लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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-डॉ. मधुसूदन-
hindi

(एक) आज का उद्देश्य।
आज का उद्देश्य है यह दिखाना कि, हिंदी में संस्कृत द्वारा कितनी सारी संज्ञाएं रची जा सकती हैं। यह प्रत्यक्ष उदाहरणों से दिखाना; चाहता हूँ; किसी और के कथन या उद्धरण से नहीं। जब पाठक इन शब्दों को अंग्रेज़ी के शब्दों के आमने सामने देख कर तुलना करेगा, तो स्वयं ही निर्णय कर स्वीकार कर लेगा। मानता हूँ कि वस्तुओं के नाम, अंतर-राष्ट्रीय चलन, माप-तौल, सूत्र इत्यादि तो प्रायः बदले नहीं जा सकते। उन्हें कुछ अपवादों को छोडकर, वैसे के वैसे ही स्वीकारने पर विचार किया जाना चाहिए। जहाँ संभव हो, वहाँ, कुछ हिंदीकरण (संस्कृतकरण) भी किया जा सकता है।

(दो) अंग्रेज़ी शब्दों की कठिनाई।
अंग्रेज़ी शब्दों की कठिनाई जानने के लिए, कभी एनेटॉमी की संज्ञाओं के विषय में किसी चिकित्सक (डॉक्टर) को पूछिए; प्रमाणित हो जाएगा। अंग्रेज़ी ने तो प्रायः ४९ से १२० तक भाषाओं से शब्द ग्रहण किए है। वह भानुमती का कुनबा बन चुका है। इधर की ईंट उधर का रोडा, लेकर, अंग्रेजी भानुमती ने अपना कुनबा जोड़ा हुआ है। न उच्चारण का ठिकाना, न स्पेलिंग का ठिकाना। दो तीन आलेख इसी विषय पर डाले हुए आप सभी पाठक जानते ही होंगे। अनुरोध है कि एक बार फिर से मेरे द्वारा लिखी गयी “खिचडी भाषा अंग्रेज़ी”, और “हिंदी हितैषियों के चिंतनार्थ” नामक आलेख पढ़ें। वहीं टिप्पणी भी करें।

मैं अंग्रेज़ी को आदर्श नहीं मानता। न उसको कोई भाषाविज्ञानी आदर्श मानता है।
आदर्श यदि है, तो संस्कृत है। इसी के कारण तो संगणक के परिचालन में भी प्रायोजित हुयी है।
संस्कृत की शब्द रचना विधि अनुपम है।

(तीन) प्रत्यक्ष प्रमाण।
शब्द विकास की प्रक्रिया को गत आलेख से आगे बढ़ाता हूँ।
प्रत्यक्ष प्रमाण के लिए शासकीय संज्ञाएँ ४५ क्रम तक दी थीं। उसके आगे आज ४६ से ८६ तक देता हूँ। इनको कुछ अलग रीति से भी विकसित किया जा सकता है। पर शायद ये संज्ञाएँ कानून की भाँति व्याख्यायित हैं, तो उनको बदला नहीं जा सकता।

(४६)Forest Department= वन विभाग
(४७)Assembly Department=विधान सभा विभाग
(४८) Public Works Department= सार्वजनिक निर्माण विभाग
(४९)Agriculture Department=कृषि विभाग
(५०)Labour Department= श्रम विभाग
(५१)Co-operative Department=सहकारि विभाग
(५२)Appointment Department= नियुक्ति-विभाग
(५३)Social Education Department= समाज-शिक्षा-विभाग
(५४) Rehabilitation Department=पुनर्वास=विभाग
(५५)Department of Statistics=सांख्यिकी-विभाग
(५६)Excise Department= उत्पाद-कर-विभाग
(५७)Health Department= स्वास्थ्य-विभाग
(५८)Mining and Geology Department=खनि तथा भौमिकी-विभाग
(५९)Departmental = विभागीय
(६०) Inquiry= परिपृच्छा (पूछताछ )
(६१)Departmental Charges=विभागीय व्यय
(६२)Officer =अधिकारी
(६३)Officer-in-Charge=प्रभारी अधिकारी
(६४) Establishment Officer=स्थापना अधिकारी
(६५)Registrar= पञ्जीयक, निबंधक
(६६)Superintendent= अधीक्षक
(६७)Deputy Superintendent=उप-अधीक्षक
(६८)Assistant Superintendent= सहायक अधीक्षक
(६९)Clerk=लिपिक
(७०)Director= संचालक
(७१)Director of Industries= उद्योग संचालक
(७२)Deputy Director=उप-संचालक
(७३)Ex-Officio Director=पदात्‌ संचालक
(७४)Managing Director= प्रबंध संचालक
(७५)Officiating Director=स्थानापन्न संचालक
(७६)Assistant Director=सहायक संचालक
(७७)Extra Assistant Director=अतिरिक्त सहायक संचालक
(७८)Commissioner =आयुक्त
(७९)Chief Commissioner= मुख्य आयुक्त
(८०)Deputy Commissioner=उपायुक्त
(८१)Additional Deputy Commissioner=अपर उपायुक्त
(८२)Assistant Commissioner= सहायक आयुक्त
(८३)Extra Assistant Commissioner= अतिरिक्त सहायक आयुक्त
(८४)Development Commissioner=विकास-आयुक्त
(८५) Labour Commissioner=श्रम-आयुक्त
(८६)Election Commissioner=निर्वाचन आयुक्त

