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महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ‘सोशल मीडिया व ब्लागिंग संगोष्ठी’

– सुनीता भास्कर

wardhaसोशल मीडिया व ब्लागिंग लोगों से जुड़े लोगों की अड्डेबाजी हो और न्यू मीडिया के विविध आयामों पर बात न हो यह अपवाद स्वरूप ही होगा, और उस पर अगर सुधी श्रोता मिल जाएं तो संगोष्ठी करना सार्थक जान पड़ता है. महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शुक्रवार को आगाज हुई सोशल मीडिया व ब्लागिंग संगोष्ठी का उद्घाटन व अंतिम सत्र इसी का प्रतीक रहा। विवि के कुलगीत से आरंभ हुई संगोष्ठी की शुरूआत ब्लागिंग के दस साला वीडियोनुमा सफरनामे से हुई।

विवि के कुलपति विभूति नारायण राय ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए ब्लागरों का स्वागत करते हुए विवि दवारा सोशल मीडिया पर पूर्व में आयोजित संगोष्ठियों का हवाला दिया। साथ ही हिंदी ब्लागिंग को लेकर विवि द्वारा हुई पहलों व परियोजनाओं से सभी को अवगत कराया। जिसमें हिंदी समय डाट काम व हिंदी शब्दकोश जैसे योगदान शामिल हैं. उन्होंने कहा कि राज्य को खुद पर नियंत्रण रखने की जरूरत है बजाय इसके कि वह हर न्यूनतम अभिव्यिक्त पर अकुंश लगाने की कार्यवाही करे।

संगोष्ठी के आयोजक सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी ने बताया कि शीघ्र ही विवि देश भर के ब्लागरों को एक सामूहिक प्लेटफार्म मुहैय्या कराने की गरज से पुरानी ब्लागवाणी व चिठ्ठाजगत की तर्ज पर चिठ्ठासमय का आगाज करने जा रहे हैं। इस सत्र में विवि के प्रतिकुलपति व मीडिया विभाग के डीन अनिल राय अंकित ने भी अपनी बात रखी। दोपहर बाद के सत्र में ब्लोगरों ने विवि के बच्चों को ब्लोगिंग के तकनीकी गुर सिखाये.

पहले दिन के तीसरे सत्र (सोशल मीडिया और राजनीति) का आगाज करते हुए फुरसितया अनूप शुक्ला ने सोशल मीडिया में होने वाली बहसों को मध्यमवर्ग की भागीदारी का शार्टकट करार दिया । उन्होंने कहा कि मध्यमवर्ग का एक बड़ा तबका सोशल मीडिया में होने वाली बहसों को लाइक कमेंट कर अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी की इतिश्री मान लेता है। आर्थिक मामलों के ब्लागर अनिल रघुराज ने कहा कि देश की जीडीपी का साठ फीसद जिस तबके से आ रहा है सरकार का उसे कोई प्रश्रय नहीं है, जबकि वहीं जीडीपी के चालीस फीसद के लिए ही सारा तामझाम है। और सोशल मीडिया से भी यह तबका नदारद है।

छत्तीसगढ़ से आए दीपकमल पत्रिका के संपादक पंकज झा ने ‘आओ राजनीति करें’ का नारा देते हुए महाकवि दिनकर की पंक्तियों के हवाले से कहा कि ‘जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उसका भी अपराध।’ उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया निहायत निजी माध्यम है लेकिन आदमी के निजी विचार भी किसी न किसी धारा का प्रतिनिधित्व ही करते हैं। इसीलिए गैरराजनीतिक कुछ भी नहीं होता, हर सोच राजनीति से ही गढ़ी जाती है। ब्लागिग पर प्रतिबन्ध के मसले पर उनका मानना था कि सोशल मीडिया को रेगुलेशन की कोई जरूरत ही नहीं है, यहां तो फीडबैक इतना तुरंत मिलता है कि पोस्ट का खुद ही जजमेंट हो जाता है। फेसबुक मित्र व फालोवर ही पोस्ट को रेगुलेट कर देते हैं।

