लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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मैने हमेशा धार्मिक अंधविश्वासों का विरोध किया है चाहें वो किसी भी समुदाय से जुड़े हों। हिन्दू धर्म की बात करें तो मुख्य रूप से दो तरह के भक्त होते हैं पहले मूर्ति पूजक और दूसरे गुरु पूजक। गुरु पूजक मे भी मोटे तौर पर दो श्रेणियां होती हैं।–

1. ये गुरु आध्यात्म का ज्ञान बांटते हैं और देवी देवताओं की पूजा करवाते है, साथ साथ भक्त गुरुपूजा भी करने लगते हैं।

radha2. इस श्रेणी मे वो गुरु आते हैं जो अपना समुदाय, एक कारपोरेट की तरह चलाते हैं, भक्त उन्हें  ही भगवान समझने लगते हैं।

पुराने ज़माने की बात मुझे नहीं मालुम, पर आज ये गुरु समाज का जितना हित कर रहे हैं, उससे कहीं ज़्यादा अहित हो रहा है।आज मै एक विशेष समुदाय की बात करूंगी, जिसके बारे मे बहुत ज़्यादा लोग नहीं जानते क्योंकि ये मीडिया और राजनीति से ये दूर रहते हैं। राधास्वामी सतसंग के तीन स्वतन्त्र केंद्र है, एक ब्यास, दूसरा स्वामीबाग(आगरा) और तीसरा दयालबाग़ ( आगरा)।

मेरे परिवार के बहुत से सदस्य और जान पहचान के लोग राधास्वामी सतसंग दयालबाग़ से जुड़े है, इसलियें मै यहां की अच्छाइयों और बुराइयों को समझती हूं, मै ख़ुद उनसे कभी नहीं जुड़ी इसलिये मेरा आकलन वस्तुनिष्ठ और पूर्वाग्रहों से मुक्त होने की आशा की जा सकती है।

दयालबाग़ राधास्वामी सतसंग एक बहुत पुरानी संस्था है, जहां के आध्यात्मिक गुरु का  दर्जा सबसे बड़ा होता है।एक राजा के मंत्रिमंडल की तरह यहां की सभा के सदस्य काम करते है। वहां आध्यात्म के अलावा, कृषि मे और अन्य महत्वपूर्ण कामो मे  श्रमदान किया जाता है, जिसे ‘सेवा’ कहा जाता है। बहुत से शैक्षक संस्थान  भी यहां कार्यरत है। अनुयायियों के बच्चों की शादी तय कराने के लिये मैरिज ब्यूरों हैं, समूह विवाह कराये जाते हैं बिना दहेज़ के, ऐसे ही और काम भी कराये जाते है जो प्रशंसनीय हैं। आज इन कामो के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं का ज़िक्र न करके मै सीधे अपने शीर्षक ये कैसी अर्ज़ है! पर आती हूं।

यहां के गुरु का दर्जा ईश्वर के समान है। पहले लोग इन्हे ‘हुज़ूर कहकर संबोधित करते थे, अब एक क़दम और आगे बढ़कर ‘मालिक कहने लगे हैं।जब भक्त खेतों पर काम करते हैं, वहां ‘मालिक एक दरबार लगाते हैं। भक्त अपनी व्यक्तिगत समस्यायें लेकर इस दरबार मे अर्ज़ करने आते हैं। समस्याओं का वर्गीकरण करके उन्हे अलग अलग समूहों मे रखा जाता है। एक एक करके लोग ‘मालिक से अपनी समस्याओं का समाधान पाते है और उनके दिशानिर्देश का पालन करते है।भक्तों के मन मे यह भावना रहती है कि एक बार पूछा है, तो उनकी बात मानन ज़रूरी है, नहीं तो अनर्थ हो सकता है।

