लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under हिंद स्‍वराज.


नवभवन द्वारा प्रकाशित महात्‍मा गांधी की महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक ‘हिंद स्‍वराज’ का दसवां पाठ

hind swarajjपाठक: सभ्यता के बारे में आपके विचार मैं समझ गया। आपने जो कहा उस पर मुझे ध्यान देना होगा। तुरन्त सब कुछ मंजूर कर लिया जाय, ऐसा तो आप नहीं मानते होंगे, ऐसी आशा भी नहीं रखते होंगे। आपके ऐसे विचारों के अनुसार आप हिन्दुस्तान के आजाद होने का क्या उपाय बतायेंगे?

संपादक: मेरे विचार सब लोग तुरन्त मान लें, ऐसी आशा मैं नहीं रखता। मेरा फर्ज इतना ही है कि आपके जैसे जो लोग मेरे विचार जानना चाहते हैं, उनके सामने अपने विचार रख दूं। वे विचार उन्हें पसंद आयेंगे या नहीं आयेंगे। यह तो समय बीतने पर ही मालूम होगा। हिन्दुस्तान की आजादी के उपायों का हम विचार कर चुके। फिर भी हमने दूसरे रूप में इन पर विचार किया। अब हम उन पर उनके स्वरूप में विचार करें। जिस कारण से रोगी बीमार हुआ हो, वह कारण अगर दूर कर दिया जाय, तो रोगी अच्छा हो जायगा, यह जग मशहूर बात है। इसी तरह जिस कारण से हिन्दुस्तान गुलाम बना वह कारण अगर दूर कर दिया जाय, तो वह बंधन से मुक्त हो जायेगा।

पाठक: आपकी मान्यता के मुताबिक हिन्दुस्तान की सभ्यता अगर सबसे अच्छी है, तो फिर वह गुलाम क्यों बना?

संपादक: सभ्यता तो मैंने कही वैसी ही हैं। लेकिन देखने में आया है कि हर सभ्यता पर आफतें आती है। जो सभ्यता अचल है वह आखिरकार आफतों को दूर कर देती है। हिन्दुस्तान के बालकों में कोई न कोई कमी भी थी इसीलिए वह सभ्यता आफतों से घिर गयी। लेकिन इस घेरे में से छूटने की ताकत उसमें है, यह उसके गौरव को दिखाता है।

और फिर सारा हिन्दुस्तान उसमें (गुलामी में) घिरा हुआ नहीं है। जिन्होंने पश्चिम की शिक्षा पाई है और जो उसके पाश में फंस गये हैं, वे ही गुलामी में घिरे हुए हैं। हम जगत को अपनी दमड़ी के नाप से नापते हैं। अगर हम गुलाम हैं, तो जगत को भी गुलाम मान लेते हैं। हम कंगाल दशा में हैं, इसलिए मान लेते हैं कि सारा हिन्दुस्तान ऐसी दशा में है। दरअसल ऐसा कुछ नहीं हैं। फिर भी हमारी गुलामी सारे देश की गुलामी है, ऐसा मानना ठीक है। लेकिन ऊपर की बात हम ध्यान में रखें तो समझ सकेंगे कि हमारी अपनी गुलामी मिट जाये तो हिन्दुस्तान की गुलामी मिट गई। ऐसा मान लेना चाहिये, इसमें अब आपको स्वराज्य की व्याख्या भी मिल जाती है। हम अपने ऊपर राज करें, वही स्वराज्य है, और वह स्वराज्य हमारी हथेली में है।

इस स्वराज्य को आप सपने जैसा न मानें। मन से मानकर बैठे रहने का भी, यह स्वराज्य नहीं है। यह तो ऐसा स्वराज्य है कि आपने अगर इसका स्वाद चख लिया है, तो दूसरों को इसका स्वाद चखाने के लिए आप जिन्दगी भर कोशिश करेंगे, लेकिन मुख्य बात तो हर शख्स के स्वराज्य भोगने की है। डूबता आदमी दूसरे को नहीं तारेगा लेकिन तैरता आदमी दूसरे को तारेगा। हम खुद गुलाम होंगे और दूसरों को आजाद करने की बात करेंगे तो वह संभव नहीं है।

