लेखक परिचय

डॉ. अभिज्ञात

डॉ. अभिज्ञात

वास्तविक नामः हृदय नारायण सिंह। जन्म-1962, ग्राम-कम्हरियां, ज़िला-आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश। शिक्षा-एमए-हिन्दी, कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएचडी। प्रकाशित पुस्तकें-कविता संग्रह-एक अदहन हमारे अन्दर, भग्न नीड़ के आर-पार, सरापता हूं, आवारा हवाओं के ख़िलाफ़ चुपचाप, वह हथेली, दी हुई नींद, उपन्यास- अनचाहे दरवाज़े पर, कला बाज़ार तथा कहानी संग्रह-तीसरी बीवी। एक कहानी पर हिन्दी फिल्म बनने की प्रक्रिया शुरू। पत्र-पत्रिकाओं में आलोचनात्मक टिप्पणियां भी प्रकाशित। रचनाएं कई भारतीय भाषाओं व अंग्रेज़ी में अनूदित। भोजपुरी में भी लेखन। आकांक्षा संस्कृति सम्मान, कादम्बिनी लघुकथा पुरस्कार-2007, कौमी एकता अवार्ड व अम्बेडकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान से समादृत। पेशे से पत्रकार। अमर उजाला, वेबदुनिया डाट काम, दैनिक जागरण के बाद सम्प्रति सन्मार्ग दैनिक में वरिष्ठ उप-सम्पादक।

Posted On by &filed under साहित्‍य.


-डॉ. अभिज्ञात

हिन्दी के बारे में यह मातम मनाने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है कि उसकी गरिमा को उन शब्दों से ठेस पहुंच रही है जो मूलतः हिन्दी के हैं ही नहीं। वे अंग्रेज़ी, मराठी, बंगला, पंजाबी या दूसरी भारतीय या विदेशी भाषाओं से आयातित हैं। दूसरी भाषाओं के मेल-जोल से जो भाषा बन रही है वह भ्रष्ट है और उससे हिन्दी के मूल स्वरूप को क्षति पहुंचेगी। इधर जोर शोर से कहा जा रहा है कि अब तो भाषा प्रयोग में आ रही है वह हिंग्लिश है हिन्दी या इंग्लिश नहीं। इस स्थिति से दुखी होने की बजाय हमें यह समझना चाहिए कि जिस किसी भाषा में बदलाव दिखायी दे वही जीवन्त भाषा है। भाषा में परिवर्तन का विरोध उसकी जीवंतता का विरोध है। जो भाषा जितनी परिवर्तनशील है समझें कि वह उतनी ही जीवन्त है। यह प्रवाह ही है जो वास्तविक ऊर्जा का स्रोत होता है।

हिन्दी को अगर ख़तरा है तो हिन्दी को बचाने की सुपारी लेने वालों से। वे जो उसके व्याकरण को लेकर चिन्तित हैं वे उसे जड़ बनाने पर तुले हुए हैं। हिन्दी की पूजा करने वाले, हिन्दी को भजने वाले चाहते हैं कि हिन्दी पर चढ़ावा चढ़ता रहे और वे उसकी आरती के थाल के चढ़ावे पर खाते कमाते रहें। भाषा में कोई नयी प्रयोग हुआ नहीं कि हायतौबा मचाते हैं। दीवार पर लगे पोस्टरों, नेमप्लेट, विजिटिंग कार्ड, अखबार की खबरों, विज्ञापनों हर कहीं हिन्दी को शुद्ध रूप में देखना चाहते हैं और रोते-बिसुरते रहते कि हिन्दी तो गयी। जबकि अशुद्ध बोलना, लिखना और उसका व्यापक इस्तेमाल यह बताता है कि हिन्दी का प्रयोग वे लोग कर रहे हैं जिनका हिन्दी पर न तो व्यापक अधिकार न अध्ययन न ही वह उनकी भाषा है। इस तरह के प्रयोग आम लोगों के प्रयोग है और उन्हें यह करने देना चाहिए। हिन्दी का हव्वा खड़ा करके हिन्दी को लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता। हिन्दी को हिन्दी अधिकारियों और हिन्दी के शिक्षकों ने जितना लोकप्रिय नहीं किया है उससे अधिक लोकप्रिय फिल्मों और उसके गीतों ने किया है। आम प्रचलन ही हिन्दी को विकसित करेगा। लोगों को हिन्दी गलत बोलने दें गलत लिखने दें। आते आते भाषा उन्हें आ ही जायेगी और शुद्ध नहीं भी आयी तो कोई बात नहीं। भाषा का विस्तार तो हुआ। यह बहुत है।

अंग्रेजी के जो शब्द आम जनता के प्रचलन में आ गये हैं उनके लिए हिन्दी के नये शब्दों को गढ़ने का काम बंद होना चाहिए। बल्कि उन्हें हिन्दी में प्रयोग के लिए बढ़ावा देना चाहिए। लोगों की हिचक दूर करना चाहिए कि वे अंग्रेजी के शब्द का हिन्दी में प्रयोग धड़ल्ले से करें। इतना करें कि वह ऐसा रचबस जाये कि वह हिन्दी का ही लगने लगे। हिन्दी का विकास चाहते हैं तो नये शब्द गढ़ने बंद कीजिए और दूसरी भाषा के शब्दों को हिन्दी के स्वभाव के अनुरूप अपना लीजिए। समस्या खत्म हो जायेगी। हिन्दी को मेल मिलाप की भाषा बनने से एकदम गुरेज नहीं है।

हिन्दी को खतरा उन लोगों से भी है जो चाहते हैं कि हिन्दी की बोलियों का विकास रुक जाये। वे यदि भाषा का दर्जा पाने की कोशिश करती हैं तो उन्हें लगने लगता है कि हिन्दी का क्या होगा? हिन्दी कैसे रहेगी। यदि उसकी बोलियां स्वतंत्र भाषा हो गयीं तो फिर हिन्दी का क्या रह जायेगा। उन्हें लगता है कि भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, ब्राजभाषा, मगही यदि भाषा बन गयी तो हिन्दी कमज़ोर हो जायेगी। वे यह भी मानते हैं कि मैथिली जैसी भाषा की स्वतंत्र पहचान मिलने से हिन्दी कमज़ोर हुई है। तात्पर्य यह कि उनका मानना है कि हिन्दी का वर्चस्व इसलिए है कि हिन्दी इसलिए प्रमुख भाषा बनी हुई है क्योंकि कई बोलियों को स्वतंत्र भाषा का दर्जा नहीं मिला है। यदि उन्हें भी भाषा का दर्जा मिल गया तो कोई हिन्दी का नामलेवा नहीं रह जायेगा। इसी आधार पर कुछ मासूम लोग यह दावा तक कर बैठते हैं कि हिन्दी अगले बीस सालों में मर जायेगी क्योंकि हिन्दी की तमाम बोलियां भाषा बन जायेंगी। मैं उन लोगों से विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि हिन्दी की बोलियां भी यदि भाषा बन गयीं तो हिन्दी और मज़बूत होकर उभरेगी। उसका कारण यह है कि हिन्दी की बोली समझी जाने वाली भाषाओं के समर्थन के कारण दक्षिण भारत की भाषाएं या बालियां हिन्दी को अपने से दूर समझती थीं। हिन्दी की बोलियों को स्वतंत्र भाषा बन जाने के बाद दक्षिण की भाषाओं से हिन्दी का विभेदीपूर्ण रवैया खत्म हो जायेगा और वे भी हिन्दी को तटस्थ तौर पर स्वीकार करने लगेंगी। आखिर हमें एकसूत्रता में बांधने के लिए कोई भाषा तो चाहिए ही। और चूंकि भारतीय भाषाओं में हिन्दी को जानने समझने वाले सबसे ज्यादा है स्वाभाविक तौर पर वही सबकी पहली पसंद और प्राथमिकता है। कहना न होगा कि हिन्दी ही भारत में वह भाषा है जिसमें सबसे अधिक प्रांतों की स्मृतियां जुड़ी हैं और सबसे अधिक भारतीय भाषाओं के शब्द उसमें शामिल हैं। हिन्दी हमारी सर्वाधिक साझी स्मृति की भाषा है इसलिए साझी विरासत भी। बोलियों से स्वतंत्र भाषा होने से यह साझी विरासत और मज़बूत होगी। आज की हिन्दी अगर खड़ी बोली का विकास है तो इस अर्थ में वह किसी की भाषा नहीं है और इसलिए वह सबकी भाषा है। उसमें देश की तमाम बोलियों का नवनीत है। दूसरे जो हिन्दी भाषी नहीं हैं वे हिन्दी को क्यों नहीं अपनायेंगे, आख़िर अंग्रेज़ी जिनकी भाषा नहीं है क्या वे उसे पढ़ते-लिखते समझते नहीं हैं और क्या अंग्रेज़ी की जो मज़बूत स्थिति है उसमें गैर अंग्रेजीभाषी लोगों को योगदान नहीं है।

बोलियों के विकास से हिन्दी का महत्व और समझ में आयेगा। यह नहीं भूलना होगा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर महात्मा गांधी तक जिन लोगों ने हिन्दी को भारत की भाषा बनाने की हिमायत की थी वे हिन्दी भाषा नहीं थे। उनका मानना तो बस इतना था कि जिसमें देश के बहुसंख्य लोगों की बात हो उसे ही इस देश की राष्ट्रभाषा की गरिमा प्रदान की जाये। यही लोकतंत्र का तकाजा है। वह सामर्थ्य उन्होंने हिन्दी में देखी थी। उसी में एकसूत्रता की शक्ति पायी थी।

Leave a Reply

4 Comments on "हिन्दी दिवस पर कुछ यक्ष प्रश्न"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
संजय भट्ट
Guest
संजय भट्ट

हिन्‍दी को बचाने के लिये इतनी हाय तौबा ? बचाया तो उसको जाये जिसको कोई खतरा हो,दिन प्रतिदिन हिन्‍दी का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है,नये नये हिन्‍दी के साफ्टवेयर आ रहे हैं, व्‍यावसायिक पाठयक्रम हिन्‍दी में पढाये जा रहे हैं, विज्ञापनों में हिन्‍दी का प्रयोग बखूबी हो रहा है,हिन्‍दी फिल्‍में,हिन्‍दी सीरियलस लोकप्रिय हो रहे हैं, तो हिन्‍दी को खतरा कहां है ?

vinod saraswat
Guest

महोदयजी, आपकी बात बिलकुल सत्य है. की राजस्थानी, भोजपुरी अवधि आदि भाषावो को मान्यता मिल जाने से हिंदी कमजोर नहीं होगी. अपितु ज्यादा मजबूत होकर निखरेगी. सो हिंदी के हितेषियो को यह चिंता नहीं करणी चाहिए.

विश्व मोहन तिवारी
Guest
विश्व मोहन तिवारी

आलोचना करना, प्रश्न करना किसी भी घटना कोसुधारने के लिये पहला कदम है।
अब कुछ ठोस कार्य भी करना चाहिये — कृपया देखेंमेरा लेख इसी प्रवक्ता.काम में

श्रीराम तिवारी
Guest
hindi ke baare men aapka yh vishleshan sahi hai ki gair hindi bhashi gandhi ji .binobaji tegorji tatha swami dayanad sarasvati jaise prbhrutti viddono ki soojh boojh se hindi ko saare desh men sampark bhasha ka samman mila hai .aaj jo sarkaree tantr men ghuskar hindi ke naam pr arvon rupya kharch ho raha hai wh nihayt hi ghatiya bhash neeti ka parinaam hai .hindi ko kisi hidi adhikari ,hidi divas ya hindi pakhwade ki jarurat nahin kyonki hindi ke bina kisi ka bhi is desh men gujara nahin hindi ko bina sanrkshn ke hi vishwvypee banaya ja sakta hai… Read more »
wpDiscuz