अनुयायियों की समस्याये किसी भी प्रकार की हो सकती हैं जैसे बच्चो की शिक्षा से संबधित, उनके विवाह से संबधित, पति पत्नी के बीच तनाव से संबधित या निवेश और प्रौपर्टी से संबंधित। सबसे ज़्यादा लोग चिकित्सा से संबधित समस्यायें लेकर आते है। यहां एक ही आदमी, [क्षमा करें गुरु] जो न मनोवैज्ञानिक है न, शिक्षाविद न वित्तीय और प्रोपर्टी के मामलों का वकील और न ही डाक्टर वो सबकी समस्याओं का समाधान पाने के लियें रास्ते सुझा देता है।

भक्त गुरु के सामने निरीह अवस्था मे खड़े होकर उनके सुझावों को मानते ही नहीं प्रसाद की तरह सिर माथे लगाते है।किसी से राय लेना ग़लत नहीं है पर उस राय को भक्ति से जोड़कर निर्णयात्मक बना लेना ग़लत है।  पहले भक्त इस तरह ‘अर्ज कम करते थे, अब बहुत करने लगे हैं।  विश्वास अंधविश्वास  मे बदलने लगा है। हर छोटी बड़ी बात के लियें अर्ज़ करने से लोगों के निर्णय लेने की क्षमता समाप्त होती जा  रही हैं। ज़रा सी भी दुविधा हुई तो सीधे अर्ज़ करने पहुच जाते हैं, जिसके दुष्परिणाम समने आने लगे हैं।

गुरु थोड़ी सी बात सुनकर तुरन्त रास्ते सुझा देते हैं, इससे सबसे अधिक नुकसान होने की आशंका चिकित्सा के क्षेत्र मे दी गई सलाहों की वजह से हो रही हैं, पर भक्त ये बात समझने को तैयार नहीं होते। अपनी बात स्पष्ट करने के लियें कुछ केस स्टडीज़ प्रस्तुत कर रही हू, केवल नाम बदले हैं घटनायें सच और आंखों देखी हैं।

केस स्टडी-1

श्री अरविंद कुमार 77 वर्ष की आयु मे क़रीब 5 साल पहले लधुशंका की कठिनाई से जूझ रहे थे जांच से पता चला कि उन्हे prostate का cancer है। सबसे पहले biopsy  कराने की सलाह दी गई। श्री अरविंद कुमार  की भक्ति चरम सीमा पर थी परिवार के सभी सदस्य गुरुभक्त थे तो अर्ज़ करने पंहुच गये।उनके मालिक ने होम्योपैथिक इलाज की सलाह दी, साथ ही अपने संप्रदाय के एक डाक्टर(निश्चय ही वो oncologist नहीं थे)को उनकी देखे रेख की ज़िम्मेदारी दे दी गई।श्री अरविंद कुमार  का पुत्र भी डाक्टर है पर उनके आदेश का विरोध नहीं कर सका क्योंकि वह भी गुरुभक्त है।जांच होती तो पहले गुरु महाराज report देखते। ऐसे ही एक साल बीत गया। एक छोटा सा operation हुआ,गुरुजी की सहमति के बाद, पर  कुछ दिन बाद बीमारी ने उग्र रूप ले लिया,तब गुरु जी ने कहा कैमोथैरैपी करवालो, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

श्री अरविंद कुमार  संपन्न परिवार से थे शुरू से अपना इलाज विशेषज्ञों से करवाते तो कुछ वर्ष और जी सकते थे, ठीक भी हो सकते थे, कम से कम उनका कष्ट कम हो जाता।

परिवार अभी भी गुरु पर उतनी ही श्रद्धा  और विश्वास करता है।

केस स्टडी-2

श्रीमती दिशा आयु 73 वर्ष। क़रीब 2 साल पहले शंका जताई गई थी कि इन्हे  गर्भाशय का cancer है biopsy से उसकी पुष्टि हो सकती थी और तुरन्त गर्भाशय निकालकर  अगला इलाज हो सकता था, पर ये लोग भी अपने गुरुजी के पास अर्ज़ लेकर पंहुच गये।उन्होने किसी भी प्रकार की शल्य चिकित्सा करवाने से मना कर दिया और वही होम्योपैथिक इलाज करवाने को कहा। होम्योपैथ भी अपने समुदाय से ढूंढ लिये गये। दो वर्ष तक रक्त स्त्राव होता रहा एक बार अस्पताल पंहुच कर वापिस आगये क्योंकि  गुरुमहाराज शल्य चिकित्सा की इजाज़त नहीं दे रहे थे।बीमारी बढ़ती रही फिर गुरुजी ने कहा दिल्ली मे एम्स मे दिखालो। वहां तुरन्त गर्भाशय निकाला गया।बेवजह दो ढ़ाई वर्ष आध्यात्मिक गुरु की सलाह पर इलाज मे देरी की गई।

केस स्टडी –3

श्री सुरजीत कुमार आयु 75 वर्ष । लगभग 3 साल पहले मूत्र मे रक्त आने के बाद जांच कराने पर पता चला कि उनके मूत्राशय मे  है malignant tumour यानि cancer है।ये भी गुरु जी के पास गये और इन्हे भी होम्योपैथिक इलाज की सलाह दी गई। तीन साल तक हालत संतोष जनक बनी रही तो सोचा गया कि होम्योपैथिक दवाइयां काम कर रही हैं।दरअसल इस प्रकार का कैंसर धीरे धीरे बढ़ता है, तीन साल बाद गुर्दों ने काम करना छोड़ दिया है। हालत गंभीर बनी हुई है। संभवतः समय पर सही इलाज होता तो हालात इतने न बिगड़ते।

मुझे होम्योपैथी से शिकायत नहीं है, कई रोगों मे यह कारगर साबित होती है। मेरा ऐतराज़ है निर्णय लेने के तरीकों से, अंधभक्ति से।यह सही है कि लोग ख़ुद अर्ज़ करने आते हैं और उनसे सलाह देने के लियें कोई धन भी नहीं लिया जात।भक्ति रस मे डूबे ये लोग गुरु मे भगवान देखते है, और अपनी डरी हुई मानसिकता मे उनकी हर बात मानने की विवशता महसूस करते है।यदि इन गुरु मे थोड़ी भी मानवीयता है, तो इन्हे सलाह देना बन्द कर देना चाहिये।भगवान तो नहीं हैं, इंसान बने रहें ये ही काफ़ी है।

भक्तों से इस दलदल से निकलने की उम्मीद करना,पत्थर पर सर फोड़ने जैसा है।

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4 Comments on "ये कैसी अर्ज़ है!"

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Dr Sunil
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Vishwas aur shradha hi unscientific h

Binu Bhatnagar
Guest

केस स्टडी न. 3 के रोगी की भी कुछ 3 दिन पहले मृत्यु हो गई।केसन स्टडी 1 को अंतिम दनो मे केमोथिरैपी की सलाह गुरु ने दी थी और केस न. 3 को अंतिम दिनो मुंबई टाटा कैंसर इंस्टीट्यूट ले जाने को गुरु ने कहा, जब वो ख़ुद हिलने लायक भी नहीं थे। इतनी बेवकूफ़ियों भरी सलाह मिलने के बाद के बाद भी भक्तों की भक्ती ज्यों की त्यों है।

ashok andre
Guest

aapka yeh sargarbhit aalekh man ko boori tarah jhinjhod gyaa.maine khud ese logon ko dekha hai jo andh bhakti ke karan apni jindagi se bhii haath dho baithe.yeh dukhad sthiti hai.shradha rakhna galat nhiin ho sakta hai kintu apni buddhi ka bhii istemaal karna chahiye.yahi main kah sakta hoon.is javalant aalekh ko prastut karne ke liye aapko badhai deta hoon.

Rajeev Sharma
Guest

अंध विशवास पर बोहोत सघन चोट हार्दिक धन्यवाद इस लेखन के लिए

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