लेखक परिचय

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर जैन ने भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक, रोमानिया के बुकारेस्त विश्वविद्यालय के हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर तथा जबलपुर के विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विभाग के लैक्चरर, रीडर, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष तथा कला संकाय के डीन के पदों पर सन् 1964 से 2001 तक कार्य किया तथा हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार-विकास के क्षेत्रों में भारत एवं विश्व स्तर पर कार्य किया।

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हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा है; इसे उसके अपने ही घर में मत तोड़ो

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

स्वाधीनता के लिए जब जब आन्दोलन तेज़ हुआ तब तब हिन्दी की प्रगति का रथ भी तेज़ गति से आगे बढ़ा। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक बन गई। स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व जिन नेताओं के हाथों में था, उन्होंने यह पहचान लिया था कि विगत 600 – 700 वर्षों से हिन्दी सम्पूर्ण भारत की एकता का कारक रही है; यह संतों, फकीरों, व्यापारियों, तीर्थ यात्रियों, सैनिकों आदि के द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग तक प्रयुक्त होती रही है। मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा की मान्यता उन नेताओं के कारण प्राप्त हुई जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी। बंगाल के केशवचन्द्र सेन, राजा राम मोहन राय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस; पंजाब के बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय; गुजरात के स्वामी दयानन्द, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी; महाराष्ट के लोकमान्य तिलक तथा दक्षिण भारत के सुब्रह्मण्यम भारती, मोटूरि सत्यनारायण आदि नेताओं के राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्बंध में व्यक्त विचारों से मेरे मत की संपुष्टि होती है। हिन्दी भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई। हिन्दी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक हो गई। इसके प्रचार प्रसार में सामाजिक, धार्मिक तथा राष्ट्रीय नेताओं ने सार्थक भूमिका का निर्वाह किया।

हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए जिन राष्ट्रीय नेताओं ने अथक प्रयास किए, उनमें महात्मा गाँधी का महत्व सबसे अधिक है। हिन्दी को सम्पूर्ण भारत में व्यवहार की भाषा बनाने, सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित करने एवं राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में महात्मा गाँधी की भूमिका अप्रतिम है। गाँधी जी ने हिन्दी के महत्व का आकलन दक्षिण अफ्रीका में ही कर लिया था। यह सर्वविदित है कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति एवं अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध करने के लिए गाँधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन चलाया। नेटाल के सत्याग्रह आश्रम में हिन्दी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु आदि भाषाओं के बोलने वाले बच्चे रहते थे। गाँधी जी ने निरीक्षण किया कि खेलते समय वे भिन्न भाषी बच्चे हिन्दी बोलते हैं। इससे उन्होंने यह पहचान लिया कि भिन्न भाषियों की सम्पर्क भाषा हिन्दी ही हो सकती है। उन्होने उन बच्चों को हिन्दी के माध्यम से पढ़ाना शुरु कर दिया। भारत लौटने के बाद गाँधी जी ने पूरे देश का भ्रमण किया तथा हिन्दी की अखिल भारतीय भूमिका को जाना तथा यह भी महसूस किया कि देश के किस किस भाग में हिन्दी को जनता की कामचलाऊ भाषा बनाने के लिए क्या करणीय है जिससे पूरा देश हिन्दी के द्वारा एकजुट होकर राष्ट्रीय आन्दोलन की ज्योति को पूरी आभा के साथ आलोकित कर सके।

सन् 1910 में गाँधी जी ने कहाः ‘हिन्दुस्तान को अगर सचमुच एक राष्ट्र बनाना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा हिन्दी ही बन सकती है’।

सन् 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में गाँधी जी ने हिन्दी में भाषण दिया तथा स्पष्ट घोषणा कीः ‘हिन्दी का प्रश्न मेरे लिए स्वराज्य के प्रश्न से कम महत्वपूर्ण नहीं है’। इसी अधिवेशन में 26 दिसम्बर को ‘आर्य समाज मंडप’ में गाँधी जी के सभापतित्व में ‘एक भाषा एक लिपि’ विषयक सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें सर्वसम्मति से संकल्प पारित हुआ कि ‘हिन्दी भाषा और देवनागरी का प्रचार प्रसार देश के हित एवं एकता की स्थापना हेतु करना चाहिए”।तमिल भाषी श्री रामास्वामी अय्यर और श्री रंगस्वामी अय्यर इस प्रस्ताव के समर्थक थे।

सन् 1917 में ‘गुजरात शिक्षा सम्मेलन’ के अध्यक्षीय भाषण में गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा के मानकों का निर्धारण करते हुए प्रतिपादित कियाः

किसी देश की राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जिसे वहाँ की अधिकांश जनता बोलती हो। वह सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो। सरकारी कर्मचारियों एवं सरकारी कामकाज के लिए सुगम और सरल हो। जिसे सुगमता तथा सरलता से सीखा जा सकता हो। जिसे चुनते समय क्षणिक, अस्थायी तथा तात्कालिक हितों की उपेक्षा की जाए और जो सम्पूर्ण राष्ट्र की वाणी बनने की क्षमता रखती हो।

इन मानकों पर कसने के बाद गाँधी जी का निष्कर्ष था कि ‘बहुभाषी भारत में केवल हिन्दी ही एक भाषा है जिसमें ये सभी गुण पाए जाते हैं’।

यहाँ इसको रेखांकित करना अप्रसांगिक न होगा कि हिन्दीतर भाषी राष्ट्रीय नेताओं ने जहाँ देश की अखंडता एवं एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार की अनिवार्यता की पैरोकारी की वहीं भारत के सभी राष्ट्रीय नेताओं ने एकमतेन सरल एवं सामान्य जनता द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी का प्रयोग करने एवं हिन्दी उर्दू की एकता पर बल दिया। मैंने हिन्दी एवं उर्दू के अद्वैत पर विस्तार से विवेचन किया है। इसके लिंक के बारे में आगे उल्लेख किया जाएगा।

जब अटल जी प्रधान मंत्री बने। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में बोले। आशा जगी। मैंने उस समय जोर डाला था कि भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं की सूची में हिन्दी को भी शामिल कराने की कोशिश करे। मैंने भारत सरकार के तत्कालीन नेताओं को बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाओं में चीनी भाषा को छोड़कर हिन्दी के बोलनेवालों की संख्या अन्य 5 आधिकारिक भाषाओं के बोलने वालों से अधिक है। आलेख चर्चित भी हुआ। बाद में यह इन्टरनेट पर भी आया।

उस समय तत्कालीन सरकार के लोगों का आकलन था कि हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए काम करेंगे तो दक्षिण भारत के लोगों पर विपरीत प्रतिक्रिया होगी। भाजपा के एक बड़े नेता ने मुझसे कहा कि जयललिता नाराज हो जाएँगी। हमें सरकार चलानी है। मैंने विस्तार से बताया कि दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रति हिन्दी के प्रचारकों के मन में अगाध प्रेम है। मगर मेरी बात का कोई असर नहीं हुआ। जो व्यक्ति दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के सम्बंध में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, वे मेरे निम्न आलेख का अध्ययन कर सकते हैं –

स्वाधीनता संग्राम के युग में दक्षिण-भारत में हिन्दी का प्रचार-प्रसार

http://www.rachanakar.org/2013/07/blog-post_4027.html

 

मैं सन् 1992 से लेकर सन् 2001 तक केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का निदेशक था। मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूँ कि केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों का अधिकांश काम अंग्रेजी में ही होता है।राजनेता मंत्री पद पर बैठने के बाद अपने मंत्रालय में पदस्थ अधिकारियों की सलाह के अनुरूप काम करते हैं। अधिकांश अधिकारी अंग्रेजी मोह से ग्रसित हैं। अगर वे हिन्दी के प्रति समर्थक टिप्पण लिखें तो कोई कारण नहीं है कि हिन्दी का प्रयोग न बढ़े अथवा कोई भी ताकत हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने में सफलता प्राप्त कर सके। सन् 1992 में मध्य प्रदेश के एक माननीय मंत्री ने भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय से मध्य प्रदेश की हिन्दी की एक क्षेत्रीय उपभाषा की “भाषा अकादमी” स्थापित करने के लिए अनुदान की माँग की। मंत्रालय ने उनका माँग पत्र मेरे पास टिप्पण देने के लिए भेजा। मैंने टिप्पण लिखा: “भारत सरकार को इस माँग पर विचार करने के पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मध्य प्रदेश हिन्दी भाषी राज्य है अथवा बुन्देली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, छत्तीसगढ़ी आदि भाषाओं का राज्य है”। मेरे टिप्पण के बाद मध्य प्रदेश के मंत्री जी का प्रस्ताव ठंढ़े बस्ते में डाल दिया गया। जब से विश्व के प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथों ने यह स्वीकार किया है कि चीनी भाषा के बाद हिन्दी के मातृभाषियों की संख्या सर्वाधिक है, कुछ ताकतें अपनी पूरी शक्ति से हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का कुचक्र एवं षड़यंत्र रच रही हैं। यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि हिन्दी का मतलब केवल खड़ी बोली है। सामान्य व्यक्ति ही नहीं, हिन्दी के तथाकथित विद्वान भी हिन्दी का अर्थ खड़ी बोली मानने की भूल कर रहे हैं। हिन्दी साहित्य को जिंदगी भर पढ़ाने वाले, हिन्दी की रोजी-रोटी खाने वाले, हिन्दी की कक्षाओं में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों को विद्यापति, जायसी, तुलसीदास, सूरदास जैसे हिन्दी के महान साहित्यकारों की रचनाओं पढ़ाने वाले अध्यापक तथा इन पर शोध एवं अनुसंधान करने एवं कराने वाले आलोचक भी न जाने किस लालच में या आँखों पर पट्टी बाँधकर यह घोषणा कर रहे हैं कि हिन्दी का अर्थ तो केवल खड़ी बोली है। भाषा-विज्ञान के भाषा-भूगोल एवं बोली-विज्ञान के सिद्धांतों से अनभिज्ञ ये लोग ऐसे वक्तव्य देते हैं जैसे वे भाषा-विज्ञान के भी पंडित हैं।

किसी भाषा का मानक रूप उस भाषा का एक रूप होता है। केवल मानक भाषा ही भाषा नहीं होती। अपने भाषा-क्षेत्र में प्रयुक्त समस्त भाषिक-रूपों की समष्टि का नाम “भाषा” है। यह भाषावैज्ञानिक तथ्य है। संसार भर के भाषावैज्ञानिक इसको स्वीकार करते हैं। बोली विज्ञान एवं भाषा-भूगोल का अध्ययन करने पर इस सत्य का सहज ज्ञान हो जाएगा। हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने की साजिश रचने वालों के इरादों का पता लगाया जाना चाहिए। वे किस कारण से यह पाप कर रहे हैं। वे अपने अज्ञान के कारण ऐसा कर रहे है अथवा किसी स्वार्थ के कारण ऐसा कर रहे हैं – इसको जानना चाहिए। मैं यह कहने से अपने को नहीं रोक पा रहा हूँ कि अनेक ताकतों के द्वारा हिन्दी भाषा क्षेत्र के अनेक भागों के लोगों के मन में क्षेत्रीय भावनाओं को उभारकर एवं भड़काकर हिन्दी की संश्लिष्ट परम्परा को छिन्न-भिन्न करने का पाप कर्म हो रहा है। हिन्दी के प्रेमियों को सचेत होने की जरूरत है। सामान्य व्यक्ति को तो जाने ही दीजिए, इस सम्बंध में हिन्दी के अनेक विद्वानों तथा आलोचकों के विचार और अवधारणाएँ भी संशयग्रस्त / संदिग्ध / दुविधाग्रस्त / भ्रामक हैं। उदाहरण के लिए हिन्दी की जिंदगी भर रोटी खाने वाले तथा हिन्दी के शीर्षस्थ पदों पर काम करने वाले तथा प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने सन् 2009 में हिन्दी के प्रति द्रोही, षड़यंत्रकारी एवं घातक वक्तव्य दिया हिंदी समूचे देश की भाषा नहीं है वरन वह तो अब एक प्रदेश की भाषा भी नहीं है। उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों की भाषा भी हिंदी नहीं है। वहाँ की क्षेत्रीय भाषाएँ यथा अवधी, भोजपुरी, मैथिल आदि हैं। यह मेरी बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है। नामवर सिंह जैसे लोगों को उत्तर देने तथा उनके समान भ्रमित हिन्दी के अन्य विद्वानों को वस्तुस्थिति से अवगत कराने के लिए मैंने सन् 2009 में एक लेख लिखा। जो पाठक चाहें वे उस लेख को पढ़ सकते हैं, जिसका लिंक हैः

रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख : क्‍या उत्‍तर प्रदेश एवं बिहार हिन्‍दी भाषी राज्‍य नहीं हैं?

www.rachanakar.org/2009/09/blog-post_08.html

 

हिन्दी के प्रेमियों से मेरा यह अनुरोध है कि इस लेख का अध्ययन करने की अनुकंपा करें जिससे जो ताकतें हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का षड़यंत्र कर रहीं हैं, वे बेनकाब हो सकें। हिन्दी के घर के क्या अर्थ है। यह जानना जरूरी है। संसार की प्रत्येक भाषा का भाषा-क्षेत्र होता है। यही उसका घर होता है।

‘हिन्‍दी भाषा क्षेत्र’ के उपभाषिक रूप

‘हिन्‍दी भाषा क्षेत्र’ के अन्‍तर्गत भारत के निम्‍नलिखित राज्‍य एवं केन्‍द्र शासित प्रदेश समाहित हैं –

  1. उत्‍तर प्रदेश
  2. उत्‍तराखंड
  3. बिहार
  4. झारखंड
  5. मध्‍यप्रदेश
  6. छत्‍तीसगढ़
  7. राजस्‍थान
  8. हिमाचल प्रदेश
  9. हरियाणा
  10. दिल्‍ली
  11. चण्‍डीगढ़।

भारत के संविधान की दृष्‍टि से यही स्‍थिति है।भाषाविज्ञान का प्रत्‍येक विद्‌यार्थी जानता है कि प्रत्‍येक भाषा क्षेत्र में भाषिक भिन्‍नताएँ होती हैं। किसी ऐसी भाषा की कल्‍पना नहीं की जा सकती जो जिस ‘भाषा क्षेत्र’ में बोली जाती है उसमें किसी प्रकार की क्षेत्रगत एवं वर्गगत भिन्‍नताएँ न हों। भिन्‍नत्‍व की दृष्‍टि से तो किसी भाषा क्षेत्र में जितने बोलने वाले व्‍यक्‍ति रहते हैं उस भाषा की उतनी ही ‘व्‍यक्‍ति बोलियाँ’ होती हैं। इसी कारण यह कहा जाता है कि भाषा की संरचक ‘बोलियाँ’ होती हैं तथा बोलियों की संरचक ‘व्‍यक्‍ति बोलियाँ’। इसी को इस प्रकार भी कह सकते हैं कि ‘व्‍यक्‍ति बोलियों’ के समूह को ‘बोली’ तथा ‘बोलियों’ के समूह को भाषा कहते हैं। बोलियों की समष्‍टि का नाम ही भाषा है। किसी भाषा की बोलियों से इतर व्‍यवहार में सामान्‍य व्‍यक्‍ति भाषा के जिस रूप को ‘भाषा’ के नाम से अभिहित करते हैं वह तत्‍वतः भाषा नहीं होती। भाषा का यह रूप उस भाषा क्षेत्र के किसी बोली अथवा बोलियों के आधार पर विकसित उस भाषा का ‘मानक भाषा रूप’/’व्‍यावहारिक भाषा रूप’ होता है। भाषा विज्ञान से अनभिज्ञ व्‍यक्‍ति इसी को ‘भाषा’ कहने लगते हैं तथा ‘भाषा क्षेत्र’ की बोलियों को अविकसित, हीन एवं गँवारू कहने, मानने एवं समझने लगते हैं।

भारतीय भाषिक परम्‍परा इस दृष्‍टि से अधिक वैज्ञानिक रही है। भारतीय परम्‍परा ने भाषा के अलग अलग क्षेत्रों में बोले जाने वाले भाषिक रूपों को ‘देस भाखा अथवा देसी भाषा’ के नाम से पुकारा तथा घोषणा की कि देसी वचन सबको मीठे लगते हैं – ‘ देसिल बअना सब जन मिट्‌ठा ‘। ( विशेष अध्‍ययन के लिए देखें – प्रोफेसर महावीर सरन जैन ः भाषा एवं भाषा विज्ञान, अध्‍याय 4 – भाषा के विविधरूप एवं प्रकार, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1985 ) हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में हिन्‍दी की मुख्‍यतः 20 बोलियाँ अथवा उपभाषाएँ बोली जाती हैं। इन 20 बोलियों अथवा उपभाषाओं को ऐतिहासिक परम्‍परा से पाँच वर्गों में विभक्‍त किया जाता है – पश्‍चिमी हिन्‍दी, पूर्वी हिन्‍दी, राजस्‍थानी हिन्‍दी, बिहारी हिन्‍दी और पहाड़ी हिन्‍दी।

  • पश्‍चिमी हिन्‍दी – खड़ी बोली 2. ब्रजभाषा 3. हरियाणवी 4. बुन्‍देली 5. कन्‍नौजी
  • पूर्वी हिन्‍दी – 1. अवधी 2. बघेली 3. छत्‍तीसगढ़ी
  • राजस्‍थानी – 1. मारवाड़ी 2. मेवाती 3. जयपुरी 4.मालवी
  • बिहारी – 1. भोजपुरी 2. मैथिली 3. मगही 4. अंगिका 5. बज्जिका
  • पहाड़ी –   1. कूमाऊँनी 2. गढ़वाली 3. हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली हिन्‍दी की अनेक बोलियाँ जिन्‍हें आम बोलचाल में ‘ पहाड़ी ‘ नाम से पुकारा जाता है।

टिप्पण –

(क) मैथिली – मैथिली को अलग भाषा का दर्जा दे दिया गया है हॉलाकि हिन्‍दी साहित्‍य के पाठ्‌यक्रम में अभी भी मैथिली कवि विद्‌यापति पढ़ाए जाते हैं तथा जब नेपाल में मैथिली आदि भाषिक रूपों के बोलने वाले मधेसी लोगों पर दमनात्‍मक कार्रवाई होती है तो वे अपनी पहचान ‘हिन्‍दी भाषी’ के रूप में उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार मुम्‍बई में रहने वाले भोजपुरी, मगही, मैथिली एवं अवधी आदि बोलने वाले अपनी पहचान ‘हिन्‍दी भाषी’ के रूप में करते हैं।

(ख) छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी – जबसे मैथिली एवं छत्तीसगढ़ी को अलग भाषाओं का दर्जा मिला है तब से भोजपुरी को भी अलग भाषा का दर्जा दिए जाने की माँग प्रबल हो गई है। हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का सिलसिला मैथिली एवं छत्तीसगढ़ी से आरम्भ हो गया है। मैथिली पर टिप्पण लिखा जा चुका है। छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी के सम्बंध में कुछ विचार द्रष्ट्व्य हैं।

जब तक छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का हिस्सा था तब तक छत्तीसगढ़ी को हिन्दी की बोली माना जाता था। रायपुर विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. रमेश चन्द्र महरोत्रा का सन् 1976 में “ Distance among Twenty-Two Dialects of Hindi depending on the parallel forms of the most frequent sixty-two words of Hindi” शीर्षक आलेख रायपुर से भाषिकी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ जिसमें हिन्दी की 22 बोलियों के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी समाहित है। मैं भोजपुरी के सम्बंध में भी कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। लेखक को जबलपुर के विश्वविद्यालय में डॉ. उदय नारायण तिवारी जी के साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भोजपुरी की भाषिक स्थिति को लेकर अकसर हमारे बीच विचार विमर्श होता था। उनके जामाता डॉ. शिव गोपाल मिश्र उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष व्याख्यानमाला आयोजित करते हैं। इस वर्ष 26 जून, 2013 को मुझे हिन्दुस्तानी एकाडमी, इलाहाबाद के श्री बृजेशचन्द्र का डॉ. उदय नारायण तिवारी व्याख्यानमाला का आमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ। व्याख्यान का विषय भोजपुरी भाषा था। मैंने उसी दिन व्याख्यान के सम्बंध में डॉ. शिव गोपाल मिश्र को जो पत्र लिखा उसका व्याख्यान के विषय से सम्बंधित अंश पाठको के अवलोकनार्थ अविकल प्रस्तुत है –

“डॉ. उदय नारायण तिवारी जी ने भोजपुरी का भाषावैज्ञानिक अध्ययन किया। उनके अध्ययन का वही महत्व है जो सुनीति कुमार चटर्जी के बांग्ला पर सम्पन्न कार्य का है। इस विषय पर हमारे बीच अनेक बार संवाद हुए। कई बार मत भिन्नता भी हुई। जब मैं भाषा-भूगोल एवं बोली-विज्ञान के सिद्धांतों के आलोक में हिन्दी भाषा-क्षेत्र की विवेचना करता था तो डॉ. तिवारी जी इस मत से सहमत हो जाते थे कि हिन्दी भाषा-क्षेत्र के अंतर्गत भारत के जितने राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेश समाहित हैं, उन समस्त क्षेत्र में जो भाषिक रूप बोले जाते हैं, उनकी समष्टि का नाम हिन्दी है। खड़ी बोली ही हिन्दी नहीं है अपितु यह भी हिन्दी भाषा-क्षेत्र का उसी प्रकार एक क्षेत्रीय भेद है जिस प्रकार हिन्दी भाषा-क्षेत्र के अन्य अनेक क्षेत्रीय भेद हैं। मगर कभी-कभी उनका तर्क होता था कि खड़ी बोली बोलने वाले और भोजपुरी बोलने वालों के बीच बोधगम्यता बहुत कम होती है। इस कारण भोजपुरी को यदि अलग भाषा माना जाता है तो इसमें क्या हानि है। जब मैं कहता था कि भाषाविज्ञान का सिद्धांत है कि संसार में प्रत्येक भाषा-क्षेत्र में भाषिक भिन्नताएँ होती हैं। हम ऐसी किसी भाषा की कल्पना नहीं कर सकते जिसके भाषा-क्षेत्र में क्षेत्रगत एवं वर्गगत भिन्नताएँ न हों। इस पर डॉ. तिवारी जी असमंजस में पड़ जाते थे। अनेक वर्षों के संवाद के अनंतर एक दिन डॉ. तिवारी जी ने मुझे अपने मन के रहस्य से अवगत कराया। उनके शब्द थेः

“जब मैं ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के अपने अध्ययन के आधार पर विचार करता हूँ तो मुझे भोजपुरी की स्थिति हिन्दी से अलग भिन्न भाषा की लगती है मगर जब मैं संकालिक भाषाविज्ञान के सिद्धांतों की दृष्टि से सोचता हूँ तो पाता हूँ कि भोजपुरी भी हिन्दी भाषा-क्षेत्र का एक क्षेत्रीय रूप है”।

विनय है कि भोजपुरी को अलग भाषा का दर्जा दिलाने के लिए कटिबद्ध चिंतक तटस्थ भाव से इस पर मनन करें।

(ग) राजस्थानी – सन् 1978 में, मैं “श्रीमद् जवाहराचार्य स्मृति व्याख्यानमाला” के अंतर्गत “विश्व शान्ति एवं अहिंसा” विषय पर व्याख्यान देने कलकत्ता (कोलकोता) गया था। वहाँ सरदारमल जी कांकरिया के निवास पर मेरा संवाद राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए आन्दोलन चलाने वाले तथा राजस्थानी में “धरती धौरां री” एवं “पातल और पीथल” जैसी कृतियों की रचना करने वाले कन्हैया लाल सेठिया जी से हुआ। उनका आग्रह था कि राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा का दर्जा मिलना चाहिए। मैंने उनसे अपने आग्रह पर पुनर्विचार करने की कामना व्यक्त की और मुख्यतः निम्न मुद्दों पर विचार करने का अनुरोध किया –

(1) ग्रियर्सन ने ऐतिहासिक दृष्टि से विचार किया है। स्वाधीनता आन्दोलन में हमारे राष्ट्रीय नेताओं के कारण हिन्दी का जितना प्रचार प्रसार हुआ उसके कारण हमें ग्रियर्सन की दृष्टि से नहीं अपितु डॉ. धीरेन्द्र वर्मा आदि भाषाविदों की दृष्टि से विचार करना चाहिए।

(2) राजस्थानी भाषा जैसी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। राजस्थान में 1. मारवाड़ी 2..मेवाती 3. जयपुरी 4.मालवी आदि विविध भाषिक रूप बोले जाते हैं जिन्हें हिन्दी के रूप मानने में क्या आपत्ति हो सकती है।

(3) यदि आप राजस्थानी का मतलब केवल मारवाड़ी से लेंगे तो क्या मेवाड़ी, मेवाती, जयपुरी, मालवी, हाड़ौती, शेखावाटी आदि अन्य भाषिक रूपों के बोलने वाले अपने अपने भाषिक रूपों के लिए आवाज़ नहीं उठायेंगे।

(4) भारत की भाषिक परम्परा रही है कि एक भाषा के हजारों भूरि भेद माने गए हैं मगर अंतर क्षेत्रीय सम्पर्क के लिए एक भाषा की मान्यता रही है।

(5) हिन्दी साहित्य की संश्लिष्ट परम्परा रही है। इसी कारण हिन्दी साहित्य के अंतर्गत रास एवं रासो साहित्य की रचनाओं का भी अध्ययन किया जाता है।

(6) राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित हिन्दी कथा साहित्य एवं हिन्दी फिल्मों में जिस राजस्थानी मिश्रित हिन्दी का प्रयोग होता है उसे हिन्दी भाषा क्षेत्र के प्रत्येक भाग का रहने वाला समझ लेता है।

(7) मारवाड़ी लोग व्यापार के कारण भारत के प्रत्येक राज्य में निवास करते हैं तथा अपनी पहचान हिन्दी भाषी के रूप में करते हैं। यदि आप राजस्थानी को हिन्दी से अलग मान्यता दिलाने का प्रयास करेंगे तो राजस्थान के बाहर रहने वाले मारवाड़ी व्यापारियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।

(8) भारतीय भाषाओं के अस्तित्व एवं महत्व को अंग्रेजी से खतरा है। संसार में अंग्रेजी भाषियों की जितनी संख्या है उससे अधिक संख्या केवल हिन्दी भाषियों की है। यदि हिन्दी के उपभाषिक रूपों को हिन्दी से अलग मान लिया जाएगा तो भारत की कोई भाषा अंग्रेजी से टक्कर नहीं ले सकेगी और धीरे धीरे भारतीय भाषाओं के अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा।

(घ) पहाड़ी – डॉ. सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने ‘पहाड़ी’ समुदाय के अन्‍तर्गत बोले जाने वाले भाषिक रूपों को तीन शाखाओं में बाँटा –

(अ) पूर्वी पहाड़ी अथवा नेपाली

(आ) मध्‍य या केन्‍द्रीय पहाड़ी

(इ)पश्‍चिमी पहाड़ी।

हिन्‍दी भाषा के संदर्भ में वर्तमान स्‍थिति यह है कि हिन्‍दी भाषा के अन्‍तर्गत मध्‍य या केन्‍द्रीय पहाड़ी की उत्‍तराखंड में बोली जाने वाली 1. कूमाऊँनी 2. गढ़वाली तथा पश्‍चिमी पहाड़ी की हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली हिन्‍दी की अनेक बोलियाँ हैं जिन्‍हें आम बोलचाल में ‘ पहाड़ी ‘ नाम से पुकारा जाता है।

हिन्‍दी भाषा के संदर्भ में विचारणीय है कि अवधी, बुन्‍देली, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली आदि को हिन्‍दी भाषा की बोलियाँ माना जाए अथवा उपभाषाएँ माना जाए। सामान्‍य रूप से इन्‍हें बोलियों के नाम से अभिहित किया जाता है किन्‍तु लेखक ने अपने ग्रन्‍थ ‘ भाषा एवं भाषाविज्ञान’ में इन्‍हें उपभाषा मानने का प्रस्‍ताव किया है। ‘ – – क्षेत्र, बोलने वालों की संख्‍या तथा परस्‍पर भिन्‍नताओं के कारण इनको बोली की अपेक्षा उपभाषा मानना अधिक संगत है। ( भाषा एवं भाषाविज्ञान, पृष्‍ठ 60)

इसी ग्रन्‍थ में लेखक ने पाठकों का ध्‍यान इस ओर भी आकर्षित किया कि हिन्‍दी की कुछ उपभाषाओं के भी क्षेत्रगत भेद हैं जिन्‍हें उन उपभाषाओं की बोलियों अथवा उपबोलियों के नाम से पुकारा जा सकता है।

यहाँ यह भी उल्‍लेखनीय है कि इन उपभाषाओं के बीच कोई स्‍पष्‍ट विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है। प्रत्‍येक दो उपभाषाओं के मध्‍य संक्रमण क्षेत्र विद्‌यमान है।

हिन्‍दी भाषा का मानक भाषा रूप

विश्‍व की प्रत्‍येक भाषा के विविध बोली अथवा उपभाषा क्षेत्रों में से विभिन्न सांस्‍कृतिक कारणों से जब कोई एक क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक महत्‍वपूर्ण हो जाता है तो उस क्षेत्र के भाषा रूप का सम्‍पूर्ण भाषा क्षेत्र में प्रसारण होने लगता है। इस क्षेत्र के भाषारूप के आधार पर पूरे भाषाक्षेत्र की ‘मानक भाषा’ का विकास होना आरम्‍भ हो जाता है। भाषा के प्रत्‍येक क्षेत्र के निवासी इस भाषारूप को ‘मानक भाषा’ मानने लगते हैं। इसको मानक मानने के कारण यह मानक भाषा रूप ‘भाषा क्षेत्र’ के लिए सांस्‍कृतिक मूल्‍यों का प्रतीक बन जाता है। मानक भाषा रूप की शब्‍दावली, व्याकरण एवं उच्‍चारण का स्‍वरूप अधिक निश्चित एवं स्‍थिर होता है एवं इसका प्रचार, प्रसार एवं विस्‍तार पूरे भाषा क्षेत्र में होने लगता है। कलात्‍मक एवं सांस्‍कृतिक अभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम एवं शिक्षा का माध्‍यम यही मानक भाषा रूप हो जाता है। इस प्रकार भाषा के ‘मानक भाषा रूप’ का आधार उस भाषाक्षेत्र की क्षेत्रीय बोली अथवा उपभाषा ही होती है, किन्‍तु मानक भाषा होने के कारण चूँकि इसका प्रसार अन्‍य बोली क्षेत्रों अथवा उपभाषा क्षेत्रों में होता है इस कारण इस भाषारूप पर ‘भाषा क्षेत्र’ की सभी बोलियों का प्रभाव पड़ता है तथा यह भी सभी बोलियों अथवा उपभाषाओं को प्रभावित करता है। उस भाषा क्षेत्र के शिक्षित व्‍यक्‍ति औपचारिक अवसरों पर इसका प्रयोग करते हैं। भाषा के मानक भाषा रूप को सामान्‍य व्‍यक्‍ति अपने भाषा क्षेत्र की ‘मूल भाषा’, केन्‍द्रक भाषा’, ‘मानक भाषा’ के नाम से पुकारते हैं। यदि किसी भाषा का क्षेत्र हिन्‍दी भाषा की तरह विस्‍तृत होता है तथा यदि उसमें ‘हिन्‍दी भाषा क्षेत्र’ की भाँति उपभाषाओं एवं बोलियों की अनेक परतें एवं स्‍तर होते हैं तो ‘मानक भाषा’ के द्वारा समस्‍त भाषा क्षेत्र में विचारों का आदान प्रदान सम्‍भव हो पाता है। भाषा क्षेत्र के यदि आंशिक अबोधगम्‍य उपभाषी अथवा बोली बोलने वाले परस्‍पर अपनी उपभाषा अथवा बोली के माध्‍यम से विचारों का समुचित आदान प्रदान नहीं कर पाते तो इसी मानक भाषा के द्वारा संप्रेषण करते हैं। भाषा विज्ञान में इस प्रकार की बोधगम्‍यता को ‘पारस्‍परिक बोधगम्‍यता’ न कहकर ‘एकतरफ़ा बोधगम्‍यता’ कहते हैं। ऐसी स्‍थिति में अपने क्षेत्र के व्‍यक्‍ति से क्षेत्रीय बोली में बातें होती हैं किन्‍तु दूसरे उपभाषा क्षेत्र अथवा बोली क्षेत्र के व्‍यक्‍ति से अथवा औपचारिक अवसरों पर मानक भाषा के द्वारा बातचीत होती हैं। इस प्रकार की भाषिक स्‍थिति को फर्गुसन ने बोलियों की परत पर मानक भाषा का अध्‍यारोपण कहा है (डायग्‍लोसियाः वॅर्ड, 15 पृष्‍ठ 325 – 340) तथा गम्‍पर्ज़ ने इसे ‘बाइलेक्‍टल’ के नाम से पुकारा है। (स्‍पीच वेरिएशन एण्‍ड दः स्‍टडी ऑफ इंडियन सिविलाइज़ेशन, अमेरिकन एनथ्रोपोलोजिस्‍ट, खण्‍ड 63,पृष्‍ठ 976- 988)।

हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में सामाजिक संप्रेषण

हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में अनेक क्षेत्रगत भेद एवं उपभेद तो है हीं; प्रत्‍येक क्षेत्र के प्रायः प्रत्‍येक गाँव में सामाजिक भाषिक रूपों के विविध स्‍तरीकृत तथा जटिल स्‍तर विद्‌यमान हैं और यह हिन्‍दी के सामाजिक संप्रेषण की वास्‍वविकता है। ये हिन्‍दी पट्‌टी के अंदर सामाजिक संप्रेषण के विभिन्‍न नेटवर्कों के बीच संवाद के कारक हैं। इस हिन्‍दी भाषा क्षेत्र अथवा पट्‌टी के गावों के रहनेवालों के वाग्‍व्‍यवहारों का गहराई से अध्‍ययन करने पर पता चलता है कि ये भाषिक स्‍थितियाँ इतनी विविध, विभिन्‍न एवं मिश्र हैं कि भाषा व्‍यवहार के स्‍केल के एक छोर पर हमें ऐसा व्‍यक्‍ति मिलता है जो केवल स्‍थानीय बोली बोलना जानता है तथा जिसकी बातचीत में स्‍थानीयेतर कोई प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता वहीं दूसरे छोर पर हमें ऐसा व्‍यक्‍ति मिलता है जो ठेठ मानक हिन्‍दी का प्रयोग करता है तथा जिसकी बातचीत में कोई स्‍थानीय भाषिक प्रभाव परिलक्षित नहीं होता। स्‍केल के इन दो दूरतम छोरों के बीच बोलचाल के इतने विविध रूप मिल जाते हैं कि उन सबका लेखा जोखा प्रस्‍तुत करना असाध्‍य हो जाता है। हमें ऐसे भी व्‍यक्‍ति मिल जाते हैं जो एकाधिक भाषिक रूपों में दक्ष होते हैं जिसका व्‍यवहार तथा चयन वे संदर्भ, व्‍यक्‍ति, परिस्‍थियों को ध्‍यान में रखकर करते हैं। सामान्‍य रूप से हम पाते हैं कि अपने घर के लोगों से तथा स्‍थानीय रोजाना मिलने जुलने वाले घनिष्‍ठ मित्रों से व्‍यक्‍ति जिस भाषा रूप में बातचीत करता है उससे भिन्‍न भाषा रूप का प्रयोग वह उनसे भिन्‍न व्‍यक्‍तियों एवं परिस्‍थितियों में करता है। सामाजिक संप्रेषण के अपने प्रतिमान हैं। व्‍यक्‍ति प्रायः वाग्‍व्‍यवहारों के अवसरानुकूल प्रतिमानों को ध्‍यान में रखकर बातचीत करता है।

हम यह कह चुके हैं कि किसी भाषा क्षेत्र की मानक भाषा का आधार कोई बोली अथवा उपभाषा ही होती है किन्‍तु कालान्‍तर में उक्‍त बोली एवं मानक भाषा के स्‍वरूप में पर्याप्‍त अन्‍तर आ जाता है। सम्‍पूर्ण भाषा क्षेत्र के शिष्‍ट एवं शिक्षित व्‍यक्‍तियों द्वारा औपचारिक अवसरों पर मानक भाषा का प्रयोग किए जाने के कारण तथा साहित्‍य का माध्‍यम बन जाने के कारण स्‍वरूपगत परिवर्तन स्‍वाभाविक है। प्रत्‍येक भाषा क्षेत्र में किसी क्षेत्र विशेष के भाषिक रूप के आधार पर उस भाषा का मानक रूप विकसित होता है, जिसका उस भाषा-क्षेत्र के सभी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे व्‍यक्‍ति औपचारिक अवसरों पर प्रयोग करते हैं। हम पाते हैं कि इस मानक हिन्‍दी अथवा व्‍यावहारिक हिन्‍दी का प्रयोग सम्‍पूर्ण हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में बढ़ रहा है तथा प्रत्‍येक हिन्‍दी भाषी व्‍यक्‍ति शिक्षित, सामाजिक दृष्‍टि से प्रतिष्‍ठित तथा स्‍थानीय क्षेत्र से इतर अन्‍य क्षेत्रों के व्‍यक्‍तियों से वार्तालाप करने के लिए इसी को आदर्श, श्रेष्‍ठ एवं मानक मानता है। गाँव में रहने वाला एक सामान्‍य एवं बिना पढ़ा लिखा व्‍यक्‍ति भले ही इसका प्रयोग करने में समर्थ तथा सक्षम न हो फिर भी वह इसके प्रकार्यात्‍मक मूल्‍य को पहचानता है तथा वह भी अपने भाषिक रूप को इसके अनुरूप ढालने की जुगाड़ करता रहता है। जो मजदूर शहर में काम करने आते हैं वे किस प्रकार अपने भाषा रूप को बदलने का प्रयास करते हैं – इसको देखा परखा जा सकता है। [सन् 1960 में लेखक ने बुलन्द शहर एवं खुर्जा तहसीलों (ब्रज एवं खड़ी बोली का संक्रमण क्षेत्र) के भाषिक रूपों का संकालिक अथवा एककालिक भाषावैज्ञानिक अध्ययन करना आरम्भ किया। सामग्री संकलन के लिए जब लेखक गाँवों में जाता था तथा वहाँ रहने वालों से बातचीत करता था तबके उनके भाषिक रूपों एवं आज लगभग 50 वर्षों के बाद के भाषिक रूपों में बहुत अंतर आ गया है। मानक हिन्दी अथवा व्यावहारिक हिन्दी का प्रभाव आसानी से पहचाना जा सकता है। अंग्रेजी शब्दों का चलन भी बढ़ा है। यह कहना अप्रासंगिक होगा कि उनकी जिन्दगी में और व्यवहार में भी बहुत बदलाव आया है।] पूरे भाषा क्षेत्र में इसका व्‍यवहार होने तथा इसके प्रकार्यात्‍मक प्रचार-प्रसार के कारण विकसित भाषा का मानक रूप भाषा क्षेत्र के समस्‍त भाषिक रूपों के बीच संपर्क सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी मानक भाषा रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है।

 

हिन्‍दी के क्षेत्रगत प्रभेदों के अध्ययन के प्रतिमान तथा हिन्दी भाषा

हिन्‍दी भाषा का क्षेत्र बहुत विस्‍तृत है। इस कारण इसकी क्षेत्रगत भिन्‍नताएँ भी बहुत अधिक हैं।‘खड़ी बोली’ हिन्‍दी भाषा क्षेत्र का उसी प्रकार एक भेद है ; जिस प्रकार हिन्‍दी भाषा के अन्‍य बहुत से क्षेत्रगत भेद हैं। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र में ऐसी बहुत सी उपभाषाएँ हैं जिनमें पारस्‍परिक बोधगम्‍यता का प्रतिशत बहुत कम है किन्‍तु ऐतिहासिक एवं सांस्‍कृतिक दृष्‍टि से सम्‍पूर्ण भाषा क्षेत्र एक भाषिक इकाई है तथा इस भाषा-भाषी क्षेत्र के बहुमत भाषा-भाषी अपने-अपने क्षेत्रगत भेदों को हिन्‍दी भाषा के रूप में मानते एवं स्‍वीकारते आए हैं कुछ विद्वानों ने इस भाषा क्षेत्र को हिन्‍दी पट्‌टी के नाम से पुकारा है तथा कुछ ने इस हिन्‍दी भाषी क्षेत्र के निवासियों के लिए ‘हिन्‍दी जाति’ का अभिधान दिया है। वस्‍तु स्‍थिति यह है कि हिन्‍दी, चीनी एवं रूसी जैसी भाषाओं के क्षेत्रगत प्रभेदों की विवेचना यूरोप की भाषाओं के आधार पर विकसित पाश्‍चात्‍य भाषाविज्ञान के प्रतिमानों के आधार पर नहीं की जा सकती।

जिस प्रकार अपने 29 राज्‍यों एवं 07 केन्‍द्र शासित प्रदेशों को मिलाकर भारतदेश है, उसी प्रकार भारत के जिन राज्‍यों एवं शासित प्रदेशों को मिलाकर हिन्‍दी भाषा क्षेत्र है, उस हिन्‍दी भाषा-क्षेत्र के अन्‍तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उनकी समाष्‍टि का नाम हिन्‍दी भाषा है। हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के प्रत्‍येक भाग में व्‍यक्‍ति स्‍थानीय स्‍तर पर क्षेत्रीय भाषा रूप में बात करता है। औपचारिक अवसरों पर तथा अन्‍तर-क्षेत्रीय, राष्‍ट्रीय एवं सार्वदेशिक स्‍तरों पर भाषा के मानक रूप अथवा व्‍यावहारिक हिन्‍दी का प्रयोग होता है। आप विचार करें कि उत्तर प्रदेश हिन्‍दी भाषी राज्‍य है अथवा खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्‍नौजी, अवधी, बुन्‍देली आदि भाषाओं का राज्‍य है। इसी प्रकार मध्‍य प्रदेश हिन्‍दी भाषी राज्‍य है अथवा बुन्‍देली, बघेली, मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं का राज्‍य है। जब संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका की बात करते हैं तब संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के अन्‍तर्गत जितने राज्‍य हैं उन सबकी समष्‍टि का नाम ही तो संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका है। विदेश सेवा में कार्यरत अधिकारी जानते हैं कि कभी देश के नाम से तथा कभी उस देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा होती है। वे ये भी जानते हैं कि देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा भले ही होती है, मगर राजधानी ही देश नहीं होता। इसी प्रकार किसी भाषा के मानक रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक रूप होता है ः मानक भाषा ही भाषा नहीं होती। इसी प्रकार खड़ी बोली के आधार पर मानक हिन्‍दी का विकास अवश्‍य हुआ है किन्‍तु खड़ी बोली ही हिन्‍दी नहीं है। तत्‍वतः हिन्‍दी भाषा क्षेत्र के अन्‍तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उन सबकी समष्‍टि का नाम हिन्दी है। हिन्‍दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने के षडयंत्र को विफल करने की आवश्‍कता है तथा इस तथ्‍य को बलपूर्वक रेखांकित, प्रचारित एवं प्रसारित करने की आवश्‍यकता है कि सन् 1991 की भारतीय जनगणना के अंतर्गत भारतीय भाषाओं के विश्‍लेषण का जो ग्रन्‍थ प्रकाशित हुआ है उसमें मातृभाषा के रूप में हिन्‍दी को स्‍वीकार करने वालों की संख्‍या का प्रतिशत उत्‍तर प्रदेश (उत्‍तराखंड राज्‍य सहित) में 90.11, बिहार (झारखण्‍ड राज्‍य सहित) में 80.86, मध्‍य प्रदेश (छत्‍तीसगढ़ राज्‍य सहित) में 85.55, राजस्‍थान में 89.56, हिमाचल प्रदेश में 88.88, हरियाणा में 91.00, दिल्‍ली में 81.64, तथा चण्‍डीगढ़ में 61.06 है।

http://www.rachanakar.org/2012/09/blog-post_3077.html#ixzz2eqRRA0uA

 

हिन्‍दी भाषा की प्रकृति के अनुरूप प्रयोग

इतने विस्तृत क्षेत्र की भाषा होने के बावजूद हिन्दी का जितना व्यापक व्यवहार होना चाहिए था, वह क्यों नहीं हो पाया। इसका एक कारण जहाँ भारतीयों का अंग्रेजी के प्रति अतिशय मोह है वहीं दूसरी ओर जन भाषा हिन्दी के स्थान पर संस्कृत आधारित शब्दों के प्रयोग को ही बढ़ावा देने की प्रवृत्ति एवं मानसिकता भी है। हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप प्रयोग को बढ़ावा देने पर ही इसका प्रसार सम्भव है। इस सम्बंध में, मैं हिन्दी के भाषिक स्वरूप के सम्बंध में भी कुछ विचार व्यक्त करना चाहता हूँ। मेरे कुछ मित्र हिन्दी में केवल संस्कृत आधारित शब्दों के प्रयोग के हिमायती हैं। मेरा विचार अलग है। मेरा मत है कि हिन्दी भाषा के प्रसार के लिए हमें जनभाषा हिन्दी को अपनाने पर बल देना चाहिए। किसी भी विकसित भाषा के अनेक रूप और व्यवहार क्षेत्र होते हैं। यथा – (1) साहित्यिक (2) वैज्ञानिक (3) तकनीकी (4) व्यवसायिक (5) वाणिज्यिक (6) प्रशासनिक आदि आदि। इनकी अलग अलग प्रयुक्तियाँ एवं शैलियाँ होती हैं। मगर समस्त रूप जनभाषा से ही उद्भूत होते हैं। जनभाषा से इनका अलगाव कम से कम होना चाहिए। बोलचाल की सहज, रवानीदार एवं प्रवाहशील भाषा पाषाण खंडों में ठहरे हुए गंदले पानी की तरह नहीं होती। पाषाण खंडों के ऊपर से बहती हुई अजस्र धारा की तरह होती है। नदी की प्रकृति गतिमान होना है। भाषा की प्रकृति प्रवाहशील होना है।संस्कृति में परिवर्तन होता है, हमारी सोच तथा हमारी आवश्कताएँ परिवर्तित होती हैं उसी अनुपात में शब्दावली भी बदलती है। स्थिर होना जड़ होना है। बहुलतावाद को स्वीकरना गतिमान होना है। देश के यथार्थ को स्वीकारना है।

मैं इस तथ्य को रेखांकित करना चाहता हूँ कि स्वतंत्रता के बाद हमारे राजनेताओं ने हिन्दी की घोर उपेक्षा की। पहले यह तर्क दिया गया कि हिन्दी में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली का अभाव है। इसके लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग बना दिया गया। काम सौंप दिया गया कि शब्द बनाओ। शब्द गढ़ो। शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं। आयोग ने जिन शब्दों का निर्माण किया, उनमें से अधिकतर शब्द जटिल, क्लिष्ट एवं अप्रचलित थे। चूँकि शब्द गढ़ते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि वे सामान्य आदमी की समझ में आ सकें, इस कारण आयोग के द्वारा बनाए गए 80 प्रतिशत शब्द कोशों की शोभा बनकर रह गए हैं। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने तकनीकी एवं वैज्ञानिक शब्दों के निर्माण के लिए जिन विशेषज्ञों को काम सौंपा उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द अधिक गढ़े। आयोग ने जिन शब्दों का निर्माण किया उनमें से अधिकांशतः अप्रचलित, जटिल एवं क्लिष्ट हैं। सारा दोष आयोग एवं विशेषज्ञों का भी नहीं है। मैं उनसे ज्यादा दोष मंत्रालय के अधिकारियों का मानता हूँ। प्रशासनिक शब्दावली बनाने के लिए अलिखित आदेश दिए गए कि प्रत्येक शब्द की स्वीकार्यता के लिए मंत्रालय के अधिकारियों की मंजूरी ली जाए। अधिकारियों की कोशिश रही कि जिन शब्दों का निर्माण हो, वे बाजारू न हो। सरकारी भाषा बाजारू भाषा से अलग दिखनी चाहिए। मैं अपनी बात को एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहता हूँ । प्रत्येक मंत्रालय में सेक्रेटरी तथा एडिशनल सेक्रेटरी के बाद मंत्रालय के प्रत्येक विभाग में ऊपर से नीचे के क्रम में अंडर सेक्रेटरी होता है। इसके लिए निचला सचिव शब्द बनाकर मंत्रालय के अधिकारियों के पास अनुमोदन के लिए भेजा गया। अर्थ संगति की दृष्टि से शब्द संगत था। मंत्रालयों के अधिकारियों को आयोग द्वारा निर्मित शब्द पसंद नहीं आया। आदेश दिए गए कि नया शब्द बनाया जाए। आयोग के चेयरमेन ने विशेषज्ञों से अनेक वैकल्पिक शब्द बनाने का अनुरोध किया। अंडर सेक्रेटरी के लिए नए शब्द गढ़ने में विशेषज्ञों ने व्यायाम किया। जो अनेक शब्द बनाकर मंत्रालय के पास भेजे गए उनमें से मंत्रालय के अधिकारियों को “अवर” पसंद आया और वह स्वीकृत हो गया। अंडर सेक्रेटरी के लिए हिन्दी पर्याय ´अवर सचिव’ चलने लगा। मंत्रालयों में सैकड़ों अंडर सेक्रेटरी काम करते हैं और सब ´अवर सचिव’ सुनकर गर्व का अनुभव करते हैं। शायद ही किसी अंडर सेक्रेटरी को अवर के मूल अर्थ का पता हो। स्वयंबर में अनेक वर विवाह में अपनी किस्मत आजमाने आते थे। जिस वर को वधू माला पहना देती थी वह चुन लिया जाता था। जो वर वधू के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाते थे उन्हें अवर कहते थे। चूँकि शब्द गढ़ते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि वे सामान्य आदमी को समझ में आ सकें, इस कारण आयोग के द्वारा निर्मित कराए गए लगभग 80 प्रतिशत शब्द प्रचलित नहीं हो पाए। वे कोशों की शोभा बनकर रह गए हैं। एक विद्वान को आपत्ति है कि अवर शब्द अधिक उचित और गरिमामय है। मेरा मानना है कि हमें संस्कृत और हिन्दी के अन्तर को ध्यान में रखना चाहिए। निचला शब्द हिन्दी की प्रकृति के अधिक निकट है तथा जन सामान्य के लिए अधिक बोधगम्य है।

मैं राजभाषा हिन्दी के प्रयोग की स्थिति के सम्बंध में भी दो शब्द कहना चाहता हूँ। 64 वर्षों के बाद भी राजभाषा हिन्दी सरकारी मंत्रालयों में केवल अनुवाद की भाषा क्यों बनी हुई है। हिन्दी राजभाषा है और अंग्रेजी सह राजभाषा है। मगर यथार्थ यह है कि वास्तविक राजभाषा अंग्रेजी है। हिन्दी की यथार्थ स्थिति हास्यास्पद है। अंग्रेजी के मैटर का आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली में कृत्रिम, बोझिल एवं क्लिष्ट अनुवाद हिन्दी में करने मात्र से संवैधानिक दायित्व की रस्म अदायगी हो जाती है। प्रत्येक मंत्रालय के राजभाषा अधिकारी अंग्रेजी के शब्द के स्थान पर हिन्दी के शब्द रखते जाते हैं। हिन्दी भाषा की प्रकृति को ध्यान में रखकर वाक्य नहीं बनाते। इस कारण जब राजभाषा हिन्दी में अनुवादित सामग्री पढ़ने को मिलती है तो उसे समझने के लिए कसरत करनी पड़ती है। इस बारे में आगे विस्तार से चर्चा की जाएगी।

मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि लोकतंत्र में राजभाषा राजा-महाराजाओं की भाषा नहीं होती। लोकतंत्र में यह शासन और जनता के बीच संवाद की भाषा होती है। इस कारण वह आम आदमी के लिए बोधगम्य होनी चाहिए।

शब्द का पैमाना लोक प्रचलन

कोई शब्द जब तक चलन में नहीं आएगा, चलेगा नहीं। यदि लोक में प्रचलित शब्द के स्थान पर कोई नया शब्द गढ़ा जाएगा तो वह चलेगा नहीं। रेलवे स्टेशन का एक कुली कहता है कि ट्रेन अमुक प्लेटफॉर्म पर खड़ी है, या ट्रेन आनेवाली है, सिग्नव डाउन हो गया है। जब आप इन लोक प्रचलित शब्दों की जगह संस्कृत तत्सम शब्दों पर आधारित नए शब्द गढ़ेंगे तो वे गढ़े शब्द कैसे चलेंगे। बाजार में उसी सिक्के का मूल्य होता है जो बाजार में चलता है। हमें वही शब्द सरल एवं बोधगम्य लगता है जो हमारी जबान पर चढ़ जाता है। “भाखा बहता नीर”। लोक व्यवहार से भाषा बदलती रहती है। यह भाषा की प्रकृति है। जो हिन्दी प्रेमी इस दृष्टि से विस्तृत अध्ययन करना चाहते हैं, वे इसके लिए देखें –

http://www.scribd.com/doc/110501224/Bhakhaa-Bahataa-Neer

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जो जबाब भारत के नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों में दिया उसको मैंने सुना तथा प्रयुक्त अंग्रेजी के शब्दों को अपनी शक्ति-सीमा के दायरे में लिखता गया। बहुत से शब्द छूट भी गए। मैं उस भाषण में बोले गए अंग्रेजी के जिन शब्दों को लिख पाया, वे शब्द निम्नलिखित हैं: 1.स्कैम इंडिया 2. स्किल इंडिया 3. एंटरप्रेन्योरशिप 4. स्किल डेवलपमेंट 5. एजेंडा 6. रोडमैप 7. रेप 8. एफ आई आर 9. रेंज 10. कॉमन 11. ब्रेक 12.इंडस्ट्रीज़ 13. फोकस 14. मार्केटिंग 15. प्रोडक्ट । मैंने मोदी जी के इस भाषण में प्रयुक्त अंग्रेजी के शब्दों का उल्लेख अपने लेख में जानबूझकर किया। ऐसा इस कारण किया जिससे मैं उन विद्वानों को उत्तर दे सकूँ जो मूल धारा की शुद्धता को बनाए रखने के नाम पर हिन्दी में केवल संस्कृत आधारित शब्दों के प्रयोग के हिमायती है तथा भारत सरकार के राजभाषा विभाग के तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के भाषा एकक के अधिकारियों को सचेत कर सकूँ कि वे अपने भारत सरकार के राजभाषा अधिकारियों के लिए भाषा-प्रयोग सम्बंधी आदेश पर पुनर्विचार करे। भारत सरकार का राजभाषा अधिकारियों के लिए यह नियम रहा है कि वे वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के द्वारा निर्मित शब्दों का ही प्रयोग करें तथा निदेशालय की मानक हिन्दी वर्तनी के नियमों का पालन किया जाए। यह नियम सरकार के राजभाषा अधिकारियों पर थोपा जाता है। मेरा मानना है कि यह गलत है। मोदी जी ने अपने अभिभाषण में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग क्यों किया तथा उनके द्वारा प्रयुक्त अंग्रेजी के शब्द चलेंगे या नहीं चलेंगे, इसका जबाब एक विद्वान ने मुझसे माँगा है। मेरा उनको सीधा सा उत्तर है – “यह जबाब मुझसे नहीं अपितु प्रधान मंत्री मोदी जी से माँगिए”। कौन सा शब्द चलेगा और कौन सा नहीं चलेगा – इसका पैसला न तो मैं कर सकता हूँ और न मूल धारा की शुद्धता को बनाने के पक्षधर विद्वान कर सकते हैं। कोई शब्द निर्पेक्ष सरल अथवा कठिन नहीं होता। शब्द प्रचलित अथवा अप्रचलित होता है। जो शब्द प्रचलित हो जाता है वह हमें सरल लगने लगता है। इसी कारण कहा जाता है कि शब्द बाजार में चलने वाले सिक्के की तरह होता है। बाजार में जो सिक्का चलता है, उसी का मूल्य होता है। इसी परिप्रेक्ष्य में मेरा विचार है कि हम अपने रोजाना के व्यवहार में अंग्रेजी के जिन शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हैं, उनको अपना लेना चाहिए। अंग्रेजी के जिन शब्दों को हिन्दी के अखबारों एवं टी. वी. चैनलों ने अपना लिया है तथा जो जनजीवन एवं लोक में प्रचलित हो गए हैं, उनको अपनाने में संकोच नहीं करना चाहिए। मैंने अपने लेख में लिखा था कि “प्रजातंत्र में शुद्ध हिन्दी, क्लिष्ट हिन्दी, संस्कृत गर्भित हिन्दी जबरन नहीं चलाई जानी चाहिए”। एक विद्वान ने टिप्पण किया : “प्रजातंत्र में शुद्ध हिन्दी, क्लिष्ट हिन्दी, संस्कृत गर्भित हिन्दी जबरन नहीं चलाई जानी चाहिए -लेखक महोदय ने ऐसा लिखा। परन्तु क्या अशुद्ध फारसी-अरबी-अंग्रेजी गर्भित-भाषा लिखनी चाहिये- यह कौन सी, कहाँ की और कैसी विचित्र परिभाषा है प्रजातन्त्र की”। एक दूसरे विद्वान का टिप्पण था: “ संस्कृताधारित शब्द अपना पूरा परिवार लेकर भाषामें प्रवेश करता है, अंग्रेज़ी अकेला आता है, उर्दू भी अकेला आता है।नया गढा हुआ, संस्कृत शब्द भी प्रचलित होने पर सरल लगने लगता है।भाषा बदलती है, स्वीकार करता हूँ। पर उसे सुसंस्कृत भी की जा सकती है,और विकृत भी। संस्कृत रचित शब्द सहज स्वीकृत होकर कुछ काल के पश्चात रूढ हो जाएंगे।अंग्रेज़ी के शब्द जब हिंदी में प्रायोजित होते हैं, तो लुढकते लुढकते चलते हैं। उनमें बहाव का अनुभव नहीं होता।और कौनसा स्वीकार करना, कौनसा नहीं, इसका क्या निकष? आज प्रदूषित हिंदी को उसी के प्रदूषित शब्दों द्वारा विचार और प्रयोग करके शुद्ध करना है। जैसे रक्त का क्षयरोग उसी रक्त को शुद्ध कर किया जाता है”।

मेरा इन विद्वानों से निवेदन है कि वे संदर्भ को ध्यान में रखकर “शुद्ध” शब्द का अभिधेयार्थ नहीं अपितु व्यंग्यार्थ ग्रहण करने की अनुकंपा करें। प्रजातंत्र में और जबरन चलाने पर विशेष ध्यान देंगे तो शब्द प्रयोग का व्यंग्यार्थ स्वतः स्पष्ट हो जाएगा। कोई भी जीवंत एवं प्राणवान भाषा ‘अछूत’ नहीं होती। कोई भी जीवंत एवं प्राणवान भाषा अपने को शुद्ध एवं निखालिस बनाने के व्यामोह में अपने घर के दरवाजों एवं खिड़कियों को बंद नहीं करती। यदि किसी भाषा को शुद्धता की जंजीरों से जकड़ दिया जाएगा, निखालिस की लक्ष्मण रेखा से बाँध दिया जाएगा तो वह धीरे धीरे सड़ जाएगी और फिर मर जाएगी।

नाम रखने अथवा नामकरण तथा जन प्रचलित शब्द के स्थान पर नया शब्द ‘बनाने´ अथवा ‘गढ़ने´ में अन्तर है।

भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के द्वारा शब्द निर्माण पर मेरा टिप्पण था –

“उन्होंने जन-प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”

इस पर एक विद्वान ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की वह नीचे उद्धृत है –

“प्रो. जैन जो कहते हैं, उसे दो अंशों में बाँट कर सोचते हैं। क और ख।

(क) “उन्होंने जन प्रचलित शब्दों को अपनाने के स्थान पर संस्कृत का सहारा लेकर शब्द गढ़े।

(ख) शब्द बनाए नहीं जाते। गढ़े नहीं जाते। लोक के प्रचलन एवं व्यवहार से विकसित होते हैं।”

(क) “जन प्रचलित” – यह जन कोई एक व्यक्ति नहीं है। और अनेक व्यक्ति यदि प्रचलित करते हैं, तो, क्या वे एक ही शब्द जो सर्वमान्य हो, ऐसा शब्द प्रचलित कर सकते हैं?

(क१) और प्रचलित कैसे करेंगे? जब प्रत्येक का अलग शब्द होगा, तो, अराजकता नहीं जन्मेगी? और यदि ऐसा होता है, तो वैचारिक संप्रेषण कैसे किया जाए?

(ख) शब्द बनाए नहीं जाते। गढे नहीं जाते?”।

मैंने विद्वान महोदय की उपर्युक्त आपत्तियों का जो उत्तर दिया वह निम्न है।

किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु का ‘नाम रखने´ अथवा ´नामकरण करने’ तथा जन प्रचलित शब्द के स्थान पर नया शब्द ‘बनाने´ अथवा ‘गढ़ने´ में अन्तर है। ये भिन्न ´विचारों’ के वाचक हैं; भिन्न ‘संकल्पनाओं´ के बोधक हैं। आप सम्भवतः भाषाविज्ञान के विशेषज्ञ नहीं हैं, इस कारण आपकी सुविधा के लिए मैं दोनों के अन्तर एवं भेद को उदाहरणों से स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा।

“नामकरण” करना तथा जन प्रचलित शब्द के स्थान पर नया शब्द ‘गढ़ना´ –

(अ) नामकरण करना अथवा नाम रखना –

(क) व्यक्ति का नामकरण – घर में जब किसी शिशु का जन्म होता है, वह भगवान के घर से कोई नाम लेकर पैदा नहीं होता। उसका ´नामकरण’ होता है। उसका हम नाम रखते हैं। उसके लिए नाम बनाते नहीं हैं। उसके लिए नाम गढ़ते नहीं हैं। जो नाम रखते हैं, वह समाज में उस शिशु के लिए प्रचलित हो जाता है। लोक उसे उसके रखे नाम से पहचानता है। नाम व्यक्तित्व का अंग हो जाता है। नाम व्यक्ति से जुड़ जाता है।

(ख) नई व्यवस्था, नई वस्तु, नए आविष्कार के लिए नामकरण – भारत ने गुलामी की जंजीरों को काटकर स्वतंत्रता प्राप्त की। स्वाधीन होने के पहले से ही हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने स्वतंत्र भारत के संविधान के लिए ‘संविधान सभा´ का गठन कर दिया था। हमारे देश की संविधान सभा ने राजतंत्र के स्थान पर लोकतंत्र को ध्यान में रखकर संविधान बनाया। राजतंत्र में सर्वोच्च पद राजा का होता है। लोकतंत्र के लिए उन्होंने ´राष्ट्रपति’ का पद बनाया। राष्ट्रपति शब्द इस कारण प्रचलित हो गया। उसके लिए कोई दूसरा शब्द जनता में प्रचलित नहीं था। पद ही नहीं था तो उसका वाचक कैसे होता। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में इसी कारण बहुत से नए शब्दों का नामकरण किया। उनके लिए लोक में कोई अन्य नाम प्रचलित नहीं थे। आपने अपने टिप्पण में जो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, उनमें से अधिकतर इसी कोटि के अन्तर्गत आते हैं। कुछ अन्य उदाहरण देखें- (1) भारत की सरकार ने जब पद्म पुरस्कारों की नई योजना बनाई तो पुरस्कारों की तीन श्रेणियाँ बनाई तथा उनके नाम रखे – (अ) पद्म विभूषण (आ) पद्म भूषण (इ) पद्म श्री । इसके लिए कोई अन्य नाम प्रचलित नहीं थे। प्रचलित नहीं थे, क्योंकि ये पुरस्कार ही नहीं थे। इस कारण रखे गए नाम चले। इनका प्रचलन हो गया। (2) भारत की सरकार ने जब पूर्वोत्तर भारत में नए राज्यों का गठन किया तो उनके लिए नाम रखे। (अ) अरुणाचल प्रदेश (आ) मणिपुर (इ) मेघालय (ई) मिज़ोरम (उ) नगालैण्ड आदि। इन नए गठित राज्यों के लिए पहले से कोई शब्द नहीं थे। शब्द इस कारण नहीं थे क्योंकि राज्य ही नहीं थे। इन नए राज्यों का नामकरण किया गया। इन राज्यों को सब इनके नाम से पुकारते हैं। (3) अभी हाल में ‘आन्ध्र प्रदेश´ को दो भागों में बाँटा गया है। एक राज्य का नामकरण किया गया – तेलंगाना । दूसरे राज्य का नामकरण किया गया – सीमान्ध्र। ये नाम चलेंगे। लोक प्रचलित हो जाएँगे। (4) भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने चन्द्रमा पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष प्रेक्षण उपग्रह का नाम ‘चन्द्रयान´ तथा मंगल पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष प्रेक्षण उपग्रह का नाम ‘मंगलयान´ रखा। इनका नामकरण ´चन्द्रयान’ एवं ‘मंगलयान’ किया। ये नाम चल रहे हैं। संसार की किसी भी देश का वैज्ञानिक जब किसी भी भाषा में इनका उल्लेख करेगा तो उसे ‘चन्द्रयान´ एवं ‘मंगलयान´ शब्दों का प्रयोग करना पड़ेगा।

(आ) शब्द बनाना अथवा शब्द गढ़ना –

अब मैं शब्द बनाने अथवा शब्द गढ़ने को एक उदाहरण से स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ।

अंग्रेजों ने भारत में ‘रेलवे नेटकर्क´ शुरु किया। रेल की पटरियों का जाल बिछाने का काम किया। रेल से जुड़े अंग्रेजी के सैकड़ों शब्द जन प्रचलित हो गए। उदाहरण देखें- (1) इंजन (2) रेलवे (3) एक्सप्रेस (4) केबिन (5) गॉर्ड (6) स्टेशन (7) जंक्शन (8) टाइम टेबिल (9) टिकट (10) टिकट कलेक्टर (11) डीजल इंजन (12) प्लेटफॉर्म (13) बोगी (14) बुकिंग (15) सिग्नल (16) स्टेशन (17) स्टेशन मास्टर ।

इन जैसे जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर इनके लिए नए शब्द बनाने अथवा गढ़ने वालों से मैं उससे सहमत नहीं हो सकता। भारतीय भाषाविज्ञान की महान परम्परा के अध्ययन के बाद मुझे जो ज्ञान प्राप्त हुआ है उसके आधार पर मैं यह बात कह रहा हूँ। आचार्य रघुवीर जी ने जो कार्य किया है वह स्तुत्य है मगर उन्होंने भी अंग्रेजी के जन प्रचलित शब्दों के स्थान पर जिन शब्दों को गढ़ा है उनसे सहमत नहीं हूँ। उदाहरण के लिए रेलगाड़ी के स्थान पर उन्होंने संस्कृत की धातुओं एवं परसर्गों एवं विभक्तियों की सहायता से शब्द बनाया जो उपहास का कारक बना। ऐसे ही उदाहरणों के कारण ´रघुवीरी हिन्दी’ हास्यास्पद हो गई। लोक में रेल ही चलता है और चलेगा। गढ़ा शब्द नहीं चलेगा। इसी संदर्भ में, मेरा मत है कि जो शब्द जन-प्रचलित हैं उनके स्थान पर शब्द गढ़े नहीं। इस विषय पर इलाहाबाद में लेखक के रज्जू भैया से बहुत लम्बे संवाद हुए हैं। । लेखक सन् 1958 से लेकर सन् 1962 तक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का विद्यार्थी था। यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार उसके पिता जी के मित्र श्री के. एल. गोविल थे। उनके घर पर लेखक की ´संघ के रज्जू भैया’ से अनेक बार मुलाकात हुईं। उनकी सोच यह थी कि हमारे राष्ट्र की मूल धारा एक है और वह धारा अविरल एवं शुद्ध रूप में प्रवाहित है। जो धाराएँ हमारे देश में आक्रांताओं के द्वारा लाई गयीं हैं उन्होंने हमारी राष्ट्र रूपी गंगा को गंदा कर दिया है। हमें उसे निर्मल बनाना है।मेरे दिमाग में उस समय से लेकर अब तक दिनकर की पंक्तियाँ गूँजती रही हैं कि भारतीय संस्कृति समुद्र की तरह है जिसमें अनेक धाराएँ आकर विलीन होती रही हैं। एक दिन हमने रज्जू भैया से निवेदन किया कि आप जिन आगत धाराओं को गंदे नालों के रूप में देखते हैं, हम उनको इस रूप में नहीं देखते। उन समस्त धाराओं को जिन्हें आप गंदे नालों एवं ´मल’ के रूप में देखते हैं उनको हम ‘ऐसे मल´ की श्रेणी में नहीं रख सकते जो हमारी भाषा, धर्म, एवं संस्कृति रूपी गंगा को ´गंदा नाला’ बनाते हैं। आगत धाराएँ हमारी गंगा की मूल स्रोत भागीरथी में आकर मिलने वाली अलकनंदा,धौली गंगा,अलकन्दा, पिंडर और मंदाकिनी धाराओं की श्रेणी में आती हैं। हिन्दी भाषा की प्रकृति और स्वरूप के बारे में भी हमारी सोच यही है। आप नया आविष्कार करें और उसका नामकरण करें, यह ठीक है। जो शब्द जन-प्रचलित हो गए हैं उनके स्थान पर नए शब्द बनाना अथवा गढ़ना श्रम का अपव्यय है। हमें किसी विचार शाखा से अपने को जकड़ना नहीं चाहिए। भाषा की प्रवाहशील प्रकृति को आत्मसात करना चाहिए।

हिन्‍दी तथा संस्कृत

संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषाएँ भिन्न कालों की भाषाएँ हैं। एक काल की भाषा पर दूसरे काल की भाषा के नियमों को नहीं थोपा जा सकता। संस्कृत और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं के अन्तर को भी मैंने अपनी पुस्तक में व्याख्यायित एवं विवेचित किया है। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है।भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है। मैंने अपने एक लेख में प्रतिपादित किया कि भाषा नदी की धारा की तरह होती है।इस पर कुछ विद्वानों ने सवाल उठाया कि क्या नदी की धारा को अनियंत्रित, अमर्यादित एवं बेलगाम हो जाने दें। मेरा उत्तर है – नदी की धारा अपने तटों के द्वारा मर्यादित रहती है। भाषा अपने व्याकरण की व्यवस्था एवं संरचना के तटों के द्वारा मर्यादित रहती है। भाषा में बदलाव एवं ठहराव दोनों साथ साथ रहते हैं। ‘शब्दावली’ गतिशील एवं परिवर्तनशील है। व्याकरण भाषा को ठहराव प्रदान करता है। ऐसा नहीं है कि ‘व्याकरण’ कभी बदलता नहीं है। बदलता है मगर बदलाव की रफ़तार बहुत धीमी होती है। ‘शब्द’ आते जाते रहते हैं। हम विदेशी अथवा अन्य भाषा से शब्द तो आसानी से ले लेते हैं मगर उनको अपनी भाषा की प्रकृति के अनुरूप ढाल लेते हैं। ‘शब्द’ को अपनी भाषा के व्याकरण की पद रचना के अनुरूप विभक्ति एवं परसर्ग लगाकर अपना बना लेते हैं। हम यह नहीं कहते कि मैंने चार ‘फिल्म्स’ देखीं; हम कहते हैं कि मैंने चार फिल्में देखीं।

मेरे लेख को पढ़ने के बाद कुछ विद्वानों ने मुझे संस्कृत की व्याकरण परम्परा के महत्व से परिचित कराना चाहा। मैं उन विद्वानों से यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं संस्कृत के महान वैयाकरणों एवं निरुक्तकारों के योगदान से परिचित हूँ। यही नहीं प्रातिशाख्यों तथा शिक्षा-ग्रंथों में भाषाविज्ञान और विशेष रूप से ध्वनि विज्ञान से सम्बंधित कितना सूक्ष्मदर्शी और गहन विचार सन्निहित है, उससे भी अवगत हूँ। भारतीय भाषाविज्ञान की परम्परा बड़ी समृद्ध है और उसमें न केवल वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के भाषाविद् समाहित हैं अपितु प्राकृतों एवं अपभ्रंशों के भाषाविद् भी समाहित हैं। पाणिनी ने अपने काल के पूर्व के 10 आचार्यों का उल्लेख किया है। उन आचार्यों ने वेदों के काल की छान्दस् भाषा पर कार्य किया था। पाणिनी ने वैदिक काल की छान्दस भाषा को आधार बनाकर अष्टाध्यायी की रचना नहीं की। उन्होंने अपने काल की जन-सामान्य भाषा संस्कृत को आधार बनाकर व्याकरण के नियमों का निर्धारण किया। वाल्मीकीय रामायण में इस भाषा के लिए ‘मानुषी´ विशेषण का प्रयोग हुआ है। पाणिनी के समय संस्कृत का व्यवहार एवं प्रयोग बहुत बड़े भूभाग में होता था। उसके अनेक क्षेत्रीय भेद-प्रभेद रहे होंगे। पाणिनी ने भारत के उदीच्य भाग के गुरुकुलों में बोली जानेवाली भाषा को आधार बनाया। पाणिनी के व्याकरण का महत्व सर्वविदित है। उस सम्बंध में लिखना अनावश्यक है। पाणिनी के व्याकरण की विशिष्टता को अनेक विद्वानों ने रेखांकित किया है। मैं प्रसंग को ध्यान में रखकर, अमेरिका के प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक बेंजामिन ली व्होर्फ के अभिमत को उद्धृत कर रहा हूँ – ‘यद्यपि भाषाविज्ञान बहुत प्राचीन है तथापि इसका आधुनिक प्रयोगात्मक रूप, जो अलिखित बोलचाल की भाषा के विश्लेषण पर जोर देता है, सर्वथा आधुनिक है। जहाँ तक हमें ज्ञात है, ईसा से कई शताब्दी पूर्व, पाणिनी ने इस विज्ञान का शिलान्यास किया था। पाणिनी ने उस युग में, वह ज्ञान प्राप्त कर लिया था, जो हमें आज उपलब्ध है। संस्कृत भाषा को नियमबद्ध करने के लिए पाणिनी के सूत्र बीजगणित के जटिल सूत्रों की भाँति हैं´।

मैं अवगत हूँ कि प्रत्याहार, गणपाठ, विकरण, अनुबंध आदि की विपुल तकनीक से अलंकृत पाणिनीय सूत्र उनकी अद्वितीय प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। मुझे संस्कृत भाषा के व्यवहार एवं प्रसार की थोड़ी बहुत जानकारी भी है। उत्तर-वैदिक काल में संस्कृत भारत की सभी दिशाओं में चारों ओर फैलती गई। संस्कृत का यह प्रसार केवल भौगोलिक दिशाओं में ही नहीं हो रहा था; सामाजिक स्तर पर मानक संस्कृत से भिन्न अनेक आर्य एवं अनार्य भाषाओं के बोलने वाले समुदायों में भी हो रहा था।  (Burrow. T.: The Sanskrit Language, P. 63, Faber & Faber, London).।

संस्कृत भाषा के भारत के विभिन्न भागों एवं विभिन्न सामाजिक समुदायों में व्यवहार एवं प्रसार के कारण दो बातें घटित हुईं –

  1. संस्कृत ने अपने प्रसार के कारण भारत के प्रत्येक क्षेत्र की भाषा को प्रभावित किया।
  2. संस्कृत भाषा स्वयं भी भारत में अन्य भाषा-परिवारों की भाषाओं से तथा संस्कृत युग में भारतीय आर्य परिवार की संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं से प्रभावित हुई। हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि संस्कृत काल में अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं का व्वहार होता था। इसको विस्तार से जानने के लिए निम्न लिंक पर जाकर अध्ययन किया जा सकता है –
(प्रोफेसर महावीर सरन जैन का आलेख- संस्कृत भाषा काल में विभिन्न समसामयिक अन्य लोकभाषाओं/ जनभाषाओं का व्यवहार http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_5218.html

संस्कृत के प्रभाव से तो संस्कृत के विद्वान परिचित हैं मगर संस्कृत पर संस्कृतेतर अन्य लोक भाषाओं / जनभाषाओं के प्रभाव से शायद परिचित नहीं हैं अथवा इस पक्ष को अनदेखा कर जाते हैं। मैंने इन दोनों पक्षों पर अपनी पुस्तक में विस्तार से लिखा है। यह भी विवेचित किया है कि पाणिनी के बाद के संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त किन धातुओं का (शब्दों का नहीं) प्रयोग हुआ है जिनका उल्लेख पाणिनी की अष्टाध्यायी में नहीं हुआ है। मेरी पुस्तक का शीर्षक है – ‘भारत की भाषाएँ एवं भाषिक एकता तथा हिन्दी´ जो प्रकाशनाधीन है।

संस्कृत के प्रभाव से हम सभी सुपरिचित हैं। इस दिशा में प्रचुर कार्य सम्पन्न हुए हैं। शब्दावली के स्तर पर संस्कृत की शब्दावली ने सभी भारतीय भाषाओं को प्रभावित किया है जिसे तत्सम शब्दावली के नाम के पुकारा जाता है। मध्यकालीन साहित्यिक तमिल की ‘मणिप्रवालम शैली’ से भारतीय भाषाओं पर संस्कृत के व्यापक प्रभाव की बात सिद्ध होती है।

मैं संस्कृत के महत्व के बारे में थोड़ा सा ज्ञान रखता हूँ मगर जो शब्द लोक में प्रचलित हो गए हैं, उनके लिए संस्कृत की शब्द रचना का सहारा लेकर नए शब्द गढ़ने के खिलाफ हूँ। मेरा भाषाविज्ञान का ज्ञान तथा लोक-व्यवहार का विवेक मुझे ऐसा करने वालों का समर्थन करने से रोकता है। किसी भाषा के व्याकरण के नियमों को दूसरी किसी अन्य भाषा पर थोपना गलत है।भाषाविज्ञान का यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक नियम है।

हिन्‍दी भाषा का प्रमाण

किसी भाषा का अध्ययन करते समय किसको प्रमाण माना जाए। परम्परागत सुसंस्कृत, गरिमामय, तथाकथित शुद्ध भाषा-रूप को अथवा उस काल में भाषा के पढ़े लिखे लोगों के द्वारा बोले जाने वाले भाषा-रूप को। पाणिनी के समय में भी वैदिक भाषा का आदर होता था। उसे सम्माननीय माना जाता था। हम कह चुके हैं कि पाणिनी ने अपने व्याकरण के नियमों का निर्धारण करने के लिए वैदिक भाषा को आधार नहीं बनाया। पाणिनी ने उदीच्य भाग के गुरुकुलों में उनके समय में बोली जाने वाली लैकिक संस्कृत को प्रमाण मानकर अपने ग्रंथ में संस्कृत व्याकरण के नियमों का निर्धारण किया।पतंजलि ने भाषा प्रयोग के मामले में भाषा के वैयाकरण से अधिक महत्व सामान्य गाड़ीवान (सारथी) को दिया। महाभाष्यकार पतंजलि के ´पतंजलिमहाभाष्य’ से एक प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें उन्होंने भाषा के प्रयोक्ता का महत्व प्रतिपादित किया है। प्रयोक्ता व्याकरणिक नियमों का भले ही जानकार नहीं होता किन्तु वह अपनी भाषा का प्रयोग करता है। व्याकरणिक नियमों के निर्धारण करने वाले तथा भाषा का प्रयोग करनेवाले का पतंजलि-महाभाष्य में रोचक प्रसंग मिलता है। वैयाकरण तथा रथ चलानेवाले के बीच के संवाद का प्रासंगिक अंश उद्धृत है-

“वैयाकरण ने पूछा – इस रथ का ‘प्रवेता´ कौन है?

सारथी का उत्तर – आयुष्मान्, मैं इस रथ का ‘प्राजिता´ हूँ।

(प्राजिन् = सारथी, रथ-चालक, गाड़ीवान)

वैयाकरण – ´प्राजिता’ अपशब्द है।

सारथी का उत्तर – (देवानां प्रिय) आप केवल ‘प्राप्तिज्ञ´ हैं; ‘इष्टिज्ञ´ नहीं।

(‘प्राप्तिज्ञ´ = नियमों का ज्ञाता; ‘इष्टिज्ञ´ = प्रयोग का ज्ञाता)

वैयाकरण – यह दुष्ट ‘सूत´ हमें ´दुरुत’ (कष्ट पहुँचाना) रहा है।

सूत- आपका ´दुरुत’ प्रयोग उचित नहीं है। आप निंदा ही करना चाहते हैं तो ´दुःसूत’ शब्द का प्रयोग करें।हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हो रहा है। संसार की प्रत्येक भाषा अन्य भाषा से शब्द ग्रहण करती है और उसे अपनी भाषा में पचा लेती है। संसार की प्रत्येक प्रवाहशील भाषा में परिवर्तन होता है।

हिन्दी के समाचार पत्रों, टी. वी. चैनलों एवं फिल्मों की भाषा समाचार पत्रों में तथा टी. वी. के हिन्दी चैनलों एवं हिन्दी की फिल्मों में उस भाषा का प्रयोग हो रहा है जिसे हमारी संतति बोल रही है। भविष्य की हिन्दी का स्वरूप हमारे प्रपौत्र एवं प्रपौत्रियों की पीढ़ी के द्वारा बोली जानेवाली हिन्दी के द्वारा निर्धारित होगा जिसका निर्धारण उनके अपने काल में भाषा के वैयाकरण बनाएँगे । ऐतिहासिक भाषाविज्ञान एवं एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान की दृष्टियाँ समान नहीं होती। उनमें अन्तर होता है। शब्द प्रयोग के संदर्भ में जब ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से विचार किया जाता है तो यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि भाषा के शब्द का स्रोत कौन सी भाषा है। शब्द प्रयोग के संदर्भ में जब एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से विचार किया जाता है तो भाषा का प्रयोक्ता जिन शब्दों का व्यवहार करता है, वे समस्त शब्द उसकी भाषा के होते हैं। उस धरातल पर कोई शब्द स्वदेशी अथवा विदेशी नहीं होता। प्रत्येक जीवन्त भाषा में अनेक स्रोतों से शब्द आते रहते हैं और उस भाषा के अंग बनते रहते हैं।भाषा में शुद्ध एवं अशुद्ध का, मानक एवं अमानक का, सुसंस्कृत एवं अपशब्द का तथा आजकल भाषा के मानकीकरण एवं आधुनिकीकरण के बीच वाद-विवाद होता रहा है और होता रहेगा। भारत में ऐसे विद्वानों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है जो केवल मानक भाषा की अवधारणा से परिचित हैं। जो भाषाएँ इन्टरनेट पर अधिक विकसित एवं उन्नत हो गयीं हैं, उनके भाषाविद् मानक भाषा से ज्यादा महत्व भाषा के आधुनिकीकरण को देते हैं। वैयाकरण प्रयोक्ता द्वारा बोली जाने वाली भाषा को आधार मानकर व्याकरण के नियमों का निर्धारण करता है। परम्परा से चिपके रहने वालों की नजर में कुछ शब्द सुसंस्कृत होते हैं एवं कुछ अपशब्द होते हैं। भाषा की प्रकृति बदलना है। भाषा बदलती है। परम्परावादियों को बदली भाषा भ्रष्ट लगती है। मगर उनके लगने से भाषा अपने प्रवाह को, अपनी गति को, अपनी चाल को रोकती नहीं है। बहती रहती है। बहना उसकी प्रकृति है। इसी कारण कबीर ने कहा था – ‘भाखा बहता नीर´।भाषा का अन्तिम निर्णायक उसका प्रयोक्ता होता है। दूसरे काल की भाषा के आधार पर उस काल का व्याकरणिक संकालिक भाषा के व्याकरण के पुनः नए नियम बनाता है। व्याकरण के नियमों में भाषा को बाँधने की कोशिश करता है। भाषा गतिमान है। पुनः पुनः नया रूप धारण करती रहती है।भाषा वह है जो भाषा के प्रयोक्ताओं द्वारा बोली जाती है। भविष्य में हिन्दी भाषा का रूप वह होगा जो हमारे एवं आपके प्रपौत्रों तथा प्रपौत्रियों के काल की पीढ़ी द्वारा बोला जाएगा। भाषा का मूल आधार उस के समाज के पढ़े लिखे द्वारा बोली जानेवाली भाषा ही होती है। इसी के आधार पर किसी काल का वैयाकरण मानक भाषा के नियमों का निर्धारण करता है।

जनभाषा हिन्‍दी का प्रयोग

यहाँ इसको रेखांकित करना अप्रसांगिक न होगा कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिन्दीतर भाषी राष्ट्रीय नेताओं ने जहाँ देश की अखंडता एवं एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार की अनिवार्यता की पैरोकारी की वहीं भारत के सभी राष्ट्रीय नेताओं ने एकमतेन सरल एवं सामान्य जनता द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी का प्रयोग करने एवं हिन्दी उर्दू की एकता पर बल दिया था। मैं इस बात को दोहराना चाहता हूँ कि प्रजातंत्र में शुद्ध हिन्दी, क्लिष्ट हिन्दी, संस्कृत गर्भित हिन्दी जबरन नहीं चलाई जानी चाहिए। जनतंत्र में ऐसा करना सम्भव नहीं है। ऐसा फासिस्ट शासन में ही सम्भव है। हमें सामान्य आदमी जिन शब्दों का प्रयोग करता है उनको अपना लेना चाहिए। यदि वे शब्द अंग्रेजी से हमारी भाषाओं में आ गए हैं, हमारी भाषाओं के अंग बन गए हैं तो उन्हें भी अपना लेना चाहिए।मैं हिन्दी के विद्वानों को बता दूँ कि प्रेमचन्द जैसे महान रचनाकार ने भी प्रसंगानुरूप किसी भी शब्द का प्रयोग करने से परहेज़ नहीं किया। उनकी रचनाओं में अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। अपील, अस्पताल, ऑफिसर, इंस्पैक्टर, एक्टर, एजेंट, एडवोकेट, कलर, कमिश्नर, कम्पनी, कॉलिज, कांस्टेबिल, कैम्प, कौंसिल, गजट, गवर्नर, गैलन, गैस, चेयरमेन, चैक, जेल, जेलर, टिकट, डाक्टर, डायरी, डिप्टी, डिपो, डेस्क, ड्राइवर, थियेटर, नोट, पार्क, पिस्तौल, पुलिस, फंड, फिल्म, फैक्टरी, बस, बिस्कुट, बूट, बैंक, बैंच, बैरंग, बोतल, बोर्ड, ब्लाउज, मास्टर, मिनिट, मिल, मेम, मैनेजर, मोटर, रेल, लेडी, सरकस, सिगरेट, सिनेमा, सिमेंट, सुपरिन्टेंडैंट, स्टेशन आदि हजारों शब्द इसके उदाहरण हैं। प्रेमचन्द जैसे हिन्दी के महान साहित्यकार ने अपने उपन्यासों एवं कहानियों में अंग्रेजी के इन शब्दों का प्रयोग करने में कोई झिझक नहीं दिखाई है। जब प्रेमचंद ने उर्दू से आकर हिन्दी में लिखना शुरु किया था तो उनकी भाषा को देखकर छायावादी संस्कारों में रँगे हुए आलोचकों ने बहुत नाक भौंह सिकौड़ी थी तथा प्रेमचंद को उनकी भाषा के लिए पानी पी पीकर कोसा था। मगर प्रेमचंद की भाषा खूब चली। खूब इसलिए चली क्योंकि उन्होंने प्रसंगानुरूप किसी भी शब्द का प्रयोग करने से परहेज़ नहीं किया। उन्होंने शब्दावली आयोग की तरह इसके लिए विशेषज्ञों को बुलाकर यह नहीं कहा कि पहले इन अंग्रेजी के शब्दों के लिए शब्द गढ़ दो ताकि मैं अपना साहित्य सर्जित कर सकूँ। उनके लेखन में अंग्रेजी के ये शब्द ऊधारी के नहीं हैं; जनजीवन में प्रयुक्त शब्द भंडार के आधारभूत, अनिवार्य, अवैकल्पिक एवं अपरिहार्य अंग हैं। फिल्मों, रेडियो, टेलिविजन, दैनिक समाचार पत्रों में जिस हिन्दी का प्रयोग हो रहा है वह जनप्रचलित भाषा है। जनसंचार की भाषा है। समय समय पर बदलती भी रही है। पुरानी फिल्मों में प्रयुक्त होनेवाले चुटीले संवादों तथा फिल्मी गानों की पंक्तियाँ जैसे पुरानी पीढ़ी के लोगों की जबान पर चढ़कर बोलती थीं वैसे ही आज की युवा पीढ़ी की जुबान पर आज की फिल्मों में प्रयुक्त संवादों तथा गानों की पंक्तियाँ बोलती हैं। फिल्मों की स्क्रिप्ट के लेखक जनप्रचलित भाषा को परदे पर लाते हैं। उनके इसी प्रयास का परिणाम है कि फिल्मों को देखकर समाज के सबसे निचले स्तर का आम आदमी भी फिल्म का रस ले पाता है। मेरा सवाल यह है कि यदि साहित्यकार, फिल्म के संवादों तथा गीतों के लेखक, समाचार पत्रों के रिपोर्टर जनप्रचलित हिन्दी का प्रयोग कर सकते हैं तो भारत सरकार का शासन ´प्रशासन की राजभाषा हिन्दी’ को जनप्रचलित क्यों नहीं बना सकता। विचारणीय है कि हिंदी फिल्मों की भाषा ने गाँवों और कस्बों की सड़कों एवं बाजारों में आम आदमी के द्वारा रोजमर्रा की जिंदगी में बोली जाने वाली बोलचाल की भाषा को एक नई पहचान दी है। फिल्मों के कारण हिन्दी का जितना प्रचार-प्रसार हुआ है उतना किसी अन्य एक कारण से नहीं हुआ। आम आदमी जिन शब्दों का व्यवहार करता है उनको हिन्दी फिल्मों के संवादों एवं गीतों के लेखकों ने बड़ी खूबसूरती से सहेजा है। भाषा की क्षमता एवं सामर्थ्य शुद्धता से नहीं, निखालिस होने से नहीं, ठेठ होने से नहीं, अपितु विचारों एवं भावों को व्यक्त करने की ताकत से आती है। राजभाषा के संदर्भ में यह संवैधानिक आदेश है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

भारत सरकार का शासन राजभाषा का तदनुरूप विकास कर सका है अथवा नहीं यह सोचने विचारने की बात है। इस दृष्टि से भी मैं फिल्मों में कार्यरत सभी रचनाकारों एवं कलाकारों का अभिनंदन करता हूँ।हिन्दी सिनेमा ने भारत की सामासिक संस्कृति के माध्यम की निर्मिति में अप्रतिम योगदान दिया है। बंगला, पंजाबी, मराठी, गुजराती, तमिल आदि भाषाओं एवं हिन्दी की विविध उपभाषाओं एवं बोलियों के अंचलों तथा विभिन्न पेशों की बस्तियों के परिवेश को सिनेमा की हिन्दी ने मूर्तमान एवं रूपायित किया है। भाषा तो हिन्दी ही है मगर उसके तेवर में, शब्दों के उच्चारण के लहजे़ में, अनुतान में तथा एकाधिक शब्द-प्रयोग में परिवेश का तड़का मौजूद है। भाषिक प्रयोग की यह विशिष्टता निंदनीय नहीं अपितु प्रशंसनीय है।

मुझे प्रसन्नता है कि देर आए दुरुस्त आए, राजभाषा विभाग ने प्रशासनिक हिन्दी को सरल बनाने की दिशा में कदम उठाने शुरु कर दिए हैं। जैसे प्रेमचन्द ने जनप्रचलित अंग्रेजी के शब्दों को अपनाने से परहेज नहीं किया वैसे ही प्रशासनिक हिन्दी में भी प्रशासन से सम्बंधित ऐसे शब्दों को अपना लेना चाहिए जो जन-प्रचलित हैं। उदाहरण के लिए एडवोकेट, ओवरसियर, एजेंसी, ऍलाट, चैक, अपील, स्टेशन, प्लेटफार्म, एसेम्बली, ऑडिट, केबिनेट, केम्पस, कैरियर, केस, कैश, बस, सेंसर, बोर्ड, सर्टिफिकेट, चालान, चेम्बर, चार्जशीट, चार्ट, चार्टर, सर्किल, इंस्पेक्टर, सर्किट हाउस, सिविल, क्लेम, क्लास, क्लर्क, क्लिनिक, क्लॉक रूम, मेम्बर, पार्टनर, कॉपी, कॉपीराइट, इन्कम, इन्कम टैक्स, इंक्रीमेंट, स्टोर आदि। भारत सरकार के राजभाषा विभाग को यह सुझाव भी देना चाहता हूँ कि जिन संस्थाओं में सम्पूर्ण प्रशासनिक कार्य हिन्दी में शतकों अथवा दशकों से होता आया है वहाँ की फाइलों में लिखी गई हिन्दी भाषा के आधार पर प्रशासनिक हिन्दी को सरल बनाएँ। जब कोई रोजाना फाइलों में सहज रूप से लिखता है तब उसकी भाषा का रूप अधिक सरल और सहज होता है बनिस्पत जब कोई सजग होकर भाषा को बनाता है। सरल भाषा बनाने से नहीं बनती, सहज प्रयोग करते रहने से बन जाती है, ढल जाती है।

हिन्‍दी भाषा की प्रकृति के अनुरूप वाक्य रचना

मैंने अपने लेख में लिखा कि राजभाषा हिन्दी का प्रयोग करते समय वाक्य रचना अंग्रेजी की वाक्य रचना के अनुरूप नहीं होनी चाहिए। यह रचना हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप होनी चाहिए। यह पूर्व में कहा जा चुका है कि भारत सरकार के मंत्रालय के राजभाषा अधिकारी का काम होता है कि वह अंग्रेजी के मैटर का आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली में अनुवाद करदे। अधिकांश अनुवादक शब्द की जगह शब्द रखते जाते हैं। हिन्दी भाषा की प्रकृति को ध्यान में रखकर वाक्य नहीं बनाते। इस कारण जब राजभाषा हिन्दी में अनुवादित सामग्री पढ़ने को मिलती है तो उसे समझने के लिए कसरत करनी पड़ती है। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि लोकतंत्र में राजभाषा आम आदमी के लिए बोधगम्य होनी चाहिए। सरकारी अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया है कि राजभाषा सामान्य भाषा से अलग दिखनी चाहिए। वह गरिमामय लगनी चाहिए। उसको सुनकर सत्ता का आधिपत्य परिलक्षित होना चाहिए। राजभाषा अधिकारी हिन्दी में अंग्रेजी की सामग्री का अनुवाद अधिक करता है। मूल टिप्पण हिन्दी में नहीं लिखा जाता। मूल टिप्पण अंग्रेजी में लिखा जाता है। अनुवादक जो अनुवाद करता है, वह अंग्रेजी की वाक्य रचना के अनुरूप अधिक होता है। हिन्दी भाषा की रचना-प्रकृति अथवा संरचना के अनुरूप कम होता है। मैं उदाहरण देता हूँ ताकि अपनी बात स्पष्ट कर सकूँ।हम कोई पत्र मंत्रालय को भेजते हैं तो उसकी पावती की भाषा की रचना निम्न होती है –

´पत्र दिनांक – – – , क्रमांक – – – प्राप्त हुआ’।

सवाल यह है कि क्या प्राप्त हुआ। क्रमांक प्राप्त हुआ अथवा दिनांक प्राप्त हुआ अथवा पत्र प्राप्त हुआ। अंग्रेजी की वाक्य रचना में क्रिया पहले आती है। हिन्दी की वाक्य रचना में क्रिया बाद में आती है। इस कारण जो वाक्य रचना अंग्रेजी के लिए ठीक है उसके अनुरूप रचना हिन्दी के लिए सहज, सरल एवं स्वाभाविक नहीं है। क्रिया (प्राप्त होना अथवा मिलना) का सम्बंध दिनांक से अथवा क्रमांक से नहीं है। पत्र से है। एक विद्वान को इसमें कोई दोष नजर नहीं आता। मेरा उनसे निवेदन है कि हिन्दी एवं अंग्रेजी की वाक्य संरचना में अन्तर हैं। बहुत से ग्रंथ बाजार में मौजूद हैं जिनमें हिन्दी एवं अंग्रेजी का व्यतिरेकी अध्ययन(Contrastive study) किया गया है। उन ग्रंथों को पढ़ लीजिए। मेरी बात स्पष्ट हो जाएगी। सामान्य पाठक के लिए स्पष्ट कर दूँ कि हिन्दी की रचना प्रकृति के हिसाब से वाक्य रचना निम्न प्रकार से होनी चाहिए।

´आपका दिनांक – – – का लिखा पत्र प्राप्त हुआ। उसका क्रमांक है – – – – ‘ ।

हिन्दी की वाक्य रचना भी दो प्रकार की होती है। एक रचना सरल होती है। दूसरी रचना जटिल एवं क्लिष्ट होती है। सरल वाक्य रचना में वाक्य छोटे होते हैं। संयुक्त एवं मिश्र वाक्य बड़े होते हैं। सरल वाक्य रचना वाली भाषा सरल, सहज एवं बोधगम्य होती है। संयुक्त एवं मिश्र वाक्यों की रचना वाली भाषा जटिल होती है, कठिन लगने लगती है, क्लिष्ट लगने लगती है और इस कारण अबोधगम्य हो जाती है।

मुझे विश्वास है कि यदि प्रशासनिक भाषा को सरल बनाने की दिशा में पहल हुई तो राजभाषा हिन्दी और जनभाषा हिन्दी का अन्तर कम होगा। सरल, सहज, पठनीय, बोधगम्य भाषा-शैली का विकास होगा। ऐसी राजभाषा लोक में प्रिय होगी। लोकप्रचलित होगी।

अंग्रेजी में भारतीय भाषाओं के शब्दों का प्रयोग

ऐसा नहीं है कि केवल हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में ही अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होता है और अंग्रेजी बिल्कुल अछूती है। अंग्रेजी में संसार की उन सभी भाषाओं के शब्द प्रयुक्त होते हैं जिन भाषाओं के बोलने वालों से अंग्रेजो का सामाजिक सम्पर्क हुआ। चूँकि अंग्रेजों का भारतीय समाज से भी सम्पर्क हुआ, इस कारण अंगेजी ने हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों का आदान किया है। यदि ब्रिटेन में इंडियन रेस्तरॉ में अंग्रेज समोसा, इडली, डोसा, भेलपुरी खायेंगे, खाने में ‘करी’, ‘भुना आलू’ एवं ‘रायता’ मागेंगे तो उन्हें उनके वाचक शब्दों का प्रयोग करना पड़ेगा। यदि भारत का ‘योग’ करेंगे तो उसके वाचक शब्द का भी प्रयोग करना होगा और वे करते हैं, भले ही उन्होंने उसको अपनी भाषा में ‘योगा’ बना लिया है जैसे हमने ‘हॉस्पिटल’ को ‘अस्पताल’ बना लिया है। जिन अंग्रेजों ने भारतविद्या एवं धर्मशास्त्र का अध्ययन किया है उनकी भाषा में अवतार, अहिंसा, कर्म, गुरु, तंत्र, देवी, नारद, निर्वाण, पंडित, ब्राह्मन, बुद्ध, भक्ति,भगवान, भजन, मंत्र, महात्मा, महायान, माया, मोक्ष, यति, वेद, शक्ति, शिव, संघ, समाधि, संसार, संस्कृत, साधू, सिद्ध, सिंह, सूत्र, स्तूप, स्वामी, स्वास्तिक, हनुमान, हरि, हिमालय आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। भारत में रहकर जिन अंग्रेजों ने पत्र, संस्मरण, रिपोर्ट, लेख आदि लिखे उनकी रचनाओं में तथा वर्तमान इंगलिश डिक्शनरी में अड्डा, इज्जत, कबाब, कोरा, कौड़ी, खाकी, खाट, घी, चक्कर, चटनी, चड्डी, चमचा, चिट, चोटी, छोटू, जंगल, ठग, तमाशा, तोला, धतूरा, धाबा, धोती, नबाब, नमस्ते, नीम, पंडित, परदा, पायजामा, बदमाश, बाजार, बासमती, बिंदी, बीड़ी, बेटा, भाँग, महाराजा, महारानी, मित्र, मैदान, राग, राजा, रानी, रुपया, लाख, लाट, लाठी चार्ज, लूट, विलायती, वीणा, शाबास, सरदार, सति, सत्याग्रह, सारी(साड़ी), सिख, हवाला एवं हूकाह(हुक्का) जैसे शब्दों को पहचाना जा सकता है। डॉ. मुल्क राज आनन्द ने सन् 1972 में ‘पिजि़न-इंडियन: सम नोट्स ऑन इंडियन-इंगलिश राइटिंग’ में यह प्रतिपादित किया था कि ऑॅक्सफोर्ड इंगलिश डिक्शनरी में 900 से अधिक भारतीय भाषाओं के शब्द हैं तथा इनकी संख्या हर साल बढ़ती जा रही है।

(देखें – आस्पेक्ट्स ऑॅफ् इंडियन राइटिंग इन इंगलिश, सम्पादकः एम. के. नाइक, मद्रास, पृ. 24-44,(1979))

सन् 2012 में ऑॅक्सफोर्ड इंगलिश डिक्शनरी के अधिकारी की प्रेस रिलीज़ हुई जिसमें उनका वक्तव्य था कि इस साल डिक्शनरी में विदेशी भाषाओं के करीब दो हजार शब्द सम्मिलित किए गए हैं और उनमें से करीब दो सौ शब्द भारतीय भाषाओं से आगत हैं।

हिन्‍दी की विश्व भाषाओं में स्थिति

मैंने हिन्दी के महत्व का हमेशा प्रतिपादन किया है। कुछ तथ्य रखता हूँ। इसे आत्म-प्रचार मत समझ लीजिएगा। मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोलीजाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें सन् 1998 के पूर्व, हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1991 के सेन्सॅस ऑफ इण्डिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ जुलाई, 1997 में प्रकाशित हुआ। यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फॉर द वॅःल्ड लैंग्वेजिज रिपोर्ट ने अपने दिनांक 13 जुलाई, 1998 के पत्र के द्वारा ‘यूनेस्को प्रश्नावली’ के आधार पर हिन्दी की रिपोर्ट भेजने के लिए भारत सरकार से निवेदन किया। भारत सरकार ने उक्त दायित्व के निर्वाह के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन को पत्र लिखा। प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने सन् 1999 में यूनेस्को को विस्तृत रिपोर्ट भेजी। प्रोफेसर जैन ने विभिन्न भाषाओं के प्रामाणिक आँकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रयोक्ताओं की दृष्टि से विश्व में चीनी भाषा के बाद दूसरा स्थान हिन्दी भाषा का है। रिपोर्ट तैयार करते समय ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया से अंग्रेजी मातृभाषियों की पूरे विश्व की जनसंख्या के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजने के लिए निवेदन किया गया। ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया ने इसके उत्तर में गिनीज बुक आफ नॉलेज (1997 संस्करण) का पृष्ठ-57 फैक्स द्वारा भेजा। ब्रिटिश काउन्सिल ने अपनी सूचना में पूरे विश्व में अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या 33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) प्रतिपादित की। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या 04,34,06,932 है। हिन्दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है। प्रोफेसर जैन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिद्ध किया कि भाषिक दृष्टि से हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है। जो विद्वान हिन्दीउर्दू की एकता के सम्बंध में मेरे विचारों से अवगत होना चाहते हैं, वे निम्न लिंक पर जाकर अध्ययन कर सकते हैं –

http://www.scribd.com/doc/22142436/Hindi-Urdu

इस प्रकार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि सभी देशों के अंग्रेजी मातृभाषियों की संख्या के योग से अधिक जनसंख्या केवल भारत में हिन्दी एवं उर्दू भाषियों की है। रिपोर्ट में यह भी प्रतिपादित किया गया कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्पूर्ण भारत में मानक हिन्दी के व्यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों में बहुसंख्यक द्विभाषिक समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करता है।
मेरा आकलन है कि हिन्दी को आगे बढ़ने से अब कोई ताकत रोक नहीं सकती। हिन्दी निरन्तर आगे बढ़ रही है। सन् 2003 में अमेरिका में विश्व हिन्दी न्यास के वार्षिक अधिवेशन में, मैंने यह मत व्यक्त किया था कि 19वीं शताब्दी फ्रेंच भाषा की थी, 20 वीं शताब्दी अंग्रेजी भाषा की थी तथा 21 वीं शताब्दी हिन्दी की होगी। मैंने अपने इस मत की पुष्टि के लिए निम्नलिखित कारणों की विस्तार से विवेचना की थी

1.भाषा बोलने वालों की संख्या

  1. भाषा व्यवहार क्षेत्र का विस्तार
  2. हिन्दी भाषा एवं लिपि व्यवस्था की संरचनात्मक विशेषताएँ
  3. भविष्य में कम्प्यूटर के क्षेत्र में टैक्स्ट टू स्पीचतथा स्पीच टू टैक्स्टतकनीक का विकास

 

  1. भारतीय मूल के आप्रवासी एवं अनिवासी भारतीयों की संख्या, श्रमशक्ति, मानसिक प्रतिभा में निरन्तर अभिवृद्धि।

हिन्दी के बढ़ते अन्तरराष्ट्रीय महत्व की विवेचना लेखक ने अलग आलेख में की है। हिंदी की अन्तर-क्षेत्रीय, अन्तर्देशीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका को स्पष्ट करने के लिए लेखक ने सन् 2002 में विस्तृत लेख लिखा। उक्त लेख सातवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन स्मारिका में प्रकाशित हुआ (पृष्ठ 13-23)। उसको इंटरनेट पर भी देखा जा सकता है। लिंक्स हैं –

  1. http://www.rachanakar.org/2010/07/blog-post_8861.html#ixzz2WNsOK2lT

 

  1. http://www.scribd.com/doc/22573933/Hindi-kee-antarraashtreeya-bhoomikaa

 

भारत में हिन्दीतर राज्यों में तथा विदेशों में हिन्दी का प्रसार बढ़ रहा है। यह प्रसार बढ़ेगा। इन दिशाओं में चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मेरी चिन्ता का कारण भिन्न है। मेरी चिंता उन ताकतों से है जो हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का कुचक्र एवं षड़यंत्र रच रही हैं।

जो हिन्दी प्रेमी “हिन्दी भाषा क्षेत्र” तथा इसके अंतर्गत आने वाले समस्त भाषिक रूपों के सम्बंधों को भाषा विज्ञान के भाषा भूगोल एवं बोली विज्ञान के सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में गहराई से जानना चाहते हैं, वे निम्न लिंकों पर जाकर अध्ययन कर सकते हैं –

http://www.scribd.com/doc/105229692/Hindi-Bhasha

http://www.scribd.com/doc/105906549/Hindi-Divas-Ke-Avasa

www.rachanakar.org/2012/09/blog-post_3077.html

हिन्दी के प्रेमियों से मेरा यह अनुरोध है कि इन लेखों का अध्ययन करने की अनुकंपा करें जिससे जो ताकतें हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का षड़यंत्र कर रहीं हैं, वे बेनकाब हो सकें। मैं समझता हूँ कि हिन्दी दिवस के अवसर पर उन ताकतों को निर्मूल करने के लिए प्रतिबद्ध होना ही हिन्दी के प्रति सच्ची भावभक

 

 

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