लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

Posted On by &filed under विविधा.


-अरुण तिवारी-
 hindan
1. संदर्भ: गंगा के प्रवाह में प्रदूषित पानी की आवक औसतन 700 क्युसेक है; जबकि यदि पूरी क्षमता के साथ वर्षा जल संचयन की कोशिश की जाये, तो गंगा में सतत् प्रवाह की मात्रा को 50 हजार क्युसेक तक बढाया जाना संभव है। उक्त तथ्य को आधार बनाकर श्री दीपक सिंघल (प्रधान सचिव – सचिव, सिंचाई एवम् जल संसाधन विभाग, उ. प्र. शासन) ने पंचायत को यह बताने की कोशिश की कि नदियों में ताजे जल की मात्रा बढाना, प्रदूषण का एक कारगर समाधान है। उ. प्र. शासन प्राथमिकता पर यह कार्य करना चाहता है।
निर्णय संख्या-एक: जितना जरूरी और प्रभावी नदियों में ताजे जल की मात्रा बढाना है, उतना ही जरूरी और प्रभावी कदम है, प्रदूषण की रोकथाम और इलाज। अतः उत्तर प्रदेश शासन, तीनों पहलुओं को समान प्राथमिकता देने वाली प्रदेश नदी नीति निर्मित कर तद्नुसार समयबद्ध क्र्रियान्वयन कार्यक्रम बनाये।
नदी में प्रवाह बढाने हेतु निर्णय (संख्या 02 से 06)
2. संदर्भ: किसी भी नदी के तीन क्षेत्र होते हैं: प्रथम – सामान्य दिनों में नदी का पानी जहां तक बहता है; द्वितीय – सामान्य बाढ का पानी जितना क्षेत्रफल घेरता है; तृतीय: पिछले सौ वर्षों के दौरान सर्वाधिक बाढ वाले वर्ष में नदी का पानी जहां तक पहुंचा।
पंचायत के संचालक जलपुरुष श्री राजेन्द्र सिंह ने इन्हे क्रमशः नीले, हरे और लाल क्षेत्र का नाम दिया। श्री सिंह ने पंचायत में उपस्थित उत्तर प्रदेश के लोकनिर्माण विभाग एवम् सिंचाई व जल संसाधन विभाग के माननीय मंत्री (श्री शिवपाल सिंह यादव ) से मांग की, कि वह अधिकारिक तौर पर सुनिश्चित करे कि क्रमशः इन तीनों क्षेत्रों की पहचान तथा चिन्हीकरण कर उसे तद्नुसार अधिसूचित किया जाये। माननीय मंत्री ने पंचायत के समक्ष यह मांग स्वीकार की।
निर्णय संख्या-दो: उत्तर प्रदेश शासन प्रतिनिधि के तौर पर माननीय मंत्री श्री शिवपाल सिंह यादव ने पंचायत के समक्ष नदियांे के नीले, हरे और लाल क्षेत्र की पहचान, चिन्हीकरण और अधिसूचना जारी करने की जो मांग स्वीकारी है, वह इसका क्रियान्वयन एक नीतिगत निर्णय तथा समयबद्ध कार्यक्रम के रूप में कराने का कष्ट करें।
उप निर्णय 2 क: नीतिगत तौर पर किसी भी स्थिति में किसी भी नदी के नीले, हरे तथा लाल क्षेत्र का भू-उपयोग तथा मालिकाना बदलने की अनुमति न हो।
उप निर्णय 2 ख: उत्तर प्रदेश शासन, नदी क्षेत्र के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की प्रत्येक जलसंरचना का सूचीकरण करे; सरकारी रिकाॅर्ड में दर्ज तथा वास्तविक मौजूदा रकबे को सार्वजनिक करे। इस संबंध में अधिसूचना वर्ष तय कर नये सिरे से सभी जलसंरचनाओं का रकबा, नाम, उपयोग तथा उपयोगकर्ता अधिसूचित करे।
ऐसा किए जाने से उत्तर प्रदेश शासन के राजस्व विभाग द्वारा जल संरचनाओं से अतिक्रमण मुक्त करने की बाबत् करीब एक दशक पूर्व जारी अति महत्वपूर्ण व सराहनीय अधिसूचना की अनुपालना करने की प्रभावी पहल संभव हो सकेगी।
उप निर्णय 2 ग: यह काम सबसे पहले, उत्तर प्रदेश की सबसे प्रदूषित तथा प्रवाह खो चुकी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों मंे हो।
उप निर्णय 2 घ: हिण्डन, उत्तर प्रदेश राज्य की सर्वाधिक प्रदूषित नदी है। अत इस काम का शुभारम्भ हिण्डन नदी जलग्रहण क्षेत्र से ही किया जाये।
उप निर्णय 2 ङ: उत्तर प्रदेश शासन-प्रशासन, नदी क्षेत्र तथा अन्य जल संरचनाओं की पहचान तथा चिन्हीकरण के काम को स्थानीय नदी संगठन तथा संबंद्ध ग्राम पंचायतों द्वारा अधिकारिक तौर पर गठित की गई जल समितियों की सहमति तथा सहयोग से करे।
