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नवभवन द्वारा प्रकाशित महात्‍मा गांधी की महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक ‘हिंद स्‍वराज’ का चौदहवां पाठ

hind swarajjपाठक: आपने इतना सारा कहा परन्तु उसमें कहीं भी शिक्षा तालीम की जरूरत तो बताई ही नहीं। हम शिक्षा की कमी की हमेशा शिकायत करते रहते हैं। लाजिमी तालीम देने का आन्दोलन हम सारे देश में देखते हैं।

महाराजा गायकवाड ने (अपने राज्य में) लाजिमी शिक्षा शुरू की है। उसकी ओर सबका ध्यान गया है। हम उन्हें धन्यवाद देते हैं। यह सारी कोशिश क्या बेकार ही समझनी चाहिये?

संपादक: अगर हम अपनी सभ्यता को सबसे अच्छी मानते हैं, तब तो मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि वह कोशिश ज्यादातर बेकार ही है। महाराजा साहब और हमारे दूसरे धुरन्धर नेता सबको तालीम देने की जो कोशिश कर रहे हैं, उसमें उनका हेतु निर्मल है। इसलिए उन्हें धन्यवाद ही देना चाहिये। लेकिन उनके हेतु का जो नतीजा आने की संभावना है, उसे छिपा नहीं सकते।

शिक्षा तालीम का अर्थ क्या है? अगर उसका अर्थ सिर्फ अक्षर ज्ञान ही हो तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है, एक शस्त्र से चीर फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही है। बहुत से लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक हैं, तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है।

शिक्षा का साधारण अर्थ अक्षर ज्ञान ही होता है। लोगों को लिखना-पढ़ना और हिसाब करना सिखाना बुनियादी या प्राथमिक प्रायमरी शिक्षा कहलाती है। एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है। उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है। अपने मां बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री के साथ कैसे बरतना? बच्चों से कैसे पेश आना? जिस देहात में वह बसा हुआ है वहां उसकी चालढाल कैसी होनी चाहिये? इस सबका उसे काफी ज्ञान है। वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है।

लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता। इस आदमी को आप अक्षर ज्ञान देकर क्या करना चाहते है? उसके सुख में आप कौन सी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर ज्ञान देने की जरूरत नहीं है। पश्चिम के असर के नीचे आकर हमने यह बात चलायी है कि लोगों को शिक्षा देनी चाहिये लेकिन उसके बारे में हम आगे पीछे की बात सोचते ही नहीं।

अब ऊंची शिक्षा को लें, मैं भूगोल विद्या सीखा खगोल विद्या (आकाश के तारों की विद्या) सीखा, बीजगणित (एलजेब्रा) भी मुझे आ गया। रेखागणित (ज्यामेट्री) का ज्ञान भी मैंने हासिल किया। भूगर्भ विद्या को भी मैं पी गया, लेकिन उससे क्या? उससे मैंने अपना कौन सा भला किया? अपने आसपास के लोगों का क्या भला किया? किस मकसद से मैंने वह ज्ञान हासिल किया? उससे मुझे क्या फायदा हुआ? एक अंग्रेज विद्वान (हक्सली) ने शिक्षा के बारे में यों कहा है- उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह उसके बस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा हुआ काम करता है। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसकी बुद्धि शुद्ध शांत और न्यायदयी है।

उसने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसका मन कुदरती कानूनों से भरा है और जिसकी इन्द्रियां उसके बस में है, जिसके मन की भावनायें बिलकुल शुद्ध है, जिसे नीच-कामों से नफरत है और जो दूसरों को अपने जैसा मानता है। ऐसा आदमी ही सच्चा शिक्षित (तालीमशुदा) माना जायगा, क्योंकि वह कुदरत के कानून के मुताबिक चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा। अगर यही सच्ची शिक्षा हो तो मैं कसम खाकर कहूंगा कि ऊपर जो शास्त्र मैंने गिनाये हैं उनका उपयोग मेरे शरीर या मेरी इन्द्रियों को बस में करने के लिए मुझे नहीं करना पड़ा। इसलिए प्रायमरी प्राथमिक शिक्षा को लीजिये या ऊंची शिक्षा को लीजिये। उसका उपयोग मुख्य बात में नहीं होता। उससे हम मनुष्य नहीं बनते। उससे हम अपना कर्तव्य नहीं मान सकते।

पाठक: अगर ऐसा ही है तो मैं आपसे एक सवाल करूंगा आप ये जो सारी बातें कह रहे हैं, वह किसकी बदौलत कह रहे हैं? अगर आपने अक्षर ज्ञान और ऊंची शिक्षा नहीं पाई होती तो ये सब बातें आप मुझे कैसे समझा पाते?

संपादक : आपने अच्छी सुनाई। लेकिन आपके सवाल का मेरा जवाब भी सीधा ही है। अगर मैंने ऊंची या नीची शिक्षा नहीं पाई होती, तो मैं नहीं मानता कि मैं निकम्मा आदमी हो जाता। अब ये बातें कहकर मैं उपयोगी बनने की इच्छा रखता हूं। ऐसा करते हुए जो कुछ मैंने पढ़ा उसे मैं काम में लाता हूं और उसका उपयोग अगर वह उपयोग हो तो मैं अपने करोड़ों भाइयों के लिए नहीं कर सकता। सिर्फ आप जैसे पढ़े लिखों के लिए ही कर सकता हूं। इससे भी मेरी ही बात का समर्थन होता है। मैं और आप दोनों गलत शिक्षा के पंजे में फंस गये थे। उसमें से मैं अपने को मुक्त हुआ मानता हूं। अब वह अनुभव मैं आपको देता हूं और उसे देते समय ली हुई शिक्षा का उपयोग करके उसमें रही सड़न मैं आपको दिखाता हूं।

इसके सिवा आपने जो बात मुझे सुनाई उसमें आप गलती खा गये क्योंकि मैंने अक्षर ज्ञान को (हर हालत में) बुरा नहीं कहा है। मैंने तो इतना ही कहा है कि उस ज्ञान की हमें मूर्ति की तरह पूजा नहीं करनी चाहिये वह हमारी कामधेनु नहीं है। वह अपनी जगह पर शोभा दे सकता है। अगर वह जगह यह है जब मैंने और आपने अपनी इन्द्रियों को बस में कर लिया है, जब हमने नीति की नींव मजबूत बना ली हो, तब अगर हमें अक्षर ज्ञान पाने की इच्छा हो तो उसे पाकर हम उसका अच्छा उपयोग कर सकते हैं। वह शिक्षा आभूषण के रूप में अच्छी लग सकती है। लेकिन अक्षर ज्ञान का अगर आभूषण के तौर पर ही उपयोग हो, तो ऐसी शिक्षा को लाजिमी करने की हमें जरूरत नहीं। हमारे पुराने स्कूल ही काफी हैं। वहां नीति को पहला स्थान दिया जाता है। वह सच्ची प्राथमिक शिक्षा है। उस पर हम जो इमारत खड़ी करेंगे वह टिक सकेगी।

पाठक: तब क्या मेरा यह समझना ठीक है कि आप स्वराज्य के लिए अंग्रेजी शिक्षा का कोई उपयोग नहीं मानते?

संपादक: मेरा जवाब हां और नहीं दोनों है। करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मेकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी। ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं? जिस शिक्षा को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया है वह हमारा सिंगार बनती है, यह जानने लायक है। उन्हीं को विद्वान कहते रहते हैं कि उसमें यह अच्छा नहीं है, वह अच्छा नहीं है। वे जिसे भूल से गये हैं, उसी से हम अपने अज्ञान के कारण चिपके रहते हैं। उनमें अपनी अपनी भाषा की उन्नति करने की कोशिश चल रही है।

वेल्स इंग्लैंड का एक छोटा सा परगना है, उसकी भाषा धूल जैसी नगण्य हैं। ऐसी भाषा का अब जीर्णोद्धार हो रहा है। वेल्स के बच्चे वेल्श भाषा में ही बोलें, ऐसी कोशिश वहां चल रही हैं। इसमें इग्लैंड के खजांची लायड जार्ज बड़ा हिस्सा लेते हैं। और हमारी दशा कैसी है? हम एक दूसरे को पत्र लिखते हैं तब गलत अंग्रेजी में लिखते हैं। एक साधारण एम. ए. पास आदमी भी ऐसी गलत अंग्रेजी से बचा नहीं होता। हमारे अच्छे से अच्छे विचार प्रगट करने का जरिया है अंग्रेजी। हमारी कांग्रेस का कारोबार भी अग्रेंजी में चलता है।

अगर ऐसा लंबे अरसे तक चला तो मेरा मानना है कि आनेवाली पीढ़ी हमारा तिरस्कार करेगी, और उसका शाप हमारी आत्मा को लगेगा। आपको समझना चाहिये कि अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म, वगैरा बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में उसे परेशान करने में कुछ भी उठा नहीं रखा है। अब अगर हम अंग्रेजी शिक्षा पाये हुए लोग उसके लिए कुछ करते हैं तो उसका हम पर जो कर्ज चढ़ा हुआ है उसका कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं।

यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इन्साफ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिये। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता। दूसरे आदमी को मेरे लिए तरजुमा कर देना चाहिये, यह कुछ कम दंभ है? यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है? इसमें मैं अंग्रजों का दोष निकालूं या अपना हिन्दुस्तान को। गुलाम बनानेवाले तो हम अंग्रेजी जाननेवाले लोग ही हैं। राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी बल्कि हम पर पड़ेगी। लेकिन मैंने आपसे कहा कि मेरा जवाब हां और ना दोनों है। हां कैसे सो मैंने आपको समझाया।

