर तक स्थापित करने के चरणबद्ध चक्र तथा समयबद्ध कार्यक्रम जो प्रसार और स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़ा हो, जिन्हें इस जमीनी हकीकत के संदर्भ में तैयार किया जाए कि प्रारंभिक स्वास्थ्य समस्याएं स्वयं लोगों द्वारा हल की जा सकें। भारत में निशुल्क इलाज के दावे किए जाते हैं, पर जमीनी हकीकत इससे इतर है। तो कैसे उन आधारभूत ढांचों का निर्माण किया जाए जिससे देश के स्वास्थ्य-मानचित्र में परिवर्तन आए। जब हम अस्वस्थ भारत की बात करते हैं तो यकीनन हमारी संपूर्ण दृष्टि पश्चिमी चिकित्सा पद्धति पर टिकी होती है। पर अब इससे इतर हमें उस ओर दृष्टि करनी होगी जो भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी हुई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की मूल चिकित्सा पद्धति अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। जब भी चिकित्सा सुधार की कोई योजना बनती है, उसमें आधुनिक चिकित्सा सुधार के लिए भारी-भरकम बजट का प्रावधान होता है, पर भारत की अपनी पद्धति आयुर्वेद के शिक्षण-स्तर में सुधार के लिए शायद ही कोई ठोस उपाय किया जाता है।
आयुष पद्धति के अधिकांश चिकित्सक अब भी ग्रामीण और छोटे शहरी जगहों में कार्य करके लोगों की सेवा कर रहे हैं। नई और वैज्ञानिक उपचार विधियों के इस युग में पारंपरिक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के विकास, स्तरोन्नयन और अनुसंधान के जरिए ही भारतीयों की अस्वस्थता को दूर करने की पहल की जानी चाहिए। क्योंकि आज इस तथ्य को स्वीकार किया जा रहा है कि स्वास्थ्य का अर्थ ‘मात्र रोग से मुक्ति’ नहीं बल्कि इसमें अधिक महत्त्त्वपूर्ण अन्य पहलू भी शामिल हैं। वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में रोगविशेष के इलाज के बजाय प्रकृति का ही एक अंग समझ कर मरीज का उपचार किया जाता है। मूलत: आधुनिक चिकित्सा पद्धति इलाज के साथ-साथ खान-पान संबंधी परहेजों की चर्चा करती नहीं दिखती, जो कि स्वस्थ होने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कारक है। दरअसल हम सहज उपलब्ध तरीके, जो पश्चिमी संस्कृति की देन हैं, उन्हें ही प्रमुखता देते हैं। पर वे देश जो एलोपैथी के पुराने पैरोकार हैं वे भी विविध प्रकार के प्राकृतिक इलाज की ओर रुख कर रहे हैं, जबकि हमारी पुरातन चिकित्सा पद्धति के प्रति उदासीनता बनी हुई है। भारतीय वैकल्पिक चिकित्सा बोर्ड द्वारा चलित अंतरराष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय अकादमी है जो कि भारत व विदेशों में प्राकृतिक तथा पूरक चिकित्सा और स्वास्थ्य संवर्धन के क्षेत्र में अग्रणी संस्था है। अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर कॉम्प्लीमेंटरी ऐंड आल्टरनेटिव मेडीसिन ऐसे उदाहरणों का उल्लेख करता है जिसमें अन्य पद्धतियों के अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा, पाद-चिकित्सा, जड़ी-बूटी, आयुर्वेद, ध्यान, योग, पोषण-आधारित उपचार पद्धतियां शामिल हैं।
बीते दशक में एक वैश्विक लहर का आगाज हुआ है जिसका लक्ष्य आम आदमी को बेहतर जीवन देना, चिकित्सक और मरीजों के बीच बेहतर रिश्ते की बुनियाद रखना और कम खर्च में अच्छा इलाज मुहैया कराना है, जो मौजूदा चिकित्सा पद्धति नहीं दे रही है। विविध प्रकार के प्राकृतिक इलाज की ओर रुख कर रहे इस नए प्रारूप को इंटिग्रेटेड मेडिसिन या समन्वयकारी चिकित्सा कहा जा रहा है। चिकित्सा की विभिन्न पद्धतियों को एक साथ मिलाने के विचार को पश्चिमी चिकित्सा की मुख्यधारा के चिकित्सकों ने फर्जी विज्ञान कह कर खारिज कर दिया। चिकित्सा प्रतिष्ठानों ने ऐसे किसी विचार को मानने से इनकार कर दिया जो प्रयोगशाला में डबल ब्लाइंड और रैंडम क्लीनिकल ट्रायल पर खरा न उतरे।इन सारी अड़चनों के बावजूद विश्व का एक बड़ा तबका वैकल्पिक चिकित्सा की ओर न केवल बढ़ रहा है बल्कि उसके विस्तार के लिए एक नवीन धरातल भी तैयार कर रहा है। ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स ने नवंबर 2013 में बंगलुरुके शौक्य इंटरनेशनल होलिस्टिक हीलिंग सेंटर फाउंडेशन की साझेदारी में एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना शुरू की, जो ब्रिटेन के उनके चैरिटी कॉलेज आॅफ मेडिसिन का एक प्रयास है। इसका उद्देश्य एक ऐसा नेटवर्क तैयार करना है जो पूरब और पश्चिम के ‘वेलनेस’ गुरुओं को एकजुट कर आधुनिक अनुसंधान और प्राचीन ज्ञान के इलाज से रोगों की रोकथाम पर ध्यान दे।
