लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
पुनर्जागरण का तात्पर्य है फिर से जागना। सचेत एवं चेतन्य होना। व्यक्ति, समाज या देश जो पहले जागा हुआ था, जो प्रत्येक क्षेत्र में अपना सर्वांगीण विकास कर रहा था, परंतु किन्हीं कारणों से वह सुषुप्ति की अवस्था में पहुंच गया है, उसका पुन: पहले की भांति सचेत एवं जाग्रत होना। डॉ. ललिता अरोड़ा (वीणा में पुनर्जागरण के संदर्भ में राष्ट्रीय चेतना लेख) के शब्दों में व्यक्ति, समाज व देश का अपनी अस्मिता और अतीत गौरव के प्रति सजग सचेत होकर क्रियाशील होना या अपने चतुर्दिक अन्य देशों की प्रगति को देख स्वयं को भी उस स्तर तक पहुंचाने के लिए संघर्षशील होना अथवा अपनी वर्तमान स्थिति से क्षुब्ध कुछ न कर पाने की स्थिति में मन मार कर बैठ जाने पर भी अन्तत: शक्ति को जाग्रत करने में बने रहना। अन्त:शक्ति के जाग्रत होते ही अपनी पूर्व स्थिति को प्राप्त करने के लिए तत्पर हो उठना ही पुनर्जागरण है।

यह शब्द फैंर च शब्द रिनेक्सा…के अर्थ में स्वीकार किया गया है ‘‘रिनेक्सा’’ का अर्थ नया जन्म यह पुनर्जन्म माना गया है। पुनर्जागरण नवयुग का अपनी जीवन्त, सनातन, सांस्कृतिक परंपरा की कसौटी पर कसता हुआ नूतन गतिविधियों को अपनाता है।

सम्पूर्ण युग में मध्य युग अंधकार का युग कहा जाता है। इस युग में प्राचीन सभ्यता, संस्कृति शिक्षा का ह््रास हो गया था। सारे यूरोप में पोप का धार्मिक साम्राज्य स्थापित हो गया था। बड़ी-बड़ी राजसत्ताएं ईसाई गुरु पोप के कथनानुसार राज्य चलाती थीं, जिसके विरोध में जागरण शुरू हुआ। इस जागरण में यूरोपवासियों ने अपने प्राचीन साहित्यकारों, दार्शनिकों, विचारकों से प्रेरणा प्राप्त की और पोप की निरंकुश सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया, यूरोपवासियों का अपने प्राचीन आदर्शों के साहित्य को पडक़र पुन: नव सृजन के लिए खड़े होना ही पुनर्जागरण कहलाया। यूरोपीय पुनर्जागरण का स्वरूप जो हमें पारसील्युस, बेकन, मोंटेन की रचनाओं में मिलता है। मुख्यत: बौद्धिक एवं सौन्दर्यात्मक था। उसमें ईश्वर की अनुकम्पा पर भरोसा करने के स्थाान पर मनुष्य को गतिशील शक्ति की नई चेतना प्रदान की।

16वीं एवं 17वीं शताब्दियों के यूरोप में इस बात पर बल नहीं दिया गया कि प्लेटो, अरस्तु या सिसेरो के तात्विक निष्कर्षों को ज्यों का त्यों अंगीकार कर लिया जाए, अपितु पुनर्जागरण की तात्विक प्रवृत्ति यह थी कि युनानियों में जो बौद्धिक परीक्षण की भावना थी, उसे पुन: जीवित किया जाए। पेट्रार्क तथा बोकेशियो ने मनुष्य जीवन का महत्व समझाया। इरास्मस ने मानवतावादी दृष्टिकोण का निरूपण किया, फिसिना, मिराडोला बौद्धिक अभिजात वर्ग के समर्थक थे। जहां यूरोप में 14वीं शताब्दी में जागरण की चिंगारी प्रस्फुटित हो गई थी, जो 16वीं शताब्दी आते-आते एक वृहद रूप में सारे यूरोप में दिखाई देने लगी थी। वहीं भारत में पुनर्जागरण यूरोपीय जागरण से प्रभावित था, तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी। भारतीय आत्मा की सृजनात्मक अभिव्यक्ति सबसे पहले दर्शन, धर्म व संस्कृति के क्षेत्रों में हुई और राजनीतिक आत्मचेतना का उदय उसके अपरिहार्य परिणाम में अतीत को पुनर्जीवित करने को प्रवृत्ति अधिक थी। भारतीय पुनर्जागरण के नेतृत्व कर्ताओं ने खुले रूप से इस बात को रखा कि हमें अपने प्राचीन धर्मशास्त्र वेदों उपनिषदों.. गीता, पुराणों आदि के आधार पर अपने वर्तमान जीवन को डालना चाहिए। अतीत को पुनर्जीवित करने की यह भावना आक्रामक तथा अहंकारपूर्ण विदेशी सभ्यता को महान चुनौती के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न हुई थी। चूंकि यह सभ्यता राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावी और आर्थिक रूप से बलशाली थी, इसलिए इसके विरूद्ध प्रतिक्रिया का होना और भी अधिक स्वाभाविक था। पश्चिम की यांत्रिक सभ्यता तथा भारत की धार्मिक संस्कृतियों के बीच इस संघर्ष से नये भारत का उदय हुआ।
ब्रिटेन की प्रचण्ड राजनैतिक शक्ति तथा सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में अहम समाज राजाराम मोहनराय, केशवसेन प्रार्थना समाज 1864, आर्य समाज 1875, दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, थियोसोपिकल सोसाईटी, अरविन्द घोष, बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय आदि जैसे चिंतकों ने धर्म और आध्यात्म के माध्यम से भारत में पुनर्जागरण का शंखनाद किया। इसके अलावा पूना एसोसिएशन 1867, ईस्ट इण्डियन एसोसिएशन, हिन्दू महाजन सभा आदि संस्थाओं एवे बेगदर्शन, संवाद प्रभाकर, अमृत बाजार पत्रिका, सुलभ समाचार, वाइस ऑफ इण्डिया, बम्बई समाचार, इन्दु प्रकाश, मराठा केसरी, हिन्दू स्वदेश मित्रम, हेराल्ड, एडवोकेट आदि समाचार पत्रों का भी भारत में पुनर्जागरण लाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

पुनर्जागरण का उद्भव एवं विकास सबसे पहले बंगाल में हुआ (राजाराम मोहनराय इसके पहले पुरोधा माने जाते हंै)। लोग सबसे पहले पश्चिमी सभ्यता के सम्पर्क में आए, क्योंकि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपना व्यापार सबसे पहले वहीं जमाया था। बंगाली सबसे पहले विश्व में चल रही गतिविधियों से परिचित हुए, यहां से होता हुआ जागरण सारे भारत में फैला, जिसके फलस्वरूप सारा भारत ‘स्वामी विवेकानन्द’ के शब्दों में दीर्घकालीन सुदीर्घ निंद्रा से जाग्रत हो उठा।

जहां तक पुनर्जागरण में हिन्दी लोक जागरण का प्रश्न है, इस संबंध में प्रसिद्ध आलोचक ‘राम विलास शर्मा’ का मानना है कि ‘1957 का गदर हिन्दी प्रदेश में लोक जागरण की पहली मंजिल है, भारतेन्दु हरिशचन्द्र का युग दूसरी तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके सहयोगियों का कार्यकाल हिन्दी लोक जागरण की तीसरी मंजिल है।’ 1857 के गदर उत्पन्न हुई चेतना से ही वे साहित्य में आधुनिकता की शुरुआत मानते हैं कि अन्य इतिहासकारों की तरह अंग्रेजीराज के फलस्वरूप पश्चिमी सम्पर्क से। अपनी मान्यताओं की पुष्टि के लिए उन्होंने ‘भारतेन्दु हरिशचन्द्र’ भारतेन्दु युग और हिन्दी भाषा की विकास परम्परा तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी जागरण इन तीनों पुस्तकों का निर्माण किया।

भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग के लेखकों की सामंतविरोधी राष्ट्रीय चेतना ही साहित्य में रीतिवादी रूढि़पंथी मूल्यों के खिलाफ आधुनिकता और मुक्ति की स्वच्छंद चेतना ने रूप में प्रस्फुटित हुई। इसके साथ ही अंग्रेजी राज का विरोध करके इन लेखकों ने देश प्रेम और स्वाधीनता के मूल्येां के साथ हमारे साहित्य से संबद्ध किया।

हिन्दी लोक जागरण के संदर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपने ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास’ लिखते हंै कि ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का प्रभाव, भाषा और साहित्य दोनों पर गहरा पड़ा।’ उन्होंने गद्य की भाषा को परिमार्जित करके उसे बहुत मधुर व स्वच्छ रूप प्रदान किया। उन्होंने हिन्दी साहित्य को नए मार्ग पर लाकर खड़ा कर दिया, उनके संस्कार को महत्ता को सब लोगों ने मुक्त-कंठ से स्वीकार किया और वे वर्तमान हिन्दी गद्य के प्रवर्तक माने गये। शुक्ल जी आगे लिखते हंै कि इससे बड़ा काम यह उन्होंने यह किया कि साहित्य को नवीन मार्ग दिखलाया, उसे वे शिक्षित जनता के साहचर्य में ले आए। यदि हम तात्कालीन स्थिति पर विचार करें तो यह बात समझ में आती है कि भारत में अंग्रेजी राज स्थापित होने के बाद अंग्रेजों की कोशिश यह रही थी कि हिन्दू-मुस्लिम एक न हो पाएं, के लिए उन्होंने हर अच्छे-बुरे तरीके का सहारा लिया। इस संदर्भ में उन्होंने साहित्य का भी सहारा लिया और उर्दू का अदालती भाषा घोषित की। संवत् 1909 के आसपास हिन्दी और उर्दू दोनों का रहना आवश्यक समझा था वहीं आगे सर सैयद अहमद खां के प्रभाव के कारण हिन्दी के बारे में कहते हैं कि इस वक्त हिन्दी की हैसियत भी एक बोली (डायलेक्ट) सी बन गई है, जो हर गांव से अलग-अलग ढंग से बोली जाती है।

आगे तारी ने एक नजर कहा मैं सैयद अहमद खां जैसे विख्यात मुसलमान विद्वान की तारीफ में और ज्यादा नहीं कहना चाहता। उर्दू भाषा और मुसलमानों से मेरा जो लगाव है, वह कोई छिपी हुई बात नहीं है। मैं समझता हूं मुसलमान लोग कुरान तो आसमानी किताब मानते ही है, इंजील की शिक्षा को भी अस्वीकार नहीं करते, पर लोग मूर्तिपूजक होने के कारण इंजील की शिक्षा नहीं मानते। इससे यह बात साफ जाती है कि हिन्दुओं के प्रति अंग्रेजों का रूख ठीक नहीं था फिर हिन्दी के प्रति वह सकारात्मक हो सकते थे? ऐसे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल या राम विलास शर्मा द्वारा किया गया हिन्दी लोक जागरण का मूल्यांकन ठीक ही बैठता है।
पूर्व में भारत में उर्दू और फारसी भाषा का बोल-बाला हिन्दी क्षेत्र में था वहीं भारतेन्दु की साधना के कारण अब हिन्दी में बदल रहा था। गदर के एक दशक बाद ही भारतेन्दु ने ‘कविवचनसुधा’ निकाली, उसके प्रकाशन के दूसरे वर्ष उसमें लेवी प्राणलेवी शीर्षक विख्यात ब्रिटिश विरोधी लेख लिखा, उन्होंने मार्च 1974 में लिखा कपड़ा बनाने वाले, सूत निकालने वाले, खेती करने वाले आदि सब भीख मांगते है और 23 मार्च 1874 कविवचनसुधा में उन्होंने स्वदेशी का प्रसिद्ध प्रतिज्ञा पत्र स्वाधीन हुई वैसे ही भारतवर्ष भी स्वाधीनता का लाभ उठा सकता है।

हिन्दी लोकजागरण में दो बाते हमें मुखरित रूप से दिखाई देती है। राष्ट्रीयधारा साम्राज्यवाद का विरोध और इसे उठाने में सिर्फ भारतेन्दु ही नजर नहीं आते बल्कि मंत्री सदासुख लाल, लल्लूलाल, सदन मिश्र, राजा लक्ष्मण सिंह, पं. प्रताप नारायण मिश्र, उपाध्याय बद्री नारायण चौधरी, ठाकुर जगमोहन सिंह, बालकृष्ण भट्ट आदि कुछ ऐसे नाम है जिन्होंने हिन्दी के प्रत्येक क्षेत्र को चाहे वह गद्य का या पद्य का हो या समालोचना का सभी को परिमार्जित किया। हिन्दी अपने रूप में खड़ी बोली में प्रकट हुई। भारतेन्दु ने जहां लोक जागरण का काम कविवचनसुधा, हरिश्चन्द्र चंद्रिका पत्रिकाओं के माध्यम से किया वहीं प्रेमदान ने आनंद काविनी के माध्यम से हिन्दी में लोकजागरण का कार्य किया। प्रताप नारायण मिश्र के पत्र ब्रहमण में फक्कड़पन के साथ व्यंग्य और हास्यप्रधान रचनाओं में लोकजागरण व्यक्त होता था। बाल कृष्ण भट्ट का हिन्दी प्रदीप और बालगुप्त की भारत मिश्र इस जागरणकाल के दो अन्य महत्वपूर्ण पत्र थे। निबंधों को ले तो ऐसे निबन्ध हैं जो इस लोकजागरण काल में लिखे गये। यह निबन्ध कला रीति कालीय साहित्य से नाता तोड़ती है और हिन्दी में यथार्थवाद के विकास की रास्ता दिखलाती है। इन यथार्थवाद का स्रोत देश प्रेम है, उसकी शैली लोकप्रिय है और उसका दृष्टिकोण साधारण जनता है (महावीर प्रकाश द्विवेदी और हिन्दी नव जागरण)।

राजा शिवप्रसाद का राजा भोज का सपना, राधाचरण गोस्वमी का यमपुर की माया, बालमुकुन्द गुप्त का शिव शंभू का चिट्टा, भारतेन्दु का वैधनाथ की यात्रा, बालकृष्ण भट्ट का साहित्य समूह के हृदय का विकास है आदि कुल हिन्दी लोक जागरण काल के प्रमुख निबंध हैं। ऐसे ही अन्य श्री निवास दास का उपन्यास परीक्षागुरु संयोगिता स्वयंवर भारतेन्दु के पूर्ण प्रकाश चंद्रप्रभा: वैदिक हिंसा हिंसा न भवित, अंधेर नगरी चौपट राजा, चंद्रावली, भारत दुर्दशा, राधाचरण गोस्वामी के तन, मन, धन श्री गुसाइं जी के अर्पण, बंदू मुंह मुहासे आदि प्रमुख नाटक लिखे गये। आलोचना के विकास में बाल कृष्ण भट्ट को यदि हिंदी आलोचना का जन्म होना कहा जाये तो अनुचित न होगा। भारत और यूरोपीय साहित्य की तुलना से सबसे पहले उन्होंने ही की। 1886 के हिंदी प्रदीप में सच्ची कविता शीर्षक से प्रकाशित निबंध का विशेष महत्व है। इससे उन्होंने कविता के बारे में सबसे पहले स्वच्छांदवादी धारणाएं व्यक्त की है। इनके अलावा बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमधन’ का दृश्य रूपक व नाटक शीर्षक लेखमाला, भारतीय नगरी भाष शीर्षक व्याख्यान तथा भारतेन्दु के नाटक और जातीय संगीत शीर्षक निबंधों में हमें बीज रूप से हिन्दी की सैद्धान्तिक समालोचना के दर्शन होते हैं। ऐसे की काव्य क्षेत्र में इन प्रमुख लोगों द्वारा काव्य सृजन किया गया। अत: हम कह सकते हैं कि हिन्दी लोक जागरण भारतेन्दु से शुरू हुआ और इस समय हिन्दी का सर्वमुखी, विविध क्षेत्रों में विकास हुआ।

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