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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-गोपाल बघेल ‘मधु’-
poem

हम रहे आनन्द की आशा बने (मधुगीति सं. २२९२)

हम रहे आनन्द की आशा बने,
हम रहे ब्रह्मांड की भाषा बने;
अण्डजों की आत्म की सुषमा बने,
पिण्डजों की गति की ख़ुशबू बने ।

समय में चलना कभी चाहे हमीं,
पूर्व के कुछ दृश्य लख चाहे कभी;
भविष्यत की झांकियां चाहे कभी,
भूमि की भव सिद्धियां चाहे कभी ।

गति प्रकाशों की लिये हम झांक सकते,
पार आकाशों के क्या है ताक सकते;
काश यदि हम हृदय में भी झांक सकते,
धरा औ आकाश के उद्गम को तकते ।

रहा जो ब्रह्मांड वह ही मन हमारे,
चाँद तारे सब सितारे उर हमारे;
सहज ही सब नजर आजाते नज़ारे,
ध्यान गति उच्छ्वास आते पिण्ड सारे ।

देख कर भी क्या करेंगे ये नज़ारे,
छूट ही सब जाएंगे दृष्टि से सारे;
क्यों न द्रष्टा बन सुसृष्टि को चलाने,
हर ‘मधु’ के नयन बोयें सुर सुहाने ।

महकता मेरा गुलिस्तां सदा रहता (२२९३)

महकता मेरा गुलिस्तां सदा रहता,
दहकता दरिया जगत से विदा लेता;
तरा दुविधा से मेरा मन तर्ज पाता,
त्याग की हर तरन्नुम में लरज़ जाता ।

जगत की हर लहर को चुपके से तकता,
चाह कर भी चिपक वह उससे न पाता;
गीति की हर प्रीति में प्राणों को लखता,
प्रतीति की रीति में वह ना मचलता ।

प्रलय को नित लय दिये वह चला चलता,
लय विलय कर बृह्म में निश्वास भरता;
आश के हर पाश को प्रश्वांस देता,
श्वाँस के हर न्यास को विश्वास देता ।

मृग बना मरु भूमि में वह चला चलता,
तरु बना तन्मय हुआ वह कभी रहता;
कीट की हर क्रियति में रंग खिला देता,
प्रीति की हर प्रणति में सृष्टि बढ़ाता ।

मात्र तकता मुक्ति भरता भुक्ति करता,
मन मेरा मायूस ना है कभी होता;
समर्पित मालिक को नित यह जगत करता,
‘मधु’ को महका फुरा कर मोद करता ।

कहां मैं कुछ कर सका बिन तेरे प्रेरे (२२९५)

कहां मैं कुछ कर सका बिन तेरे प्रेरे,
प्रीति के कितने कुएं पाये घनेरे;
लख सका ना लुके कितने थे सबेरे,
जीव के उर में बसे कितने अंधेरे ।

लखे मैं जग में गया कितने चितेरे,
गया सुलगा हृदय में कितने अंगारे;
विलक्षण प्रतिविम्ब कितने जग निहारे,
सुलक्षण सपने भरे कितने नज़ारे ।

प्रायः पाया सूक्ष्मता के कुछ सितारे,
हृद नदी के लखा में कितने मुहाने;
ग़ज़ल में कितनी फ़ज़ल कर दर किनारे,
चला गाता प्रीति के अद्भुत तराने ।

प्रगति की पगडंडियों पर पुष्प लखने,
मैं चला चलता प्रकृति कुछ कृति करने;
काल्पनिक जग कल्पना को सस्वर करने,
भास्वर भव भंगिमा में सुर फुराने ।

कोपलों की चपल सुन्दरता निरखने,
कोयलों की लय भरी कविता परखने;
‘मधु’ चला चलता सुकृति को नित सँवारे,
बृह्म की हर छवि में उसको निहारे ।

प्रीति की जो गीति थी तुमने सुनायी (२२९६)

प्रीति की जो गीति थी तुमने सुनाई,
भाव की सरिता हृदय मेरे बहाई;
हुलस कर मेरे हृदय वह बाढ़ लाई,
जगत का झरना दिखा वह रंग लाई ।

सुशीतल स्वच्छन्द सुर वह रही गाई,
स्रोत का अस्तित्व वह देती दिखाई;
सहज सात्विक भाव वह जग में फुराई,
प्रकृति की हर कृति को वह रास आई ।

सरसता की सरहदों वह रही सोही,
विकलता के हर क़दम पर रही मोही;
विवशता में स्वप्न बन आया करी वह,
कुटिलता में शीलता लाया करी वह ।

कभी बन कर जीव की वह सहचरी सी,
सुष्मना सबके अजब हलचल करी थी;
सूक्ष्म बन कर कभी फिर वह चल पड़ी थी,
गर्भ जाकर जीव नूतन बन पड़ी थी ।

प्रीति के सुर छन्द मन मन में सुहाई,
अखिल जग को दे कभी उर में विदाई;
‘मधु’ को देते कभी ध्वनि निज सुनाई,
प्रीति के नव संचरण की लय पुराई ।

मुक्त जो मन रह सका उन्मुक्तता में (२२९७)

मुक्त जो मन रह सका उन्मुक्तता में,
भुक्त जो मन रह सका नित शून्यता में;
चित्त की सब तरंगों को सोंप उसमें,
वृत्ति की भवितव्यता को समझ उसमें ।

दग्ध मन को कर जगत कल्याण पाया,
शून्यता में अखिलता को देख पाया;
सूक्ष्म नित गति को किये शाश्वत लखाया,
वेग की आवृत्ति तज भूतों को खोया ।

प्रकाशों के वेग जा भूतों को लखना,
काल की दीर्घा में जा जग को निरखना;
नहीं भाता मुक्त को पीछे पलटना,
चेतना को चाहता वह सूक्ष्म करना ।

सचेतन हो सूक्ष्म में सृष्टि निरखता,
योजना सृष्टा की वह है समझ जाता;
ब्राह्मी-मन मन मिलाकर एक होता,
भविष्यत के द्रश्य वह सब देख पाता ।

सोचता जो वही होजाता जगत में,
सूक्ष्म मन की तरंगों के प्रस्फुरण में;
जीव जो भी तक सके हैं ‘मधु’ मनन में,
गीत सब उसके रचे हैं अणु नयन में ।

अलविदा क्या किसी को मैं कह सका (२२९८)

अलविदा क्या किसी को मैं कह सका,
अलहदा भी क्या किसी से हो सका;
गुमशुदा जब तब कभी मन में रहा,
कहकहाना कभी ना उर कम रहा।

सुलगते संसार को क्या आग दूं,
धड़कते दिल क्यों किन्हीं के तोड़ दूं;
चहकती चिड़ियों को क्यों ना प्यार दूँ,
मचलती रंगीनियों को क्यों मैं रोक दूँ।

गति प्रगति की चला है यह ज़माना,
गा रहा हर जीव अपना तराना;
स्थिति सबकी सभी की राह अपनी,
पा सकेंगे समय पर सब तरन अपनी।

बना द्रष्टा मैं सभी को लखे चलता,
योग औ सहयोग सब संग नित्य करता;
पर न ज्यादा लिप्त होकर मोह करता,
गति उनकी प्रभु समर्पित समझ चलता ।

मुदित पर ना अधिक मुझसे हुआ जाता,
क्षुब्ध भी ना अब किसी से हुआ जाता;
धर्म की गति बँधा मन यह कर सका,
कर्म के मृदु मर्म को ‘मधु’ चख सका।

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1 Comment on "महकता मेरा गुलिस्तां सदा रहता"

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N singh
Guest

Nice poem:
सुलगते संसार को क्या आग दूं,
महकता मेरा गुलिस्तां सदा रहता,
दहकता दरिया जगत से विदा लेता;
तरा दुविधा से मेरा मन तर्ज पाता,
त्याग की हर तरन्नुम में लरज़ जाता

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