उप निर्णय 2 च: जिन ग्राम पंचायतांे में उत्तर प्रदेश भूजल दिवस-2015 तक जल समिति गठित नहंीं हुई है, वहां अगले सितम्बर, 2015 से पूर्व ऐसा किया जाना सुनिश्चित करें।
3. संदर्भ: उत्तर प्रदेश में वर्षा जल संचयन का सर्वाधिक प्रचलित ढांचा, तालाब ही हैं। उत्तर प्रदेश के ज्यादातर इलाकों की खेती आज भी, नहरों से ज्यादा तालाबों और नलकूपों पर टिकी है। इस महत्व को देखते हुए ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरटी कानून के तहत् उत्तर प्रदेश में तालाब निर्माण के काम को प्राथमिकता पर लिया गया। तालाब बने भी, किंतु इन तालाबों में क्षमता और हुई वर्षा के अनुरूप पानी रुका नहीं। कई जगह तो इन्हे नलकूप से निकाले पानी से भरा गया; जबकि सभी जानते हैं कि ऐसा करने से वर्षाजल संचयन का उनका मूल मकसद कतई पूरा नहीं होता।
जल विशेषज्ञों की राय है कि ज्यादातर मामलों में तालाबों के लिए जगह और डिजायन के चुनाव में हुई गलती मात्र के कारण ऐसा हुआ है। मनरेगा के तहत् बनाये तालाबों मेें चारों तरफ पाल बनाकर पानी आने-जाने के लिए पाइप लगाये जाते हैं। यह कारगर सिद्ध नहीं हुआ। नाकामी की एक वजह, सरकारी तौर पर नवनिर्मित सभी तालाबों के लिए तय यह एकसमान ज्यामिति भी है। इस गलती में मामूली सुधार करते हुए वर्ष 2009 में उत्तर प्रदेश शासन ने आदेश दिया था कि तालाबों में तीन तरफ ही पाल बनाई जाये। तालाबों को  पानी आने की दिशा से खोलकर रखा जाये। किंतु वह आदेश भी ज़मीन पर नहीं उतरा।
निर्णय संख्या-तृतीय: सरकारी बजट से बनने वाली जलसंरचना के लिए जगह तथा डिजायन का चयन स्थानीय जरूरत व भौगालिक परिस्थिति के अनुसार जैसा उचित हो, तय करने का छूट हो।
उप निर्णय 3 क: जलसंरचना के लिए जगह तथा डिजायन का तय करने की निर्णायक शक्ति अधिकार पूरी तरह ग्रामसभा को सौंप दी जाये। ग्राम पंचायत तथा सरकारी तकनीकी तंत्र की भूमिका, इसमें सहयोगी मात्र की हो।
4. संदर्भ: वैश्विक तापमान में वृद्धि ने वाष्पीकरण की गति को तेज किया है। गर्म जलवायु का प्रदेश होने के कारण उत्तर प्रदेश में इसका दुष्प्रभाव ज्यादा है। पिछले डेढ दशक में उत्तर प्रदेश में विभिन्न सङक परियोजनााओं के लिए हुए कटान अलावा बङे पैमाने पर हुए अवैघ कटान ने इस दुष्प्रभाव को और बढाया है।
निर्णय संख्या-चार: नदी के हरे क्षेत्र तथा अन्य सभी सतही जल संरचनाओं की खासकर दक्षिण और पश्चिम दिशा में स्थानीय जैवविविधता व पानी के अनुकूल वनस्पति लगाने और उसे संरक्षित करने का काम समयबद्ध लक्ष्य प्राप्ति तथा क्रियान्वयन व्यवस्था के साथ नियोजित हो।
उप निर्णय 4 क. वाष्पीकरण रोकने के इस काम की सतत् निगरानी व वैज्ञानिक मूल्यांकन हेतु ग्राम जल समिति/मोहल्ला समिति स्तरीय अधिकारिक जवाबदेही तय की जाये।
5. संदर्भ: उत्तर प्रदेश में गंगा, यमुना, गोमती, आमी, सरयू, हिण्डन समेत कई नदियों के किनारे के इलाके उपलब्ध पेयजल की मात्रा और गुणवत्ता में कमी के नये शिकार के रूप में सामने आ रहे हैं। दोहन और संचयन में संतुलन जरूरी है। जलसंचयन के पुराने ढांचों पर बङे पैमाने पर अवैध कब्जा है और नये ढांचों के लिए भूमि की उपलब्धता, एक बङी चुनौती है। श्री दीपक सिंघल जी (प्रधान सचिव सिंचाई एवम् जलसंसाधन विभाग, उ. प्र.)  ने रबर डैम केे जरिये नदी प्रवाह की मात्रा बढाने के विचार को पंचायत में समक्ष रखा। श्री राजेन्द्र सिंह ने कहा कि रबर डैम के सभी पहलुओं को जांचे बगैर वह इसके पक्ष या विपक्ष में कोई राय नहीं दे सकते।