अब ना कैसे यह बताता हूं। हम सभ्यता के रोग में ऐसे फंस गये हैं कि अंग्रेजी शिक्षा बिलकुल लिये बिना अपना काम चला सकें। ऐसा समय अब नहीं रहा जिसने वह शिक्षा पाई है, वह उसका अच्छा उपयोग करें। अंग्रेजों के साथ के व्यवहार में, ऐसे हिन्दुस्तानियों के साथ के व्यवहार में, जिनकी भाषा हम समझ न सकते हों और अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से कैसे परेशान हो गये हैं, यह समझने के लिए अंग्रेजी का उपयोग किया जाय। जो लोग अंग्रेजी पढ़े हुए हैं उनकी संतानों को पहले तो नीति सिखानी चाहिये, उनकी मातृभाषा सिखानी चाहिये और हिन्दुस्तान की एक दूसरी भाषा सिखानी चाहिये।

बालक जब पुख्ता (पक्की) उम्र के हो जाय, तब भले ही वे अंग्रेजी शिक्षा पाये और वह भी उसे मिटाने के इरादे से न कि उसके जरिये पैसे कमाने के इरादे से। ऐसा करते हुए भी हमें यह सोचना होगा कि अंग्रेजी में क्या सीखना चाहिये और क्या नहीं सीखना चाहिये। कौन से शास्त्र पढ़ने चाहिये, यह भी हमें सोचना होगा। थोड़ा विचार करने से ही हमारी समझ में आ जायेगा कि अगर अंग्रेजी डिग्री लेना हम बन्द कर दें तो अंग्रेज हाकिम चौकेंगे।

पाठक: तब कैसी शिक्षा दी जाय?

संपादक: उसका जवाब ऊपर कुछ हद तक आ गया है। फिर भी इस सवाल पर हम और विचार करें। मुझे तो लगता है कि हमें अपनी सभी भाषाओं को उज्ज्वल शानदार बनाना चाहिये। हमें अपनी भाषा में ही शिक्षा लेनी चाहिये? इसके क्या मायने हैं। इसे ज्यादा समझाने का यह स्थान नहीं है। जो अंग्रेजी पुस्तकें काम की है। उनका हमें अपनी भाषा में अनुवाद करना होगा। बहुत से शास्त्र सीखने का दंभ और वहम हमें छोड़ना होगा। सबसे पहले तो धर्म की शिक्षा या नीति की शिक्षा दी जानी चाहिये।

हर एक पढे-लिखे हिन्दुस्तानी को अपनी भाषा का, हिन्दू को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी का, पारसी को फारसी का और सबको हिन्दी का ज्ञान होना चाहिये। कुछ हिन्दुओं को अरबी और मुसलमानों और पारसियों को संस्कृत सीखनी चाहिये। उत्तरी और पश्चिमी हिन्दुस्तान के लोगों को तामिल सीखनी चाहिये। सारे हिन्दुस्तान के लिए जो भाषा चाहिये वह तब से हिन्दी ही होनी चाहिये। उसे उर्दू या देवनागरी लिपि में लिखने की छूट रहनी चाहिये। हिन्दू मुसलमानों के संबंध ठीक रहें इसलिए बहुत से हिन्दूस्तानियों का इन दोनों लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने से हम आपस के व्यवहार में अंग्रेजी को निकाल सकेंगे।

और यह सब किसके लिए जरूरी है? हम जो गुलाम बन गये हैं, उनके लिए। हमारी गुलामी की वजह से देश की प्रजा गुलाम बनी है। अगर हम गुलामी से छूट जाय तो प्रजा तो छूट ही जायगी।

पाठक: आपने जो धर्म की शिक्षा की बात कही वह बड़ी कठिन है।

संपादक: फिर भी उसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। हिन्दुस्तान कभी नास्तिक नहीं बनेगा। हिन्दुस्तान की भूमि में नास्तिक फल फूल नहीं सकते। बेशक यह काम मुश्किल है। धर्म की शिक्षा का ख्याल करते ही सिर चकराने लगता है। धर्म के आचार्य दंभी और स्वार्थी मालूम होते हैं। उनके पास पहुंचकर हमें नम्र भाव से उन्हें समझाना होगा। उसकी कुंजी मुल्लों, दस्तूरों और ब्राह्मणों के हाथ में है। लेकिन उनमें अगर सदबुद्धि न हो तो अंग्रेजी शिक्षा के कारण हममें जो जोश पैदा हुआ है उसका उपयोग करके हम लोगों को नीति की शिक्षा दे सकते हैं।

यह कोई बहुत मुश्किल बात नहीं है। हिन्दुस्तानी सागर के किनारे पर ही मैल जमा है। उस मैल से जो गंदे हो गये है उन्हें साफ होना है। हम लोग ऐसे ही और खुद ही बहुत कुछ साफ हो सकते हैं। मेरी यह टीका करोड़ों लोगों के बारे में नहीं है। हिन्दुस्तान को असली रास्ते पर लाने के लिए हमें ही असली रास्ते पर आना होगा, बाकी करोड़ों लोग तो असली रास्ते पर ही हैं। उसमें सुधार-बिगाड़, उन्नति अवनति समय के अनुसार होते ही रहेंगे। पश्चिम की सभ्यता को निकाल बाहर करने की ही हमें कोशिश करनी चाहिये। दूसरा सब अपने आप ठीक हो जायगा।

जारी….

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