लेखक परिचय

अशोक बजाज

अशोक बजाज

श्री अशोक बजाज उम्र 54 वर्ष , रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर से एम.ए. (अर्थशास्त्र) की डिग्री। 1 अप्रेल 2005 से मार्च 2010 तक जिला पंचायत रायपुर के अध्यक्ष पद का निर्वहन। सहकारी संस्थाओं एंव संगठनात्मक कार्यो का लम्बा अनुभव। फोटोग्राफी, पत्रकारिता एंव लेखन के कार्यो में रूचि। पहला लेख सन् 1981 में “धान का समर्थन मूल्य और उत्पादन लागत” शीर्षक से दैनिक युगधर्म रायपुर से प्रकाशित । वर्तमान पता-सिविल लाईन रायपुर ( छ. ग.)। ई-मेल - ashokbajaj5969@yahoo.com, ashokbajaj99.blogspot.com

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 अशोक बजाज

लेडीज़ एंड जेंटलमेन,

गुड मार्निंग

 

पूरे इण्डिया में 14 सितंबर को औपचारिक रूप से हिंदी दिवस मनाया गया. मेरा स्कूल मीडियम इंगलिश है तो क्या हुआ यहाँ भी हिंदी दिवस पर गोष्ठी का प्रोग्राम रखा गया. हमारे प्रिंसिपल मि. के. पी. नाथ ने हिंदी की महत्ता पर प्रकाश डाला तथा हिंदी की गरिमा बढ़ाने पर बल दिया. हिंदी के टीचर मि. टी.आर. गर्ग ने हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु महत्वपूर्ण टिप्स दिये.प्रोग्राम के अंत में उन्हें हिंदी की उत्कृष्ट सेवा के लिए सम्मानित कर एक मोमेंटो प्रदान किया गया . स्कूल से लौटते वक्त हमें रोड में जगह जगह हिंदी दिवस के पोस्टर दिखाई दिये. घर पहुचते ही मैने थोड़ा ब्रेकफास्ट लिया और रोज की तरह बैट बाल लेकर समीप के क्रिकेट ग्राउंड की तरफ निकल गया . पिंटू को भी साथ लेकर जाना था उसका घर आन द वे है , उसके घर “ग्रीन हॉउस” में एंट्री करते ही पिंटू के डैडी प्रभाकर अंकल मिले उन्हें नमस्ते किया और पिंटू के साथ क्रिकेट खेलने निकल गया . ग्राउंड में पहले से ही अनेक फ्रेंड्स मौजूद थे . एक-दूसरे को हाय हैलो करने के बाद हम लोग क्रिकेट खेलने लगे , कुछ देर खेलने के बाद हम लोग गप्प मारने बैठ गए . यहाँ भी हिंदी दिवस की चर्चा शुरू हो गई . सभी मित्र अपने अपने स्कूल में हुए प्रोग्राम पर कमेन्ट करने लगे. किसी ने कहा कि हमें हिंदी बोलने की प्रेक्टिस करनी चाहिए क्योकि हिंदी हमारी मातृ भाषा है अतः हमें हिंदी को इंपोर्टेंस देना चाहिए. किसी ने अंगरेजी की वकालत की तो कुछ ने दोनों भाषा को सामान रूप से अपनाने पर बल दिया , इस बीच अचानक तेज बारिस होने लगी और हम सब अपने अपने व्हीकल से घर की ओर भागे. हिंदी दिवस पर हमारी चर्चा अधूरी ही रही, मैंने सोचा घर पहुँच कर मम्मी-डैडी से हिन्दी दिवस पर चर्चा करूँगा. घर पहुंचा तो देखा कि डैडी आफिस से लौटकर सेक्सपियर के उपन्यास में खोये हुए है तथा मम्मी टी.व्ही.सीरियल देखनें में व्यस्त है. मैंने कपड़े चेंज किये और पोर्च में बैठकर बारिस के पानी के तेज प्रवाह से चिथड़े चिथड़े हो कर बहते हुए हिंदी न्यूज पेपर के टुकड़ों को टकटकी लगाये देखता रहा.

आपका – आर.सी.गंग

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1 Comment on "हिन्दी बेचारी और मेरी लाचारी"

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डॉ. राजेश कपूर
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प्रचलित हिंदी पर यह लेख सशक्त ढंग से इंगित करता है. पर निराशा जैसी भी बात नहीं है. अंग्रेजी की दीनता व निर्धनता और हिंदी की श्रेष्ठता के जानने लिए प्रो. मधुसुदन जी के प्रवक्ता पर छपे अमूल्य लेख पढ़ें तो हिंदी की वास्तविकता को समझने में सहायता मिलती है. उनके ये लेख इस शताब्दी के अत्यंत मूल्यवान लेख हैं जो हिंदी के बारे में आँखें खोलने वाले हैं. विनीत,
– डा. राजेश कपूर.

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