निर्णय संख्या-पांच: पांच में से एक पंच – सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता श्री एस. के. शर्मा मानते हैं कि रबर डैम, चीन समेत दुनिया भर में सफल हुआ है। श्री शर्मा, उत्तर प्रदेश की नदियों में रबर डैम के प्रयोग के पक्ष में हैं। एक अन्य पंच आई आई टी के प्रो. श्री विनोद तारे का स्पष्ट मत है कि शासन, अगले कुछ वर्षों तक रबर डैम जैसे प्रयोगों पर समय व पैसा खर्च न करे। प्रो. तारे समेत शेष चार पंचों की राय यही है कि भारतीय परिस्थिति और आर्थिकी की दृष्टि से प्राकृतिक प्रवाहों, बरसाती नालों तथा पेयजल की दृष्टि से अनुपयोगी हो चुके कुंओं आदि कोे आवश्यक तौर पर वर्षा जल संचयन ढांचों के रूप में तब्दील किया जाना बेहतर विकल्प है। शासन, रबर डैम की तुलना में इस विकल्प को अपनी प्राथमिकता बनाये।
उप निर्णय 5 क: इसके लिए वर्षाजल संचयन क्षेत्रफल में वृद्धि का वर्षवार लक्ष्य तय करके, तद्नुसार कार्यक्रम बनें।
उप निर्णय 5 ख: भूजल संबंधी उत्तर प्रदेश शासनादेश सख्ती से लागू किए जायें।
उप निर्णय 5 ग: किसी भी बसावट का नियोजन करते वक्त अब जिस तरह कुल क्षेत्रफल में से हरित क्षेत्र’ का क्षेत्रफल प्रतिशत तय होता है, उसी तरह ’जल क्षेत्र’ का भी प्रतिशत क्षेत्रफल तय कर इसे आवश्यक बनाया जाये।
उप निर्णय 5 घ: ’जीरो डिस्चार्ज’ का मतलब है कि शोधन पश्चात् नियोजित क्षेत्र से बाहर जाने वाले शोधित प्रवाह की मात्रा शून्य होगी। इसका यह भी मतलब है कि शोधन पश्चात् प्राप्त प्रवाह की 100 फीसदी मात्रा का उपयोग नियोजित क्षेत्र में कर लिया जायेगा। चारदीवारी वाली ऐसी बसावटें तथा औद्योगिक इकाइयां, जिन्होने ’जीरो डिस्चार्ज’ का लक्ष्य नहीं किया है, उनसे ताजे आपूर्ति जल की एवज् में शोधन में आने वाले खर्च से डेढ गुना अधिक कीमत की दर का बिल वसूला जाये। ऐसा करने से वे, उनके स्वयं के द्वारा पैदा किए कचरे का 100 फीसदी शोधन करने को बाध्य होंगे।
उप निर्णय 5 ङ: जो बसावट/उद्योग ’जीरो डिस्चार्ज’ लक्ष्य हासिल कर लें, उसेेे आपूर्ति किए जा रहे ताजे पानी की दर तथा मात्रा… दोनो अन्य बसावटों/उद्योगों की तुलना में एक व्यवहारिक प्रतिशत तक कम कर दी जाये।
दर कम करना, उन्हे जल पुर्नोपयोग के लिए प्रोत्साहित करता रहेगा। शोधन पश्चात् प्राप्त जल के 100 फीसदी पुर्नोपयोग के कारण ताजे पानी की आवश्यकता उन्हे कम होगी। अतः उन्हे कम मात्रा में पानी देने से हुई पानी की बचत अंततः नदी को उसके हिस्से का पानी देने में मददगार होगी।
उप निर्णय 5 च: मलशोधन संत्रंयों के निर्माण के लिए लिए शासन, स्थानीय निकायों को अनुदान देने की बजाय, कर्ज दे। जिसका भुगतान सुनिश्चित करने के लिएशासन, स्थानीय निकाय के साथ करार करे कि गुणवत्ता स्तर पर खरा पाये जाने पर शासन,  शोधित किए गये जल को तय मूल्य पर खरीद लेगा।
6. संदर्भ: प्रदेश की कई नदी पुनर्जीवन परियोजनाओं में नदियों के तल को मशीन के जरिये छील कर गहरा तथा ढलवा किया गया है। तल, समतल होने के कारण नदी, नदी नहीं रही। उसका तल प्राकृतिक न होकर, मानव निर्मित नाले की भांति हो गया है। जिला-अमेठी की मालती नदी, इसका एक छोटा सा उदाहरण है। मालती नदी जलग्रहण क्षेत्र में इसके दुष्परिणाम कई रूप मंे सामने आये हैं: नदी में पानी ज्यादा दिन तक रुकता नहीं। नदी किनारे का भूजल उतर गया है। गाद के नाम पर कई जगह, नदी की रेत हटा दी गई है। इससे जल को संजोकर रखने और सांस लेने की नदी की क्षमता कम हो गई है। खुदाई प्रक्रिया के कारण, नदी के मोङों पर मौजूद 10 फुट तक गहरे कुण्ड खत्म हो गये हैं। कुण्डों और ऊबङ-खाबङ तल के खत्म होने से फरवरी आते-आते नदी की सतह पर पानी नहीं रहता। लिहाजा, नदी किनारे की हरियाली लुट गई है। वन्यजीवों के बसेरे खत्म हो रहे हैं। गर्मियों में खासकर, जंगली जीवों के लिए पेयजल का संकट उत्पन्न हो गया है। परिणामस्वरूप, नीलगाय, नलकूप की टंकियों और खेतों तक आने लगे हैं तथा अन्य वन्यजीव गांवों तक। नदी का ऊबङ-खाबङ तल ही नदी के प्रवाह को टकराने का मौका देता है। यह टकराहट, नदी में आॅक्सीकरण की प्रक्रिया को सतत् सक्रिय
रखती है। इस सक्रियता के कारण, नदी के जल में आॅक्सीजन की मात्रा अधिकतम बनाये रखने में मदद मिलती है। जब इसकी ओर प्रशासन का ध्यान खींचा गया तो मालती नदी में स्थान-स्थान पर दो-दो मीटर ऊंचे स्टाॅप डैम बनाने के टेंडर कर दिए गये। यह दोहरा नुकसान और दोहरा खर्च है।
निर्णय संख्या-छह: गाद निकासी कहां हो, कहां न हो; इसकी अनुमति नदी तल की भू-संरचना पर निर्भर करती है। अतः हिण्डन-यमुना-गंगा नदी पंचायत के पांचों पंच मानते हैं कि नदी भूतल के कटावों के वैज्ञानिक आधार के अनुरूप ही गाद निकासी की अनुमति दी जाये।
उप निर्णय 6 क: जिस नदी में गाद निकासी अनुकूल हो, वहां भी गाद निकासी एक समान न करके एक लहर की माफिक समान अंतराल के बाद ऊंची-नीची हो।
उप निर्णय 6 ख: नदी प्रवाह मार्ग के मोङों से पहले छोटे-छोटे कुण्डों की खुदाई बहुदेश्शीय महत्व का काम है। अत्यंत छोटी और मौसमी हो चुकी नदियों में कुण्ड निर्माण का काम प्राथमिकता पर किया जाये। यह प्रत्येक छोटी नदी में किया जा सकता है। इसके लिए किसी अध्ययन की आवश्यकता नहीं। इसे मनरेगा के तहत् प्रदेश स्तर पर बनी योजनाओं में एक विशेष योजना के रुप में जोङा जाये।
प्रदूषण निवारण हेतु संदर्भ सहित निर्णय ( संख्या 07 से 11)
7. संदर्भ: गंगा की निर्मलता का लक्ष्य हासिल न हो पाने के पीछे प्रवाह मार्ग मंे बाधा, नहरी सिंचाई हेतु अधिकतम जल का वितरण, खनन, गंगा भूमि पर अतिक्रमण के अलावा एक अन्य महत्वपूर्ण कारण भी हैं। वह कारण, यह है कि गंगा कार्य योजना से लेकर ’नमामि गंगे’ तक सारा बजट और सारा जोर, नदी में मिलने वाले प्रदूषण के शोधन पर है; प्रदूषण न्यूनतम हो, यह अभी तक सरकार की प्राथमिकता बनी ही नहीं। कचरा, कैंसर की तरह होता है। जिस तरह कैंसर का इलाज, उसके स्त्रोत पर किया जाता है, ठीक उसी तरह कचरे का निष्पादन भी स्त्रोत पर किया जाना चाहिए। ऐसा नहीं हो रहा। पाइप लाइनों के द्वारा कचरे को नदी के किनारे ढोकर ले जाने का चलन जारी है।
 शहरी मल और औद्योगिक अवजल, प्रदूषण के निस्संदेह के बङे स्त्रोत हैं; किंतु कृषि रसायन, कीटनाशक,  पाॅली कचरा, ई कचरा तथा धार्मिक तथा अन्य ठोस कचरों से नदी को मिल रही चुनौतियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। नदी प्रदूषण मुक्ति की कोई भी योजना बनाते वक्त, भविष्य में नदी विशेष के किनारे बढने वाली आबादी, मल, अवजल और ठोस कचरे का आकलन किया जाना जरूरी होता है। यह नहीं किया गया। यह तब तक संभव भी नहीं है, जब तक कि नदी किनारे के क्षेत्रों को लेकर अगले 25-50 वर्षों का मास्टर प्लान न बना लिया जाये।
प्रदूषण नियंत्रण हेतु केन्द्रीय तथा राज्य स्तरीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से अपेक्षा की जाती है। सच यह है कि ये बोर्ड महज् प्रदूषण संबंधी शोध, जानकारी, मार्गदर्शी निर्देश तथा ’प्रदूषण नियंत्रण मंे है’ का प्रमाणपत्र जारी करने वाला तंत्र बनकर रह गये हैं। लोगों को पता नहीं है कि उनकी नदी को कौन प्रदूषित कर रहा है।
निर्णय संख्या-सात: सभी प्रदूषकों की सूची बनें और प्रदूषण निवारण हेतु कदम उठाये जायंे।
उप निर्णय 7 क: नदी मंे प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए जरूरी है कि नदी से मिलने वाले नालों के पानी की गुणवत्ता नियमित रूप से जांची और सार्वजनिक की जाये।
उप निर्णय 7 ख: सीवेज तथा उद्योग, तरल कचरे के मुख्य दो स्त्रोत हैं। उद्योगों तथा मल शोधन संयंत्रों के लिए जरूरी हो कि वे संयंत्र के बाहर एक बङे बोर्ड पर निम्न तथ्यों की दैनिक रिपोर्ट सार्वजनिक करें: संयंत्र द्वारा उपयोग किया गया ताजा पानी, संयंत्र द्वारा मल/अवजल शोधन के पश्चात् अलग हुए पानी तथा ठोस कचरे की अलग-अलग मात्रा, पुर्नोपयोग किए गये शोधित जल की कुल मात्रा तथा शोधन पूर्व व पश्चात् प्राप्त जल/अवजल की जैविक तथा रासायनिक रिपोर्ट।
उप निर्णय 7 ग: इस रिपोर्ट का 15 दिन में एक बार शासकीय अथवा प्रमाणिक प्रयोगशाला से प्रमाणित होना जरूरी हो।
उप निर्णय 7 घ: नदी के समानान्तर एक इंटरसेप्टर बनाकर, संबंधित शहर के सभी नालों को जोङने तथा तत्पश्चात् नदी किनारे किसी एक स्थान पर शोधन संयंत्र लगाने की योजना से श्री एस. के शर्मा सहमत हैं। किंतु शेष चार पंच मानते हैं कि तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से यह योजना सर्वश्रेष्ठ विकल्प नहीं है।
उप निर्णय 7 ङ: पंचों की सर्वसम्मत राय है कि कचरे को उसके स्त्रोत से जितना करीब निष्पादित किया जाये, उतना श्रेयस्कर है। ऐसा करने से शोधन प्रणाली पर नियंत्रण, निगरानी तथा सफलता अधिकतम होगी तथा असफल होने पर दुष्प्रभाव सीमित। अतः पंचों की इस राय को एक सिद्धांत की तरह अपनाया जाये।
उप निर्णय 7 च: मल/अवजल के पश्चात् प्राप्त पानी की प्राथमिकता निम्नलिखित क्रमानुसार न सिर्फ तय की जाये, बल्कि सुनिश्चित किया जाये कि व्यवहार में भी ऐसा हो:
पहली प्राथमिकता – जिस स्त्रोत के जिस कार्य के परिणामस्वरूप मल/अवजल उत्पन्न किया गया हो, शोधन पश्चात् उसे सर्वप्रथम उसी स्त्रोत द्वारा उसी कार्य में पुर्नोपयोग में लाया जाये।
दूसरी प्राथमिकता – खेती तथा बागवानी में।
तीसरी प्राथमिकता – स्थानीय तालाबों में।
चैथी प्राथमिकता – स्थानीय गैर बरसाती नालों में।
अंतिम प्राथमिकता – स्थानीय नहर में।
उप निर्णय 7 छ: ठोस कचरा, किसी भी हालत में निर्णय संख्या दो में उल्लिखित नदी के तीनो क्षेत्रों मंे न डाला जाये।
उप निर्णय 7 ज: नदियां, ’डंप एरिया’ में तब्दील न हों, इसके लिए सभी नगरीय बसावटों में भराव क्षेत्रों और कचरा निष्पादन क्षेत्रों के चिन्हीकरण तथा अधिसूचित करने का काम प्राथमिकता पर हो।
उप निर्णय 7 झ: नदी मंे किसी भी तरह का कचरा डालने वाले पर बिना अनुमति प्रथम सूचना प्राथमिकी दर्ज करने तथा राष्ट्रीय हरित पंचाट द्वारा यमुना नदी के मामले में दिए आदेशों के आलोक मंे उत्तर प्रदेश की अन्य नदियों के मामले में भी आर्थिक दण्ड व कारावास का प्रावधान हो।
निर्णय 7 ´: शासन-प्रशासन सुनिश्चित करे कि नदी के लाल क्षेत्र के तुरंत बाद बसाई जाने वाली बसावटें पूर्णतया नियोजित हों तथा अनियोजित बसावटों पर रोक लगे।
7 ट: पंचों की राय है कि ’जीरो डिस्चार्ज’ सुनिश्चित करने की शर्त के साथ ही नवीन नियोजित बसावटों को मंजूरी दी जाये।
7 ठ: मूर्ति निर्माण, विसर्जन को लेकर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा कई मार्गदर्शी निर्देश दिए गये हैं। धार्मिक कार्यों में प्रयोग की जाने वाली सामग्री को यमुना मंे न फेंके जाने को लेकर राष्ट्रीय हरित पंचाट का भी एक आदेश है। इनकी पालना सुनिश्चित करने की जवाबदेही, सीधे-सीधे नदी किनारे के स्थित तीर्थ स्थानों/शवदाह गृहों के प्रबंधन की हो। स्थानीय प्रशासन इसमें सहयोगी और निगरानीकर्ता की भूमिका निभाये।
7 ड: उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने यमुना और गंगा में मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाई है। इस न्यायिक रोक के आलोक में प्रदेश की सभी नदियों में मूर्ति विसर्जन प्रतिबंधित हो। शासन इस बाबत् अधिसूचना जारी करे।