लेकिन इतना काफी नहीं है। हमें और भी आगे सोचना होगा। अब इतना तो आपकी समझ में आया होगा कि अंग्रेजों को देश से निकालने का मकसद सामने रखने की जरूरत नहीं है। अगर अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनकर रहें तो हम उनका समावेश यहां कर सकते हैं। अंग्रेज अगर अपनी सभ्यता के साथ रहना चाहें, तो उनके लिए हिन्दुस्तान में जगह नहीं है। ऐसे हालात पैदा करना हमारे हाथ में है।

पाठक: अंग्रेज हिन्दुस्तानी बनें यह नामुमकिन है।

संपादक: हमारा ऐसा कहना यह कहने के बराबर है कि अंग्रेज मनुष्य नहीं हैं। वे हमारे जैसे बनें या न बनें इसकी हमें परवाह नहीं है। हम अपना घर साफ करें। फिर रहने लायक लोग ही उसमें रहेंगे, दूसरे अपने आप चले जायेंगे ऐसा अनुभव तो हर आदमी को हुआ होगा।

पाठक: ऐसा होने की बात तारीख में तो हमने नहीं पढ़ी।

संपादक: जो चीज तारीख में नहीं देखी वह कभी नहीं होगी। ऐसा मानना मनुष्य की प्रतिष्ठा में अविश्वास करना है। जो बात हमारी अकल में आ सके उसे आखिर हमें आजमाना तो चाहिये ही।

हर देश की हालत एक सी नहीं होती। हिन्दुस्तान की हालत विचित्र है। हिन्दुस्तान का बल असाधारण है। इसलिए दूसरी तारीखों से हमारा कम संबंध है। मैंने आपको बताया कि दूसरी सभ्यतायें मिट्टी में मिल गयीं, जब कि हिन्दुस्तानी सभ्यता को आंच नहीं आयी है।

पाठक: मुझे ये सब बातें ठीक नहीं लगतीं। हमें लड़कर अंग्रेजों को निकालना ही होगा। इसमें कोई शक नहीं जब तक वे हमारे मुल्क में हैं तब तक हमें चैन नहीं पड़ सकता। ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ ऐसा देखने में आता है। अंग्रेज यहा हैं इसलिए हम कमजोर होते जा रहे हैं। हमारा तेज चला गया है और हमारे लोग घबराये से दीखते हैं। अंग्रेज हमारे देश के लिए यम (काल) जैसे हैं। उस यम को हमें किसी भी प्रयत्न से भगाना होगा।

संपादक: आप अपने आवेश में मेरा सारा कहना भूल गये हैं। अंग्रेजों को यहां लाने वाले हम हैं और वे हमारी बदौलत ही यहां रहते हैं। आप यह कैसे भूल जाते हैं कि हमने उनकी सभ्यता अपनायी हैं, इसलिए वे यहां रह सकते हैं? आप उनसे जो नफरत करते हैं, वह नफरत आपको उनकी सभ्यता से करनी चाहिये। फिर भी मान लें कि हम लड़कर उन्हें निकालना चाहते हैं। यह कैसे हो सकेगा?

जारी….

अवश्‍य पढें :

‘हिंद स्वराज की प्रासंगिकता’ को लेकर ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ पर व्‍यापक बहस की शुरुआत

‘हिंद स्‍वराज’ का पहला पाठ

हिंद स्वराज : बंग-भंग

हिंद स्वराज : अशांति और असंतोष

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान कैसे गया?

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा (रेलगाडिया)

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा (हिन्दू-मुसलमान)

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा(वकील)

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा (डाक्टर)

हिंद स्वराज : सच्ची सभ्यता कौन सी?

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz