लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under हिंद स्‍वराज.


नवभवन द्वारा प्रकाशित महात्‍मा गांधी की महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक ‘हिंद स्‍वराज’ का तेरहवां पाठ

hind swarajjपाठक: आप जिस सत्याग्रह या आत्मबल की बात करते हैं, उसका इतिहास में कोई प्रमाण है। आज तक दुनिया का एक भी राष्ट्र इस बल से ऊपर चढ़ा हो, ऐसा देखने में नहीं आता। मार काट के बिना बुरे लोग सीधे रहेंगे ही नहीं, ऐसा विश्वास अभी भी मेरे मन में बना हुआ है।

संपादक : कवि तुलसीदासजी ने लिखा है :

दया धरमको मूल है, पाप मूल अभिमान,

तुलसी दया न छोडिय, जब लग घट में प्रान।

मुझे तो यह वाक्य शास्त्र-वचन जैसा लगता है। जैसे दो और दो चार ही होते हैं, उतना ही भरोसा मुझे ऊपर के वचन पर है। दयाबल आत्मबल है, सत्याग्रह है। और इस बल के प्रमाण पग पग पर दिखाई देते हैं। अगर यह बल नहीं होता तो पृथ्वी रसातल (सात पातालों में से एक) में पहुंच गई होती। लेकिन आप तो इतिहास का प्रमाण चाहते हैं। इसके लिए हमें इतिहास का अर्थ जानना होगा। इतिहास का शब्दार्थ है ‘ऐसा हो गया’। ऐसा अर्थ करें तो आपको सत्याग्रह के कई प्रमाण दिये जा सकेंगे।

इतिहास जिस अंग्रेजी शब्द का तरजुमा है और जिस शब्द का अर्थ बादशाहों या राजाओं की तवारीख होता है, उसका अर्थ लेने से सत्याग्रह का प्रमाण नहीं मिल सकता। जस्ते की खान में आप अगर चांदी ढूढ़ने जायें, तो वह कैसे मिलेगी। ‘हिस्टरी’ में दुनिया के कोलाहल की ही कहानी मिलेगी इसलिए गोरे लोगों में कहावत है कि जिस राष्ट्र की हिस्टरी (कोलाहल) नहीं है, वह राष्ट्र सुखी है। राजा लोग कैसे खेलते थे? कैसे खून करते थे? कैसे बैर रखते? ये यह सब हिस्टरी में मिलता है। अगर यही इतिहास होता, अगर इतना ही हुआ होता, तब तो यह दुनिया कब की डूब गई होती।

अगर दुनिया की कथा लड़ाई से शुरू हुई होती तो आज एक भी आदमी जिंदा नहीं रहता। जो प्रजा लड़ाई का ही भोग (शिकार) बन गई, उसकी ऐसी ही दशा हुई है। आस्ट्रेलिया के गोरों ने उनमें से शायद ही किसी को जीने दिया है। जिनकी जड़ ही खत्म हो गई, वे लोग सत्याग्रही नहीं थे। जो जिंदा रहेंगे, वे देखेंगे कि आस्ट्रेलिया के गोरे लोगों के भी यही हाल होंगे। जो तलवार चलाते हैं उनकी मौत तलवार से ही होती है। हमारे यहां ऐसी कहावत है कि तैराक की मौत पानी में।

दुनिया में इतने लोग आज भी जिन्दा है, यह बताता है कि दुनिया का आधार हथियार बल पर नहीं है, परन्तु सत्य, दया या आत्म बल पर है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि दुनिया लड़ाई के हंगामों के बाबजूद टिकी हुई है। इसलिए लड़ाई के बल के बजाय दूसरा ही बल उसका आधार है। हजारों बल्कि लाखों लोग प्रेम के बस रहकर अपना जीवन बसर करते हैं। करोड़ों कुटुम्बों का क्लेश प्रेम की भावना में समा जाता है, डूब जाता है। सैकडों राष्ट्र मेलजोल से रहे हैं, इसको हिस्टरी नोट नहीं करती। हिस्टरी कर भी नहीं सकती। जब इस दया की, प्रेम की और सत्य की धारा रुकती है, टूटती है, तभी इतिहास में वह लिखा जाता है।

