लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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राकेश उपाध्याय

सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं, छुपा था क्या कहां, किसने ढका था, उस समय तो यह अगम, अतल जल भी कहां था। ये पंक्तियां भारत एक खोज धारावाहिक की शुरुआत में जब टीवी के जरिए हमारे कानों में गूंजती थीं तो मन एक बार ठहर जाता था। सृष्टि के रहस्य पर सवाल उठाती ये पंक्तियां हमें ये सोचने को मज़बूर करती थीं कि वास्तव में ब्रह्मांड का रहस्य है क्या, और क्या उसे सचमुच जाना जा सकता है?

 

 

 

इस सवाल की खोज भारतीय मनीषा ने वेदकाल से आधुनिक काल तक की,रामायण, महाभारत आदि सभी ग्रंथों में सब जगह एक बात समान तौर पर कही गई कि ईश्वर की खोज कहीं बाहर नहीं करनी है। इसी शरीर में इन्हीं आंखों और मन से उस परम तत्व को खोजा जा सकता है, जिसे खोजने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने दशकों तक अनथक मेहनत की और लार्जर हैड्रान कोलाइडर मशीन में परमाणु के नाभिक में पाए जाने वाले कण प्रोटॉन को तोड़कर एक नए कण हिग्स-बोसोन की खोज का दावा किया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रोटॉन को तोड़ने पर सेकेंड के लाखवें के लाखवें हिस्से में वो कण प्रकाश के तौर पर दिखाई पडा लेकिन फिर अचानक ओझल हो गया। पर इतने में ही महाप्रयोग को वो मिल गया जिसे खोजने और जानने के लिए भारतीय मनीषा ने अपना सब कुछ हमेशा दांव पर लगाए रखा।

 

 

 

गॉड पार्टिकल की कथित खोज के बाद सृष्टि, जीवन और जगत से जुड़े सवाल फिर से कौंधने लगे हैं कि क्या सचमुच ईश्वर सृष्टि के कण-कण में हैं या फिर इस प्रकार की सोच इस ज़माने में धारण किए रहना निरी मूर्खता है? हम जब अपने चारों ओर पसरी गरीबी, बेबसी, लाचारी,असमानता और अनाचार देखते हैं तो कई बार उस तथाकथित ईश्वर से भी अरुचि सी हो जाती है जिसके दरबार में सावन महीने में एक लोटा जल और बेलपत्र हम सभी परंपरा से चढ़ाते आ रहे हैं। सवाल है कि क्या कण-कण में रहने वाला ईश्वर ही स्वयं मानव जीवन से जुड़ी अपार तकलीफें सह रहा है? यदि ऐसा है तो फिर काहे का ईश्वर और यदि ऐसा नहीं है तो फिर कण-कण में भगवान होने की बात कैसे मान ली जाए? यदि कण-कण में ईश्वर है तो फिर व्यवस्था में फैली अव्यवस्था और कमजोर की कमजोरी को वो दूर कर पाने में समर्थ क्यों नहीं है? ईश्वर की दार्शनिक भावभूमि के मुताबिक, जीवन की नियामक जो संप्रभु सत्ता हर कण यानी हर मनुष्य के पास होनी चाहिए थी, वो आखिर कुछ मुट्ठी भर लोगों, चंद कॉरपोरेट हाउसों, धनी देशों तक ही क्यों सीमित रह गई है?हिग्स बोसोन पार्टिकल का सच अगर ये है कि कण-कण में संसार के संचालन की ताक़त भरी है तो फिर ये ताक़त हर मनुष्य तक क्यों नहीं पहुंचती? क्यों दुनिया की बड़ी आबादी लाचार, बेकार,दीन-हीन, पंगु, असमर्थ और दूसरों के दिए दान-खैरात और सब्सिडी पर जिंदगी जीने को विवश है? दुनिया की बडी आबादी की शक्ति और पुरुषार्थ को आखिर किन लोगों ने छीन लिया है? क्यों हर तरफ शोषण का साम्राज्य अट्ठहास लगा रहा है?

 

 

 

बहुत दूर जवाब की तलाश नहीं की जा सकती। अपने आस-पास से ही शुरुआत करनी होगी। 1990 के पहले के दिनों की बात है, जब गांव में न बिजली थी और ना ही फ्रीज। टीवी, कूलर और गरमियों में भट्टी की तरह तपते पक्के कंक्रीट मकान बनाने की हवस भी तब देश में तेज नहीं थी। हमारे खेत को जोतने वाले किसान परभू हरिजन का किस्सा याद आता है जो परंपरा से खेतिहर मज़दूर थे। वही हमारा खेत ‘अधिया’ पर जोतते थे। यानी खेत के मालिक हम थे और वो किसान। पानी, खाद, बीज, जोताई का आधा पैसा वो देते थे, आधा हमारे घर से जाता था। उपज का आधा हिस्सा वो लेते थे और आधा हमारे घर आता था। तीज-त्योहारों समेत साल भर जितने उत्सव घर पर पड़ते थे, उसमें घर के सदस्य के तौर पर परभू के परिवार का हक हिस्सा भी रहता था, और सिर्फ परभू का नहीं, गांव में रहने वाले धोबी, कहार, कुम्हार, नाई,दर्जी, लोहार परिवारों यानी पूरा समाज घर का हिस्सा रहता था, और वो हक से अपना हिस्सा हर उत्सव के बाद आकर दादी के हाथों से ले जाता था। उनके घर पर जो भी शादी-विवाह, उत्सव पड़ते थे, उसमें हमारी शिरकत भी वैसे ही होती थी, मानो अपने घर के दरवाजे पर बारात आई हो।

 

ये सच हिंदुस्तान के ज्यादातर गांवों का था। सच ये भी है कि शोषण और अत्याचार की घटनाएं भी इस बीच सुर्खियां बनती रहीं लेकिन असल में वो कभी इस देश की असलियत नहीं बन सकीं। सदियों से जो हिंदुस्तान गांवों में पलता आया, जिसके पराक्रम को हिंद स्वराज में बापू ने याद किया और, जो 17 वीं सदी में दुनिया के सामने भारत को सोने की चिड़िया बना देने की वजह था, वो गांव 19वीं सदी के ब्रिटिश भारत में लुटते-पिटते, कंगाली के मुहाने पर पहुंचने लगा। 1990 में चली आर्थिक उदारीकरण ने उसकी तबाही का नया अध्याय लिखा। बात फिर परभू और हमारे परिवार की आती है। 80 के दशक के अंत तक कच्चे मकान में परभू भी परिवार समेत रहा करते थे और हमारे परिवार के लोग भी। घास-फूस, बांस, सरकंडे और अरहर के सूखे रहठ्टे से बनीं मड़ई परभू के दरवाजे पर भी थी, हमारे यहां भी, इसे बनाने की सारी सामग्री हम दोनों परिवार साथ-साथ जुटाते थे। हर साल मंड़ई की मरम्मत भी आगे-पीछे होती थी। गाय उनके घर भी बंधती थी, हमारे घर भी, जिसका शुद्ध दूध वो भी पी रहे थे, हम भी, चारा उसी खेत से आता था जो हमारा था, पर चारा उगाने का जिम्मा परभू का था। उस वक्त गांव कुएं के पानी का इस्तेमाल करता था, हर बस्ती का अपना कुआं था जिसका पानी हमारे घर भी पिया जाता था, और परभू की बस्ती में भी लोग अपने कुएं का ही पानी पीते थे, जिसे खुदवाने में हमारे पुरखों की भी भूमिका रही। जाड़े की रात में अपने घर में धान की सूखी पुआल पर बिस्तर बिछाकर सोने का आनंद बांभन टोला भी उठाता था और, परभू का टोला भी। वही खटिया-मचिया उनके घर भी थी, वही खटिया-मचिया हमारे घर भी। अंतर इतना था कि हमारा खपड़ैल से आच्छादित खूबसूरत कच्चा मकान हवेलीनुमा था जबकि परभू बस दो तीन कमरों के कच्चे मकान में रहा करते थे,हालांकि दोनों मकान एक ही तालाब-पोखर की मिट्टी से बने थे। लेकिन पिछले 40 सालों में मानो सब कुछ उलट-पुलट गया। गांवों में अट्टालिकाएं खड़ी होती गईं, बिजली, तकनीकी विकास ने हर गांव में दो हिंदुस्तान खड़े कर दिए। एक हिंदुस्तान जो सुविधाओं से मालामाल है और दूसरा, जो दो जून की रोटी के लिए रात-दिन मशक्कत कर रहा है, लेकिन जिसे मेहनत के बावजूद उसका हक नहीं मिल पा रहा। और इसमें जाति का भेद कहीं नहीं है, हर जाति-बिरादरी में, समूह में-संप्रदाय में गैरबराबरी और गरीबी-अमीरी के दो पाले साफ-साफ खिंच चुके हैं। प्रति व्यक्ति सुविधाओं और संसाधनों के उपभोग के सवाल पर हिंदुस्तान में इतनी गैरबराबरी शायद ही इसके पहले कभी देखी गई हो।

 

लोग कहते हैं कि दुनिया इतनी खूबसूरत पहले कभी नहीं थी। लेकिन अब जब मैं गांव जाता हूं, घरों से नौजवान गायब हैं। रोजगार की तलाश ने हर टोले-बस्ती का जीवन बेहाल कर दिया है। बज़बजाते बाज़ार बन चुके छोटे शहर बेतरतीब यूं बढ़े हैं जैसे स्वस्थ शरीर पर फोड़े-फुंसियों का अंबार लग गया है। बाज़ारवाद ने गांव में कुछ यूं दस्तक दी है कि उसका सारा सुख-चैन जाता रहा। माना कि आज लाइट-बत्ती कुछ घंटों के लिए पहुंचने लगी और सदियों तक जो गांव अंधेरे में रहे,वहां इंटरनेट और सड़कों का जाल बिछता दिख रहा है लेकिन अहम मुद्दा है कि वो ग्रामीण चेतना कहां हैं जो भारत की पहचान रही? जहां सुविधाएं पहुंची हैं वहां गांव का माहौल नहीं बचा और जहां अभी कुछ नहीं पहुंचा, वहां से गांव ऐसे गायब हुआ है मानो शरीर छोड़कर आत्मा ही कहीं दूर बसने चली गई। मरघट और मुर्दनगी हमारे चारों ओर पसरने लगी है लेकिन शायद हम देख नहीं पा रहे।

 

धरती से जीवन उठता जा रहा है और आधुनिक विश्व को देखिए जो हज़ारों करोड़ रुपये खर्चकर हिग्स-बोसोन पार्टिकल खोज रहा है, करोड़ों-अरबों डॉलर खर्च कर मंगल जैसे ग्रहों पर जीवन तलाशा जा रहा है। सभ्यता की कैसी विंडबना है ये? आधुनिक सभ्यता के कथित झंडाबरदार लोगों को जिंदगी की ज़द्दोज़हद में बुनियादी सुविधाओं के घोर अभाव में तिल-तिलकर जीवन जी रहे करोड़ों लोगों की जिंदगी बेहतरीन बनाकर क्या जीवन की असल खोज नहीं हो सकती? सवाल है कि क्या धरती पर जीवन की खोज पूरी हो चुकी है? क्या हमारा जहान पूरे तौर पर खुशहाल हो चुका है,और यदि नहीं तो जो ईश्वरीय चेतना भारतीय दर्शन के मुताबिक, असंख्य जीवनों में हर पल खिलखिलाती है, उसे भुलाकर कहीं पाताल में गॉड पार्टिकल तो कहीं छितिज के पार मंगल मिशन में जीवन की खोज करने का मतलब क्या है?

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1 Comment on "हिग्स बोसोन, मंगल पर जीवन और सभ्यता का संकट"

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Bipin Kumar Sinha
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इस आलेख को पढने के बाद ऐसा लगा कि यह पूर्वाग्रह से ग्रसित है.अगर समाज में असमानताएं दृष्टिगोचर होती है तो यह हमारी राजनितिक और आर्थिक कुप्रबंधन का परिणाम है और इसे सही सूझ्बूझ से हल करना चाहिए, न कि वैज्ञानिक खोजों को और प्रयासों कि निंदा कर के की जानी चाहिए.अगर ऐसा भूतकाल में मान्य हो जाता तो आज हम जो तकनीकी ज्ञान और उपलब्धियों का लाभ उठा रहे है , वह न होता.जय हो उन नीति निर्धारकों की जिन्होंने भारत में कंप्यूटर आधारित कार्यप्रणाली को जन्म दिया और हम देख सकते है कि उसका कितना फायदा हुआ है.इसे… Read more »
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