शब्द निर्माण प्रक्रिया।
शब्द निर्माण का प्रत्यक्ष प्रमाण देखनेपर और साथ साथ अंग्रेज़ी संज्ञाएँ देखकर पाठक अपने आप सत्यापन कर सकता है। यदि हमें अंग्रेज़ी शब्द स्वीकार करने की विवशता होती है, तो उसकी भी क्या कठिनाई है; यह भी समझमें आ जाएगा।

एक अनुरोध
प्रयोग करें। घड़ी लगाकर अंग्रेज़ी संज्ञा लिखे। लिखने में कितना समय लगा? लिख लें। फिर हिंदी की संज्ञा लिखें उसका भी समय लिख लीजिए। आप देखेंगे कि हिंदी लिखने में आप को अंग्रेज़ी की अपेक्षा आधे से भी कम समय लगेगा। कुछ समय स्पेलिंग पाठ करने में भी जाएगा।

एक उदाहरण देखिए।
-Labour Commissioner= श्रम-आयुक्त (हिन्दी में)
को अंग्रेज़ी में और हिन्दी में लिखकर अनुभव करें।
अंग्रेज़ी के (१८ अक्षर)= और हिन्दी के (पाँच अक्षर) स्पेलिंग कण्ठस्थ करने का समय अलग।
ऐसे उदाहरण देखनेपर आप स्वयं निर्णय करें, कि हमारी हिन्दी के शासकीय शब्द कितने सरल हैं?
ये संज्ञाएँ डॉ. रघुवीर जी की भारत को देन है।

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डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Sanskrit Grammar and Spread of Indian Culture

Look at this English sentence: “ They wound their business and came back to India”. I read the word ‘wound’ in the sense of hurt or injury. Of course it was used as the past tense of word ‘wind’. Now the word ‘wind’ can also mean a breeze when it was pronounced differently. So it is all confusing. Is the word ‘put’ is pronounced in the same way as ‘cut’ or ‘but’? In ‘walk’ or ‘chalk’ the ‘l’ is silent. In a Hindi picture “Pyare Mohan” Dharmendra asks his boss, Omprakash, who was also his English teacher,- “If ‘do’ is pronounced as ‘du’ then ‘go’ should be pronounced as ‘gu’ which in many Indian languages means human excreta. A man who has passed M. A.(English) has to consult a dictionary to know spelling and pronunciation of English words.

Every movement is a vibration and every vibration is a sound. Even a thought is sound and corresponds therefore to a particular vibration. The universe is full of infinite sounds which we may or may not hear. Vibrations of Vedic Mantras are most beneficial to the mankind. Hence for Vedic- Mantras correct pronunciation is more important than its meaning. Vedas are learnt by hearing a teacher but never by reading books. Any creative activity is preceded by thoughts, so it is said the world is created by ‘AUM.

‘AUM’ is composed of vowel ‘A’, Vowel ‘U’ and consonant ‘M’. ‘A’ is pronounced with mouth open and it rises from navel. ‘M’ is pronounced with lips closed, which means it is the end of sounds pronounced by human beings. ‘U’ is like rolling sound moving from ‘A’ to ‘M’. Thus ‘AUM’ represents all the sounds present in the Universe! Amen used by others is not AUM. Experts say Vedas are oldest literature in the world. Hence Sanskrit is the oldest language which has influenced all the languages.

We humorously say that Shakespeare was an Indian whose name was Sheshappa Aiyer. But if you see the etymology of Juggernaut (which means a ruthlessly killing machine) you will be surprised to find it has come from the word Lord ‘Jagannath’ of Puri. Now you try to utter the word ‘Dant’ which means ‘tooth’. You cannot pronounce it without touching the teeth with your tongue. The English word ‘Dental’ has come from Sanskrit word ‘Dant’, but to pronounce it, the tongue need not touch the teeth.