एक कुटुम्ब के दो भाई लड़े। इसमें एक ने दूसरे के खिलाफ सत्याग्रह का बल काम में लिया। दोनों फिर से मिल जुलकर रहने लगे इसका नोट कौन लेता है? अगर दोनों भाइयों में वकीलों की मदद से या दूसरे कारणों से वैरभाव बढ़ता और वे हथियारों या अदालतों (अदालत एक तरह का हथियार बल, शरीर बल ही है।) के जरिये लड़ते तो उनके नाम अखबारों में छपते। अड़ोस पड़ोस के लोग जानते और शायद इतिहास में भी लिखे जाते। जो बात कुटुम्बों जमातों और इतिहास के बारे में सच है, वही राष्ट्रों के बारे में भी समझ लेना चाहिये। कुटुम्ब के लिए एक कानून और राष्ट्र के लिए दूसरा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। हिस्टरी अस्वाभाविक बातों को दर्ज करती है। सत्याग्रह स्वाभाविक है, इसलिए उसे दर्ज करने की जरूरत ही नहीं है।

पाठक: आपके कहे मुताबिक तो यही समझ में आता है कि सत्याग्रह की मिसालें इतिहास में नहीं लिखी जा सकतीं। इस सत्याग्रह को ज्यादा समझने की जरूरत है। आप जो कुछ कहना चाहते हैं, उसे ज्यादा साफ शब्दों में कहेंगे तो अच्छा होगा।

संपादक: सत्याग्रह या आत्मबल को अंग्रेजी में पैसिव रेजिस्टेन्स कहा जाता है। जिन लोगों ने अपने अधिकार पाने के लिए खुद दुख सहन किया था, उनके दुख सहने के ढंग के लिए यह शब्द बरता गया है। उसका ध्येय लड़ाई के ध्येय से उलटा है। जब मुझे कोई काम पसन्द न आये और वह काम मैं न करूं तो उसमें मैं सत्याग्रह या आत्मबल का उपयोग करता हूं।

मिसाल के तौर पर मुझे लागू होनेवाला कोई कानून सरकार ने पास किया। वह कानून मुझे पसन्द नहीं है। अब अगर मैं सरकार पर हमला करके यह कानून रद्द करवाता हूं, तो कहा जायगा कि मैंने शरीर बलका उपयोग किया। अगर मैं उस कानून को मंजूर ही न करूं और उस कारण से होनेवाली सजा भुगत लूं, तो कहा जायगा कि मैंने आत्मबल या सत्याग्रह से काम लिया। सत्याग्रह में मैं अपना ही बलिदान देता हूं।

यह तो सब कोई कहेंगे कि दूसरे का भोग बलिदान लेने से अपना भोग देना ज्यादा अच्छा है। इसके सिवा सत्याग्रह से लड़ते हुए अगर लड़ाई गलत ठहरी तो सिर्फ लड़ाई छेड़नेवाला ही दुख भोगता है। यानी अपनी भूल की सजा वह खुद भोगता है। ऐसी कई घटनायें हुई हैं जिनमें लोग गलती से शामिल हुए थे। कोई भी आदमी दावे से यह नहीं कह सकता कि फलां काम खराब ही है। लेकिन जिसे वह खराब लगा उसके लिए तो वह खराब ही है। अगर ऐसा ही है तो फिर उसे वह काम नहीं करना चाहिये। और उसके लिए दुख भोगना कष्ट सहन करना चाहिये। यही सत्याग्रह की कुंजी है।

पाठक: तब तो आप कानून के खिलाफ होते हैं। यह बेवफाई कही जायगी। हमारी गिनती हमेशा कानून को माननेवाली प्रजा में होती है। आप तो एक्स्ट्रीमिस्ट से भी आगे बढ़ते दीखते हैं। एक्स्ट्रीमिस्ट कहता है कि जो कानून बन चुके हैं उन्हें तो मानता ही चाहिये, लेकिन कानून खराब हों तो उनके बनानेवालों को मारकर भगा देना चाहिये।

संपादक: मैं आगे बढ़ता हूं या पीछे रहता हूं इसकी परवाह न आपको होनी चाहिये न मुझे। हम तो जो अच्छा है, उसे खोजना चाहते हैं और उसके मुताबिक बरतना चाहते हैं।