पंकज झा ने सबसे बड़ी चिंता बड़े कारपोरेट हाउसों में निकाले जाने की अनिश्चितताओं के बीच काम करने वाले पत्रकारों की जताई और कहा कि सोशल मीडिया को एक वैकिल्पक मीडिया बनाने की गरज से व साथ ही पत्रकारों को रोजी-रोटी की गारंटी का एक मंच मिल सके इसीलिए भी सोशल मीडिया को मजबूत कर रेवेन्यू हासिल करने की सोच हमें रखनी होगी। सोशल मीडिया की कथित रफ भाषा का तोड़ उन्होंने नागार्जुन  की कविताओं से दिया और उनकी कुछ कविताओं का हवाला देते हुए कहा कि आज के ब्लागिंग की भाषा का आगाज तो बाबा नागार्जुन ही कर गए थे। उन्होनें राजनीतिक प्रतिद्वंदिता  के लिए दो टूक भाषा के इस्तेमाल को जायज बताया। अंत में उन्होंने कहा कि राजनीति दुर्जनों की दुजर्नता से नहीं बलिक सज्जनों की चुप्पी से खराब हो रही लिहाजा उन्होंने हर किसी से सोशल मीडिया के बहाने ही सही राजनीति में सकिय भागीदारी का आह्वान किया।

युवा ब्लागर कार्तिकेय ने बहुत विनम्रता के साथ दो टूक कहा कि अगर हम यह सोच रहे हैं कि सोशल मीडिया से क्रान्ति हो जाएगी तो अगली सांस लेने से पहले ही हमें अपने एकाउंट बंद कर लेने चाहिए। उन्होंने अरब क्रांति से लेकर अन्ना हजारे तक के सोशल मीडिया मूवमेंट का विश्लेषण अपनी खोजी दृष्टि से रखा। उन्होंने सोशल मीडिया माध्यम को बेहद ही आवेगशील माध्यम बताते हुए उसकी किसी बुरी पोस्ट से क्षण भर में पढ़ने वाले प्रभाव को बताया और कहा कि उस प्रभाव की रेमेडी संभव नहीं लिहाजा हर यूजर को ही सजग होना होगा समाज व राजनीति के प्रति खुद ही रेगुलेटर की भूमिका ही अदा करनी होगी।

प्रवक्ता  डाट काम के  संपादक संजीव सिन्हा ने राजनीतिक दलों के बीच सोशल मीडिया के क्रेज को कई कई उदाहरणों से बताया और कहा कि हमें इस सोच से उबरना होगा कि राजनीतिक दल इस मंच को खुद को ब्रांड बनाने के लिए कर यूज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अभिव्यिक्त का खुला मंच है तो जाहिर है हर कोई उसे अपने अपने लाभ के लिए भी इस्तेमाल में लाएगा ही।

मंचासीन लोगों को उकसाने व उगलवाने में श्रोतापक्ष की ओर से एमफिल के शोधार्थी प्रेम कुमार, योगेन्द्र यादव, राम गुप्ता राकेश गांधी समेत कई स्टूडेंट शामिल रहे। कार्यक्रम में शिरकर करने वालों में ब्लोगर व व्यंग्यकार अविनाश वाचस्पति, आलोक कुमार, प्रवीन पाण्डेय, बलिराम धप्से, अरविन्द मिश्र, संतोष त्रिवेदी, शैलेश भारतवासी, शकुंतला, रजनी त्रिपाठी, हर्षवर्धन त्रिपाठी समेत विवि के शिक्षक व स्टूडेंट शामिल रहे. सोशल मीडिया के बहाने समाज व राजनीति पर बहस की यह अड्डेबाजी शनिवार को भी जारी रहेगी..

(लेखिका महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में शोधार्थी हैं)

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3 Comments on "सोशल मीडिया के सेल्फ रेगुलेशन की वकालत"

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कार्तिकेय मिश्र
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अच्छा लिखा है.. धन्यवाद..

बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

कुछ लोग सो रहे हैं कुछ जगे रहने का प्रयास कर रहे हैं।

काजल कुमार
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बढ़ि‍या रपट है जी

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