लेखक परिचय

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान युवा पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों दैनिक भास्कर, अमर उजाला और हरिभूमि में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन भी जारी है. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, जिसे काफ़ी सराहा गया है. इसके अलावा डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी कर रही हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए आपको कई पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है. आप कई भाषों में लिखती हैं. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में ख़ास दिलचस्पी रखती हैं. फ़िलहाल एक न्यूज़ और फ़ीचर्स एजेंसी में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं.

Posted On by &filed under समाज.


हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फिरोज़शाह तुगलक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है। गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है। ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका। हिसार का गूजरी महल 1354 में फिरोज़शाह तुगलक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया। गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है। इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था। ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुगलक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है।

गूजरी महल की स्थापना के लिए बादशाह फिरोज़शाह तुगलक ने क़िला बनवाया। यमुना नदी से हिसार तक नहर लाया और एक नगर बसाया। क़िले में आज भी दीवान-ए-आम, बारादरी और गूजरी महल मौजूद हैं। दीवान-ए-आम के पूर्वी हिस्से में स्थित कोठी फिरोज़शाह तुगलक का महल बताई जाती है। इस इमारत का निचला हिस्सा अब भी महल-सा दिखता है। फिरोज़शाह तुगलक के महल की बंगल में लाट की मस्जिद है। अस्सी फ़ीट लंबे और 29 फ़ीट चौड़े इस दीवान-ए-आम में सुल्तान कचहरी लगाता था। गूजरी महल के खंडहर इस बात की निशानदेही करते हैं कि कभी यह विशाल और भव्य इमारत रही होगी।

सुल्तान फिरोज़शाह तुगलक और गूजरी की प्रेमगाथा बड़ी रोचक है। हिसार जनपद के ग्रामीण इस प्रेमकथा को इकतारे पर सुनते नहीं थकते। यह प्रेम कहानी लोकगीतों में मुखरित हुई है। फिरोज़शाह तुगलक दिल्ली का सम्राट बनने से पहले शहज़ादा फिरोज़ मलिक के नाम से जाने जाते थे। शहज़ादा अकसर हिसार इलाक़े के जंगल में शिकार खेलने आते थे। उस वक्त यहां गूजर जाति के लोग रहते थे। दुधारू पशु पालन ही उनका मुख्य व्यवसाय था। उस काल में हिसार क्षेत्र की भूमि रेतीली और ऊबड़-खाबड़ थी। चारों तरफ़ घना जंगल था। गूजरों की कच्ची बस्ती के समीप पीर का डेरा था। आने-जाने वाले यात्री और भूले-भटके मुसाफ़िरों की यह शरणस्थली थी। इस डेरे पर एक गूजरी दूध देने आती थी। डेरे के कुएं से ही आबादी के लोग पानी लेते थे। डेरा इस आबादी का सांस्कृतिक केंद्र था।

एक दिन शहज़ादा फिरोज़ शिकार खेलते-खेलते अपने घोड़े के साथ यहां आ पहुंचा। उसने गूजर कन्या को डेरे से बाहर निकलते देखा तो उस पर मोहित हो गया। गूजर कन्या भी शहज़ादा फिरोज़ से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। अब तो फिरोज़ का शिकार के बहाने डेरे पर आना एक सिलसिला बन गया। फिरोज़ ने गूजरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा तो उस गूजर कन्या ने विवाह की मंजरी तो दे दी, लेकिन दिल्ली जाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर नहीं जा सकती। फिरोज़ ने गूजरी को यह कहकर मना लिया कि वह उसे दिल्ली नहीं ले जाएगा।

1309 में दयालपुल में जन्मा फिरोज़ 23 मार्च 1351 को दिल्ली का सम्राट बना। फिरोज़ की मां हिन्दू थी और पिता तुर्क मुसलमान था। सुल्तान फिरोज़शाह तुगलक ने इस देश पर साढ़े 37 साल शासन किया। उसने लगभग पूरे उत्तर भारत में कलात्मक भवनों, किलों, शहरों और नहरों का जाल बिछाने में ख्याति हासिल की। उसने लोगों के लिए अनेक कल्याणकारी काम किए। उसके दरबार में साहित्यकार, कलाकार और विद्वान सम्मान पाते थे।

दिल्ली का सम्राट बनते ही फिरोज़शाह तुगलक ने महल हिसार इलांके में महल बनवाने की योजना बनाई। महल क़िले में होना चाहिए, जहां सुविधा के सब सामान मौजूद हों। यह सोचकर उसने क़िला बनवाने का फ़ैसला किया। बादशाह ने ख़ुद ही करनाल में यमुना नदी से हिसार के क़िले तक नहरी मार्ग की घोड़े पर चढ़कर निशानदेही की थी। दूसरी नहर सतलुज नदी से हिमालय की उपत्यका से क़िले में लाई गई थी। तब जाकर कहीं अमीर उमराओं ने हिसार में बसना शुरू किया था।

किवदंती है कि गूजरी दिल्ली आई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अपने घर लौट आई। दिल्ली के कोटला फिरोज़शाह में गाईड एक भूल-भूलैया के पास गूजरी रानी के ठिकाने का भी ज़िक्र करते हैं। तभी हिसार के गूजरी महल में अद्भुत भूल-भूलैया आज भी देखी जा सकती है।

क़ाबिले-गौर है कि हिसार को फिरोज़शाह तुगलक के वक्त से हिसार कहा जाने लगा, क्योंकि उसने यहां हिसार-ए-फिरोज़ा नामक क़िला बनवाया था। ‘हिसार’ फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘क़िला’। इससे पहले इस जगह को ‘इसुयार’ कहा जाता था। अब गूजरी महल खंडहर हो चुका है। इसके बारे में अब शायद यही कहा जा सकता है-

सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में

उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियां बोलती हैं…

-फ़िरदौस ख़ान

Leave a Reply

1 Comment on "विरासत : सुनने की फुर्सत हो तो, आवाज़ है पत्थरों में…"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
प्रदीप श्रीवास्‍तव
Guest

फ़िरदौस ख़ान जी बहुत सुन्दर आलेख है यह ,बधाई.
बड़ी खूबसूरती के साथ दोनों जगहों
का सामंजस्य किया है.
प्रदीप श्रीवास्तव

wpDiscuz