हम कानून को माननेवाली प्रजा है, इसका सही अर्थ तो यह है कि हम सत्याग्रही प्रजा हैं। कानून जब पसन्द न आयें तब हम कानून बनानेवालों का सिर नहीं तोड़ते बल्कि उन्हें रद्द कराने के लिए खुद उपवास करते हैं, खुद दुख उठाते हैं। हमें अच्छें या बुरे कानून को मानना चाहिये। ऐसा अर्थ तो आज कल का है। पहले ऐसा नहीं था। तब चाहे जिस कानून को लोग तोड़ते थे और उसकी सजा भोगते थे।

कानून हमें पसन्द न हों तो भी उनके मुताबिक चलना चाहिये, यह सिखावन मर्दानगी के खिलाफ है, धर्म के खिलाफ है और गुलामी की हद है।

सरकार तो कहेगी कि हम उसके सामने नंगे होकर नाचें, तो क्या हम नाचेंगे? अगर मैं सत्याग्रही होऊं तो सरकार से कहूंगा यह कानून आप अपने घर में रखिये। मैं न तो आपके सामने नंगा होनेवाला हूं और न नाचनेवाला हूं। लेकिन हम ऐसे असत्याग्रही हो गये हैं कि सरकार के जुल्म के सामने झुककर नंगे होकर नाचने से भी ज्यादा नीच काम करते हैं।

जिस आदमी में सच्ची इन्सानियत है, जो खुदा से ही डरता है, वह और किसी से नहीं डरेगा। दूसरे के बनाये हुए कानून उसके लिए बंधनकारक नहीं होते। बेचारी सरकार भी नहीं कहती कि तुम्हें ऐसा करना ही पड़ेगा वह कहती है कि तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हें सजा होगी। हम अपनी अधम दशा के कारण मान लेते हैं कि हमें ऐसा ही करना चाहिये। यह हमारा फर्ज है, यह हमारा धर्म है।

अगर लोग एक बार सीख लें कि जो कानून हमें अन्यायी मालूम हो उसे मानना नामर्दगी है, तो हमें किसी का भी जुल्म बांध नहीं सकता। यही स्वराज्य की कुंजी है।

ज्यादा लोग जो कहें, उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिये। यह तो अनीश्वरी बात है, एक वहम है। ऐसी हजारों मिसालें मिलेंगी जिनमें बहुतों ने जो कहा वह गलत निकला हो और थोड़े लोगों ने जो कहा वह सही निकला हो। सारे सुधार बहुत से लोगों के खिलाफ जाकर कुछ लोगों ने ही दाखिल करवाये हैं। ठगों के गांव में अगर बहुत से लोग यह कहें कि ठगविद्या सीखनी ही चाहिये तो क्या कोई साधु ठग बन जायगा। हरगिज नहीं। अन्यायी कानून को मानना चाहिये, यह वहम जब तक दूर नहीं होता, तब कि हमारी गुलामी जानेवाली नहीं है। और इस वहम को सिर्फ सत्याग्रही ही दूर कर सकता है।

शरीर बल का उपयोग करना, गोला बारूद काम में लाना, हमारे सत्याग्रह के कानून के खिलाफ है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि हमें जो पसंद है वह दूसरे आदमी से हम (जबरन) करवाना चाहते हैं। अगर यह सही हो तो फिर यह सामनेवाला आदमी भी अपनी पसंद का काम हमसे करवाने के लिए हम पर गोला बारूद चलाने का हकदार है। इस तरह तो हम कभी एक राय पर पहुंचेगे ही नहीं। कोल्हू के बैल की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर भले ही हम मान लें कि हम आगे बढ़ते हैं। लेकिन दरअसल तो बैल की तरह हम गोल गोल चक्कर ही काटते रहते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं कि जो कानून खुद को नापसन्द है उसे मानने के लिए आदमी बंधा हुआ नहीं है। उन्हें तो सत्याग्रह को ही सही साधन मानना चाहिये, वरना बड़ा विकट नतीजा आयेगा।

पाठक: आप जो कहते हैं, उस पर से मुझे लगता है कि सत्याग्रह कमजोर आदमियों के लिए काफी काम का है। लेकिन जब वे बलवान बन जायें, तब तो उन्हें तोप (हथियार) ही चलाना चाहिये।