8. संदर्भ: हिण्डन, उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक प्रदूषित और भारत की दूसरी सर्वाधिक प्रदूषित नदी है। हिण्डन, यमुना में मिलती है और यमुना, गंगा में। स्पष्ट है कि हिण्डन की निर्मलता और प्रवाह सुनिश्चित किए बगैर ’नमामि गंगे’ की सफलता तथा गंगा की निर्मलता व प्रवाह सुनिश्चित करना असंभव है।  हिण्डन का प्रवाह और निर्मलता, इसकी सहायक काली, कृष्णी, धमोला, पांवधोई आदि धाराओं तथा जलग्रहण क्षेत्र में मौजद बरसाती नालों व जल संचयन संरचनाओं पर निर्भर है। पंचायत में प्रस्तुत एक रिपोर्ट के मुताबिक, सहारनपुर से नोएडा के बीच लिए गये पानी के नमूनों में मात्र एक भनेङा गांव का नमूना ही मानकों पर खरा पाया गया; शेष सभी नमूने फेल हुए। इसकी प्रमाणिकता इस तथ्य से भी है कि जितनी खतरनाक और बङी संख्या में हिंण्डन नदी तंत्र में रहने वाला जन-जीवन जलजनित बीमारियों का शिकार हो रहा है, उत्तर प्रदेश सीमा के किसी और नदी तंत्र में नहीं। उक्त दोनो पहलू स्पष्ट करते हैं  कि हिण्डन की उपेक्षा करना, गंगा-यमुना के साथ-साथ विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भूजल, खेती, कृषि उत्पादों की गुणवत्ता, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिकी के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो रहा है। इसका असर अंततः पूरे उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सेहत और आर्थिकी पर पङने वाला है।
निर्णय संख्या आठ: गंगा को पानी देने वाली उत्तर प्रदेश की सभी प्रांतीय नदियों में हिण्डन को सर्वाधिक प्राथमिकता दी जाये। इसमें मिलने वाली सभी सहायक
नदियों तथा बरसाती नालों को निर्मल तथा वर्षा जल से प्रवाहमान बनाने का काम प्राथमिकता पर हो।
उप निर्णय 8 अ: हिण्डन जलग्रहण क्षेत्र की सभी नदियांे का उद्गम तालाबों से हुआ है। स्पष्ट है कि हिण्डन को प्रवाहमान बनाने के लिए इसके जलग्रहण क्षेत्र की जलसंरचनाओं को संरक्षित और समृद्ध करना अत्यंत आवश्यक है।
9. संदर्भ: स्वयंसेवी समाज द्वारा भारत में नदी निर्मलता प्रयास की आयु कई दशक हो चुकी है। अनुभव यह है कि एक-दूसरे के दोषारोपण मात्र से समाधान सधेगा नहीं। इसके लिए ईमानदार साझा और आपसी सहयोग जरूरी है। प्रशासन और पब्लिक के साझे से समाधान के रूप में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर नगर से गुजरने वाली पांवधोई नदी का उदाहरण हमारे सामने है। जलबिरादरी की स्थानीय इकाई की पहल पर तत्कालीन जिलाधिकारी श्री आलोक कुमार व स्थानीय नागरिकों द्वारा पेश सफलता प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो बिना अतिरिक्त धन या परियोजना के कचरा मुक्ति संभव है।
गौर करें कि पांवधोई  के इस उदाहरण से प्रेरित होकर तत्कालीन उत्तर प्रदेश शासन ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें उत्तर प्रदेश के कई जिलों का उल्लेख करते हुए यह अपेक्षा की गई थी कि सहारनपुर प्रशासन-पब्लिक के साझे की सफलता अन्य जिलों में भी दोहराई जायेगी। किंतु यह हो न सका।
हिण्डन-यमुना-गंगा पंचायत के आयोजक ’जल-जन जोङो अभियान के संचालक श्री राजेन्द्र सिंह, अन्य विशेषज्ञों, जमीनी हकीकत से रुबरु प्रतिभागियों तथा सभा में उपस्थित शासन-प्रशासन प्रतिनिनिधियों ने संकेत दिया कि वे पांवधोई के प्रयोग को ज्यादा विस्तार और विविधता के साथ हिण्डन नदी में दोहराने के इच्छुक हैं।
निर्णय संख्या 9: सभा द्वारा शासन-प्रशासन-पब्लिक के साझे से हिण्डन निर्मलीकरण के लक्ष्य को अंजाम देने की दर्शाई गई इच्छा का सभी पंच स्वागत करते हैं। पंचों की राय में इसके नियोजन, संचालन, क्रियान्वयन, निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु एक साझा-सक्रिय औपचारिक तंत्र विकसित करन आवश्यक है।
10. संदर्भ: किसी भी नदी की निर्मल कथा टुकङे-टुकङे में लिखी तो जा सकती है, किंतु सोची नहीं जा सकती। हिण्डन नदी निर्मलीकरण को भी समग्र सोच व समग्र प्रयासों की आवश्यकता है। इसे इस तरह अंजाम दिया जाना चाहिए ताकि यह उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की दूसरे प्रांतों के लिए सीखने योग्य एक सबक बन सके।
निर्णय संख्या दस : हिण्डन निर्मलीकरण हेतु चार स्तरीय व्यवस्था ढांचा बनाया जाये: हिण्डन जलग्रहण क्षेत्र स्तरीय, जिला स्तरीय, तहसील स्तरीय तथा तहसील के भीतर जलसंरचना स्तरीय।
हिण्डन जलग्रहण क्षेत्र स्तरीय व्यवस्था
उप निर्णय 10 क: हिण्डन नदी जलग्रहण क्षेत्र स्तरीय व्यवस्था, एक सशक्त-सक्षम-मार्गदर्शी किंतु जवाबदेह व्यवस्था हो। यह मार्गदर्शी व्यवस्था, नीतिगत् निर्णयों, मार्गदर्शी निर्देशों को तय करने, उनकी पालना तथा वित्तीय व्यवस्था के लिए सक्षम तथा जवाबदेह हो।
उप निर्णय 10 ख: निर्मल हिण्डन मार्गदर्शी व्यवस्था में शामिल किए जाने वाले प्रतिनिधि: केन्द्रीय वन एवम् पर्यावरण मंत्रालय का एक प्रतिनिधि, केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरोद्धार मंत्रालय का एक प्रतिनिधि, उत्तर प्रदेश राज्य सिंचाई एवम्् जल संसाधन विभाग के राज्य स्तरीय दो प्रतिनिधि, हिण्डन जल ग्रहण क्षेत्र के सभी मण्डलायुक्त, प्रत्येक मण्डल स्तर से एक-एक तकनीकी प्रतिनिधि, हिण्डन जलग्रहण क्षेत्र के सभी सांसद, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का एक प्रतिनिधि, प्रमुख स्थानीय औद्योगिक परिसंघ के तीन प्रतिनिधि, आई आई टी, रूङकी का एक प्रतिनिधि, नेशनल इंस्टीट्युट आॅफ हाइड्रोलाॅजी का एक वैज्ञानिक प्रतिनिधि,
सेंट्रल पेपर एण्ड पल्प रिसर्च इंस्टीट्युट का एक वैज्ञानिक प्रतिनिधि, चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (मेरठ) का एक प्रशासनिक प्रतिनिधि, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण से सेवानिवृत एक न्यायिक सदस्य, वित्त नियोजन एवम् लेखा निगरानी समीक्षा हेतु विशेषज्ञ, एक विद्वान नगर नियोजक, इंडिया वाटर पार्टनरशिप और हिण्डन जलबिरादरी जैसे स्थानीय समझ तथा जन-अभियान संचालन के अनुभवी दो विशेषज्ञ स्वयंसेवी संगठनों के एक-एक प्रतिनिधि, हिण्डन जलग्रहण क्षेत्र में पूरी तरह प्रभावी प्रमुख मीडिया समूह का प्रशासनिक प्रमुख, नदी-भूजल-कृषि-समाज मसलों पर पश्चिम उत्तर प्रदेश क्षेत्र विशेष में व्यावहारिक अनुभव व ज्ञान रखने वाले क्रमशः तीन-तीन विशेषज्ञ।
उप निर्णय 10 ग: उक्त मार्गदर्शी व्यवस्था के संचालन हेतु मार्गदर्शी व्यवस्था स्तर पर अगले दस वर्षो के लिए पूर्णकालिक ’हिंण्डन निर्मलीकरण मिशन’ की स्थापना की जाये। यह मिशन, मार्गदर्शी व्यवस्था के दायित्वों के क्रियान्वयन हेतु समन्वय के अलावा वित्तीय आवंटन, अंकेक्षण, कार्य की निगरानी तथा परिणाम मूल्याकंन के लिए जवाबदेह होगी।
उप निर्णय 10 घ: मिशन द्वारा वित्तीय आवंटन, सीधे तहसील तथा जलसंरचना स्तरीय नोडल एजेंसी को किया जाये। उनका वित्तीय लेखा-जोखा भी सीधे इसी स्तर से लिया जाये। यदि सांसद निधि, नगरपालिका/जिला पंचायत निधि, मनरेगा आदि से वित्तीय व्यवस्था की जानी हो, तो भी वित्त आवंटन में उक्त प्रक्रिया अपनाई जाये। इससे वित्तीय आवंटन में भ्रष्टाचार तथा देरी से निजता मिलेगी।
जिला/तहसील/जलसंरचना स्तरीय व्यवस्था
