लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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-बीनू भटनागर-
poem

एक ही जीवन में हमने,
एक युग पूरा देखा है।
बड़े बड़े आंगन चौबारों को,
फ्लैटों मे सिमटते देखा है।
घर के बग़ीचे सिमट गये हैं,
बाल्कनी में अब तो,
हमने तो पौधों को अब,
छत पर उगते भी देखा है।
खुले आंगन और छत पर,
मूंज की खाटों पे बिस्तर,
पलंग निवाड़ के ढीले पड़े,
तो उन्हें कसना।
हाथ से पंखों का झलना,
सूरज की किरण से जगना,
हमे अब भी याद है।
फिर बिजली के पंखे और कूलर,
अब एसी में करवट बदलना,
हर मौसम में अब,
बन्द दरवाज़ों में सोने का ज़माना।
एक ही जीवन में हमने,
पूरा एक युग देखा है।
फोन तो बचपन में भी था,
बिना डायल वाला काला,
नम्बर बताने पर ,
जुड़ता था सामने वाला।
ट्रंककाल पर चिल्लाये,
घंटों प्रतीक्षा की,
तीन मिनट हलो हलो करते बीते,
बात पूरी हो न पाई।
फिर एसटीडी आई,
सीधे ही नम्बर लगाया,
लखनऊ से कानपुर घुमाया।
फोन भी तब बहुत कम थे,
‘कृपया राधा जी को बुलादें’
जैसे संदेश आते..
और अब,
देश विदेश फोन में सिमट गये हैं,
मां जगाती बच्चे को होस्टल में
‘अब तो उठ जा बेटा साढ़े सात,
बज गये हैं।‘
हर व्यक्ति के पास फोन,
नये से नये हैं।
सब्जीवाला, ऑटोवाला,
फोन पर है दौड़ा आता।
एक ही जीवन में हमने,
पूरा एक युग देखा है।
छोट शहरों की औरतें भी,
कहां थी बाज़ार जाती,
दुकान से ही सामान,
घर ले आते थे दुकानदार।
घर में एक रेडियो था,
बिनाका गीतमाला जश्न
होता था हर बुधवार रात।
एक ग्रामा फोन भी था,
चाबीवाला… कभी-कभी
निकाला जाता।
फिर टेप रिकॉर्डर आया
संगीत का जश्न तब,
कैसेट और सीडी ने जमाया।
एक ही जीवन में हमने,
पूरा एक युग देखा है।
देखते ही देखते,
दूरदर्शन का रंग छाया,
चलचित्र चित्रहार से,
मनोरंजन पाया।
श्वेतश्याम रूप भी बड़ा भाया।
फिर कभी ऐंटीना हिलाया,
रुकावट के लिये खेद होता।
समाचार सलमा सुनाती,
बालों में फूल एक लगाना,
वो न कभी भूल पातीं।
अकेले घर में जब होते,
कृषिदर्शन से भी जी बहलता।
बय्यासी में रंग टीवी में आया,
गणतंत्र दिवस का रंगीन जश्न मनाया,
और एशियाई खेल रंगीन देखे।
रोज के धारावाहिकों ने,
सबका मन बहलाया।
एलसीडी एलईडी के बाद,
अब एचडी आ चुका है,
पर अब कुछ जी उकता चुका है।
एक ही जीवन में हमने,
पूरा एक युग देखा है।
भला हो इस इंटरनेट का,
इसमें तो है जग समाया,
सारे प्रश्नों के उत्तर,
गूगल है ढूंढ़ लाता,
स्काइप दूरियां घटाता,
डाकिया अब केवल,
रद्दी वाले कागज है लाता,
अंतर्देशीय पत्र नहीं,
अब तो ई-मेल आता।
तार अब नहीं हैं आते,
एस ऐम ऐस या व्हाट्स-अप,
संदेश लाते।
पुस्तकालय तो हम जाते थे,
अबतो लैपटॉप में क्या,
टैबलेट में सब कुछ समाता।
एक ही जीवन में हमने,
पूरा एक युग देखा है।
छुट्टियों में पहले हम,
नानी दादी के घर थे जाते,
चचेरे ममेरे भाई बहनों के संग,
मौज मस्ती करते,
छुट्टियां बिताकर घर आते।
पर्यटन के बारे में तो,
सोच ही नहीं थे पाते।
अब रिश्तेदारों के लिये,
वक्त ही किसी को कहां है।
किसी को मसूरी शिमला जाना है,
किसी को तीर्थ है करना,
किसी को रोमांचकारी कुछ है करना,
सप्ताहांत में शॉपिंग,
या फिर बच्चों को पढ़ाना है।
पढ़ाई से याद आया,
हम तो यो ही पढ़ गये थे।
पांच दस रुपये में कक्षा चढ़ गये थे,
अब तो लेकिन हज़ारों का ज़माना है।
एक ही जीवन में हमने,
एक युग पूरा देखा है।
पहले बस या रेल से,
यों ही चले जाते थे कहीं,
और अब महीनों पहले,
आरक्षण का झंझट जुटाना,
तत्काल जाना हो तो तत्काल भी,
टिकिट न पाने का ज़माना।
हवाई यात्रा तो अमीरों से अमीरों की,
चीज़ हुआ करती थी।
अब तो हर काम काजी व्यक्ति,
रोज़ उड़ा करता है।
सुबह को मुंबई में मीटिंग करके,
दिल्ली मे आकर सोता है।
एक ही जीवन में हमने,
एक युग पूरा देखा है।
रिश्ते पहले भी खट्टे-मीठे थे,
पर रिश्तों को सीचने को वक़्त था।
अब तो वक़्त हाथ से ही,
फिसलता जा जाता है।
इंसान धीमा पड़ गया है,
वक़्त की रफ्तार से।
एक ही जीवन में हमने,
एक युग पूरा देखा है।

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3 Comments on "युग देखा है"

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विजय निकोर
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विजय निकोर

//रिश्ते पहले भी खट्टे-मीठे थे,
पर रिश्तों को सीचने को वक़्त था।
अब तो वक़्त हाथ से ही,
फिसलता जा जाता है।
इंसान धीमा पड़ गया है,
वक़्त की रफ्तार से।//

बहुत ही सुन्दर भाव हैं यह। रचना के लिए बधाई।

आर. सिंह
Guest
बीनू जी के इस वर्णात्मक सुन्दर कविता को पढ़कर एक पुराने गाने का मुखड़ा याद आ रहा है, युग बदला,पर बदल न पाया यह इतिहास. जब जब राम ने जन्म लिया तब तब पाया बनवास. सोचता हूँ कि क्या कुछ बदला भी है.जब से जन्म लिया है,तब से तो यही सब देखता आ रहा हूँ.जन्म आजादी के पहले हुआ था,पर आजादी के साथ साथ ही कुछ समझने लायक हुआ था.अकर्मण्यता पहले भी थी,आज भी है.भ्रष्ट तब भी पूजे जाते थे,आज भी पूजे जाते हैं.मंदिर ऊपरी आमदनी से बनता था,चढ़ावा ऊपरी आमदनी वाले चढ़ाते थे. आज भी वही है.हाँ यह बदलाव… Read more »
गंगानन्द झा
Guest
गंगानन्द झा

सुन्दर,अति सुन्दर

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