ऐसे देश जहां लंबे समय से पश्चिमी चिकित्सा को ही सबसे अच्छा माना जा रहा है आज वहां भी वैकल्पिक परंपराओं को अपनाया जा रहा है। अमेरिका में ‘डीन आर्निश’ ने जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों से निपटने के लिए उनके नुस्खे लोगों तक पहुंचाए। वे ऐसे पहले शख्स हैं जिन्होंने साक्ष्य आधारित शोध के जरिए सिद्ध किया कि शाकाहार के साथ शरीर और मन में सकारात्मक भावों को जगा कर दिल की बीमारी, टाइप टू डायबिटीज और कुछ तरह के कैंसर को भी शुरुआती दौर में ही ठीक किया जा सकता है। ब्रिटेन के डॉ जॉर्ज लोविथ ने चिकित्सा की मल्टीस्किल तकनीक विकसित करने में मदद की है। आज वे ब्रिटेन में वैकल्पिक चिकित्सा के प्रमुख पैरवीकारों में एक हैं।
वैश्विक स्तर पर वैकल्पिक चिकित्सा को स्वीकार किया जाना इस बात को स्थापित करता है कि स्वास्थ्य का तात्पर्य रोगों से मुक्ति मात्र नहीं, निरोगी काया की रचना करना है। ऐलोपैथी हालांकि तुरंत परिणाम का दावा करती है, पर वह रोगों की जड़ समाप्ति की बात नहीं करती। भारत जैसे विशाल देश में, जहां लगभग सत्तर प्रतिशत जनसंख्या आज भी गांवों में निवास करती है, वैकल्पिक चिकित्सा का ज्ञान, स्वस्थ भारत की पृष्ठभूमि निर्मित कर सकता है और यही कारण है कि 1995 में भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होम्योपैथी विभाग की स्थापना की गई थी। नवंबर 2003 में इसका नाम बदल कर आयुर्वेद, योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी एवं होम्योपैथी (आयुष) विभाग रखा गया। पर जिस गति से इसके प्रचार-प्रसार की आवश्यकता थी वह नहीं हुई।
चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र विशेषकर आयुष शिक्षा में सुधार हो, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ आमजन तक पहुंचाया जा सके। वास्तविकता तो यह है कि बीते दशकों में आयुष चिकित्सा-शिक्षा के पाठ्यक्रम को नवीनीकृत नहीं किया गया। आयुष चिकित्सा शिक्षा प्रणाली के शोध पर न ही कोई ध्यान दिया गया और न ही आयुष चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में बीमारियों से संबंधित किसी भी प्रकार के शोधपूर्ण आंकड़े उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय आयुष के लिए केंद्रीय औषधि नियंत्रक गठित करने की कवायद में है। यह एक महत्त्वपूर्ण इकाई होगी, जो कि विशेष तौर पर आयुष उत्पादों और उनके मानकों पर नजर रखेगी। केंद्र सरकार का यह प्रयास स्वस्थ भारत के निर्माण में तभी महती भूमिका निभाएगा जब ‘स्वास्थ्य शिक्षा’ पर जोर दिया जाएगा। इसलिए माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर ही स्वास्थ्य शिक्षा जैसे विषय को जोड़े जाने की आवश्यकता है। भारत में मुख्यधारा से जुड़ी चिकित्सा प्रणाली मेंढांचागत सुधार सहजता से होना संभव नहीं है। ऐसे में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति स्वस्थ भारत के स्वप्न को साकार करने में यकीनन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। आवश्यकता है अपनी परंपराओं को पहचानने और स्वीकारने की।
भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता :– चिकित्सा विज्ञान सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है जो कि आज बहुत ही चिंताजनक स्थिति में है, इसके गिरते स्तर के कारण हम भारी कीमत चुका रहे हैं। देश के अधिकतर क्षेत्रों में आज ढहते हुए चिकित्सा केन्द्रों में स्वास्थ्य सेवा देने के लिए अच्छे चिकित्सक और उनके सहकर्मी नहीं जाना चाहते हैं।यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की बात की जाए तो शहरी और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में बहुत अंतर पाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्र बहुत दूर-दूर तक भी नहीं पाए जाते हैं। इसके साथ ही आजकल आवश्यकता से अधिक टेस्ट कराये जाते हैं और साथ ही साथ बहुत अधिक दवाइयां भी लिख दी जाती हैं। जब तक रोगी सारे टेस्ट करवाकर लाता है तब तक उसकी बीमारी और भी बढ़ चुकी होती है। साथ ही साथ वह शारीरिक व मानसिक रूप से भी कमज़ोर हो चुका होता है। भोर कमिटी की रिपोर्ट 1946 के आधार पर भारत सरकार ने आज़ादी के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था में तीन स्तरीय चिकित्सा प्रणाली की व्यवस्था की – प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक। इस प्रणाली के कार्यान्वन के लिए हमें पूरी तरह से प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता है जो इन तीनों स्तरों पर कार्य को संभाल सके। लगता है समय के साथ-साथ हम लोग अपने लक्ष्य से कहीं भटक गए। आजकल चिकित्सक ग्रामीण इलाकों में कार्य नहीं करना चाहते हैं। इस गंभीर समस्या के कई कारण हैं, जैसे काफी कम वेतन, अच्छा काम करने वालों को बीच बीच में प्रोत्साहन की कमी, स्थानांतरण की गलत नीतियां, पदोन्नति की कोई पक्की नीति न होना, किसी के भविष्य को सवारने की नीति का पूरी तरह से न होना, किसी का सपॉर्ट न होना। इन सभी समस्याओं को दूर करना भी ज़रूरी है। हालांकि यह समस्या इतनी गंभीर है कि इसे पूरी तरह से दूर करना निकट भविष्य में कठिन है। इन सब कमियों के बावजूद, पिछले 60 वर्षों में शिशु मृत्यु दर को 120 से 70 तक व मातृ मृत्यु दर को 840 से 407 तक नीचे लाया गया है। हालांकि कुछ राज्यों में अच्छा काम भी हुआ है, जैसे केरल और तमिलनाडु में शिशु मृत्यु दर 17 है व उत्तर प्रदेश व बिहार में यह 100 है। आंकड़ों से यह प्रतीत होता है की यह अलग-अलग राज्यों में व्यक्तियों और समुदायों के कार्य का परिणाम है, न कि सरकारी व्यवस्था का। यह हमारी प्रणाली की विफलता है जिसे जल्द से जल्द पहचानना और दूर करना आवश्यक है। नर्सों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में सही योजना का अभाव नज़र आता है – मात्रा और गुणवत्ता दोनों में हमारे देश में डॉक्टर व नर्स का अनुपात है 1:1.35 जबकि विकसित देशों में यह अनुपात 1:3 है। चिकित्सक व जनसंख्या का अनुपात 1:1722 है। ऐसे परिदृश्य में ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी मलिन बस्तियों में रहने वाले अधिकांश लोगों को प्राथमिक माध्यमिक या तृतीयक किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पाती और इस कारण उन्हें स्वैच्छिक एजेंसियों या प्रतिबद्ध गैर सरकारी संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
हमारे मेडिकल कॉलेजों में दिए जा रहे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करने की आवश्यकता है ताकि मेडिकल कॉलेजों के वातावरण को राष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके। स्वास्थ्य पर हो रहे कुल व्यय का 83% निजी क्षेत्र में जा रहा है इसलिए हमारी स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रमुख प्रभाव भी निजी क्षेत्र का ही पड़ता है। निजी क्षेत्र में काम कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों ने अधिक मुनाफा कमाने की चाह में एक ऐसी चिकित्सा व्यवस्था बना दी है जिसमें चिकित्सा के लिए अधिक लागत वाले उपकरण व तकनीकों की आवश्यकता होने लगी है। इसके अतिरिक्त मेडिकल कॉलेजों की एक बहुत बड़ी संख्या छह राज्यों में ही केंद्रित होकर रह गयी है (महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और गुजरात)। इन राज्यों में 63% मेडिकल कॉलेज और कुल सीटों में से 67% सीटें हैं।
मेडिकल काउंसल्स में विरोधाभासी स्थिति :– हमारे देश में दो मुख्य अलग-अलग काउंसल हैं। एक MCI जो ऐलोपथिक चिकित्सा प्रणाली को दिशा-निर्देश देता है, दूसरा CCIM जो भारतीय चिकित्सा प्रणाली के दिशा-निर्देश निर्धारित करता है। इससे हुआ यह कि दो अलग चिकित्सा प्रणाली बन गयी हैं जो अपने अलग तरीके से कार्य करना चाहती हैं। रोगियों की ज़रूरतों को महत्व देते हुए यह दोनों आपस में सामंजस्य नहीं करना चाहतीं। रोगी को स्वास्थ्य लाभ पहुँचाने के लिए एक दूसरे से यह सलाह नहीं करतीं। अपने अलग अभिमान में रहकर यह दोनों काम करती हैं। इसके कारण भोर कमिटी, चोपड़ा कमिटी और दवे कमिटी के सुझावों को भी एक किनारे रख दिया गया है। जब भी कोई चिकित्सा सुधार प्लानिंग होती है, उसमें आधुनिक चिकित्सा सुधार के लिए भारी भरकम बजट रख दिया जाता है पर भारत की अपनी पद्धति आयुर्वेद के शिक्षण स्तर में सुधार के लिए शायद ही कोई ठोस उपाय किया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि आयुष पद्धति के अधिकांश चिकित्सक अब भी ग्रामीण और छोटे शहरी जगहों में कार्य करके लोगों की सेवा कर रहे हैं। ऐलोपैथी शिक्षण में सुधारों के उपाय तो हम मीडिया और अखबारों के माध्यम से जानते रहते हैं। हालांकि आयुष चिकित्सा शिक्षण में सुधार करने के उपाय शायद ही प्रकाश में आते हों।
तुरंत आवश्यक कार्य:-इस निराशाजनक परिदृश्य में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र विशेषकर आयुष शिक्षा में सुधारों की आवश्यकता है जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ जन साधारण तक पहुंचाया जा सके। चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण क्योंकि अंत में उसी को देश की अर्थव्यवस्था में सुधार करना है। यही अच्छी चिकित्सा शिक्षा का लक्ष्य है। इस समय यदि देखा जाए तो देश के कुछ चिकित्सा संस्थानों के अतिरिक्त अन्य सभी में स्वास्थ्य उन्मुख शिक्षा, दिशाहीन, अनियमित और गैर मानकीकृत है। नर्सिंग और पैरा मेडिकल शिक्षण में कार्यरत लोगों की संख्या बढ़ाई जाए। हमारी स्वास्थ्य चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी कमी यह है कि हमारे पास ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले चिकित्सक, नर्स आदि की भारी कमी है। एक एजेंसी की आवश्यकता है जो पूरी स्वास्थ्य प्रणाली के कार्यों पर हर समय नज़र रखे और निजी व सरकारी व्यवस्था का बेहतर उपयोग किया जा सके। अगर मेडिकल कॉलेज सेवा परक शैक्षिक वातावरण न उत्पन्न कर सके तो कुछ समय बाद डॉक्टरों के लिए चिकित्सा मात्र एक व्यवसाय बनकर रह जाएगा जो इसका प्रयोग पैसा व प्रतिष्ठा कमाने के लिए करेंगे, सेवा करने के लिए नहीं। भारतीय चिकित्सा पद्दति को ग्रैजुएट, पोस्ट ग्रैजुएट और शोध के क्षेत्र में दृढ़ किया जाये जिससे हम अपनी हेरिटेज को संभाल सकें। आधुनिक बायो साइंस के क्षेत्र में कार्य करने के लिए दोनों विधियों के ज्ञान को एक साथ लेकर चलना होगा। ऐसे तरीको को बनाना चाहिए जिससे नए शोध कार्य और पुराने ज्ञान से लाभ लेकर विधिवत तरीके से पूरी तरह से प्रशिक्षित चिकित्सकों को ज्ञान दिया जा सके। सच्चाई यह है कि आयुष शिक्षा चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम को वर्षों से नवीनीकृत नहीं किया गया है और न ही पब्लिक हेल्थ की प्लानिंग पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही पाठ्यक्रम में रिसर्च बेस्ड ज्ञान को नए तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जा रहा जिससे युवा इस फील्ड में आने से अब कतरा रहे हैं। मेरा मानना है कि पुराने आयुष पाठ्यक्रम में नए विषय जोड़े जाने चाहिए, जैसे जराचिकित्सा, पब्लिक हेल्थ, आपातकालीन