संपादक: यह तो आपने बड़े अज्ञान की बात कही। सत्याग्रह सबसे बड़ा सर्वोपरि बल है। वह जब तोपबल से ज्यादा काम करता है, तो फिर कमजोरों का हथियार कैसे माना जायगा। सत्याग्रह के लिए जो हिम्मत और बहादुरी चाहिये, वह तोप का बल रखने वाले के पास हो ही नहीं सकती। क्या आप यह मानते हैं कि डरपोक और कमजोर आदमी नापसन्द कानून को तोड़े सकेगा? एक्स्ट्रीमिस्ट तोपबल पशुबल के हिमायती हैं। वे क्यों कानून को मानने की बात कर रहे हैं? मैं उनका दोष नहीं निकालता, वे दूसरी कोई बात कर ही नहीं सकते। वे खुद जब अंग्रेजों को मारकर राज्य करेंगे तब आपसे और हमसे (जबरन) कानून मनवाना चाहेंगे, उनके तरीके के लिए यही कहना ठीक है। लेकिन सत्याग्रही तो कहेगा कि जो कानून उसे पसन्द नहीं है उन्हें वह स्वीकार नहीं करेगा। फिर चाहे उसे तोप के मुंह पर बांधाकर उसकी धज्जियां क्यों न उड़ा दी जायं।

आप क्या मानते हैं। तोप चलाकर सैकड़ो को मारने में हिम्मती की जरूरत है या हंसते-हंसते तोप के मुंह पर बांधकर धज्जिया उड़ने देने में हिम्मत की जरूरत है? खुद मौत को हथेली में रखकर जो चलता फिरता है वह रणवीर है या दूसरों की मौत को अपने हाथ में रखता है वह रणवीर है? यह निश्चित मानिये कि नामर्द आदमी घड़ी भर के लिए भी सत्याग्रही नहीं रह सकता। हां यह सही है कि शरीर से जो दुबला हो वह भी सत्याग्रही हो सकता है। एक आदमी भी (सत्याग्रही) हो सकता है और लाखों लोग भी हो सकते हैं। मर्द सत्याग्रही हो सकता है औरत भी हो सकती है। उसे अपना लश्कर तैयार करने की जरूरत नहीं रहती। उसे पहलवानों की कुश्ती सीखने की जरूरत नहीं रहती। उसने अपने मन को काबू में किया कि फिर वह वनराज सिंह की तरह गर्जना कर सकता है, और जो उसके दुश्मन बन बैठे हैं, उनके दिल इस गर्जना से फट जाते हैं।

सत्याग्रह ऐसी तलवार है, जिसके दोनों ओर धार है। उसे चाहे जैसे काम में लिया जा सकता है। जो उसे चलाता है और जिस पर वह चलाई जाती है वे दोनों सुखी होते हैं। वह खून नहीं निकालती लेकिन उससे भी बड़ा परिणाम ला सकती है। उसको जंग नहीं लग सकता। उसे कोई (चुराकर) ले नहीं जा सकता। अगर सत्याग्रही दूसरे सत्याग्रही के साथ होड़ में उतरता है, तो उसमें उसे थकान लगती ही नहीं। सत्याग्रही की तलवार को म्यान की जरूरत नहीं रहती। उसे कोई छीन नहीं सकता। फिर भी सत्याग्रह को आप कमजोरों का हथियार मानें तब तो उसे अंधेर ही कहा जायेगा।

पाठक: आपने कहा कि वह हिन्दुस्तान का खास हथियार है। तो क्या हिन्दुस्तान में तोप के बल का कभी उपयोग नहीं हुआ है?

संपादक: आप हिन्दुस्तान का अर्थ मुट्ठीभर राजा करते हैं। मेरे मन में तो हिन्दुस्तान का अर्थ वे करोड़ों किसान हैं जिनके सहारे राजा और हम सब जी रहे हैं।

राजा तो हथियार काम में लायेंगे ही, उनका वह रिवाज ही हो गया है। उन्हें हुक्म चलाना है। लेकिन हुक्म माननेवाले को तोपबल की जरूरत नहीं है। दुनिया के ज्यादातर लोग हुक्म माननेवाले हैं। उन्हें या तो तोपबल या सत्याग्रह का बल सिखाना चाहिये। जहां वे तोपबल सीखते हैं, वहां राजा प्रजा दोनों पागल जैसे हो जाते हैं। जहां हुक्म माननेवालों ने सत्याग्रह करना सीखा है वहां राजा का जुल्म उसकी तीन गज की तलवार से आगे नहीं जा सकता और हुक्म माननेवालों ने अन्यायी हुक्म की परवाह भी नहीं की है। किसान किसी के तलवार बल के बस न तो कभी हुए है, और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, न किसी की तलवार से वे डरते हैं। उन्होंने मौत का डर छोड़ दिया है, इसलिए सब का डर छोड़ दिया है। यहां मैं कुछ बढ़ा चढ़ाकर तस्वीर खींचता हूं, यह ठीक है। लेकिन हम जो तलवार के बल से चकित हो गये हैं, उनके लिए यह कुछ ज्यादा नहीं है।

बात यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है।

मुझे याद है कि एक रियासत में रैयत को अमुक हुक्म पसन्द नहीं आया, इसलिए रैयत ने हिजरत करना, गांव खाली करना शुरू कर दिया। राजा घबड़ाये। उन्होंने रैयत से माफी मांगी और हुक्म वापस ले लिया। ऐसी मिसालें तो बहुत मिल सकती हैं। लेकिन वे ज्यादातर भारत भूमि की ही उपज होंगी। ऐसी रैयत जहां है, वहीं स्वराज्य है। इसके बिना स्वराज्य कुराज्य है।

पाठक: तो क्या आप यह कहेंगे कि शरीर को कसने की जरूरत ही नहीं है?

संपादक: ऐसा मैं कभी नहीं कहूंगा शरीर को कसे बिना सत्याग्रही होना मुश्किल है। अक्सर जिन शरीरों को गलत लड़ा लड़ा कर या सहलाकर कमजोर बना दिया गया है, उनमें रहनेवाला मन भी कमजोर होता है। और जहां मन का बल नहीं है वहां आत्मबल कैसे हो सकता है? हमें बाल विवाह बगैरा के कुरिवाज को और ऐश आराम की बुराई को छोड़कर शरीर को कसना ही होगा। अगर मैं मरियल और कमजोर आदमी को यकायक तोप के मुंह पर खड़ा हो जाने के लिए कहूं तो लोग मेरी हंसी उड़ायेंगे।

पाठक: आपके कहने से तो ऐसा लगता है कि सत्याग्रही होना मामूली बात नहीं है, और अगर ऐसा है कोई आदमी सत्याग्रही कैसे बन सकता है, यह आपको समझाना होगा।

संपादक: सत्याग्रही होना आसान है। लेकिन जितना वह आसान है उतना ही मुश्किल भी है। चौदह बरस का एक लड़का सत्याग्रही हुआ है। यह मेरे अनुभव की बात है। रोगी आदमी सत्याग्रही हुए हैं, यह भी मैंने देखा है। मैंने यह भी देखा है कि जो लोग शरीर से बलवान थे और दूसरी बातों में भी सुखी थे, वे सत्याग्रही नहीं हो सके। अनुभव से मैं देखता हूं कि जो देश के भले के लिए सत्याग्रही होना चाहता है, उसे ब्रहाचर्य का पालन करना चाहिये। गरीबी अपनानी चाहिये। सत्य का पालन तो करना ही चाहिये और हर हालत में अभय बनना चाहिये। ब्रह्मचर्य एक महान व्रत है, जिसके बिना मन मजबूत नहीं होता। ब्रहाचर्य का पालन न करने से मनुष्य वीर्यवान नहीं रहता। नामर्द और कमजोर हो जाता है।

जिसका मन विषय में भटकता है, वह क्या शेर मारेगा? यह बात अनगिनत मिसालों से साबित की जा सकती है। तब सवाल यह उठता है कि घर संसारी को क्या करना चाहिये? लेकिन ऐसा सवाल उठाने की कोई जरूरत नहीं। घर संसारी ने जो संग किया (स्त्री की सोहबत की) वह विषय भोग नहीं है, ऐसा कोई नहीं कहेगा। संतान पैदा करने के लिए ही अपनी स्त्री का संग करने की बात कही गयी है। और सत्याग्रही को संतान पैदा करने की इच्छा नहीं होनी चाहिये। इसलिए संसारी होने पर भी वह ब्रहाचर्य का पालन कर सकता है। यह बात ज्यादा खोलकर लिखने की जरूरत नहीं। स्त्री का क्या विचार है? यह सब कैसे हो सकता है? ऐसे विचार मन में पैदा होते हैं, फिर भी जिसे महान कार्यों में हिस्सा लेना है, उसे तो ऐसे सवालों का हल ढूढ़ना ही होगा।

जैसे ब्रहाचर्य की जरूरत है, वैसे ही गरीबी को अपनाने की भी जरूरत है। पैसे का लोभ और सत्याग्रह का सेवन पालन (दोनों साथ साथ) कभी नहीं चल सकते। लेकिन मेरा मतलब यह नहीं है कि जिसके पास पैसा है, वह उसे फेंक दे। फिर भी पैसे के बारे में लापरवाह रहने की जरूरत है। सत्याग्रह का सेवन करते हुए अगर पैसा चला जाय तो चिन्ता नहीं करनी चाहिये।

जो सत्य का सेवन नहीं करता वह सत्य का बल, सत्य की ताकत कैसे दिखा सकेगा?इसलिए सत्य की तो पूरी पूरी जरूरत रहेगी ही। बड़े से बड़ा नुकसान होने पर भी सत्य को नहीं छोड़ा जा सकता। सत्य के लिए कुछ छिपाने को होता ही नहीं। इसलिए सत्याग्रही के लिए छिपी सेना की जरूरत नहीं होती। जान बचाने के लिए झूठ बोलना चाहिये या नहीं, ऐसा सवाल यहां मन में नहीं उठाना चाहिये। जिसे झूठ का बचाव करना है, वही ऐसे बेकार सवाल उठाता है। जिसे सत्य की ही राह लेनी है, उसके सामने ऐसे धर्म संकट कभी आते ही नहीं। ऐसी मुश्किल हालत में आ पडे तो भी सत्यवादी उन में से उबर जाता है।

अभय के बिना तो सत्याग्रही की गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं चल सकती। अभय संपूर्ण और सब बातों के लिए होना चाहिये। जमीन जायदाद की, झूठी इज्जत का, सगे-सम्बन्धियों का, राज-दरबार का, शरीर को पहुंचने वाली चोटों का और मरण का अभय हो, तभी सत्याग्रह का पालन हो सकता है।

यह सब करना मुशिकल है, ऐसा मानकर इसे छोड़ नहीं देना चाहिये। जो सिर पर पड़ता है उसे सह लेने की शक्ति कुदरत ने हर मनुष्य को दी है। जिसे देश सेवा न करनी है उसे भी ऐसे गुणों का सेवन करना चाहिये।

इसके सिवा हम यह भी समझ सकते हैं कि जिसे हथियार बल पाना होगा उसे भी इन बातों की जरूरत रहेगी। रणवीर होना कोई ऐसी बात नहीं कि किसी ने इच्छा की और तुरन्त रणवीर हो गया। योद्धा (लड़वैया) को ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा, भिखारी बनना होगा। रण में जिसके भीतर अभय न हो, वह लड़ नहीं सकता। उसे (योद्धा को) सत्यव्रत का पालन करने की उतनी जरूरत नहीं है, ऐसा शायद किसी को लगे लेकिन जहां अभय है वहां सत्य कुदरती तौर पर रहता ही है। मनुष्य सत्य को छोड़ता है तब किसी तरह के भय के कारण ही छोड़ता है।

इसलिए इन चार गुणों से डर जाने का कोई कारण नहीं है। फिर तलवारबाज को और भी कुछ बेकार कोशिशें करनी पड़ती है, उसका कारण भय है। अगर उसमें पूरी निर्भयता आ जाय तो उसी पल उसके हाथ से तलवार गिर जायगी। फिर उसे तलवार के सहारे की जरूरत नहीं रहती। जिसकी किसी से दुश्मनी नहीं है, उसे तलवार की जरूरत ही नहीं है। सिंह के सामने आनेवाले एक आदमी के हाथ की लाठी अपने आप उठ गई। उसने देखा कि अभय का पाठ उसने सिर्फ जुबानी ही किया था। उसने लाठी छोड़ी और वह निर्भय निडर बना।

जारी….

अवश्‍य पढें :

‘हिंद स्वराज की प्रासंगिकता’ को लेकर ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ पर व्‍यापक बहस की शुरुआत

‘हिंद स्‍वराज’ का पहला पाठ

हिंद स्वराज : बंग-भंग

हिंद स्वराज : अशांति और असंतोष

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान कैसे गया?

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा (रेलगाडिया)

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा (हिन्दू-मुसलमान)

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा(वकील)

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान की दशा (डाक्टर)

हिंद स्वराज : सच्ची सभ्यता कौन सी?

हिंद स्वराज : हिन्दुस्तान कैसे आजाद हो?

हिंद स्वराज : इटली और हिन्दुस्तान

हिंद स्वराज : गोला- बारूद

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz