लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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hindiडॉ. मयंक चतुर्वेदी

भाषा के बारे में कहा जाता है कि वह स्व प्रवाहित होती है, आप चाहकर भी उसे रोक नहीं सकते । विश्व में कोई नहीं जिसका कार्य भाषा बिना चलता हो । मनुष्य की बात एक बार को छोड़ भी दीजिए तो पशु, पक्षी, कीट और पतंग भी अपने स्तर पर किसी न किसी भाषा का प्रयोग करते हैं, फिर ये भाषा सांकेतिक, विभि‍न्न किस्म की आवाजों के जरिए या अन्य प्रकार की भलेही हो सकती है । कुल मिलाकर भाषा प्रत्येक जीव के लिए अभि‍व्यक्ति का माध्यम है।

मनुष्यों के स्तर पर इसे देखे तो आज दुनिया में इंसान कई प्रकार की भाषाएं इस्तेमाल कर रहा है। इतिहास में भाषायी विकास बताता है, कि विश्व में जिस समय जो शक्ति प्रभावशील रही, उसकी बोलनेवाली भाषा का विस्तार तेजी से हुआ, यह प्रभाव दो तरह से देखा गया है एक, अर्थ शक्ति के रूप में और दूसरा पराक्रम युक्त श्रमशक्ति के रूप में । कहने को दुनियाभर में अंग्रेज मुट्ठीभर रहे, लेकिन उनके पराक्रम के कारण उनके साम्राज्य का विकास हुआ ही साथ में अंग्रेजी भी जहां जहां वे गए वहां सशक्त भाषा के रूप में उभरी। इसी प्रकार इस्लाम के फैलने के साथ अरबी लिपि का विकास हुआ। फ्रेंच का विकास भी हुआ किंतु यह विकास एक विशेषवर्ग तक सीमित रहा जो अपने को श्रेष्ठ मानता है। लेकिन हिंदी अपना वह मुकाम नहीं हासिल कर सकी जो जनसंख्यात्मक स्तर पर बहुत बड़ी संख्या में बोले जाने के कारण इसे मिलना चाहिए था। किंतु अब ऐसा नहीं है। आज दुनिया में भाषायी नजरिए को लेकर सभी समीकरण बदल चुके हैं। वैश्विक फलक पर यदि अंग्रेजी वर्तमान की जरूरत बनती जा रही है तो कई देश आज हिन्दी सीखने के लिए अपने यहां विशेष कक्षाएं लगा रहे हैं।

वस्तुत: यह परिवर्तन अचानक नहीं आ गया है। देखाजाए तो यह आज बाजार की देन है। वर्तमान समय अर्थ प्रधान है यहां आज हर चीज बिक रही है। हर कोई विश्व में छा जाना चाहता है, इस छा जाने के चक्कर में कई शक्तिशाली देश और अन्य देश भी परस्पर एक दूसरे की भाषा सीख रहे हैं, इन्हें जहां बड़ा बाजार दिखाई दे रहा है, वहीं लाभ दिख रहा है। निज भाषा उन्नति को मूल का सिद्धांत अब पुराने दिनों की बात हो गई है। यानि कि वैश्विक परिदृश्य में परिस्थितियाँ बदल रही हैं। उपभोगताओं का युग है, बाजार में जिस भाषा का जितना अधिक उपभोक्ता होगा, बाजार उसी भाषा में बात करता हुआ दिखाई देगा।

यहां हम दो भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं, संस्कृत विश्व की सबसे पुरानी जीवित भाषा होने के साथ ही आधुनिक कम्प्युटर की प्रिय भाषा है, किंतु बाजार में उसका उपभोक्ता नगण्य है, इसीलिए वह श्रेष्ठ भाषा होने के बाद भी दुनिया के परिदृश्य में आज भी अपने को पुनर्जीवित कर रही भाषा बनी हुई है, किंतु क्या यही बात हिंदी के संदर्भ में कही जा सकती है ? हिंदी भाषा संस्कृत की बेटी है लेकिन आज बेटी की धाक दुनिया में माँ से ज्यादा है, वह भारत जैसे विशाल देश की सबसे अधिक पसंद और बोली जाने वाली भाषा होने के साथ ही दुनिया के कई देशों में सहज स्वीकार्य है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि आज हिंदी बाजार की भाषा बन चुकी है, कई हजार करोड़ रोज का हिन्दी का बाजार है। करोड़ों उपभोक्ताओं की ताकत वह अपने में समेटे है। इसे उदाहरण के तौर पर समझें तो कहा जा सकता है कि मनोरंजन की दुनिया में हिंदी सबसे अधिक मुनाफा देने वाली भाषा के रूप में स्वयं को स्थापित करने में सफल रही है । हमारा भारत भले ही बहुभाषिक देश हो, किंतु इसे बाजार की मजबूरियां ही कहिए कि यहां कुल विज्ञापनों का लगभग 75 प्रतिशत भाग हिंदी में तैयार किया जाता है।

हिंदी आज न केवल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की भाषा है बल्कि दुनिया के तमाम देशों में भी हिंदी की लोकप्रियता अन्य भाषाओं की तुलना में सबसे अधिक है। भारत में यदि थोड़े समय के लिए राजनीतिकरण से हिन्दी को मुक्त करके देखें तो इसकी सर्वव्यापकता सहजत समझी जा सकती है। इस भाषा का भौगोलिक विस्तार काफी दूर-दूर तक फैला है, जिस दक्षिण के राज्यों में इसका विरोध होता है वहां भी सबसे ज्यादा विरोध करने वाले ही हिन्दी के भक्त हैं। भारत के बाहर नेपाल, त्रिनिदाद, सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस, अमेरिका, ब्रिटेन, मलेशिया, सिंगापुर हॉगकॉग, चीन, जर्मनी, जापान, अफगानिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, घाना, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, रूस, आदि कई देशों में हिन्दी स्वयं को बोलने के लिए आमजन को प्रेरित करती है। अन्तराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का परचम इस कदर लहरा रहा है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने वाले विद्वानों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।

रूस की विज्ञान अकादमी के तहत प्राच्यविद्या संस्थान के भारत अनुसंधान केंद्र की नेता तत्याना शाउम्यान का कहना हैं कि ब्रिटेन में रहनेवाले भारतीय प्रवासियों का संगठन दुनिया में सबसे प्रभावशाली है तथा अमरीका में रहनेवाले भारतीय मूल के लोगों की संख्या सबसे बड़ी है। इस वजह से दुनिया में हिंदी भाषा की भूमिका काफी बढ़ गई है। दूसरी ओर हिन्दी को लेकर आज संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा किए उस जनसांख्यिकीय शोध कहता है कि 15 सालों में भारत चीन को पीछे छोडक़र जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया में पहले स्थान पर पहुंच जायेगा और एक भाषा के स्तर पर भी वह चीन को पछाड़ देगा। हिंदी की दीवानगी को लेकर एक अन्य मास्को में भूविज्ञान से जुड़े विद्वान रुस्लान दिमीत्रियेव मानते हैं कि भविष्य में हिंदी बोलनेवालों की संख्या इस हद तक बढ़ जाएगी कि यही दुनिया की एक सबसे लोकप्रिय भाषा होगी। वह आंकड़ों के साथ बताते हैं कि इस समय दुनिया में करीब एक अरब लोग हिंदी बोलते हैं, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दस सालों में हिंदी बोलनेवालों की संख्या 1,5 अरब तक बढ़ेगी। तब हिंदी वर्तमान में सबसे लोकप्रिय भाषाओं चीनी और स्पेनी भाषाओं को पीछे छोड़ देगी। सच पूछिए तो त्रिनिदाद, सूरीनाम, फिजी, दक्षिण अफ्रीका एवं मॉरीशस में हिंदी की जड़े गहरी हुई हैं, तो रूस, जापान, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, कोरिया, चीन आदि देशों ने हिंदी की शक्ति को जाना और स्वीकारा है।

पिछले सालों में हिंदी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनियाभर के देशों में लगातार हिन्दी सीखने की ललक अन्य भाषाओं की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक बढ़ी है। कई देशों में विधिवत शासकीय स्तर पर हिंदी भाषा में प्रकाशन शुरू किया है, निजि स्तर पर तो सैकड़ों पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो ही रही हैं। यूरोप और अमरीका में हिंदीभाषी विद्यालय स्थापित किये गये हैं। यहाँ हिंदीभाषी रेडियो स्टेशन, टीवी चेनल और वेब साइटें काम करती हैं। हिंदी फिल्मों की लाखों डीवीडी जारी की जाती हैं जो हाथों हाथ बिकती हैं। न केवल एशिया, यूरोप के तमाम देशों और इजराइल के विश्वविद्यालयों में कई वर्ष पूर्व से हिंदी पढ़ाया जारी है। हिंदी सोसाइटी सिंगापुर द्वारा आज कई हिंदी प्रशिक्षण केंद्र चलाये जा रहे हैं, जिसमें बच्चों से लेकर वयस्कों तक को हिंदी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत की सरकार ने देश की केंद्र सरकार से हिंदी को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने की गुजारिश की है।

ब्रिटिश सरकार ने अपने यहां की पाठ्यक्रम तय करने वाली समिति से जाना कि क्यों हिंदी को देश के पाठ्यक्रम में 11 भाषाओं के साथ शामिल किया जाना चाहिए। रूसी विश्वविद्यालयों में भी हिंदी के विशेषज्ञ शिक्षा पा रहे हैं। हिंदी के प्रति दुनिया की बढ़ती चाहत का एक नमूना यह भी है कि विश्व के लगभग डेढ़ सौ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ी और पढ़ाई जा रही है। विभिन्न देशों के 91 विश्वविद्यालयों में ‘हिंदी चेयर’ है। इसे देखते हुए हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए सरकार की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। वैसे यूनेस्को की सात भाषाओं में हिंदी पहले से ही शामिल है। हिंदी बोलनेवालों तथा हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य का प्रचार करनेवालों के बीच संपर्कों के विकास के लिए दुनिया के विभिन्न देशों में नियमित रूप से विश्व हिंदी सम्मेलनों का आरंभ भारत के विदेश विभाग के सहयोग से चल ही रहा है।

भाषाई अनुमान के अनुसार विश्व में कुल छह हजार आठ सौ नौ भाषाएँ बोली जा रही हैं, जिसमें से 905 भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या एक लाख से कम है। इन सभी भाषाओं में हिंदी को सीधे चुनौती देनेवाली भाषा चीन में बोली जानवाली मैंड्रीन भाषा है, किंतु जिस तरह से दुनिया का आकर्षण भारत और हिंदी के प्रति बढ़ रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हिंदी को अब अपने अस्तित्व के लिए विदेशियों के बीच संघर्ष करने की जरूरत नहीं बची है। हिंदी वैश्विक स्तर पर आज पूरी तरह बाजार की भाषा बन चुकी है। यह वर्तमान दुनिया की जरूरत है।

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1 Comment on "हिंदी दुनिया की जरूरत है"

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Himwant
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हिंदी सतत रूप से ज्ञान, विज्ञान, रोजी-रोटी, मनोरंजन की भाषा बनने की राह पर अग्रसर है. हिंदी को पूरे भारत की भाषा बनाने के लिए कुछ कदम उठाने होंगे. क्यों न हम तमिल से प्रत्येक वर्ष 10 सर्वाधिक प्रयोग होने वाले शब्द आयात करे. हिंदी भाषा में समावेश करे. इन शब्दों को लोकप्रिय बनाने में संचार जगत तथा साहित्यकार अपनी भूमिका निर्वाह करे.

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