निर्णय संख्या 11:  नियोजन का कार्य, जिला स्तर पर न किया जाये। जिला स्तरीय तंत्र की जवाबदेही सबंधित व्यवस्थाओं के बीच मार्गदर्शी निर्देशों के प्रचार-प्रसार, समन्वय, कार्य प्रगति, निगरानी, सामाजिक अंकेक्षण तथा परिणाम मूल्यांकन रिपोतार्ज का लेन-देन, तथा विवाद की स्थिति मे वैधानिक समाधान सुनिश्चित करने की हो।
उप निर्णय 11 क: जिला स्तरीय व्यवस्था, जिलाधिकारी की नेतृत्व में संचालित हो। जिलाधिकारी सुनिश्चित करें कि जिला स्तरीय नगर/ग्राम विकास एजेंसी, जिला उद्योग केन्द्र, जिला प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला पंचायत/नगर निगम/नगरपालिका, सूचना एवम् जनसम्पर्क विभाग, जल निगम, पुलिस विभाग, कृषि विभाग, बागवानी मिशन, पशु पालन विभाग, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, वन विभाग, सिंचाई एवम् जल संसाधन विभाग तथा जिला कृषि विज्ञान केन्द्र…… तहसील व जलसंरचना स्तर पर हिण्डन निर्मलीकरण हेतु बनी योजनाओं के क्रियान्वयन मे पूरी तरह सहभागी व जवाबदेह भूमिका निभायें।
उप निर्णय 11 ख –  हिण्डन निर्मलीकरण हेतु निर्णय संख्या 10 क में सुझाये मार्गदर्शी ढांचे के मार्गदर्शी निर्देशों के अनुसार, क्रियान्वयन, नियोजन, निगरानी तथा मूल्यांकन हेतु ब्लाॅक तथा जलसंरचना स्तर पर कार्यबलों का गठन किया जाये। इन कार्यबलों के कार्यक्षेत्र, कर्तव्य, अधिकार तथा इसके लिए प्रशिक्षण व जवाबदेही सुनिश्चित हो।
11 ग: तहसील और तहसील स्तरीय कार्यबल में शामिल किए जाने वाले सदस्य: उपजिलाधिकारी, ब्लाॅक प्रमुख/महापौर, ब्लाॅक विकास अधिकारी, पुलिस अधिकारी, निर्णय संख्या 10 घ में सुझाये जिला स्तरीय विभागों के तहसील स्तरीय निर्णायक अधिकारी, स्थानीय तीर्थ तथा शवदाह गृहों के प्रमुख, दो जन-अभियान विशेषज्ञ, एक विधि विशेषज्ञ , हिण्डन किनारे के न्यनूतम दो और अधिकतम पांच प्रमुख उद्योगों के एक-एक प्रतिनिधि, दो स्थानीय ब्यूरो प्रमुख, नदी-भूजल-कृषि-समाज-सूचनाधिकार व न्यायिक प्रक्रिया मसलों पर उसी जिला विशेष में व्यावहारिक कार्यानुभव रखने वाले क्रमशः दो-दो गैर सरकारी प्रतिनिधि। तहसील स्तर पर स्कूल तथा काॅलेज स्तर पर जागृति तथा क्रियान्वयन हेतु युवा टोलियां तैयार करने के लिए क्रमशः दो-दो संस्थानों को नोडल स्कूल/काॅलेज बनाकर तहसील स्तरीय कार्यबल में शामिल किया जाये।
11 घ: चैथा कार्यबल, तहसील में मौजूद विशाल तालाब/झील, नाले तथा नदी के स्तर पर बने। यह कार्यबल, मार्गदर्शी निर्देशों के आलोक में जल इकाई के स्तर पर योजना, क्रियान्वयन, निगरानी तथा स्वैच्छिक मूल्यांकन हेतु उत्तरदायी हो। जलसरंचना स्तरीय कार्यबल, उपजिलाधिकारी की निगरानी में संचालित तथा गठित हों। जलसंरचना स्तरीय कार्यबल का ढांचा… सतत् सक्रियता, जवाबदेही तथा स्थानीय सहभागिता सुनिश्चित करने वाला हो। यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यकतानुसार कानूनगो, अन्य अधिकारी तथा ग्रामस्तरीय विविध वर्गों को जोङा जाये, किंतु नेतृत्व पूरी तरह गैर सरकारी हाथों में हो। जलसंरचना स्तरीय कार्यबलों को सक्रिय बनाने में स्थानीय स्कूल/काॅलेजों के भूगोल विभाग, पर्यावरण विभाग, शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय सेवा योजना, एन.सी.सी तथा नेहरु युवक केन्द्र के मौजूदा ढांचे के उपयोगी आर्थिक व मानव संसाधन का उपयोग सुनिश्चित किया जाये।
11 ङ: तहसील स्तर पर जवाबदेही और सक्रियता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है, इस स्तर पर साप्ताहिक अंतराल स्तर पर समन्वय करने वाला समूह बनाया जाये। सुनिश्चित हो कि वह समूह, सप्ताह का एक कार्यदिवस, पूरी तरह हिण्डन निर्मलीकरण मिशन के कार्यालयी तथा नदी/समाज/जलसंरचना स्तरीय इकाई के पास जाकर करने लायक कार्यों में लगायेगा।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz