लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए

कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

जनजीवन में हिन्दी की स्थिति की बात करते हुए दुष्यन्त कुमार की गजल की ये पंक्तियाँ मर्मान्तक रूप में प्रासंगिक हो जाती हैं। कितने रूपों में हिन्दी को देश और समाज की पहचान विकसित करने में भूमिका लेने का आह्वान किया गया था, मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और सम्पर्क भाषा। दुर्द्धर्ष स्वतंत्रता सेनानी एवम् चिन्तक राममनोहर लोहिया प्रधानमंत्री जवाहरलाल के कटु आलोचक हुआ करते थे। उनसे एक गोष्ठी में पूछा गया—”राममनोहर लोहिया प्रधानमंत्री होंगे तो क्या कर लेंगे?” लोहिया ने छूटते ही जवाब दिया, “ मैं भारत माता को उसकी जुबान दे दूँगा। राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को स्थापित करके।” आजादी के बाद हिन्दी की हैसियत के बारे में इतना तो मोटामोटी तयशुदा लगता था कि राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी स्थापित होने जा रही है, मातृभाषा प्राथमिक शिक्षा का माध्यम होगी और हिन्दी को सम्पर्क भाषा की भूमिका लेनी होगी । फिर ऐसा कैसे हुआ कि आज की तस्वीर में इनमें से एक भी मौजूद नहीं है।

देश के जिस इलाके में हिन्दी-उर्दू बोली जाती है वह भारत का हृदय-क्षेत्र (heartland ) कहलाता है ।; इसको वे लोग cow- belt कहते हैं। इस नामकरण से जाहिर होता है कि आर्थिक-सामाजिक विकास के मापदण्ड पर यही क्षेत्र देश का सबसे पिछड़ा हुआ इलाक़ा भी माना गया है इस क्षेत्र के राज्यों के नामों के पहले अक्षरों को मिलाकर BIMARU (बिहार,मध्य प्रदेश राजस्थान वम् उत्तर प्रदेश) आदिवर्णिक शब्द (acronym) बनाया गया है।

भारत की राष्ट्रीय अवधारणा तथा सत्ता (concept and authority) के प्रति सहज लगाव इस इलाके की पहचान रही है । जब कि देश के बाकी इलाके अपनी अपनी इलाकाई पहचान से जाने जाते रहे हैं । हिन्दी क्षेत्र के लोग इलाकाई पहचान को क्षेत्रीयता और संकीर्णता और राष्ट्रीय चेतना को धूमिल करनेवाला मानते रहे। जबकि अन्य लोग इलाकाई पहचान को उपराष्ट्रीयता की संज्ञा देते हैं। क्या हिन्दी-क्षेत्र को अपनी पहचान और हिन्दी संस्कृति की तस्वीर परिभाषितकरने की जरूरत है?

भारत के लिए किए गए किसी भी आन्दोलन को जन-समर्थन सबसे पहले इसी इलाक़े में मिलता और बनता आ रहा है , लेकिन लीडरशीप इस इलाक़े के बाहर से ही आती रही है । महात्मा गाँधी के आह्वान पर आज़ादी के हलचल की शुरुआत यहीं हुई । पर गाँधी यहाँ से नहीं थे । जिन्ना को पाकिस्तान का क़ायद बिहार-यू. पी. ने ही बनाया । वे भी गुजरात से थे । राष्ठ्रीय स्वयम् सेवक संघ के संस्थापक श्री केशव हेडगेवार महाराष्ट्रीय थे , संघ का मुख्यालय नागपुर (महाराष्ट्र) आज भी है; पर कौन नहीं जानता कि हिन्दी क्षेत्र में ही आर. एस. एस. परवान चढ़ा । आखिर कोई वज़ह तो होगी कि लीडरशीप के लिए यह क्षेत्र देश के दूसरे हिस्सों का मुँहताज बना रहा है ।

भाषा किसी जगह में रहने वालों के बीच सरोकार कायम रखने का अहम जरिया होती है, इसलिए एक सीमित जगह में भाषा का एक ही रूप होता है । लेकिन इस इलाके समाज की छोटी से छोटी इकाइयों में भी भाषा हिन्दी-उर्दू के दो रुपों में मौजूद रही है। इन दो भाषाओं के बीच का रिश्ता विडम्बनाओं से भरा रहा है। परस्पर इतनी समानताएँ कि एक ही भाषा की भिन्न शैलियाँ लगें, पर एक का जानकार दूसरे को नहीं पढ़ या समझ सकता। इसका नतीजा होता है कि एक साथ रहते हुए भी इन दो भाषा भाषी लोगों के बीच संवाद का रिश्ता ठीक ठीक बन नहीं पाता ।

मातृभाषा की पहचान पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। मेरे एक सहकर्मी अंगरेजी के व्याख्याता शफाक अहमद आन्ध्र-प्रदेश के थे। आपसी बातचीत के सिलसिले में उन्होंने मुझे बताया कि उनकी मातृ-भाषा उर्दू है। पर वे हिन्दी-उर्दू में बात नहीं कर सकते थे। जब मैंने इस विसंगति की ओर ध्यान दिलाया तो उन्होंने मुझे कहा, “Urdu is my mother tongue because it is my mother’s tongue”, आंध्र प्रदेश से आए एक अन्य सहकर्मी भौतिकी विभाग के श्री विश्वनाथन के साथ वे तेलुगू सहजता से बोल लेते थे। जाहिर है कि तेलुगू ही उनकी मातृभाषा थी, जिसे वे अस्वीकार कर रहे थे।

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचारिणी सभा के श्री प्रकाशम् नारायण से असम में मुलाकात हुई थी। वे केरल के थे। हिन्दी के प्रति उनकी निष्ठा ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। मैंने उनसे दक्षिण भारत में हिन्दी विरोध की स्थिति पर जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि वहाँ का विरोध एक तात्कालिक रण-नीति के अनुसार है ताकि वे नौकरियों में पिछड़ न जाएँ। इसलिए हिन्दी विरोध आन्दोलन के साथ साथ वे तेजी से हिन्दी सीखते जा रहे हैं। चिन्ता तो हिन्दी क्षेत्र से है। इस क्षेत्र के लोग अपनी जिस तरह हिन्दी के बजाय स्थानीय उपभाषाओं को मातृभाषा घोषित करने में लगे हैं, हिन्दी का सम्पर्क-भाषा का दावा खतरे में पड़ जा सकता है।

हिन्दी भाषी लोगों में हिन्दी के प्रति निष्ठा और लगाव का अभाव हर अवसर पर दिखता रहता है। आज ही मुझे अपने भैया के पोते के विवाह का निमंत्रण पत्र मिला है। मेरे नाम का पत्र हिन्दी में है जबकि दूसरा पत्र, जो मेरे बेटे के नाम है, अंगरेजी में है। इन पत्रों में भाषा के अलावे अन्तर्वस्तु का भी अन्तर है। हिन्दी का निमंत्रण वर के दादा की ओर से है, जबकि अंगरेजी का वर के माता-पिता की ओर से है और उसमें दादा का नामोल्लेख भी नहीं है। हमारी समझदारी में हिन्दी आधुनिकता के साथ संगत नहीं हुआ करती, परम्परा के निर्वहन में ही हिन्दी उपयुक्त रहती है। इसे ही हीनभाव के साथ संगति कहा जाता है न ?

विश्वविद्यालयों में हिन्दी के प्राध्यापक, जिनकी पहचान रोजी रोटी हिन्दी के ऊपर ही आश्रित है, मैंने उन्हें अपना परिचय-कार्ड अंगरेजी में रखते हुए पाया है। हम कम्युटर की जटिल कार्य-प्रणाली को सीख लेते हैं पर देवनागरी लिपि में टाइप करना हो तो क्षमायाचना कर लेते हैं।

हिन्दी को उसका प्राप्य नहीं मिलने में वैसे लोगों का योगदान कम नहीं है जिन्होंने हिन्दी के साहित्य और पत्रकारिता संसार में अपनी जगहें सुरक्षित कर ली हैं। गत अप्रेल महीने के वागर्थ में हिन्दी के एक वरीय सम्मानित आलोचक का इण्टर्व्यू पढ़ने को मिला। इसमें और बातों के अलावे आलोचक महोदय ने एक स्थानीय प्रतिष्ठित साहित्यकार को हीनभाव से ग्रस्त बताया था। यद्यपि उन्होंने नाम नहीं लिया था पर वे उन्हें “पुरस्कारों के मारे हुए” बताकर स्पष्ट कर देते हैं कि ये वही है जिनको प्रारम्भिक स्टेज में इन्होंने ही पुरस्कार के लिए प्रायोजित किया था। पर बाद में वे इनसे स्वतन्त्र एवम् अन्य शिविरों के अनुकूल होकर अपनी पहचान बनाने में लग गए। यह कोई अनूठा उदाहरण नहीं है। हिन्दी का परिवेश भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से। हर नई प्रतिभा को इन क्षुद्रताओं से जूझ कर ही अपने को प्रकाशित करना होता है। नतीजा होता है कि कितनी ही प्रतिभाएँ कली से फूल नहीं बन पाती, बीच में ही मुरझा जाती है, अनेकों नदियाँ समुद्र तक पहुँचने के पहले ही मरुस्थल से गुजरते हुए सूख जाती हैं। हिन्दी के पाठकों की संख्या बढ़ाने, हिन्दी भाषी लोगों में पठनपाठन की अभिरूचि और सुविधा बढ़ाने के प्रति आग्रह न होकर लेखकीय पुरस्कार राशि एवम् संख्या बढ़ाने के आन्दोलन हिन्दी संसार के बड़े लोगों के द्वारा किए जाते हैं। पिछले दिनों पढ़ी ये पंक्तियाँ याद आती हैं-

“इस दुनिया का बड़ा बनूँ कैसे/ इतना ओछापन अपने बस में नहीं।“

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