Sanskrit is a language which has all phonemes. It has also has a script in which sound of every letter is determined with utmost accuracy. Grammar of Sanskrit has come from Shiva’s Tandav Dance! Sanskrit grammarian Bhagavan Panini observed the Tandav Dance. At the end of dance, fourteen sounds emerged form Lord Shiva’s Damaru which are called ‘Maheshwar Sutrani’. With These 14 Sutras Panini wrote his famous grammar book ‘Ashtadhyayi’, a grammar-book par excellence, with eight chapters.

राष्ट्र निर्माण में भाषा एक महत्बपूर्ण योगदान देती हैं। स्वतन्त्रा के पश्चात सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में आ गई जो अंग्रेजी समर्थक थे और भारत में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व हमेशा की लिये बनाए रखना चाहते थे। जबकि उस समय भारत में अंग्रेजी जानने बाले लोग लगभग एक प्रतिशत से अधिक नहीं थे। इन लोगों ने सारे कानून नियम अंग्रेज़ी में बनाय। जिसे भारत के आम लोग समझ नहीं पाए। पैसों की द्रद्रिता के साथ जानकारी की द्राद्रिता भि जन्ता मैं रहीं। अभी भी हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने मैं प्रादेशिक निष्ठा आड़े आ रहीं है। जबकि राष्ट्र निष्ठा को देखते हुए हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा मिलना चाहिए। डॉ. मधुसूदन जी ने समय समय पर अपने लेखों द्वारा यह सिद्द किया हैं कि हिंदी भाषा मैं शब्दोँ का एक बहुत बड़ा भंडार हैँ। संस्कृत की सहायता से नए शब्द घड़े जा सकते हैं। जो भाषा के अनुरूप हैं और जिन्हें लिखने में अंगरेजी की तुलना से भी कम समय लगता है। स्वतंत्रता के तुरन्त पश्चात हिन्दी को राष्ट्रा भाषा बनाने के लिए डॉ. रघुबीर नें एक बहुत बड़ा हिंदी शब्दकोष तैयार किया था जिससे हिंदी अंग्रेजी को हटाकर हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा बन जाये। किन्तु नेहरू के कारन हिंदी राष्ट्र भाषा नहीं बन पाई। डॉ. रघुबीर जी द्वारा निर्मित शब्दकोष एक अमूल्य पुस्तक हैँ, इसका प्रकाशन होना चाहिए।

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राष्ट्रभाषा: मनन-मंथन-मंतव्य
Editor’s Choice

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संजय भारद्वाज

भाषा का प्रश्न समग्र है। भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है। भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली वाणी है। किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भली भांति समझा। आरंभिक आक्रमणकारियों ने संस्कृत जैसी समृद्ध और संस्कृतिवाणी को हाशिए पर कर अपने-अपने इलाके की भाषाएं लादने की कोशिश की। बाद में सभ्यता की खाल ओढ़कर अंग्रेज आया। उसने दूरगामी नीति के तहत भारतीय भाषाओं की धज्जियॉं उड़ाकर अपनी भाषा और अपना हित लाद दिया। लद्दू खच्चर की तरह हिंदुस्तानी उसकी भाषा को ढोता रहा। अंकुश विदेशियों के हाथ में होने के कारण वह असहाय था। यहां तक तो ठीक था। शासक विदेशी था, उसकी सोच और कृति में परिलक्षित स्वार्थ व धूर्तता उसकी सभ्यता के अनुरुप थीं। असली मुद्दा है स्वाधीनता के बाद का। अंग्रेजी और अंग्रेजियत को ढोते लद्दू खच्चरों की उम्मीदें जाग उठीं। जिन्हे वे अपना मानते थे, अंकुश उनके हाथ में आ चुका था। किंतु वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि अंतर केवल चमड़ी के रंग में हुआ था। फिरंगी देसी चमड़ी में अंकुश हाथ में लिए अब भी खच्चर पर लदा रहा। अलबत्ता आरंभ में पंद्रह बरस बाद बोझ उतारने का “लॉलीपॉप’ जरूर दिया गया। धीरे-धीरे “लॉलीपॉप’ भी बंद हो गया। खच्चर मरियल और मरियल होता गया। अब तो देसी चमड़ी के फिरंगियों की धूर्तता देखकर गोरी चमड़ी का फिरंगी भी दंग रह गया है।

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Global Importance of Hindi

The recent consciousness towards increasing profile of Hindi language has given hope to millions of Hindi speakers and it is hoped that in times to come Hindi will get recognition and become United Nations official language. This is the time Hindi Center, Hindi universities, Hindi NGOs and millions of Hindi speakers should join hands to increase profile of Hindi. Hindi Media has contributed to growth of Hindi. Hindi written on labels also helps in growth of Hindi. Hindi films should start giving cast in Hindi instead of English and should start using pure Hindi.

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