चिकित्सा, खेल चिकित्सा, क्रिटिकल केयर, आघात देखभाल आदि। आयुष चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में बीमारियों से संबंधित किसी भी प्रकार का रिसर्च डेटा नहीं है जिसके आधार पर आयुष मेडिकल छात्र नवीन रिसर्च कर सकें। इसके साथ ही कोई ऐसी स्टडी तकनीक नहीं दी गयी है जिसके आधार पर आयुष स्वास्थ्य कर्मियों को वैज्ञानिक बनने का प्रशिक्षण दिया जा सके ताकि वे समाज की और अधिक सेवा कर सकें। प्राथमिक चिकित्सा देने वाले स्वास्थ्य कर्मियों भले ही वो आयुर्वेद के ही स्नातक हैं उन्हें यदि सही आधार व वातावरण नहीं मिला तो स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम जिस उद्देश्य से प्रारंभ किया गया है वह कभी पूरा नहीं हो पायेगा। ऐसे में मात्र जनरल फिज़िशिअन की ऐसी भीड़ तैयार हो रही है जिसे पूरी तरह से कार्य नहीं आता है फिर भी वह विशेषज्ञों वाला काम करने के लिए विवश है। देश में हो रही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ता चला रहा है क्योंकि बीमारियों का सही इलाज नहीं हो पा रहा है और अलग-अलग पैथियों में दूरी बढ़ती जा रही है। इसलिए चिकित्सा की मेनस्ट्रीम में उन्हें लाना ही होगा। दोनों पैथियों के विचारों का समन्वय होना आवश्यक है। यह कार्य आसान नहीं होगा क्योंकि दोनों ही पद्धति के चिकित्सक अपनी ही विधा को श्रेष्ठ मानते हैं। रोगी के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए दोनों पैथियों का समन्वय आवश्यक है जैसा चीन में होता है। भारत की चिकित्सा प्लानिंग का उद्देश्य यह होना चाहिए कि रोगी को ठीक करना ही है और उसके लिए सभी प्रकार के चिकित्सा शास्त्र के दक्ष चिकित्सकों को साथ लेकर उनके ज्ञान का उपयोग करना है। आयुष चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा से जुड़े चिकित्सकों को अपने साथ एकसाथ लेकर चलने से ही हम अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधार पाएंगे।
जहां एक तरफ देश के ज्यादातर इलाके डॅाक्टरों की भारी कमी से जूझ रहे है वहीं दूसरी तरफ देश के 46 प्रतिशत पंजीकृत डॅाक्टरों को सिर्फ चार राज्यों, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र, में तैनात किया गया है। भारत में इस समय 1681 मरीजों पर सिर्फ 1 डॅाक्टर मौजूद है। डॅाक्टरों की इस कमी के चलते देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है।डॅाक्टरों के इस विषम वितरण के चलते देश के अन्य बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि को कम डॅाक्टरों के साथ गुजारा करना पड़ रहा है। इस वजह से इन राज्यों की स्वास्थ्य सेवाएं भी बाधित हो रहीं हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक देश में इस समय 9.59,198 डॅाक्टर है, जिनमें से 4,36,910 (45.54 प्रतिशत) डॅाक्टर सिर्फ इन चार राज्यों में तैनात हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में इस समय कुल 1,31,554 (13.7 प्रतिशत) डॅाक्टर तैनात है। वहीं देश के उत्तर-पुर्व राज्यों में सिर्फ तीन राज्यों में ही पंजीकृत डॅाक्टर मौजुद है। देश भर में इस समय सबसे ज्यादा मेडिकल कालेजों की संख्या भी कर्नाटक में ही मौजुद है। कर्नाटक में इस समय 50 मेडिकल कालेज जबकि महाराष्ट्र इस मामले में 48 मेडिकल कोलेजों के साथ दुसरे नंबर पर है। लेकिन अगर डॅाक्टरों की तैनाती देखें तो महाराष्ट्र में इस समय सर्वाधिक 1,53,513 डॅाक्टर तैनात हैं, जबकि कर्नाटक इस मामले में देश में तीसरे स्थीन पर है जहां 1,01,273 डॅाक्टर तैनात है। जयपुर के एसएमएस हॅास्पिटल के एसोसिएट प्रोफेसर डॅाक्टर सिंहल ने बताया कि,”देश में इस समय जितने डॅाक्टर मौजुद है, उतने से सिर्फ हमारी न्युनतम जरुरतें ही पूरी हो सकती है। देश के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है।’

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