लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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नेहरु केंद्र, लन्दन में यूके हिंदी समिति द्वारा ७ नवम्बर २०१० को आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत

 पत्रकारिता की परिभाषा के वाद विवाद में पड़ने के योग्य विषय पांडित्य होने का दावा मैं नहीं करता. और न ही प्रस्तुत विषय सन्दर्भ में इसकी आवश्यकता ही है. मैंने परम मित्र पद्मेश जी के अनुरोध को स्वीकार करके ब्रिटेन में हिंदी पत्रकारिता के विषय पर आज के इस सेमिनार में बोलने का निश्चय किया तो उनका यह आग्रह भी था कि मैं चेतक पत्रिका के सम्बन्ध में अपने निजी अनुभवों का खुलासा करूं जो आज से लगभग साढ़े चार दशक पूर्व मैंने इस देश में प्रकाशित करने का उपक्रम किया था. प्राय: कंकर पत्थरों को नींव में समा जाने के बाद भुला दिया जाता है. वर्तमान के आगे बढ़ते कदम प्राय: अतीत की उपेक्षा कर देते हैं, लेकिन सत्य यह है कि इतिहास वर्तमान से नहीं बनता, बल्कि उसके अतीत से ही बनता है.

इसी दृष्टिकोण के अनुरूप ही वर्तमान की त्रैमासिक पत्रिका “पुरवाई” का, लगभग साढ़े चार दशक पूर्व उदय और अस्त हुए, मेरे संकल्प प्रतिरूप “चेतक” के साथ एक भावनात्मक सम्बन्ध स्वत: जुड जाता है. एक ऐसा सम्बन्ध जो ब्रिटेन में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की एक कड़ी बनता है. वर्तमान और अतीत के समय अंतराल को पाट देता है. यही एकात्म भाव है जो जोड़ने की अद्भुत शक्ति रखता है. साथ ही यह हिंदी के प्रति हम सब प्रवासी भारतीयों के अनुराग को रेखांकित करता है. यदा कदा भारत और विदेश के बीच रचे जा रहे इस इतिहास के पन्ने पलटते रहने की आवश्यकता है. इसलिए ताकि सर्वत्र भारतवंशियों को यह अहसास बना रहे कि यदि हमारी भाषा जीवित है तो हमारी संस्कृति भी जीवित रहेगी. परिवर्तन के वर्तमान दौर में यह नितान्त आवश्यक है कि हम हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ की मूलभूत शक्ति और साहित्यिक प्रभाविकता को किसी भी कारण से कमजोर न पड़ने दें, अन्यथा हम अपनी आधारभूमि खो देंगे.

जहां तक लेखन का सम्बन्ध है, वह चाहे किसी भी विधा में हो और जिस भाषा में भी वह रचा जा रहा है उसका सशक्त साथ उसे मिलना चाहिए, ताकि अर्थ का अनर्थ न हो. पत्रकारिता सम सामयिक स्थितियों एवं घटनाओं के सम्यक अध्ययन और विश्लेषण की कला है. किसी भी पत्रकार की विषय की गहराई तक पहुँचने की क्षमता विचारोत्तेजक पत्रकारिता को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम बनाती है. वार्तालाप पनपता है तो जनचेतना को बल मिलता है जो अनेक कठिन स्थितियों में निर्णय करने की शक्ति समाज को प्रदान करती है. अपने देश भारत में दुर्भाग्यवश, विचार-सक्षम पत्रकारिता अभावग्रस्त होने लगी है. बौलीवुड सब पर हावी है.

विगत शताब्दी में साठ का दशक, ब्रिटेन में प्रवासी भारतीयों के द्वारा हिंदी की अलख जगाने का दशक था. तब के प्रवासी भारतीयों के लिए एक प्रकार का संघर्षकाल. समय की आवश्यकता थी. अपनी भाषा के माध्यम से भारतीयता के प्रतिष्ठापन का तब के हम भारतीयों का संकल्प था. कई तरह के प्रयास शुरू हुए. कई तरीकों से किए गए. सामाजिक संस्थाएं खड़ी की गईं. भारतीय युवक संघ के नाम से एक युवा संस्था बनाने के बाद, मेरे मन में, एक हिंदी पत्रिका के प्रकाशन के माध्यम से इस संकल्प को पूरा करने की भावना जागृत हुई.

रास्ता आसान नहीं था. पहले पहल जब अपने भारतीय युवा संगठन के सहयोगियों के समक्ष चेतक के प्रकाशन का प्रस्ताव रखा, तो यह हलचल मची कि काम कौन करेगा? कहाँ छपेगा? कैसे छपेगा? कौन लिखेगा उसमें? क्या लिखेगा? मैं जानता था यही होगा. जानता था सबको एक पत्रिका का लन्दन से प्रकाशित होना तो अच्छा लगेगा, लेकिन काम और कमान मुझे ही सँभालने होंगे, क्योंकि, संस्था की स्थापना की तरह इसका विचार भी मेरे ही दिमाग की उपज थी. उससे पहले मैं इंग्लिश में एक न्यूज़लैटर संस्था की ओर से निकाल रहा था. उसमें उसकी गतिविधियों संबंधी जानकारी के साथ भारत के समाचारों के अतिरिक्त इंग्लैंड में बसे और बसने का प्रयत्न करने वाले हमवतनों के संघर्ष की चर्चा होती.

उल्लेखनीय है कि उस कालखंड में नस्ली भेदभाव के कारण विदेश से आए लोगों को अन्याय सहना पड़ता था. उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने में अन्य संस्थाओं के साथ सहयोग करते हुए, हमने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी. १९६५ में, भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. हमने, भारतीय होने के नाते, भारत के प्रति अपनी निष्ठा के अनुरूप इंडिया डिफेन्स फन्ड समिति में शामिल हो कर यथेष्ठ योगदान किया. यह अहसास और भी मज़बूत हुआ कि भारतीयों और भारत को न तो हजारों मीलों की दूरी अलग कर सकती है और नहीं ब्रिटेन और भारत के बीच संस्कृतियों का अंतर. हम विश्व के किसी भी भाग में रच बस जाएँ हमारे मन प्राण सदैव वहीँ अटके रहेंगे. इस भावनात्मक एकता को महत्व देते हुए ही चेतक पत्रिका निकालने का विचार मन में उभरा था. चेतक के घोषित लक्ष्य थे भारत के साथ सांस्कृतिक सेतु निर्माण, ब्रिटेन में बसे भारतीयों और भारतवंशियों को एक मंच पर लाने का प्रयत्न और स्थानीय समाज के साथ पूर्ण समानता के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम करना.

योजना का प्रारूप तो तैयार हो गया, लेकिन अब व्यावहारिक रूप से इस पर काम करना था. उस वक्त ब्रिटेन में हिंदी के फॉण्ट उपलब्ध नहीं थे. इसलिए हिंदी की कम्पोजिंग सम्भव नहीं थी. हमारे पास धन नहीं था. मैं अपने स्वभाव-वश किसी के आगे भिक्षा का कटोरा ले कर जाने में विश्वास नहीं करता था. इसलिए पत्रिका के प्रकाशन के लिए न तो हिंदी के नाम पर सरकारी मदद पाने की चेष्ठा की और न ही किसी धनी धनाड्य से अनुनय विनय की. हमारी भावना का आदर करते हुए दिल्ली के एक बन्धु ने हमें हिंदी की एक टाइपराइटर देने का वायदा स्वयं किया था, लेकिन निभाया नहीं. इस पर भी हमने निराशा का पल्लू नहीं थामा. किसी से कोई अपेक्षा नहीं की थी, इसलिए संकल्प नहीं डिगा. कदम नहीं रुके. कलम हाथ में थाम ली और चेतक का पहला हस्तलिखित अंक हमने १९६७ के भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर प्रकाशित कर दिया.

यही भावना और उसके अनुरूप कुछ करने का संकल्प ही ऐसी उपयोगी कल्पना को विचार और आकार प्रदान करते हैं. समय, स्थान और परिवेश की चुनौतियाँ उन्हें बल देती हैं. विचारवान व्यक्ति के मन मस्तिष्क में निरंतर उभरते प्रश्नों को तर्क बुद्धि से सुलझाने के साथ साथ उसे विश्लेषण की अभिव्यक्ति के साधन खोजने की धुन सवार होती है, कठिनाइयों के बीच भी वह साधन निर्माण करता है. सैनिक युद्धभूमि में ललकारे जाने के बाद तलवार उठाता है तो लेखक पत्रकार अपने विचारों को मुखर अभिव्यक्ति देने के लिए कलम उठाता है.

चेतक निकलने के लिए, यदि मैंने हिंदी में लिखने के लिए कलम संभाली थी, तो संस्था में मेरे सहयोगी आनंद कुमरिया ने सहर्ष इंग्लिश विभाग को देखने की जिम्मेदारी ली. हमारे संपर्क में आये जो लोग कुछ लिख सकते थे उनको हमने उकसाया. इधर से लिखवाया, उधर से लिखवाया. असली और छद्म नामों से लिखा. उन दिनों मेरे संपर्क में आये बलवंत कपूर उर्दू में मिलाप अखबार निकाला करते थे. ज्योति प्रिंटर्स के नाम से किसी एक गुजराती भारतीय की एक छोटी सी प्रेस थी. वहीं छपवाते थे. उनके साथ मैंने परामर्श किया. प्रेस के मालिक के साथ संपर्क साधा. उन्होंने सहर्ष सहयोग दिया और पहला अंक बिना कुछ भी हमसे लिए हिंदी के नाम पर छाप दिया. व्यावसायिक स्तर पर अंग्रेजी में ‘इंडिया वीकली’ नाम का समाचार पत्र निकलता था. उर्दू में ‘मिलाप’, पंजाबी में ‘देस परदेस’ छपता था. लेकिन हिन्दी में, हमारा प्रयास प्रकट कारणों से ही व्यावसायिक न हो कर स्वयंसेवी ही हो सकता था.

मैं पत्रकार की विचार प्रतिबद्धता, निर्भीकता और विश्वसनीयता को महत्व देता आया हूँ. इसलिए, जिस हिंदी पत्रकारिता को मैंने जाना और पहचाना है और जिसके साथ मैं निष्ठा के साथ जुड़ा रहा हूँ वह अब कम ही नज़र आती है, पत्रकार वही है जो बिना किसी दबाव और बंधन के विषय की गहराई तक जाए और साहस के साथ अपना मत विश्लेषण प्रस्तुत करे. लेकिन समाचार माध्यम अब एक व्यापार बन गया है. उसे आर्थिक लाभ हानि के तराजू पर अधिक तौला जाने लगा है. मैं ब्रिटेन में हिंदी पत्रकारिता के जिन प्रयासों की चर्चा कर रहा हूँ वे व्यावसायिक हानि लाभ के गुलाम नहीं थे. सेवा भाव से ओतप्रोत स्वयंसेवी प्रयास थे. १९६७ में, चेतक में छपे सम्पादकीय लेख के कुछ चयनित शब्द उद्धृत कर रहा हूँ, जो उस सोच को स्पष्ट करते हैं. हिंदी के माध्यम से हमने जैसी भाव भूमि निर्मित करने का प्रयास किया था उसकी हलकी सी एक झलक. –

“सभी राष्ट्रों की अपनी संस्कृति, भाषा एवं मान बिंदुओं का आधार ही उस राष्ट्र के अस्तित्व का आधार होता है. इंग्लैंड अपनी भाषा, इतिहास, रीति रिवाज और परम्पराओं के बल पर ही एक जीवित राष्ट्र बन कर खड़ा है. चाहे कितने भी कम समय का क्यों न हो, परन्तु आधुनिक अन्वेषणों के मध्य भी, ये सब तत्व आधार स्तंभ बन कर राष्ट्र के गतिमान अंगों को प्रेरणा देते रहने का का काम करते हैं.

प्रत्येक राष्ट्र की प्रगति उस राष्ट्र के युवा वर्ग पर निर्भर करती है. यौवन का प्रतीक राष्ट्रीय चेतना का व्रत लेकर चेतक का कार्य देश विदेश में बसने वाले भारतीयों को जागृत करने और उन्हें स्वकर्तव्य करने हेतु तैयार करने का है. अनेक बाधाओं, धन की कमी और हिंदी में मुद्रण की समुचित व्यवस्था संभव न होने पर भी चेतक का चेतनामय यह प्रथम अंक प्रवासी भारतीय समाज की सेवा में अर्पित करते हुए एक विशेष हार्दिक आनंद एवं संतोष की भावना का अनुभव हो रहा है.”

आइए चेतक के आएने में जरा और झांके-

अगला अंक दीपावली अंक था. तब तक मैंने उर्दू और हिंदी में किताबत करने वाले दिल्ली से आए एक भारतीय बन्धु मंज़ूर अहमद की खोज कर ली थी. अच्छी खासी हिंदी लिख लेते थे. उनका अपेक्षित मेहनताना तय कर लिया और धूम धमाके साथ उनके ही खुश्खत में लिखे हिंदी के पन्ने और टाइप किए गए इंग्लिश के पन्ने जोड़ कर एक जलते दीपक की आभा को संजोए मुखपृष्ठ के साथ, चेतक का दूसरा अंक प्रकाशित हुआ.

भारत के उपराष्ट्रपति श्री वी वी गिरि, हिंदीप्रेमी संसदसदस्य श्री गोविन्द दास और डाक्टर राम मनोहर लोहिया के उत्साहवर्धक सन्देश मिले. डॉक्टर लोहिया ने लिखा – “मैं भारत में अंग्रेज़ी का विरोध इसलिए नहीं करता कि वह विदेशी भाषा है. इस विषय को लेकर बहुत गलत प्रचार हुआ है. भारत में अंग्रेज़ी भाषा सामंती शासन और शोषण की भाषा हो गयी है. ५० लाख सामंत लोग ४९ करोड़ साधारण भारतीय जनता का शोषण अंग्रेज़ी के माध्यम से करते हैं ”.

हमने चेतक के वितरण का अभियान भी स्वयं ही शुरू किया, पत्रिका की प्रतियाँ लेकर हम इंग्लैंड के अनेक नगरों में गए. भारतीय दुकानदारों के साथ बात करके चेतक के विज्ञापन और वितरण के लिए सहायता मांगी. उन सिनेमाघरों पर गए, जहां हिंदी फ़िल्में दिखाई जाती थीं और अपने हम वतनों से मिल कर चेतक का परिचय दिया. जहां कहीं सम्भावना दिखी हमने संपर्क साधा. कुछ विज्ञापन लेने की चेष्ठा की और हमें किंचित सफलता प्राप्त भी हुई. इस तरह मैं और मेरे सहयोगी निस्वार्थ भाव से इस प्रकाशन को सफल बनाने के प्रयास में जुटे थे. रोटी रोज़ी के लिए संघर्ष अलग था, लेकिन चेतक हमारी सामाजिकता. भारतीयता और राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए हमारी प्रतिबद्धता का प्रतीक था.

अगला विशेषांक हमने भारत के स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्रीजी को समर्पित किया. इस बार राजनीतिक नेता श्री ओम प्रकाश त्यागी और श्री केदार नाथ साहनी, तथा पंजाब विश्व विद्यालय के आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की शुभ कामनाएं प्राप्त हुईं. आचार्य द्विवेदी जी ने लिखा – “चेतक का प्रथम अंक देख कर बड़ी प्रसन्नता हुई. सुदूर इंग्लैंड से निकलने वाली यह कदाचित प्रथम हिंदी पत्रिका है. इंग्लैंड में रहने वाले हिंदी भाषियों के मातृभाषा प्रेम और राष्ट्रीय स्वाभिमान का यह प्रतीक है. आपने बहुत थोड़े साधन से इसका प्रकाशन आरम्भ किया है, यह और भी महत्वपूर्ण है”. उन दिनों भारत में राज्य विधान सभा चुनावों की राजनीति गर्म थी. इनमें प्रवासी भारतीयों की भरपूर रूचि थी. अब भी होती है. इसलिए मैंने अपनी सम्पादकीय टिपण्णी ‘भारतीय राजनीति और संयुक्त सरकारें ’ में लिखा – “दुर्भाग्य का विषय है कि कई स्थानों पर केंद्र सरकार के अनुचित हस्तक्षेप और राज्यपालों के गैर ज़िमेवाराना व जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों के कारण कुछ राज्यों की लोकप्रिय सरकारों को पलट दिया गया है, जिसके बाद रोषपूर्ण बवंडर उठ खड़ा हुआ है. कलकत्ता में बसों और रेलगाड़ियों को जलाने और तोड़फोड़ की कारवाईयों द्वारा राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट किया जा रहा है. कारण कुछ भी हो परन्तु इस प्रकार से राष्ट्रीय सम्पति को नुक्सान बुद्धिमत्ता और राष्ट्रहित की बात नहीं मानी जा सकती ”.

तभी लोकसभा में भाषा विधेयक पारित किया गया था. मैंने उस पर लिखा – “आज़ादी के २० साल की अवधि में भी हमारे देश कि भाषा समस्या का कोई योग्य समाधान प्राप्त नहीं किया जा सका है. पारित विधेयक में, अंग्रेज़ी को तब तक सहायक सरकारी भाषा के रूप में मान्यता दी गयी है जब तक सभी प्रान्त पूरी तरह से राष्ट्रभाषा के रुप में स्वीकार नहीं कर लेते. यद्यपि प्रतिपक्षी दलों के द्वारा प्रस्तुत कुछ संशोधनों को मान लिया गया है जिनके तहत प्रान्त केंद्र के साथ पत्र संपर्क में हिंदी अंग्रेज़ी अनुवाद की व्यवस्था करेंगे. परन्तु, इस झंझटपूर्ण निर्णय से समस्या का हल होता दिखाई नहीं देता, जब तक सामाजिक स्तर पर हिंदी के प्रचार की समुचित योजना नहीं बनती”.

तब से लेकर अब तक जो कुछ हुआ है सब के सामने है. क्या हिंदी सही मानों में भारत की राष्ट्रभाषा बन पाई है? हम हिंदी को अंग्रेज़ी के कारण अपने स्थान से वंचित नहीं करना चाहते थे. जहां जिस भाषा का स्थान है वह वहीँ जंचती है. चेतक के स्वरूप, विषय चयन, और प्रस्तुति को जिस किसी ने देखा और पढ़ा, उसी ने सराहा. हमारी भावना का आदर किया. भारत और इंग्लैंड से लेखक भी इसके साथ जुड रहे थे.

भारत की आज़ादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले शहीदों की पुण्य स्मृति में हमने भगत सिंह विशेषांक निकाला. इसमें भारत से भगत सिंह की भतीजी सुश्री वीरेन्द्र सिंधु ने लेख भेजा, लन्दन से बलवंत कपूर ने शहीद उधम सिंह पर लिखा. उसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंक और तत्पश्चात चंद्रशेखर आजाद अंक प्रकाशित हुए.

एक दिन अचानक, भारतीय युवा संस्था और चेतक के सम्बन्ध में वार्ता देने के लिए बीबीसी से मुझे निमंत्रण मिला. यह अलग बात है कि जल्द बाद ही लन्दन से बीबीसी रेडियो की विश्व हिंदी सेवा के साथ नरेश अरोड़ा के नाम से मैं एक रेडियो प्रसारक के नाते लगभग चालीस वर्षों जुड़ा रहा.

चेतक के कदम चलते रहे, लेकिन प्रकट कारणों से धीमे होते चले गए. इस बीच कुछ महीनों के लिए मेरा स्वदेश जाना हुआ. मेरी अनुपस्थिति में उसकी व्यवस्था सँभालने वालों और साधनों के बने हुए अभाव में तीन वर्ष के प्रकाशन के बाद थम गए.

पत्रकारिता का सम्बन्ध रिपोर्ताज और राजनीतिक, आर्थिक एवं सामजिक विषयों पर चर्चा और बहस से होता है. आज पत्रकारिता की परिधि में मुद्रण के साथ साथ इलेक्ट्रोनिक मीडिया को भी शामिल किया जाता है. रेडियो, टेलीविजन और अब इन्टरनेट इसमें शामिल हैं. इससे पत्रकारिता की परिभाषा नहीं बदलती. मात्र स्वरूप और प्रस्तुति का माध्यम बदलते है. रेडियो और टेलीविजन में भी तो पत्रकार ही काम करते हैं. लिखते हैं और बोलते भी हैं.

धन्यवाद और शुभ कामनाएं –

नरेश भारतीय/ ७.११.२०१०

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2 Comments on "ब्रिटेन में हिन्दी पत्रकारिता : नरेश भारतीय"

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श्रीराम तिवारी
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ब्रिटेन में हिंदी पत्रकारिता विषयक आलेख सूचनापरक और उत्साह वर्धक है …धन्यवाद …

Divya [ZEAL]
Guest

जानकारीपरक लेख.

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