लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

अखिरकार केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार में बहुप्रतिक्षित एवं बहुचर्चित फेरबदल हो गया। इस फेरबदल ने दो बातें रेखाकिंत की हैं, एक तो सरकार भ्रष्टाचार के लगे दागों को मल-मलकर धोना नहीं चाहती। दूसरे उत्तर-मघ्य भारत को शायद सप्रंग ने इसलिए नकारा है,क्योंकि उसे शायद पूर्वाभास हो गया है कि इस पूरे हिंदी क्षेत्र में उसकी चुनावी संभावनाएं नगण्य है। इसलिए उसका ध्यान दक्षिण व पश्चिम में है। राहुल गांधी ने मंत्री मंण्डल में शामिल न होकर साफ कर दिया है कि उनमें राजनीतिक नेतृत्व तो थी ही नहीं, प्रशासनिक कार्यकुशलता का भी अभाव है। लिहाजा सोनिया गांधी ने चतुरार्इ से काम लेते हुए राहुल को मुटठी बंद रखने की ही नसीहत दी हो ? बहरहाल इस फेरबदल से न तो आर्थिक मंदी को कोर्इ नर्इ दिशा मिलने वाली है और न ही मंहगार्इ पर अंकुश लगने की उम्मीद इसमें अंतनिर्हित है। धोटालों की कालिख के जो दशानन केंद्रीय सता में विराजमान हैं, वे बार-बार संप्रग की नकारात्मक छवि को ही उभारने का काम करेंगे। हालांकि कांग्रेस केंदि्रत इस बदलाव ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस अब सहयोगी धटक दलों को ज्यादा महत्व देने वाली नहीं है। क्योंकि परिर्वतन की भूमिका में केवल राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के तारिक अनवर का चेहरा है।

विस्तार के नजरियों से तो अब केन्द्रीय मंत्री मण्डल में मंत्रियों का समूह 67 से बढ़कर 78 हो गया है, लेकिन लोक छवि यथावत है। क्योंकि न तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्रियों को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बाहर का रास्ता दिखा पाए और न ही धवल चेहरों को शामिल कर पाए। जाहिर है, राजनीतिक मजबूरियों का घटाटोप उनके सिर पर सवार है। इसलिए परिर्वतन में सुबह के सूरज सी चमक नहीं है। कोयले की दलाली में हाथ काले होने के बावजूद श्रीप्रकाश जयसवाल और अंपगों की वैशखियां हड़प लेने वाले सलमान खुर्षीद मंत्री समूह में शामिल हैं। हालांकि कोलगेट में कोलखण्ड हथियाने को लेकर सुबोधकांत सहाय को जाना पड़ा। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा भी मंत्री मण्डल से बाहर हैं। उनको हटाने के पीछे प्रत्यक्ष कारण तो यह बताया जा रहा है कि अगले साल कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव को मददेनजर उन्हें संगठन में महत्पूर्ण जगह दी जाएगी। जबकि असली वजह कर्नाटक लेकायुक्त द्धारा दी गर्इ वह रिर्पाट है, जिसमें मैसूर-बंगलूर एक्प्रेसवे के लिए की गर्इ जमीन अधिग्रहण के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री वीएस यदियुरप्पा, एचडी देवगौड़ा और एसएम कृष्ण को दोषी ठहराया गया है। हालांकि आर्इपीएल में वित्तीय अनियमितताओं के चलते दो साल पहले शशि थरूर को पद मुक्त कर दिया गया था, अब पेज थी्र और सोशल वेवसाइड़ो के जरिए चर्चा में बने रहने वाले यही अंग्रेजीदां शशि थरूर फिर से मंत्री मण्डल में है। जाहिर है नए मंत्री मण्डल के रचनाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ार्इ लड़ते नहीं दिख रहे हैं।

इस विस्तार में सबसे ज्यादा जगह आंध्रप्रदेश के कांगे्रसी सासंदो को मिली है। छह संसद मंत्री बनाए गए हैं। यह कवायद, पृथक तेलांगना राज्य की मांग करने वालों और वार्इएसआर के जगन मोहन रेडडी से पेश आ रही मुश्किलों से निपटने की तैयारी है। इसलिए आंध्र के अलग-अलग क्षेंत्रो और धार्मिक व जातीय समुदायों से छह मंत्रियों को शामिल किया गया है। लेकिन यह नर्इ राजनीतिक ताकत कांग्रेस की बंजर हो चुकी जमीन को कितना उर्वरा बना पाती है, यह तो चुनाव नतीजों से ही तय होगा। ये छह कमोवेश अनजान चेहरे सियासी जमीन पर वोटों के कितने फल पका पाते है, इसकी परीक्षा होनी बांकी है।

पश्चिम बंगाल से एक साथ तीन सासंदो को केंद्रीय मंत्री मण्डल में जगह देकर कांग्रेस ने ममता को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की खुली चुनौती दे दी है। हांलाकि इनमें प्रियरंजन दास मुंषी की पत्नी दीपादास मुंषी ऐसी नेता रही हैं, जो ममता से लोहा लेती रही हैं। टीवी की बहस खिड़कियों पर ममता के खिलाफ तार्किक बहस करते उन्हें देखा जाता रहा है। शायद अब कंग्रेस के पास बंगाल में सीधे मुकाबले के लिए ऐसा दूसरा नेता नहीं है। दीपा बांगंला, हिंदी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं में दक्ष हैं। हिंदी में शपथ लेकर उन्होंने राश्ट्रभाषा की गरिमा का भी खयाल रखा हालांकि अरूणाचल के निनांग एरिंग और आंध्र के बलराम नायक ने भी हिंदी में शपथ ली। किंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण सिथति रही कि राजस्थान के जोधपुर से सांसद चंदेश कुमारी ने अंग्रेजी में शपथ ली। इससे संदेश गया कि अंग्रेजी हुकूमत के कायल रहे राजे-रजवाड़ों के वंशज न तो अंग्रेजीदां सांमती मानसिकता से मुक्त नहीं हुए हैं और न ही उन्हें राष्ट्रीय स्वाभिमान का ख्याल है ? हांलाकि हिंदी प्रेमी यह खुशफहमी पालकर संतुष्ट हो सकते हैं कि पूर्वोत्तर समेत अन्य अहिंदी क्षेत्रों में लोग हिंदी के महत्व को स्वीकार रहे है।

इस फेरबदल में सबसे ज्यादा उपेक्षा समूचे हिंदी क्षेत्र की हुर्इ है। इससे जनमानस में यह संदेश भी गया है कि पंजाब व जम्मू-कशमीर समेत उत्तर और मघ्यभारत में कांग्रेस ने कमोवेश अपनी हार मान ली है। नतीजतन कांग्रेस की कोषिश रही है कि वह दक्षिण और पश्चिम भारत में अपनी राजनीतिक सिथती को पुख्ता करे। वैसे भी यह फेरबदल कांग्रेस केनिद्रत रहा है। राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के तारिक अनवर की केंद्रीय मंत्री मण्डल में भागीदारी महज एक अपवाद है। हालांकि इसी दल की अगाथा संगमा की छुट्रटी कर दी गर्इ है। उन्हें यह सजा राश्ट्रपति चुनाव में प्रत्याषी बने अपने पिता पीए संगमा का खुला प्रचार करने की मिली है। तृणमूल द्वारा समर्थन वापिस के बाद संप्रग में दूसरी बड़ी सहयोगी पार्टी द्रुमुक है। द्रमुक के 18 संसद हैं। द्रुमुक कोटे से ए राजा और दयानिधि मारन के पद खाली हुए थे, लेकिन इन्हें दु्रमुक से भरा नहीं गया। हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री नारायण सामी करूणानिधि से मिले भी थे, लेकिन उन्होंने द्रुमुक सांसदों के मंत्री मण्डल में शामिल होने से मना कर दिया। जाहिर है करूणानिधि तीसरे र्मोर्च को दिशा देने की फिराक में है। ऐसे में कांग्रेस की कमजोर कड़ी सामने आते ही वे समर्थन वापिस ले सकते हैं।

इस पुरे फेरबदल में यदि सबसे ज्यादा किसी ने निराश किया है तो वे हैं, कांग्रेस के तथाकथित भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी। वे कांग्रेस की समस्या भी हैं और समाधन भी। उनसे बड़ी उम्मीद थी, कि वे न केवल कांग्रेस को दिशा देंगे, बलिक युवाओं का कंगे्रस के पक्ष में ध्रुवीकरण भी करेंगे। लेकिन 2009 में जब से सकि्रय हुए हैं तब से लेकर अब तक कोर्इ उल्लेखनीय परिणाम नहीं दे पाए। बिहार और उत्तर प्रदेश में राहुल ने अपनी पूरी दम भी लगाकर देख ली, लेकिन नतीजे रहे, वही ढाक के तीन पात। जाहिर है, उनमें वह नेतृत्व कौशल नहीं है जो एक जमीनी नेता में होता है। यदि उनमें कौशल दक्षता होती और वे केवल बिहार और उत्तरप्रदेश में ही अपनी काबलियत दिखा पाते तो कांग्रेस को दक्षिण और पश्चिम भारत में झांकने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि इन दो प्रदेषों में ही लोकसभा की एक तिहार्इ सीटें हैं। इसके उलट आखिलेश यादव ने उत्तरप्रदेश में राजनीतिक बागडोर संभालते ही अपनी नेतृत्व कुशलता का परचम फहरा दिया। अब तो यह अहसास होने लगा है कि राहुल को राजनीति में धकेला जा रहा है और लाचार राहुल अनमने पन से राजनीति में हैं। इसी अनमने मन के चलते वे मंत्री नहीं बने। यदि वे मंत्री पद संभाल लेते तो कामकाज की शिथिलता और अकुशलता उनकी असलीयत उजागर कर देती। लिहाजा निकम्मेपन की नाकामी को संगठन में जिम्मेबारी के परदे से ढांका जा रहा है। राहुल के लिए मुनासिब भी यही है। तय है, राहुल में नेतृत्व की कमी और मनमोहन सिंह के द्वारा नेतृत्व न दे पाना, दो ऐसी वजह हैं जिनके चलते उत्तर और मघ्यभारत में कांग्रेस के लिए इतना बड़ा गडढा तैयार हो गया है, जिसे पाटने की इस फेरबदल मे कोर्इ ठोस कवायद नहीं दिखी। इस क्षेत्र की उपेक्षा करके, कांग्रेस ने अपना जनाधार और घटा लिया है।इस फेरबदल में किसी क्षेत्र की उपेक्षा तो की ही नहीं जानी चाहिए थी, कांग्रेस को भ्रष्टाचार से दो चार होते हुए भी दिखना चाहिए था।

 

 

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